रविवार, 11 मार्च 2018

हास्य रचनाएँ २ संजीव

षट्पदी: गधा-वार्ता 

*



एक गधा दूजे से बोला: 'मालिक जुल्मी बहुत मारता।'
दूजा बोला: 'क्यों सहता तू?, क्यों न रात छिप दूर भागता?'
पहला बोला: 'मन करता पर उजले कल की सोच रुक गया।'
दूजा पूछे:' क्या अच्छा है जिसे सोच तू आप झुक गया?'
पहला: 'कमसिन सुन्दर बेटी को मालिक ने मारा था चांटा।
ब्याह गधे से दूंगा तुझको' कहा, जोर से फिर था डांटा। 
ठहरा हूँ यह सपना पाले, मालिक अपनी बात निभाए।
बने वह परी मेरी बीबी, मेरी भी किस्मत जग जाए।
***
हास्य सलिला:

उमर क़ैद

संजीव 'सलिल'



नोटिस पाकर कचहरी पहुँचे चुप दम साध.
जज बोलीं: 'दिल चुराया, है चोरी अपराध..'

हाथ जोड़ उत्तर दिया, 'क्षमा करें सरकार!.
दिल देकर ही दिल लिया, किया महज व्यापार..'

'बेजा कब्जा कर बसे, दिल में छीना चैन.
रात स्वप्न में आ किया, बरबस ही बेचैन..

लाख़ करो इनकार तुम, हम मानें इकरार.
करो जुर्म स्वीकार- अब, बंद करो तकरार..'

'देख अदा लत लग गयी, किया न कोई गुनाह.
बैठ अदालत में भरें, हम दिल थामे आह..'

'नहीं जमानत मिलेगी, सात पड़ेंगे फंद.
उम्र क़ैद की अमानत, मिली- बोलती बंद..

***
हास्य सलिला:
संवाद
संजीव
*
'ए जी! कितना त्याग किया करती हैं हम बतलाओ
तुम मर्दों ने कभी नहीं कुछ किया तनिक शरमाओ
षष्ठी, करवाचौथ कठिन व्रत करते हम चुपचाप
फिर भी मर्द मियाँ मिट्ठू बनते हैं अपने आप'

"लाली की महतारी! नहीं किसी से कम हम मर्द
करें न परवा निज प्राणों की चुप सहते हर दर्द
माँ-बीबी दो पाटों में फँस पिसते रहते मौन
दोनों दावा करें अधिक हक़ उसका, टोंके कौन?
व्रत कर इतने वर माँगे, हैं प्रभु जी भी हैरान
कन्याएँ कम हुईं न माँगी तुमने क्यों नादान?
कह कम ज्यादा सुनो हमेशा तभी बनेगी बात
जीभ कतरनी बनी रही तो बात बढ़े बिन बात
सास-बहू, भौजाई-ननद, सुत-सुता रहें गर साथ
किसमें दम जो रोक-टोंक दे?, जगत झुकाये माथ"

' कहते तो हो ठीक न लेकिन अगर बनायें बात
खाना कैसे पचे बताओ? कट न सकेगी रात
तुम मर्दों के जैसे हम हो सके नहीं बेदर्द
पहले देते दर्द, दवा दे होते हम हमदर्द
दर्द न होता मर्दों को तुम कहते, करें परीक्षा
राज्य करें पर घर आ कैसे? शिक्षा लो, दे दीक्षा'

*** 

हास्य सलिला:



करो समय पर काम



संजीव 'सलिल'
*
गये लिवाने पत्नि जी को, लालू जी ससुराल
साली जी ने आवभगत की, खुश थे लालू लाल..

सासू ने स्वादिष्ट बनाये, जी भरकर पकवान.
खूब खिलाऊँगी लाल को, जी में था अरमान..

लेट लतीफी लालू की, आदत से सब हैरान.
राह देखते भूख लगी, ज्यों निकल जायेगी जान..

जमकर खाया, गप्पे मरीन, टी.व्ही. भी था चालू.
झपकी लगी, घुसे तब घर में बिन आहट के लालू..

उठा न कोई, भुखियाए थे, गये रसोई अन्दर.
थाली में जो मिला खा रहे, ज्यों हो कोई बन्दर..

खटपट सुन जागी सासू जी, देखा तो खिसियाईं. 
'बैला का हिस्सा खा गये तुम, लाला!' वे रुस्वाईं..

झुंझलाई बीबी, सालों ने, जमकर किया मजाक.
'बुला रहे हल-बक्खर' सुनकर, नाक हो गयी लाल..

