रविवार, 11 मार्च 2018

हास्य रचनाएँ १ : संजीव

मुक्तिका:
*
जीना अपनी मर्जी से
मगर नहीं खुदगर्जी से
*
गला काटना, ठान लिया?
कला सीख लो दर्जी से
*
दुश्मन से कम खतरा है
अधिक दोस्ती फर्जी से
*
और सभी कुछ पा लोगे
प्यार न मिलता अर्जी से
*
'सलिल' जरा तो सब्र करो
दूर रहो सुख कर्जी से
*
हास्य मुक्तिका:
*
हाय मल्लिका!, हाय बिपाशा!!
हाउसफुल पिक्चर की आशा 
*
तुम बिन बोलीवुड है सूना
तुम हो गरमागरम तमाशा
*
तोला-माशा रूप तुम्हारा
झीने कपड़े रत्ती-माशा
*
फ़िदा खुदा, इंसां, शैतां भी
हाय! हाय!! क्या रूप तराशा?
*
गले लगाने ह्रदय मचलता
आँख खुले तो मिले हताशा
*
मानें हार अप्सरा-हूरें
उर्वशियों को हुई हताशा
*
नहा नीर में आग लगा दो
बूँद-बूँद हो मधुर बताशा
***

मुक्तिका-
धत्तेरे की
*
आँख खुले भी ठोकर खाई धत्तेरे की
नेता से उम्मीद लगाई धत्तेरे की
.
पूज रहा गोबर गणेश पोंगा पण्डज्जी
अंधे ने आँखें दिखलाई धत्तेरे की
.
चौबे चाहे छब्बे होना, दुबे रह गए
अपनी टेंट आप कटवाई धत्तेरे की
.
अपन लुगाई आप देख के आँख फेर लें
छिप-छिप ताकें नार पराई धत्तेरे की
.
एक कमा दो खरचें, ले-लेकर उधार वे
अपनी शामत आप बुलाई धत्तेरे की
*** 
[अवतारी जातीय सारस छंद]
१-५-२०१६, हरदोई
हास्य मुक्तिका:

...छोड़ दें??

*
वायदों का झुनझुना हम क्यों बजाना छोड़ दें?
दिखा सपने आम जन को क्यों लुभाना छोड़ दें??

गलतियों पर गलतियाँ कर-कर छिपाना छोड़ दें?
दूसरों के गीत अपने कह छपाना छोड़ दें??

उठीं खुद पर तीन उँगली उठें परवा है नहीं
एक उँगली आप पर क्यों हम उठाना छोड़ दें??

नहीं भ्रष्टाचार है, यह महज शिष्टाचार है.
कह रहे अन्ना कहें, क्यों घूस खाना छोड़ दें??

पूजते हैं मंदिरों में, मिले राहों पर अगर.
तो कहो क्यों छेड़ना-सीटी बजाना छोड़ दें??

गर पसीना बहाना है तो बहायें आम जन.
ख़ास हैं हम, कहें क्यों करना बहाना छोड़ दें??  

राम मुँह में, छुरी रखना बगल में विरसा 'सलिल'
सिया को बेबात जंगल में पठाना छोड़ दें??

बुढाया है तन तो क्या? दिल है जवां  अपना 'सलिल'
पड़ोसन को देख कैसे मुस्कुराना छोड़ दें?

हैं 'सलिल' नादान क्यों दाना कहाना छोड़ दें? 
रुक्मिणी पा गोपियों को क्यों भुलाना छोड़ दें??
*
ठेंगा





