शुक्रवार, 30 मार्च 2018

ॐ doha shatak himkar shyam


दोहा शतक 
हिमकर श्याम
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दोहा शतक
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जन्म:
आत्मज: श्रीमती सरोज-श्री निरंजनप्रसाद श्रीवास्तव।
जीवन संगिनी:
शिक्षा: वाणिज्य और पत्रकारिता में स्नातक।
लेखन विधा: दोहा, लेखा, रिपोर्ताज आदि।
प्रकाशन:
उपलब्धि: प्रभात खबर’ और ‘दैनिक जागरण’ के संपादकीय विभाग में, शोध पत्रिका ‘अनुसंधानिका’ से संबद्ध
सम्प्रति: स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, ब्लोगर।
सम्पर्क: बी-१, शांति इंक्लेव, कुसुम विहार, मार्ग क्रमांक ४, निकट चिरंजीवी पब्लिक स्कूल, मोराबादी, राँची ८३४००८, झारखण्ड।
ब्लॉग : http://himkarshyam.blogspot.in/ https://doosariaawaz.wordpress.com ।
चिभाष: ९१८६०३१७१७१०,  ई-मेल पता : himkar.shyam@gmail.com ।
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दोहा शतक
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शिक्षा, शासन हर जगह, अंग्रेजी का राज।
निज भाषा को छोड़कर, परभाषा पर नाज।।
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देशप्रेमियों ने लिखे, थे विप्लव के गान।
इष्ट क्रांति की चेतना, हिंदी का वरदान।।
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हिंदी सबको जोड़ती, करती है सत्कार।
विपुल शब्द भण्डार है, वैज्ञानिक आधार।।
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भाषा सबको बाँधती, भाषा है अनमोल।
हिंदी-उर्दू मिल गले, देती हैं रस-घोल।।
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सब भाषा को मान दें, रखें सभी का ज्ञान।
हिंदी अपनी शान है, हिन्दी है अभिमान।।
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हिंदी हिंदुस्तान की, सदियों से पहचान।
हिंदीजन मिल कर करें, हिंदी का उत्थान।।
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हँस कर कोयल ने कहा, आया रे! मधुमास।
दिशा-दिशा में छा गया, फागुन का उल्लास।।
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झूमे सरसों खेत में, बौराए हैं आम।
दहके फूल पलास के, हुई सिंदूरी शाम।।
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दिन फागुन के आ गए, सूना गोकुल धाम।
मन राधा का पूछता, कब आयेंगे श्याम।।
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होली के हुड़दंग में, निकले मस्त मलंग।
किसको यारों होश है, पीकर ठर्रा-भंग।।
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टूटी कड़ियाँ फिर जुड़ीं, जुड़े दिलों के तार।
प्रेम-रंग में रँग गया, होली का त्यौहार।।
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होरी-चैती गुम हुई, गुम फगुआ की तान।
धीरे-धीरे मिट रही, होली की पहचान।।
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भूखा बच्चा के लिए, क्या होली, क्या रंग?
फीके रंग गुलाल हैं, जीवन है बदरंग।।
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दुख जीवन से दूर हो, खुशियाँ मिले अपार।
नूतन नई उमंग हो, फागुन रंग बहार।।
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हिमकर इस संसार में, सबकी अपनी पीर।
एक रंग में सब रँगे, राजा, रंक, फकीर।।
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आफ़त में है जिंदगी, उलझे हैं हालात।
कैसा यह जनतंत्र है, जहाँ न जन की बात।।
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आँखों का पानी मरा, कहाँ बची है शर्म।
सब के सब बिसरा गए, जनसेवा का कर्म।।
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जब तक कुर्सी ना मिली, देश-धर्म से प्रीत।
सत्ता आई हाथ जब, वही पुरानी रीत।।
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एकहि साँचे में ढले, नेता पक्ष-विपक्ष।
मिलकर लूटें देश को, मक्कारी में दक्ष।।
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कैसा यह उन्माद है,  सर पर चढ़ा जूनून
ख़ुद ही मुंसिफ़ तोड़ते, बना-बना कानून।।