लालू जी को मिला सबक, सब करो समय पर काम.
'सलिल' अन्यथा हो सकता है, जीना कठिन हराम..
*
हास्य कुंडली
*
कल्लू खां गोरे मिले, बुद्धू चतुर सुजान.
लखपति भिक्षा माँगता, विद्यापति नादान..
विद्यापति नादान, कुटिल हैं भोला भाई.
देख सरल को जटिल, बुद्धि कवि की बौराई.
कलमचंद अनपढ़े, मिले जननायक लल्लू.
त्यागी करते भोग, 'सलिल' गोरेमल कल्लू..
*
अचला-मन चंचल मिला, कोमल-चित्त कठोर.
गौरा-वर्ण अमावसी, श्यामा उज्जवल भोर..
श्यामा उज्जवल भोर, अर्चना करे न पूजा.
दृष्टिविहीन सुनयना, सुलभा सदृश न दूजा..
मधुरा मृदुल कोकिला, कर्कश दिल दें दहला.
रक्षा करें आक्रमण, मिलीं विपन्ना कमला..
*
कहाँ कै मरे कैमरे, लेते छायाचित्र.
छाया-चित्र गले मिलें, ज्यों घनिष्ठ हों मित्र..
ज्यों घनिष्ठ हों मित्र, रात-दिन चंदा-सूरज.
एक बिना दूजा बेमानी, ज्यों धरती-रज..
लोकतंत्र में शोकतंत्र का राज्य है यहाँ.
बेहयाई नेता ने ओढ़ी, शर्म है कहाँ?..
*
जल न जलन से पायेगा, तू बेहद तकलीफ.
जैसे गजल कहे कोइ, बिन काफिया-रदीफ़..
बिन काफिया-रदीफ़, रुक्न-बहरों को भूले.
नहीं गाँव में शेष, कजरिया सावन झूले..
कहे 'सलिल कविराय', सम्हाल जग में है फिसलन.
पर उन्नति से खुश हो, दिल में रह ना जलन..
*
एक षट्पदी 
*
'बुक डे' 
राह रोक कर हैं खड़े, 'बुक' ले पुलिस जवान
वाहन रोकें 'बुक' करें, छोड़ें ले चालान
छोड़ें ले चालान, कहें 'बुक' पूरी भरना
छूट न पाए एक, न नरमी तनिक बरतना
कारण पूछा- कहें, आज 'बुक डे' है भैया  
अगर हो सके रोज, नचें कर ता-ता थैया
***
नियति * सहते मम्मी जी का भाषण, पूज्य पिताश्री का फिर शासन भैया जीजी नयन तरेरें, सखी खूब लगवाये फेरे बंदा हलाकान हो जाये, एक अदद तब बीबी पाये सोचे धौन्स जमाऊं इस पर, नचवाये वह आंसू भरकर चुन्नू-मुन्नू बाल नोच लें, मुन्नी को बहलाये गोद ले कही पड़ोसी कहें न द्ब्बू, लड़ता सिर्फ इसलिये बब्बू ***

हास्य सलिला:
जयेन्द्र पाण्डेय लल्ला 
'लल्ला' इस संसार मेँ जितने हुए महान
उन्हेँ बनाने के समय ठलुआ था भगवान!"
"ठलुआ इस संसार मेँ सबसे ज्यादा व्यस्त
कामकाज वाला दुखी लेकिन ठलुआ मस्त"
"फेसबुक के घाट पर भयी ठलुअन की भीर
चलते चारोँ तरफ से तरह तरह के तीर"
"दुनिया मानेगी सदा ठलुओं का उपकार
ठलुआई की देंन हैं सारे आविष्कार"
*
 संजीव वर्मा 'सलिल'
ठलुआ-रत्न जयेंद्र जी! आप पहन लें हार
ठलुआ मिला न आप सा मान रहे हम हार
मान रहे हम हार, बनायें ठलुआ-संसद
मैनपुरी में तब हो फिर संजीव बरामद
शिवा करें आतिथ्य, विराजें शिव संग ललुआ
करें मुलायम भी जय-जय जब घेरें ठलुआ 
***

लाल गुलाब 

*
लालू जब घर में घुसे, लेकर लाल गुलाब
लाली जी का हो गया, पल में मूड ख़राब
'झाड़ू बर्तन किये बिन, नाहक लाये फूल
सोचा, पाकर फूल मैं जाऊँगी सच भूल
लेकिन मुझको याद है ए लाली के बाप!
फूल शूल के हाथ में देख हुआ संताप
फूल न चौका सम्हालो, मैं जाऊँ बाज़ार
सैंडल लाकर पोंछ दो जल्दी मैली कार.'
****
याद
संजीव 'सलिल'



