सोमवार, 19 मार्च 2018

doha shatak tribhavan kaul


दोहा शतक
त्रिभवन कौल












आत्मज: स्वर्गीय लक्ष्मी कौल-श्री बद्रीनाथ कौल।
जीवन संगिनी: श्रीमती ललिता कौल।
जन्म: १.१.१९४६, श्री नगर, जम्मू-कश्मीर।
शिक्षा: स्नातक।
लेखन विधा: दोहा, हाइकु, मुक्तछंद।
संप्रति: सेवानिवृत्त सिविलियन ग़ज़्ज़ेटेड अफसर (भारतीय वायु सेना), लेखक-कवि (हिंदी, अंग्रेजी)।
प्रकाशन:  नन्हे-मुन्नों के रूपक, सबरंग, मन की तरंग, बस एक निर्झरणी भावनाओं की। साझा संकलन  लम्हे, सफीना, काव्यशाला,  स्पंदन, कस्तूरी, सहोदरी सोपान २, उत्कर्ष काव्य संग्रह १, विहग प्रीती के, पुष्पगंधा, ढाई आखर प्रेम, अथ से इति स्तंभ वर्ण पिरामिड, शत हाइकुकार साल शताब्दी, सुरभि कंचन।
उपलब्धि: विशेषांक ट्रू मीडिया पत्रिका नवंबर २०१७, ट्रू मीडिया गौरव सम्मान, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल सम्मान, जयशंकर प्रसाद सम्मान, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' सम्मान, पिरामिड भूषण, साहित्य भूषण सम्मान,कवितालोक रत्न, शब्द शिल्पी, मुक्तक लोक भूषण, काव्य सुरभि आदि।
संपर्क: एच १/ २८ तृतीय तल, लाजपत नगर १, नई दिल्ली, ११००२४।
चलभाष: 9871190256, ईमेल: kaultribhawan@gmail.com ।

दोहा शतक

गुरुवर! मुझको दीजिए, कर अनुकंपा ज्ञान।
माँग रहा कर जोड़कर, शिष्य एक अनजान।।
*
परंपरा गुरु-शिष्य की, मिले उसे ही ज्ञान।
लक्ष्य साधता बिंदु पर, करे अँगूठा दान।।
*
बच्चे पढ़-लिख कुछ बनें, मात-पिता-अरमान।
बच्चे पढ़-लिख कुछ बने, भुला जनक पहचान।।
*
आँचल में दौलत भारी, समझ न हुआ अमीर।
आह न लेना किसी की, राज या कि फ़कीर।।
*
अभी रौशनी बहुत है, भाग-निवाला छीन।
जीवन ज्योति जला सतत, सुन ले सुख की बीन।।
*
आतंकी देखे नहीं, धर्म, पंथ या जात।
काफ़िर सबको कह रहे, भूले निज औकात।।
*
पत्थरबाजी सह रहे, बैठे चुप्पी साध।
जेल भेज मत छोड़ कर, शंख-नाद निर्बाध।।
*
शह दें पत्थरबाज़ को, देशी नमकहराम।
जो बोलें जय पाक की, कर दो काम तमाम।।
*
दूध पिएँ विष उगलते, किसका कहें कसूर?
खा जाएँ माँ बेचकर , भारत के नासूर।।
*
मर्यादा श्री राम की, केवल करें बखान।
सिय मर्यादित थीं सदा, न्यून नहीं हनुमान।।
*
मनुज हुआ जब लालची, पर्यावरण विनष्ट।
पौधारोपण से करें, भू का दूर अनिष्ट।।
*
स्वास्थ्य-स्वच्छता बनी हो, कर ऐसा व्यवहार।
हों सब भागीदारी तो, निर्मल हो संसार।।
*
धरतीइनरी एक सम, पोषक-ममताशील।
झोली भर देती रहें , दोनों बहुत सुशील।।
*
कौन ज्ञानियों की सुने, भौतिक सब संसार।
बाबा आडंबर करें, नष्ट हुए आधार।।
*
दे बयान नेता रहे, जग-निंदा के योग्य।
है कटाक्ष सेनाओं पर, नहीं क्षमा के योग्य।।
*
भ्रष्टाचार पनप रहा, चक्की पिसते लोग
भोग भोगते  भार हैं, नेता कैंसर रोग।।
*
नटवरलाल सभी यहाँ, सांठ-गांठ भरपूर।
नेता अफसर सेठ हैं, धन-लोलुप मद-चूर ।।
*
पाक जीत सकता नहीं, लाख लगाए ज़ोर।
आतंकी यह जान लें, सिर्फ कब्र में ठौर।।
*
पाप गले तक आ गया, जनता है लाचार।
दुराचार अपने करें, क्यों न सुने सरकार?।।
*
हम कायर कैसे बने?, गाँधी बंदर यार।
देखो-सुनो-कहो नहीं, क्या है इसमें सार ?।।
*
छः माह की बच्ची कहे, सुन लो मेरी चीख
कल को तेरी ही सुता, माँगे तुझसे भीख।।
*
बारिश-सूखा चरम पर, दोनों देते त्रास।
कभी डूबकर मर रहे, कभी न बुझती प्यास।।
*
सूरज होता अस्त जब, भाग लालिमा संग।
अंत न होता प्रणय का, सुबह भरे नव रंग।।
*
जन्म लिया इंसान थे, फिर खो दी पहचान।
जाति-धर्म फंदे फँसे, लड़ होते हैवान।।
*
कर्म सतत करते रहो, भले न फल हर बार।
पछताने से लाभ क्या, अनुभव मिला अपार।।
*
जिनमें जीवन की समझ, हैं संवेदनशील।
प्यार निराली प्रेरणा, सके बुराई लील।।
*
पड़ा सत्य पर आवरण, कहो उतारे कौन?
पीड़ा अधिक असत्य की, घाव तीर का गौण।।
*
नारी शोषण अब नहीं , देखो रहकर मूक।
साहस कर रोको तुरत, चुप रह करें न चूक।।
*
कालजयी रचना लिखो, दुनिया को हो भान।
लेखन के सिरमौर हो, गाहे सृजन सम्मान।।
*-
बंधन क्यों हो सोच पर, मन खुलकर अब सोच।
जीत-हार मन-भावना, ख़ुशी न अधिक खरोच।।
*
आभासी संसार में, मित्रों की भरमार।
विहँस फँसाएँ जाल में, धोखे कई हज़ार।।
*
धरती के दो रूप हैं, यह माँ वह संसार।
यह प्यारी ममतामयी, वह पोषण आधार।।
*
राजनीति दलदलमयी, दल-दल चलते चाल।
दली गई जनता विवश, जनगण-मन बेहाल।।
*
चिंतन प्रज्ञा यज्ञ है, उठे चेतना जाग।
ईंधन होती प्रेरणा, सुलगा दे मन आग।।
*
समता सदा विचार में, मिलती नहीं सुजान।
गुल गुलाब है एक पर, है हर पर मुस्कान।।
*
मिलन की आज आस है, तनों की बुझे प्यास
दिल कपाट जब भी खुलें, है प्रणय सूत्र रास।।
*
वही रात मधुमास है, जब समीपता ख़ास।
नृत्य करें धडकनें मिल, श्वास-श्वास हो रास।।
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वाणी तेज कटार सी, बोले तो हो त्रास।
चंद प्यार के बोल में, ईश्वर करे निवास।।
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नहीं हौसला मेघ में, बिजली फिरे उदास।
मर्माहत बेबस धरा, क्रोधित नभ तज आस।।
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जीवन है क्रीड़ा नहीं, श्रम नही है त्रास
भटक नही अब पथिक तू, कारण तेरे पास।।
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एक चाँद अति दूर है, एक हमारे पास।
वह बदली में है घिरा, यह है बहुत उदास ।।
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सावन-फागुन में नहीं, पीड़ा या उल्लास।
विरह अगन जल पीर हो, हर्ष अगर प्रिय पास।।
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यह सौंदर्य दिखावटी, उसका भीतर वास।
यह क्षणभंगुर नष्ट हो, वह शाश्वत दे हास।।
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यह बंदा अति ख़ास है, इक उसका जीवन आम।
यह है बस शाने-ख़ुदा, वह ले हरि का नाम ।।
*
मीरा माने समर्पण, राधा माने प्यार।
दोनों हों संपूर्ण जब, कृष्ण बने आधार।।
*
दलित-दलित जपते रहे, सोच मिलेंगे वोट।
हारे- ई वी एम में, बता रहे हैं खोट।।
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आग रूप-सौंदर्य है, साक्षी है इतिहास।
जले पतंगों की तरह, मनुज आम या ख़ास।।
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नेता खड़े चुनाव में, अपनी बिछा बिसात।
आम जनों को बाँटकर, बता रहे औकात।।
*
चौराहे पर खड़े हो, लक्ष्य न मिलता तात।
एक राह पर चलो तो, हँसो लक्ष्य पा भ्रात।।
*
कमी नहीं कमज़ोर की, खोजो मिले करोड़।
गर्दन नीची चाहिए, तजो अकड़ या होड़।।
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मंदिर-मस्जिद ढोंग है, फूलों का व्यापार
काँटों से कर मित्रता , ईश मिले हर बार।।
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पुष्पों k क्या भाग्य हैं, देख ईश्वरी न्याय।
सिर पर जूती के तले, जीवन के अध्याय।।
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जनसंख्या सीमित रहे, हो जीवन उत्कर्ष।
सन सामान सिद्धांत पर, फलता भारतवर्ष।।
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अवसर-सीमा असीमित, उठ छू लो आकाश।
अंतहीन अवसर सुलभ, चमके युवा प्रकाश।।
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दाँव मीन-आखेट है, मानव बगुला यार।
एक टाँग पर खड़ा है, ज्यों साधक हरि-द्वार।।
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अडिग पथिक चलते रहो, होगी जय जयकार।
जो ठाना कोशिश करो, होगी कभी न हार।।
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धनुष उठे जब वीर का, करे घोर टंकार।
लड़ हँस जीवन समर में, पा जय मिले न हार।।
*
दुःख से क्यों तू डर  रहा, इतनी सी औकात?
चंद्र ग्रहण से कब डरे, बोल चॉँदनी रात।।
*
कठिनाई नगपति सदृश, मनुज न डर तू जूझ।
रहो काटते श्रमिक सम, डगर बना नव बूझ।।
*
यदि न ज्ञान मल्लाह को, कहाँ किनारा-बाट।
क्या कसूर मँझधार का, भटक न पाए घाट।।
*
ढोंग बनी कश्मीरियत, जिसे न इसका भान।
छीने औरों को डरा, जो न रहा इंसान।।
*
बहिष्कार कर चीन का, यही उचित है नीत।
चाह मत करो युद्ध की, थोपे तो लड़ जीत।।
*
भारी पड़े तटस्थता, विश्व न कहे सशक्त।
गुटबाज़ी यदि की नहीं, मानें तुझे अशक्त।।
*
जंगल-पर्वत कट रहे, नभ रोता है देख।
जब तक हुई न त्रासदी, मनुज न करता लेख।। 
*
बीज प्रेम का बो रहा, मौन प्रेम से मीत।
दुआ-दवा है प्रेम ही, रुचे न नफरत-नीत।।
*
तुमको पाकर सब मिला, तुम बिन खाली हाथ।
ईश्वर आये तुम्हीं में, तुम बिन रहे न साथ।।
*
ईश-ईश कह थक गया, बहे नयन जल-धार।
सांई फिर भी ना मिले, पा छोड़ा संसार।।
*
पूजा-समझा तुम मिले, सेवा-प्यार अपार।
कैसा जन्म मनुष्य का, धन जीवन आधार।।
*
करिए प्यार-दुलार तो, रखें तिरंगा-मान।
हो विपत्ति में देश यदि, करें आत्म-बलिदान।।
*
आड़े आयी हृदय में, मैं मैं की दीवार।
शब्दों का टोटा रहा, बोल सका कब प्यार ।।
*
संसारी शैतान भी, हम ही हैं भगवान।
जीवन कर्मों पर टिका, जिससे हो पहचान।।
*
छोड़ दीजिये मित्र सब, जो हैं नाग समान।
आस्तीन में झाँकिए, जाने कब लें प्राण।।
*
मात-पिता को छोड़कर, करे बसेरा और।
पुत्र देख अनुसरण करे, मिले कहाँ तब ठौर।।
*
मीठी बोली बोल कर, नेता माँगे वोट
वादों की बौछार हो, जनता खाए चोट।।
*
माटी से माटी मिले, है कैसा फिर क्लेश।
कर्मों से जग जानिये, क्या घर क्या परदेश ।।
*
फूलों के सँग शूल हैं, जीवन के सँग काल।