नाहक यह तकरार है, नकली है तलवार।
राजनीति के खेल में, राष्ट्रवाद हथियार।।
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सरहद पर सैनिक मरे, मरता दीन किसान।
बदल रहा है दोस्तों, अपना हिंदुस्तान।।
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योगी का अब राज है, योगी मालामाल।
माया-ममता छोड़िए, भगवा बड़ा कमाल।।
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मौसम देख चुनाव का, उमड़ा जन से प्यार।
बदला-बदला लग रहा, फिर उनका व्यवहार।।
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राजनीति के खेल में, सबकी अपनी चाल।
मुद्दों पर हावी दिखे, जाति-धर्म का जाल।।
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लोकतंत्र के पर्व का, खूब हुआ उपहास।
दागी-बागी सब भले, शत्रु हो गए खास।।
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रातों-रात बदल गए, नेताओं के रंग।
कलतक जिसके साथ थे, आज उसी से जंग।।
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मौका आया हाथ में, अब न सहें संताप।
पछताएँगे फिर बहुत, मौन रहे जो आप।।
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जाँच-परख कर देखिए, किसमें कितना खोट?
सोच-समझ कर दीजिए, अपना-अपना वोट।।
* २९
वैरी अपना हो गया, उमड़ा मन में प्यार।
सत्ता पाने के लिए, बदल गया व्यवहार।।
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सिर पर लादे बोरिया, दिखे थकन से चूर।
स्वेद बहाते रात-दिन, बेबस दीन मजूर।।
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मालिक तो है मौज में, कर शोषण भरपूर।
हक़-हक़ूक से-दूर हैं, मेहनतकश मजदूर।।
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पानी वायु गगन धरा, हुए प्रदूषण-ग्रस्त।
जीना दूभर हो गया, हर प्राणी है त्रस्त।।
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नष्ट हो रही संपदा, दोहन है भरपूर।
विलासिता की चाह ने, किया प्रकृति से दूर।।
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जहर उगलती मोटरें, कोलाहल चहुँ ओर।
हर पल पीछा कर रहे, हल्ला-गुल्ला शोर।।
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आँगन की तुलसी कहाँ, दिखे नहीं अब नीम।
जामुन-पीपल कट गए, ढूँढे कहाँ हकीम।।
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पक्षी,बादल गुम हुए, सूना है आकाश।
आबोहवा बदल गयी, रुकता नहीं विनाश।।
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शहरों के विस्तार में, खोए पोखर-ताल।
हर दिन पानी के लिए, होता ख़ूब बवाल।।

नदियाँ जीवनदायिनी, रखिए इनका मान।
कूड़ा-कचड़ा डालकर, मत करिए अपमान।।
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ये विपदाएँ प्राकृतिक, करतीं हमें सचेत।
मौसम का बदलाव भी, कहता मानव चेत।।
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कुदरत का बरपा कहर, रूप बड़ा विकराल।
धरती जब-जब डोलती, आता है भूचाल।।
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कुदरत तो अनमोल है, इसका नहीं विकल्प।
पर्यावरण की  सुरक्षा, सबका हो संकल्प।।
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सावन में धरती लगे, तपता रेगिस्तान।
सूना अंबर देखकर, हुए लोग हैरान।।
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कहाँ छुपे हो मेघ तुम, बरसाओ अब नीर।
पथराए हैं नैन भी, बचा न मन में धीर।।
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बिन पानी व्याकुल हुए, जीव-जंतु इंसान।
अपनी किस्मत कोसता, रोता बैठ किसान।।
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सूखे-दरके खेत हैं, कैसे उपजे धान?
मानसून की मार से, खेती को नुकसान।।
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खुशियों के लाले पड़े, बढ़े रोज संताप।
मौसम भी विपरीत है, कैसा है अभिशाप।।
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सूखे पोखर, ताल सब, रूठी है बरसात।
सूखे का संकट हरो, विनती सुन लो नाथ।।
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जमकर बरसो मेघ अब, भर दो पोखर-ताल।
प्यासी धरती खिल उठे, हो जीवन खुशहाल।।
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चंचल मोहक तितलियाँ, रंग-बिरंगे पंख।
करती हैं अठखेलियाँ, हँस फूलों के संग।।
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बगिया में रौनक नहीं, उपवन है बेरंग।
कहाँ तितलियाँ गुम हुईं, लेकर सारा रंग।।
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चाक घुमा कर हाथ से, गढ़े रूप-आकार।
समय चक्र घोमा हुआ, है कुम्हार लाचार।।
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चीनी झालर से हुआ, चौपट कारोबार।
मिट्टी के दीये लिए, बैठा रहा कुम्हार।।