कालू से लालू कहें, 'दोस्त! हुआ हैरान.
घरवाली धमका रही, रोज खा रही जान.
पीना-खाना छोड़ दो, वरना दूँगी छोड़.
जाऊंगी मैं मायके, रिश्ता तुमसे तोड़'

कालू बोला: 'यार! हो, किस्मतवाले खूब.
पिया करोगे याद में, भाभी जी की डूब..
बहुत भली हैं जा रहीं, कर तुमको आजाद.
मेरी जाए तो करूँ मैं भी उसको याद..'

https://encrypted-tbn3.google.com/images?q=tbn:ANd9GcR2PMy_GXi6OBm0rQ0ffqjUgUHeOMvWObRbtmbIFkOejWZPC-TM
*
हास्य सलिला:
 




आई लव यू 
*
लालू से कालू कहे, 'यारां यह तो सोच.
कौन देश जिसने करी, 'आई लव यू' की खोज?'
समझ गये लालू तुरत, बेढब किया सवाल.
जान बचाने के लिये किसी तरह दूँ टाल.

भाषण देना सहज है, प्रश्न लगे आसान.
सूझ नहीं उत्तर रहा, आफत में है जान..
कालू बोला: 'मान लो, हार- बढ़ेगा ज्ञान.
मैं उत्तर बतलाऊँगा', है बेहद आसान..

सिर खुजलाया, मूँदकर बैठे लालू नैन.
लेकिन उत्तर ना मिला, थे बेहद बेचैन.
मरता क्या करता नहीं, आखिर मानी हार.
अट्टहास कालू करे, जीता अब की बार. 

फिर बोला: 'चाइना ने, 'आई लव यू' की खोज.
करी वापरें लोग सब, दुनिया भर में रोज.
कोई गारंटी नहीं, पल भर में हो अंत.
कभी जिंदगी भर चले, जैसे सृष्टि अनंत.

चाइना का प्रोडक्ट जो, ले वह तो पछताय.
और न ले जो उसे भी देखो नित ललचाय..
'आई लव यू' की विफलता, देती दुःख-अफ़सोस.
'सलिल' सफल ज़िंदगी भर, रोता खुद को कोस..
***
हास्य रचना: खरीदी १  


*
लल्लू जी बाज़ार में, थे बीबी के सँग.
सतत हाथ पकड़े रहे, देख लोग थे दंग..

देख लोग थे दंग, बात कुछ समझ न आई.
प्यार बहुत या, बात सुरक्षा की है भाई?

कैसे जानें राज, गले मिल कारण पूछा.
बोले: 'खाली जेब, हाथ अपना है छूछा.

छोडूंगा यदि हाथ मुसीबत होगी भारी.
आईं खरीदी करने को करके तैयारी.

**
हास्य रचना: खरीदी २ 
*
लालू जी बाजार गये, उस दिन लाली के साथ
पल भर भी छोड़ा नहीं, थे लिये हाथ में हाथ
दोस्त खूब' था चमत्कृत बोला: 'तुम हो खूब
दिन भर भउजी के ख्याल में कैसे रहते डूब?
इतनी रहती फ़िक्र न करते पल भर को भी दूर'
लालू बोले: ''गलत न समझो, हूँ सचमुच मजबूर
गर हाथ छोड़ा तो मेरी आ जाएगी शामत
बिना बात क्यों कहो बुलाऊँ खुदही अपनी आफत?
जैसे छोड़ा हाथ खरीदी कर लेगी यह खूब
चुका न पाऊँ इतने कर्जे में जाऊँगा डूब''
***
हास्य सलिला ... 

पहचान लीजिए
संजीव 'सलिल'
*



जो भी जाता मित्र प्रसाधन, जैसे ही बाहर आता.
चक्कर में हम, समझ न पाये, क्यों रह-रहकर मुस्काता?

जिससे पूछा, मौन रहा वह, बढ़ती जाती उत्सुकता-
आखिर एक मित्र बोला: ' क्यों खुद न देखकर है आता?'

गया प्रसाधन, रोक न पाया, मैं खुद को मुस्काने से.
सत्य कहूँ?, अंकित दीवार पर, काव्य पंक्तियाँ गाने से.

शहरयार होते.. क्या करते?, शायद पहले खिसियाते.
रचना का उपयोग अनोखा, देख 'सलिल' फिर मुस्काते. 