तथ्य समझ जो आ गया, जी बिन माया जाल।।
*
भारतीय-भारत सगे, धर्म-जात निस्सार।
भारत रहे अखंड तब, सुधिजन करेंविचार।।
*
चिंता नहीं अतीत की, मत रेखाएँ नाप।
वर्तमान तेरा सगा, कल अनजाना ताप।।
*
सब्जी हरी रसूल है, बाकी सब भगवान।
रंगों में मत बाँटिये, आखिर सब इंसान ।।
*
रक्षक जब भक्षक लगे, मानवता की हार।
दुराचार की देन है, कलयुग का उपहार।।                                                                                         
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मन-दर्पण आँसू बहे, जब भी खला अभाव।
नर तो थोथा दर्प है, नारी है मन-भाव।।
*
मानव जन्म सफल बने, सही दिशा लो जान।
लक्ष्य चुने फिर ना डिगे, तब ही मनुज महान।।
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मन-अनुभूति सृजन करे, शब्द नगीने ताज।
संयोजन ऐसा करें, रचना हो सरताज ।।
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आशा कोई मत रखो, सकते सुख न खरीद।
मन -दरवाजे खोल दो, सबको बना मुरीद।।
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बिम्ब और प्रतिबिंब सम, हैं विचार आचार।
देव-दनुज हों संग पर, कृत्य भेद आधार।।
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वन में गुंजित गीत हो, जग-छाए उल्लास।
बहे सावनी धार जब, बुझे धरा की प्यास।।
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करे समर पर काज जो, उसे समय का भान। 
धन से ज्यादा कीमती, समय-मूल्य तू जान।।
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आँसू दिल का आइना, होती है बरसात।
दर्द-क्रोध-सदमा-ख़ुशी, आँसू हैं सौगात।।
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वंशज क्यों पुत्री नहीं, सुत ही क्यों स्वीकार?
नर को नारी जन्म दे, नर मत कर अपकार।।
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नारी सृजक स्वरूप है, करो नहीं अपमान।
नारी जिस घर में नहीं, बन जाता शमशान।।
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रंग रक्त का एक है, तजो भेद का भाव।
गाँधी जैसे हम बनें, बदलें निजी स्वभाव।।
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राजे-रजवाड़े मिटे, याद रखें इतिहास।
सांसद सदा न रहेंगे, हों जनता के दास।।
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मछली जालों में फसें, फेसबुकी पहचान।
झूठे हैं रिश्ते यहाँ, ज्ञान नहीं आसान।।
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हीरों सा व्यापार है, लेखन नहीं दुकान।
जब से जरकन आ गए, गुमी कहीं पहचान।।
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पत्थर-मन मनु बन गया, पत्थर के भगवान।
कीमत नहीं गरीब की, प्रिय लगते धनवान।।
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जल बिन तरस रहा मनुज, रोता सूखा देख।
नदिया श्रापित हो गई, बोया काटे लेख।।
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जंगल-पर्वत कट गए, बची न पानी-धार। 
जल-जल कह सब जल रहे,  जल दे कौन उधार।। 
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मँहगाई सुरसा बनी, भूख सहो धर धीर।
ऐश सभी नेता करें, कौन हरेगा पीर।।
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संसद सांसद से चले, लोकतंत्र लें मान।
देश तभी उन्नति करे, बहस करें श्रीमान।।
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बालक बालक तब कहाँ, जब करता अपराध। 
संसद पास न बिल करें, मिटे किस तरह व्याध।।१०० 
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