माटी को मत भूल तू, माटी के इंसान।
माटी का दीपक बने, दीप पर्व की शान।।
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सज-धजकर तैयार है, धनतेरस बाजार।
महँगाई को भूलकर, लुटने जन तैयार।।
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सुख, समृद्धि, सेहत मिले, बढ़े खूब व्यापार।
घर, आँगन रौशन रहे, दूर रहे अँधियार।।
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कोई मालामाल है, कोई है कंगाल।
दरिद्रता का नाश हो, मिटे भेद विकराल।।
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चकाचौंध में खो गयी, घनी अमावस रात।
दीप तले छुप कर करे, अँधियारा आघात।।
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दीपों का त्यौहार यह, लाए शुभ संदेश।
कटे तिमिर का जाल अब, जगमग हो परिवेश।।
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ज्योति पर्व के दिन मिले, कुछ ऐसा वरदान।
ख़ुशियाँ बरसे हर तरफ़, सबका हो कल्याण।।
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दर्ज़ हुई इतिहास में, फिर काली तारीख़।
मानवता आहत हुई, सुन बच्चों की चीख़।।
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कब्रगाह में भीड़ है, सिसके माँ का प्यार।
सारी दुनिया कह रही, बार-बार धिक्कार।।
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मंसूबे जाहिर हुए, करतूतें बेपर्द।
झूठा यह जेहाद है, कायर दहशतगर्द।।
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हम देखें कब तक भला, यूँ ही कत्लेआम।
हिंसा-दहशत पर लगे, अब तो तुरत लगाम।।
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दुःख सबका है एक सा, क्या मज़हब, क्या देश?
पर पीड़ा जो बाँट ले, वही संत दरवेश।।
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घर-आँगन सूना लगे, ख़ाली रोशनदान।
रोज़ सवेरे झुण्ड में, आते थे मेहमान।।
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प्यारी चिड़ियाँ गुम हुई, लेकर मीठे गान।
उजड़ गए सब घोंसले, संकट में है जान।।
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चहक-चहक मन मोहती, चंचल शोख़ मिज़ाज।
बस यादों में शेष है, चूं-चूं की आवाज़।।
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बाग़-बगीचों की जगह, आँगन बिना मकान।
गोरैया रूठी हुई, दोषी खुद इंसान।।
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कहाँ हमारी सहचरी, बच्चों की मुस्कान।
दाना-पानी दें उसे, गूँजे कलरव गान।।
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उजड़ गयीं सब बस्तियाँ, घाव बना नासूर।
विस्थापन का दंश हम, सहने को मजबूर।।
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जल, जंगल से दूर हैं, वन के दावेदार।
रोजी-रोटी के लिए, छूटा घर-संसार।।