उत्सुकता से हों नहीं अधिक आप बेज़ार 
क्या अंकित था पढ़ें और फिर दाद दीजिये.

''इस अंजुमन में आपको आना है बार-बार
दीवारो-दर को गौर से पहचान लीजिए...''



राहुल जी का डब्बा गोल

*
लम्बी_चौड़ी डींग हाँकतीं, मगर खुल गयी पल में पोल
मोदी जी का दाँव चल गया, राहुल जी का डब्बा गोल
मातम मना रहीं शीला जी, हुईं सोनिया जी बेचैन
मौका चूके केजरीवाल जी, लेकिन सिद्ध हुए ही मैन
हंग असेम्बली फिर चुनाव का, डंका जनता बजा रही
नेताओं को चैन न आये, अच्छी उनकी सजा रही
लोक तंत्र को लोभ तंत्र जो, बना रहे उनको मारो
अपराधी को टिकिट दे रहे, जो उनको भी फटकारो
गहलावत को वसुंधरा ने, दिन में तारे दिखा दिये
जय-जयकार रमन की होती, जोगी जी पिनपिना गये
खिला कमल शिवराज हँस रहे, पंजा चेहरा छिपा रहा
दिग्गी को रूमाल शीघ्र दो, छिपकर आँसू बहा रहा
मतदाता जागो अपराधी नेता, बनें तो मत मत दो
नोटा बटन दबाओ भैया, एक साथ मिल करवट लो

*
परंपरा 
*
कालू का विज्ञापन आया, जीवन साथी की तलाश है.
लालू बोले: 'खुशकिस्मत तू, है स्वतंत्र पर क्यों हताश है?
तेरे दादा ने शादी की, फिर जीवन भर पछताए थे. 
कर विवाह चुप पूज्य पिताजी, कभी न खुलकर हँस पाये थे.
मैंने किया निकाह बता क्या, तूने मुझको खुश पाया है.
शादी बर्बादी- फँसने को, क्यों तेरा मन अकुलाया है?
सम्हल चेत जा अब भी अवसर, चाह रहा क्यों बने गुलाम.
मैरिज से पहले जो भाती, बाद न लगती वही ललाम.
भरमाती- खुद को दासी कह, और बना लेती है दास.
मुझको देखो आफत में हूँ, नहीं चैन से लेता साँस.'
*
कालू बोला: 'लालू भैये, बात पते की बतलाते. 
मुझको तुम जो राह दिखाते, कहो न खुद क्यों चल पाते?
मैं चमचा अनुकरण करूँगा, रघुकुल रीत न छोडूंगा.
प्राण गंवाऊँ वचन निभाऊं, मुख न कभी भी मोडूंगा.
मिले मंथरा या कैकेयी, शूर्पणखा हो तो क्या गम?
जीवन भर चाहे पछताऊँ, या ले जाए मुझको यम.
पुरखों ने तुमने बनायी जो, परंपरा वह बनी रहे.
चरणों की दासी प्राणों की, प्यासी होकर तनी रहे.
सच कहते हो पछताते पर, छोड़ न तुमको जाऊँगा.
साथ तुम्हारे आहें भर-भर, सुबह-शाम पछताऊंगा'.. 
***

प्रवचन



आधी रात पुलिस अफसर ने पकड़ा एक मुसाफिर.
'नाम बात, तू कहाँ जा रहा?, क्या मकसद है आखिर?'

घुड़की सुन, गुम सिट्टी-पिट्टी, वह घबराकर बोला:
' जी हुजूर! प्रवचन सुनने जाता, न चोर, मैं भोला.'

हँसा ठठाकर अफसर 'तेरा झूठ पकड़ में आया.
चल थाने, कर कड़ी ठुकाई, सच जानूंगो भाया.'

'माई-बाप! है कसम आपकी, मैंने सच बोला है.
जाता किसका प्रवचन सुनने? राज न यह खोला है.'

'कह जल्दी, वरना दो हत्थड़ मार राज जानूँगा.'
'वह बोला: क्या सच न बोलकर व्यर्थ रार ठानूँगा.'

'देर रात को प्रवचन केवल मैं न, आप भी सुनते.
और न केवल मैं, सच बोलूँ? शीश आप भी धुनते.'

सब्र चुका डंडा फटकारा, गरजा थानेदार.
जल्दी पूरी बात बता वरना खायेगा मार.'

यात्री बोला:'मैं, तुम, यह, वह सबकी व्यथा निराली.
देर रात प्रवचन सुनते सब, देती नित घरवाली.


***

कोई टिप्पणी नहीं: