गुरुवार, 22 मार्च 2018

120 दोहे

120 दोहे
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1
हे गणपति हे गजानन, हे  गणेश भगवान।
रिद्धि-सिद्धि के साथ दें, हमें अभय वरदान।।

2
द्वापर युग में इन्द्र का, तोड़ा ज्यों अभिमान।
त्यों सबकी रक्षा करें, कलियुग से भगवान।।

3
इन्द्र देव के वज्र से,हनु पर हुआ प्रहार।
कहलाए हनुमान तब,जग में पवनकुमार।।

4
कर देती नौ रात में,जीवन का उद्धार।
माँ की महिमा यूँ नहीं, गाता है संसार।।

5
जय हो शिव के ध्यान की,जय शंकर भगवान।
जग है शिव के ध्यान में,शिव को जग का ध्यान।।

6
लोग सफलता के लिए, करते क्या-क्या काम।
मगर सफल होता वही, जिसे चाहते राम।।

7
देव तरसते हैं जिसे, ऐसी मानव देह।
ऐ मानव क्यों है नहीं, तुझको इससे नेह।।

8
ऊपरवाले ने रचा, इसको मेरे मीत।
इसीलिए सबसे मधुर, मन का है संगीत।।

9
कुत्तों की भी आदमी, जैसी ही तक़दीर।
कोई जूठन खा रहा, कोई मुर्ग़-पनीर।।

10
अच्छा तो है बोलना, साफ़-साफ़ दो टूक।
लेकिन ऐसा हर जगह, अच्छा नहीं सुलूक।।

11
निष्क्रिय होकर मत करें,जीवन को बेरंग।
पड़े-पड़े तो लौह भी,खा जाता है ज़ंग।।

12
अपनी नेकी की रखें, ऐसी भी कुछ राह।
जिनका हो संसार में,केवल ख़ुदा गवाह।।

13
साथ किताबी ज्ञान के,जो दे जीवनज्ञान।
शिक्षक वही प्रणम्य है, जिसके शिष्य महान।।

14
हाथी-विषधर-शेर से,पा लेता जो पार।
अपने ही दिल से वही, मानव जाता हार।।

15
इच्छा और लगाव से,थकता है इंसान।
वरना ये हर जीव से,होता है बलवान।।

16
मानव का सबसे बड़ा, दुश्मन है अभिमान।
अंतर रावण-राम का, इसकी है पहचान।।

17
एक तुम्हें त्रुटि बता रहा, शेष लोग हैं मौन।
शुभचिंतक सोचो तुम्हीं, यहाँ तुम्हारा कौन।।

18
हम दोनोंं में बढ़ रही, रोज़ बहस-तकरार।
इसका मतलब रास्ते पर है अपना प्यार।।

19
अपने मन में जो तुम्हें, मिले नहीं भगवान।
फिर वो मिल सकते नहीं, ढूँढो सकल जहान।।

20
भूलचूक-ग़लती-क्षमा,आपस में तकरार।
इन सब बातों के बिना, कैसा रिश्ता-प्यार।।

21
इच्छाएँ ही ज़िंदगी, करती हैं दुश्वार।
लेकिन मारे किस तरह,तमन्नाएँ संसार।।

22
गायत्री-गीता-गऊ,गुरु का करिए मान।
जीवन होगा आपका,अपनेआप महान।।

23
नदियाँ अपनी राह में, कितना करें कटाव।
मगर दिशा में वो नहीं, करती हैं बदलाव।।

24
लड़ते हैं जिनके लिए,हम मानव नादान।
कभी सुना है, हों लड़े ख़ुदा और भगवान।।

25
अपनों से ही रूठने,लड़ने का अधिकार।
ग़ैरों से कैसा गिला,क्या झगड़ा-तकरार।।

26
होता वो सबसे अधिक, पावरफ़ुल इंसान।
अपनी पावर की जिसे, होती है पहचान।।

27
जीना पड़ता है उसे, जननी का किरदार।
यूँ ही हो जाता नहींं, कोई रचनाकार।।

28
आख़िर चमके किस तरह,मेरा हिंदुस्तान।
यहाँ सफ़ाई भी नहीं, होती बिन अभियान।।

29
अपने पर कुछ भूलकर, करना नहीं गुमान।
जीवन में जो हो रहा,सब है ईश विधान।।

30
मीठा सुनना ही नहीं, उसकी है तक़दीर।
जिसकी बोली को नहीं, मिली मधुर तासीर।।

31
निर्धन होना पाप है, ठीक कह रहे आप।
मरना भी निर्धन मगर, इससे बढ़कर पाप।।

32
रिश्ता यूँ होता नहीं, कोई अमर-बुलंद।
गुल मरते हैं तब कहीं, बनता है गुलकंद।।

33
उसके जीवन को पढ़ो,देखो बिम्ब अनूप।
हर नारी में हैं छुपे,दुर्गा के नौ रूप।।

34
एक-दूसरे से रहें,कितने हम नाराज़।
ध्यान रहे जाए नहीं, और कहीं ये राज़।।

35
अच्छे लोगों के मधुर,कटु भी समझो बोल।
मोती कचरे में गिरे,फिर भी है अनमोल।।

36
दिलवाते हैं कर्म ही,हमें दंड-सम्मान।
जीवन में इस बात का, हरदम रखिए ध्यान।।

37
लंकापति को खा गया, ख़ुद उसका अभिमान।
वरना रावण की नहीं, जा सकती थी जान।।

38
रूप-बुद्धि सबको अलग,देते हैं करतार।
कैसे होगा सोचिए,सबका एक विचार।।

39
जीवन में हरगिज़ नहीं, छोड़ें उनका हाथ।
बुरे दिनों में आपका,दिया जिन्होंने साथ।।

