शुक्रवार, 16 मार्च 2018

doha shatak: chhaya saxena

दोहा शतक:
छाया सक्सेना 'प्रभु'















जन्म: १५.८.१९७१, रीवा।  
आत्मजा: श्रीमती शारदा-डॉ.विश्वनाथ प्रसाद सक्सेना। 
जीवनसाथी: मनीष सक्सेना। 
शिक्षा:बी.एससी., एम. ए. (राजनीति विज्ञानं), बी. एड., एम. फिल.। 
लेखन विधा: दोहा व अन्य छंद, कहानी, लघु कथा, संपादन।  
प्रकाशन: साझा संकलनों में सहभागिता। 
उपलब्धि: साहित्यिक समूहों में अनेक पुरस्कार। 
सम्प्रति: पूर्व शिक्षिका।  
संपर्क: १२ माँ नर्मदे नगर, फेज १, बिलहरी, जबलपुर  ४८२०२०। चलभाष: ०७०२४२८५७८८, ई मेल: chhayasaxena2508@gmail.com।   
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ॐ 
दोहा शतक

करती विनती प्रार्थना, चित्रगुप्त प्रभु नित्य।
हूँ अज्ञानी ज्ञान दे, दर्शन मिलें अनित्य।।
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वाणी का वरदान दें, मातु शारदे आप।
चरणों  में नित आपके, बैठ करूँ मैं जाप।।
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राम राम श्री राम हैं, जग के पालनहार।
नित्य भजन जो भी करे, वह हो भव से पार।।
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नटवर नागर नंद ही, मोहन मधुर मुरारि।
ब्रजमोहन ब्रजपाल जप, मन न  बिसर कंसारि।।
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प्रेम, त्याग, विश्वास से, सुधरे सकल समाज।
गुरु-सुमिरन से ही बने, बिगड़े सारे काज।।
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गुरु के चरणों का करें, जो सुमिरन दिन-रैन।
काज सफल उसके हुए, आदि-अंत तक चैन।।
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चमत्कार होता तभी, जब गुरु-कृपा विशेष।
गुरु चरणों में जो गया, पाता ज्ञान अशेष।।
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मिलकर करना है सदा, सबको गुरु का ध्यान।
गुरु-चरणों में आइए, तभी मिलेगा ज्ञान।।
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करें सभी साहित्य में, अपने गुरु का नाम।
बिन गुरुवर मिलता नहीं, हमको हरि का धाम।।
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गुरु-चरणों में ही मिले, सकल जगत का सार।
द्वेष, कपट, छल त्यागिए, अर्पित कर अधिकार।।
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धरती अंबर एक से, लगते हैं प्रभु आज।
ओम मंत्र गुणगान से, सुधरे सकल समाज।।

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ओजमयी व्यक्तित्व ही, है जिनकी पहचान ।
चमत्कार हो कर्म से, बढ़े मान -सम्मान।।
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मातु-पिता आशीष से,  सकल कार्य हों पूर्ण ।
कीर्ति  सुयश उन्नति बढ़े, रहे न कार्य अपूर्ण।।
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सच्ची मानवता करे, निर्बल का कल्याण।
पर्यावरण अमोल है, बसते सबके प्राण।।
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प्रियवर! स्वागत आपका, पुष्प गुच्छ ले आज।
चंदन वंदन आरती, करता सकल समाज।।
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नित नव उन्नति हो रही, हर्ष मनाओ मीत।
अमर रहे साहित्य में, सुंदर सुफल सुनीत।।
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नदियाँ साग़र से मिलें, नैसर्गिक अधिकार।
कर्तव्यों को कीजिए, तभी मिलेगा प्यार।।
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पंछी बैठा डाल पर, देखे अंबर-ओर।
मनहर लाली सज रही, उदित हो रही भोर।। ० 
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सभी सहेजें प्रकृति को, अति उत्तम यह काज।
जन-मन को प्रेरित करें, प्रण लेकर सब आज।। -
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रंग-बिरंगी कल्पना, आज हुई साकार।
सुखद-सरस परिकल्पना, दृश्य-श्रव्य आधार।। ० 
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निशिचर दानव दैत्य शठ, असुर अधम दनु दीन।
राम-नाम जप मुक्त हों, भव-बंधन से हीन।।
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अनावृष्टि, अति बाढ़ से, जब भी पड़े अकाल।