जन-जन में है बेबसी, बदतर हैं हालात।
कैसा अबुआ राज है, सुने न कोई बात।।
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हुए ण पूरे अभी तक, बिरसा के अरमान।
शोषण-पीड़ा है वही, मिला नहीं सम्मान।।
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अस्थिरता-अविकास से, रूठी है तक़दीर।
बुनियादी सुविधा नहीं, किसे सुनाएँ पीर।।
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सामूहिकता-सादगी, स्नेह प्रकृति के गान।
नए दौर में गुम हुई, सब आदिम पहचान।।
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ढाक-साल सब खिल गए, मन मोहे कचनार।
वन प्रांतर सुरभित हुए, वसुधा ज्यों गुलनार।।
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प्रकृति-प्रेम आराधना, सरहुल का त्योहार।
हरी-भरी धरती रहे, सुखी सभी घर-बार।।
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जवा फूल तैयार हैं, गड़े करम के डार।
धरम-करम का मेल है, करमा का त्योहार।।
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कोई भूखा सो रहा, कोई मालामाल।
कोई देखे मुफलिसी, कोई है खुशहाल।।
* ८०
राहें चाहें हों अलग, जुदा नहीं भगवान।
कोई गाता है भजन, कोई पढ़े अजान।।
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फीका-फीका क्यों लगे, सावन का त्यौहार?
झूले-कजरी हैं कहाँ, कहाँ मेघ-मल्हार।।
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भूले लोक-रिवाज़ हम, बदली सारी रीत।
यादों में ही रह गया, अब देशज संगीत।।
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हँसी-ठिठोली है कहीं, कहीं बहे है नीर।
मँहगाई की मार से, टूट रहा है धीर।।
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अपनी-अपनी चाकरी, उलझे सब दिन-रात।
बूढ़ी आँखें खोजतीं, अब अपनों का साथ।।
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अमन-चैन से सब रहें, बन सच्चे इंसान।
रहे न मन में रंजिशें, बचा रहे ईमान।।
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शीतल, उज्जवल रश्मियाँ, बरसे अमृत धार।
नेह लुटाती चाँदनी, कर सोलह श्रृंगार।।
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शरद पूर्णिमा रात में, खिले कुमुदनी फूल।
रास रचाए मोहना, कालिंदी के कूल।।
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सोलह कला मयंक की, आश्विन पूनो ख़ास।
माँ श्री उतरीं धरा पर, आया कार्तिक मास।।
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लक्ष्मी की आराधना, अमृतमय पय-पान। 
पूर्ण हो मनोकामना, बढ़े मान-सम्मान।।
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रूप सलोना श्याम का, मनमोहन चितचोर।
कहतीं ब्रज की गोपियाँ, नटखट माखन चोर।।
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निरख रही माँ यशोदा, झूमा गोकुल धाम।
राधा के मन में बसे, बंसीधर घनश्याम।।
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सुध-बुध खोई राधिका, सुन मुरली की तान।
अर्जुन की आँखें खुली, पाकर गीता ज्ञान।।
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झूठे माया-मोह सब, सच्चा है हरिनाम।
राग-द्वेष को त्याग कर, रहें सदा निष्काम।।
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पाप निवारण के लिए, लिया मनुज अवतार।
लीलाधारी कृष्ण की, महिमा अपरंपार।।
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आज़ादी बेशक़ मिली, मन से रहे गुलाम।
हिंदी भाषाउपेक्षित, मिला न उचित मुक़ाम।।
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सरकारें चलती रहीं, मैकाले की चाल।
हिन्दी अपने देश में, अवहेलित बदहाल।।
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भ्रष्ट व्यवस्था हो गई, कीर्तिमान की खान।
सरकारें आईं-गईं, चलती रही दुकान।।
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नेताजी हैं मौज में, जनता भूखी-दीन।
झूठे वादे नित करें, मन से सभी मलीन।।

बेमौसम बरसात से, फसलें हुईं तबाह।
खाली हाथ किसान के, मुँह से निकले आह।। १००
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