40
उनके ऊपर प्रभु कृपा, समझो बड़ी असीम।
जिन गाँवों में आज भी,पीपल-बरगद-नीम।।

41
चाहे जितनी कोशिशें, कितना करें प्रयास।
फिर मिलना बचपन नहीं, या टूटा विश्वास।।

42
भले ख़ूबियों पर नहीं, तेरी करे विचार।
बख़्श नहीं सकता तुझे, ग़लती पर संसार।।

43
शुभ कामों का फल शुभ,ही होगा श्रीमान।
व्यर्थ कभी जाता नहीं, प्रभु सुमिरन या दान।।

44
मिसरी हो या फिटकरी, दोनों एक समान।
बाहर से अच्छा नहीं, अंदर का अनुमान।।

45
ठीक नहीं है तोड़ना, यूँ कोई अनुबंध।
किंतु निभाना भी ग़लत,बेमन का सम्बंध।।

46
शकुनि-मंथरा भी यहाँ, होते बिल्कुल फ़ेल।
भारत में जो चल रहा, राजनीति का खेल।।

47
अगर नाम की चाह है, तो करिए कुछ काम।
दुनिया में किसको मिला, बिना काम का नाम।।

48
सरपर जो मँडरा रहा, नहीं दिख रहा काल।
बाक़ी है इंसान को,सब कुछ यहाँ ख़याल।।

49
कर पाएगी कौन सी,मुश्किल उसको बैक।
जिसने बस में कर लिया, सच्चाई का ट्रैक।।

50
सच्चे हो तो कुछ नहीं, देना कहीं जवाब।
दुनिया के आरोप से,कितना लगे ख़राब।।

51
बेजा है नाराज़गी, का उनसे अंदाज़।
जहाँ स्वयं कहना पड़े,हम तुमसे नाराज़।।

52
पक्ष रखो अपना तभी, होगा बेड़ापार।
मौन रहे तो और भी,दुख देगा संसार।।

53
दुनिया में हर बात का, होता है कुछ अर्थ।
उचित कहीं पर मौन है, कहीं बोलना व्यर्थ।।

54
हे माँ जैसे कष्ट में,होता अपनेआप।
हैरत में हम बोलते, अरे बाप रे बाप।।

55
आज नहीं तो क्या हुआ,कल निखरेगा चित्र।
छोड़ो मत उम्मीद का,दामन मेरे मित्र।।

56
पैसे से पहले करें,लोगों का सम्मान।
चार लोग ही आपको, छोड़ेंगे शमशान।।

57
कभी किसी पर भी नहीं, क़ायम करिए राय।
कार और घर देखकर, या फिर उसकी आय।

58
दिल पर ली जाती नहीं, उन लोगों की बात।
जिनकी यादों से सजी,है दिल की बारात।।

59
घर पावन जैसे नहीं, है बिन तुलसी मित्र।
ये शरीर होता नहीं, बिन हरि भजन पवित्र।।

60
बोल न सकने के सबब,पशु होते हैरान।
हद से बाहर बोलकर, दुख सहता इंसान।।

61
वादे-शर्तों से नहीं, निभते हैं संबंध।
दिल-दिल मिलने से टिके,रिश्तों का अनुबंध।।

62
आत्मज्ञान का ख़ुद-ब-ख़ुद,हासिल होगा गोल।
अनुशासित यदि ज़िंदगी, मन पर है कंट्रोल।।

63
पुनर्जन्म पर हर बहस,और तर्क है व्यर्थ।
जन्म-मृत्यु का जब तलक,पता नहीं है अर्थ।।

64
महका दे माहौल जो,होता है वो इत्र।
जिससे महके ज़िंदगी, उसको कहते मित्र।।

65
दर्पण की उसके लिए, आख़ि
81
ऊपरवाला किस तरह, करता मालामाल।
करके देखें तो सही, अपना हृदय विशाल।।