भू पर फैले भुखमरी, बन जीवन का काल।। 
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अनल आग पावक अगन, ज्वाला दाहक तेज।
वायुसखा ही अग्नि है, जल को रखो सहेज।।
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भूधर पर्वत शैल गिरि, नग या शिखर पहाड़।
धरणीधर अद्री अचल, शिलागार हो बाड़।।
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उत्तम अद्भुत सी लगे, अनुपम अपनी प्रीत।
अप्रतिम उपमा दीजिए, अतुलनीय मनमीत।। 
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अमिय अमी सुरभोग है, सोम सुधा रसधार।
अमृत सम साहित्य पर, हँसकर जीवन वार।।
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बिन सोचे करिए नहीं, अपने मत का दान।
बड़ा धर्म से कर्म है, हर मनुष्य ले जान।।
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पाँच साल के बाद ही, कर पाते मतदान।
जागो मतदाता सभी, रहो नहीं अनजान।।  
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छंदों की लय ही बनी, लेखन का आधार।
सरल हृदय को 'प्रभु' सदृश, लगे छंद परिवार।। 
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नेक कर्म कर कीर्ति पा, मंगल हो चहुँ ओर।
परहित कर इंसान तो, नाच उठे मन मोर।।
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आध्यात्मिक शुभ कर्म से, मनुज मनुज हो मीत।
मिलतीं शत शुभकामना, सके ह्रदय भी जीत।।
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महिमा माने योग की, विश्व कर रहा नित्य। 
सब रोगों से मुक्ति पा, स्वस्थ मनुज कर कृत्य।।
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अजर-अमर होते सदा, जग हितकारी कर्म।
अंतर्मन तू धैर्य से, सदा निभाना धर्म।। 
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अजर-अमर है लेखनी, जो लिखती नित सत्य।
माँ वाणी की कृपा से, करना सदा सुकृत्य।।
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कर्म हमारा धर्म है, कहते वेद महान।
सच्चे मन से कीजिए, गुरुजन का सम्मान।।
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जैसे होंगे कर्म तव, वैसी होगी प्रीत।
अपनों के सँग गाइए, मधुरिम-मधुरिम गीत।।
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बच्चे तो भगवान का, ही होते प्रतिरूप।
दर्शन इनमें कीजिए, बालकृष्ण के रूप।।
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सुघड़ लाड़ली जानकी, प्रियवर हिय रघुनाथ।
मग-पग रख मुस्का रहीं, वन में सियवर साथ।। 
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सुफल सुफल ही सुफल है, जब हों सुफल सुकाज।
सुयश-सुयश बढ़ता रहे, संगम का प्रभु आज।।
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शोभित रघुवर हो रहे, जनक-लली प्रभु साथ।
जगत-जगत को मोहते, सरस-सरस रघुनाथ।।
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सरस सुहाना बाग है, मधुर-मधुर मद-गंध।
सुरभि-सुरभि पावन लगे, मनुज-मनुज संबंध।। 
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रमण-रमण सुंदर रमण, रमण-रमण तन श्याम।।
रमण-रमण सम राधिका, रमण-रमण घनश्याम।।
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सुमन-सुमन चहुँ-चहुँ दिशा, सुमन-सुमन अरु माल।
सुमन सुसज्जित भवन है, सुमन-सु मन प्रभु लाल।।
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सुमित-सुमित प्रिय सुमित है, सुमित-सुमित मन आज।
चरण-चरण रजचरण है, हृदय-हृदय रघुराज।।
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खोया है बचपन  कहीं, खोजो मिलकर आज।
गुम हो गईं कहानियाँ, छूटे सकल सुकाज।।   
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अंधेरा अरु अंध ही, अंधकार बन ज्योत।
तिमिर स्याह तम अंधता, हरे तनिक खद्योत।।
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बातें लगती हैं बुरी, जो कोई दे सीख।
जो सीखे कम उमर में, गुरु सम ज्ञानी दीख।।
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मानव मूल्यों का करो, सतत् सदा सत्कार।
प्रेम-भाव मिलकर रहो, सुखी बने संसार।।   