ठेंगे में 'ठ', ठाकुर में 'ठ', ठठा हँसा जो वह ही जीता
कौन ठठेरा?, कौन जुलाहा?, कौन कहाँ कब जूते सीता?
*
ठेंगा दर्शन बेज़ार करे, ठेंगे बिन मिलता चैन नहीं
ठेंगे बिन दिवस नहीं कटता, ठेंगे बिन कटती रैन नहीं
*
बिन ठेंगे कब काम चला है?, लगा, दिखा, चूसो या पकड़ो
चार अँगुलियों पर भारी है ठेंगा एक, न उससे अकड़ो
*
ठेंगे की महिमा भारी है, पूछो ठकुरानी से जाकर
ठेंगे के संग जीभ चिढ़ा दें, हो जाते बेबस करुणाकर
*
ठेंगा हाथों-लट्ठ थामता, पैरों में हो तो बेनामी
ठेंगा लगता, इसकी दौलत उसको दे देता है दामी
*
लोक देखता आया ठेंगा, नेता दिखा-दिखा है जीता
सीता-गीता हैं संसद में, लोकतंत्र को लगा पलीता
*
राम बाग़ में लंका जैसा दृश्य हुआ अभिनीत, ध्वंस भी
कान्हा गायब, यादव करनी देख अचंभित हुआ कंस भी
*
ठेंगा नितीश मुलायम लालू, ममता माया जया सोनिया
मौनी बाबा गुमसुम-अण्णा, आप बने तो मिले ना ठिया
*
चाय बेचकर छप्पन इंची, सीना बन जाता है ठेंगा
वादों को जुमला कहता है, अंधे को कहता है भेंगा
*
लोकतंत्र को लोभतंत्र कर, ठगता ठेंगा खुद अपने को
ढपली-राग हो गया ठेंगा, बेच रहा जन के सपने को
*
ठेंगे के आगे नतमस्तक, चतुर अँगुलियाँ चले न कुछ बस
ठेंगे ठाकुर को अर्पित कर भोग लगाओ, 'सलिल' मिले जस
***

हास्य कविता:

जन्म दिन

*













*
पत्नी जी के जन्म दिवस पर, पति जी थे चुप-मौन.
जैसे उन्हें न मालुम है कुछ, आज पधारा कौन? 

सोचा तंग करूँ कुछ, समझीं पत्नी: 'इन्हें न याद. 
पल में मजा चखाती हूँ, भूलेंगे सारा स्वाद'..

बोलीं: 'मैके जाती हूँ मैं, लेना पका रसोई. 
बर्तन करना साफ़, लगाना झाड़ू, मदद न कोई..'

पति मुस्काते रहे, तमककर की पूरी तैयारी. 
बाहर लगीं निकलने तब पति जी की आयी बारी..

बोले: 'प्रिय! मैके जाओ तुम, मैं जाता ससुराल.
साली-सासू जी के हाथों, भोजन मिले कमाल..'

पत्नी बमकीं: 'नहीं ज़रूरत तुम्हें वहाँ जाने की. 
मुझको पता पता है, छोडो आदत भरमाने की..'

पति बोले: 'ले जाओ हथौड़ी, तोड़ो जाकर ताला.'
पत्नी गुस्साईं: 'ताला क्या अकल पे तुमने डाला?'

पति बोले : 'बेअकल तभी तो तुमको किया पसंद.'
अकलवान तुम तभी बनाया है मुझको खाविंद..''

पत्नी गुस्सा हो जैसे ही घर से बाहर  निकली. 
द्वार खड़े पीहरवालों को देख तबीयत पिघली..

लौटीं सबको ले, जो देखा तबियत थी चकराई. 
पति जी केक सजा टेबिल पर रहे परोस मिठाई..

'हम भी अगर बच्चे होते', बजा रहे थे गाना. 
मुस्काकर पत्नी से बोले: 'कैसा रहा फ़साना?' 

पत्नी झेंपीं-मुस्काईं, बोलीं: 'तुम तो मक्कार.'
पति बोले:'अपनी मलिका पर खादिम है बलिहार.' 

साली चहकीं: 'जीजी! जीजाजी ने मारा छक्का. 
पत्नी बोलीं: 'जीजा की चमची! यह तो है तुक्का..'

पति बोले: 'चल दिए जलाओ, खाओ-खिलाओ केक. 
गले मिलो मुस्काकर, आओ पास इरादा नेक..

पत्नी घुड़के: 'कैसे हो बेशर्म? न तुमको लाज.
जाने दो अम्मा को फिर मैं पहनाती हूँ ताज'.. 

पति ने जोड़े हाथ कहा:'लो पकड़ रहा मैं कान.
ग्रहण करो उपहार सुमुखी हे! रहे जान में जान..'

***

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