82
बहुत भरोसे आजतक, टूटे कई क़रार।
लेकिन आदत है वही, करना सबसे प्यार।।

83
माफ़ उसे मत कीजिए, जिसके दिल में खोट।
जिसका मक़सद आपके, दिल पर करना चोट।।

84
मन तो सबके पास है, इसमें क्या है ख़ास।
ख़ास बात है आपके, रहे मनोबल पास।।

85
मानव के मन में बना, शायद कोई छिद्र।
कितना भी मिलता इसे, रहता सदा दरिद्र।।

86
रिश्तों के संसार में, जैसै फूल-सुगंध।
होता है बिल्कुल वही, पति-पत्नी संबंध।।

87
चलिए ढूँढें हम उसे, है वो किसके पास।
आपस में तो है नहीं, आपस का विश्वास।।

88
मछली से होती बड़ी,कछुए की तक़दीर।
जल-धरती दोनों जगह,है उसकी जागीर।।

89
सच्चाई का देखते, झूठे आज हिसाब।
इससे बढ़कर और क्या, होगा वक़्त ख़राब।।

90
जैसे तन की पीर का,हल्दी करे निदान।
दर्द दूर मन का करे,वैसे ही मुस्कान।।

91
सरल इस क़दर भी रखो,मत अपना व्यक्तित्व।
ख़तरे में जो डाल दे,मान और अस्तित्व।।

92
आत्मसात हर बात जो,कर ले हर हालात।
सच्चा योगी है वही, जिसमें है ये बात।।

93
पतझड़ के बिन पेड़ पर,आती नहीं बहार।
जीवन बिन संघर्ष के,कैसे हो गुलज़ार।।

94
सरल-भला भी आजकल, होना एक गुनाह।
बहुत बुरे हालात हैं, ख़ैर करे अल्लाह।।

95
चलो मोहब्बत का रचें,हम ऐसा संसार।
मँहगाई जैसा घटे,कभी न अपना प्यार।।

96
औरों को ख़ुश देख जो,ख़ुश होते इंसान।
उसे दुखी होने नहीं, देते हैं भगवान।।

97
चैनसुकूं की बात अब,करना है बेकार।
पहले जैसा अब कहाँ,है जीवनसंसार।।

98
हिचकोले हों राह में,कितने रहें तनाव।
डूब नहीं सकती मगर,कभी सत्य की नाव।।

99
जग में चुभने के लिए,काँटे हैं बदनाम।
इस धोखे में फूल भी,कर जाते ये काम।।

100
किसी के दुख के न बनें,कारण मेरे कर्म।
मेरी नज़रों में यही, पहला मानव धर्म।।

101
दवा और उसके लिए, दुआ हुई बेकार।
जो भी इस संसार में, "मैं" का हुआ शिकार।।

102
उठे अगर तो देव हो,गिरने पर हैवान।
हे प्रभु! तूने भी अजब,जीव रचा इंसान।।

103
पत्थर रखकर पेटपर, जीना है आसान।
अच्छा लगता है किसे,वरना सरपर भार।।

104
धर्म नहीं अंधा यक़ीं,केवल है बकवास।
बिन समझे कुछ मानना, सिर्फ़ अंधविश्वास।।

105
उदाहरण देना कहीं, बेहद है आसान।
उदाहरण तुम ख़ुद बनो,तो है काम महान।

106
सम्पूर्ण कोई नहीं, पर 'कुछ' हर इंसान।
सबकी बातों को सुनें,सबसे सीखें ज्ञान।।

107
ख़ामोशी का कम नहीं, अपना रुतबा मित्र।
लोग समझ पाते नहीं, बेशक इसका चित्र।।

108
ठहरो कहना बाद में,तुम मन के जज़्बात।
वर्तमान युग में सुनो,पहले धन की बात।

109
लोगों से आसेवफ़ा, मत करिए बेकार।
दिली नहीं इस दौर में,ज़रूरतन है प्यार।।

110
समझा गर्देराह जो,चंदन और गुलाल।
जग में जीवन की वही, समझ सका है चाल।।

111
मीठा लहजा झूठ की,होती है दयकार।
सच कैसे भी बोल तू,कड़वा होगा यार।।

112
वृन्दावन चाहे कहो,उसको राधाधाम।
वृन्दा-तुलसी-राधिका, सब राधा के नाम।।

113
क़द-पद पर है मित्र का,निर्भर नहीं चरित्र।
मुश्किल में जो साथ दे,वही हमारा मित्र।।

114
रह सकते हैं साथ में,शीशा एवं संग।
दोनों यदि ये सोच लें,नहीं करेंगे जंग।

115
हमें ज़रूरी तो नहीं, चाहे हर इंसान।
मगर जिएँ ऐसा,रहें,ख़ुश हमसे भगवान।।

116
मन का शत्रु विवाद है, तन का दुश्मन स्वाद।
इनसे बचिए ज़िंदगी, ख़ुद होगी आबाद।।

117
धीरज करना है कठिन, मगर लिया ये साध।
फिर जीवन का हर सफ़र,समझो हुआ अबाध।।

118
श्याम-श्याम के जाप से,होंगे सारे काम।
पर राधेराधे जपो,आएँगे तब श्याम।।

119
आस और उम्मीद का,कम करिए सामान।
अपने जीवन का सफ़र,रखना यदि आसान।।

120
मेरे क़दमों से अभी, मंज़िल काफ़ी दूर।
मगर तसल्ली, साथ है, क़दमों का भरपूर।।

121
उलझी बातें भी मधुर,हो सकती हैं मित्र।
जलेबियाँ इस बात का,प्रस्तुत करतीं चित्र।।

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