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सच्ची मानवता वही, जिससे हो कल्याण।                                                  
मानव हित अनमोल है, सबके बसते प्राण।।
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फैली है चहुँ ओर ही, ममतामयी सुवास ।
धीमे-धीमे हो रहा, प्रियतम पर विश्वास।।
शिवशंकर के शीश पर, प्रगट नर्मदा आप।
निर्मल जल की स्वामिनी, पूजो कटते पाप।। 
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नदियाँ-सरवर जिंदगी, जानो यह सब सत्य।
प्यास बुझाते मनुज की, रक्षा करिए नित्य।।
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प्रेम रत्न चहुँ ओर है, सच स्वीकारें आज।
ईश-भक्त ही जानते, जीवन का यह राज।।
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मुश्किल घटती है तभी, जब लें प्रभु का नाम।
जाग करें कोशिश अगर, मिल जाएँ प्रभु राम।।
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बिन कठिनाई कब बने, जग में कोई काज।
कदम बढ़ा साथी तभी, मिले सफलता आज।।
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सबको नित प्रति चाहिए, अच्छा भोजन रोज।
मिल-जुल रहते जब सभी, तब बढ़ जाता ओज।।
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नित्य कीजिए योग सब, मिलकर सह परिवार।
यश वैभव उन्नति  मिले, बने सुखद आधार ।। 
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सच्चाई की राह में, काँटे मिलें अनेक।
प्रेम भाव से प्रभु भजें, जाग्रत रखें विवेक।।
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श्रद्धा सह विश्वास का, अद्भुत है संयोग।
अंध भक्ति से दूर हों, जागरूक बन लोग।।  
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दुर्लभ मानव-जन्म है, इसे बनाएँ खास।
दुर्व्यसनों को छोड़कर, नई जगाएँ आस।।
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अति करती है हमेशा, अपना आप अनिष्ट।
भक्ति-भावमय जिंदगी, जिएँ न दें-लें कष्ट।।   
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कथनी-करनी में नहीं, करना कोई भेद।                                                          
कठिन भले जीवन लगे, तनिक न हो मतभेद।।
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लगन लगी श्री राम की, भजती प्रभु को नित्य।
हाथ जोड़ विनती करे, शबरी सुनें अनित्य।।
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धनुष सम्हाले हाथ में, संकट काटो नाथ।
शरण तुम्हारे आ गयी, करिए देव सनाथ।।
बप्पा को पूजें सभी, गौरा-भोले संग।
मूषक पर गजपति सजे, देखे दुनिया दंग।।
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संगम की महिमा अमित, देखो जानो लोग।
जैसी होगी कर्म-गति, वैसा हो फल-भोग।।  
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संगम हो अब ज्ञान का, ऐसा करिए कर्म।
गुरु आज्ञा स्वीकार कर, पालें सच्चा धर्म।।
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मनुज सदा साहित्य में, रचे नए आयाम।
हिंदी का सम्मान हो, भू हो हिंदी-धाम।।  
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दोहे का करिए सृजन, निहित अर्थ लें जान।
छंदों से आनंद हो, बढ़े निरंतर ज्ञान।।
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दोहे लिखना है सरस, अर्थवान लो जान।
भाव शिल्प आधार हो, पढ़ें तभी विद्वान।।
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कठिन परीक्षा की घड़ी, जब हो सम्मुख मीत।
याद देव को जो करे, विजयी हो है रीत।।
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शिव की पूजा कीजिए, शुभ होंगे सब काज।
चंदन वंदन अर्चना, मिलकर करिए आज।।
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लक्ष्मी पूजन कीजिए, हाथ जोड़ कर रोज।
विष्णु प्रिया माँ आप हैं, सुरभित सुमन सरोज।।  
मंजिल उनको ही मिले, जो चलते अविराम।
एक लक्ष्य को साधिए, तभी बढ़ेगा नाम।।
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सतत परिश्रम जो करे, विजय उसी के साथ।
भक्ति-भाव यदि हिय रखे, मलना पड़े न हाथ।।
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चमत्कार की आस में, मत बैठो बलवीर।
कर्म करो योगी बनो, जग जीतो रणवीर।।
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ओजमयी व्यक्तित्व ही, है जिनकी पहचान।
काम करें निष्काम वे, मिले मान-सम्मान।।
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सच्ची मानव ही करे, जनता का कल्याण।
मानव हित अनमोल है, यही देश के प्राण।।
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चलो सुनाएँ जगत को, आत्मकथ्य लिख आज।
सत्य-सत्य संदेश हो, नहीं झूठ-सिर ताज।।
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खट्टी- मीठी याद को, करें याद रह मौन।
गूँगे का गुण स्वाद में, कैसा बोले कौन।।
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मान तिरंगे का रखा, जब तक तन में प्राण।
ऐसे वीर शहीद को, बारंबार प्रणाम।।
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प्रीत आस विश्वास का, बहुत अनोखा संग।
जो जी में धारण करे, उस पर चढ़ता रंग।।  
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काम देश के आइए, मन में रख विश्वास।
देश बढ़े तो मानिए, सारे सफल प्रयास।।
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दानों में सबसे बड़ा, अन्नदान सच मान।
भूखा जाए न द्वार से, भिक्षुक लें प्रण ठान।।
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सबसे मीठे जगत में, होते मीठे बोल।
पल में मन को जीत लें, काम न आए ढोल।।
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अहंकार-अभिमान ही, करें मनुज का ह्रास।
दंभ-दर्प को छोड़कर, करिए  विनत प्रयास।। 
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मन मोहन में रम गया, ज्यों सागर में नीर।
मनमोहन करिए कृपा, रहे नहीं तन-पीर।।
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लक्ष्य बना बढ़ कीजिये, सपनों को साकार।
तब ही मंजिल मिलेगी, सपने हों साकार।।
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चपल श्याम राधा बने, रंग झलकता नील।
अपलक देखे जमुन-जल, लहर-लहर छवि लील।। 
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काम मान श्री कृष्ण का, करो मिटेंगे पाप।
सच्चे मन से हँस करो, दान-पुण्य नित आप।। 
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आओ! मिलकर प्रण करें, लें न विदेशी माल।
जो बनता है देश में, वही करे खुशहाल।।
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अकड़-अकड़ कर दंभ से, अभिमानी मन फूल।
असफल दंडित हो मगर, नहीं मानता भूल।। 
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नेक कर्म जो कर रहा, सफल उसी को जान।
इस दुनिया में हम सभी, कुछ दिन के मेहमान।।
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चार दिनों की जिंदगी, हर पल है अनमोल।
कड़वा कह मत मन दुखा, बोलो मीठे बोल।।
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बिना परिश्रम कब हुआ, जग में कोई काज।
कदम बढ़ा साथी तभी, मिले सफलता ताज।।  
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अवध सुहावन लग रहा, देखो कैसा आज।
सिय-सियवर का आगमन, शोभित सुफल सुकाज।।
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सर्वोत्तम उपहार है,पुस्तक दें-लें मीत।
संगम-जल सम संग रह, सिख सकें शुभ रीत।।
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दानों में सबसे बड़ा, अन्न दान को जान।
जीवन इससे ही चले, माने सकल जहान।। 
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लड़ो बाहुबल से नहीं, यदि चाहो सम्मान।
प्रेम भाव से जीत जग, 'छाया' पाए मान।।
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ध्यान योग एकांत में, फलदाई लें जान।
दुग्ध गाय का सोम सम, बलवर्धक गुणवान।।
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मंगल मंगल ही करे,  नहीं अमंगल काज।
मनु मनु का मंगल करे, तब हो सुख का राज।।१०१ 
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