बुधवार, 21 मार्च 2018

दोहा शतक हरि फैजाबादी

ॐ 
दोहा शतक 
डा.हरि फ़ैज़ाबादी













जन्म: १७.७.१९६५, फ़ैज़ाबाद उ.प्र. ।
आत्मज: स्व.श्रीमती विमला देवी-स्व. श्री वीरेन्द्र बहादुर श्रीवास्तव।
जीवनसंगिनी: श्रीमती अंजू श्रीवास्तव।
शिक्षा: एम.काम., बी.एड., एम.ए.(उर्दू),  पीएच. डी.(उर्दू)।
लेखन विधा: गद्य एवं पद्य (ग़ज़ल,दोहा,नात,भजन,गीत,मुक्तक,मनक़बत) आदि।
प्रकाशित: मिट्टी का योगदान ग़ज़ल संग्रह, जीवन की हर बात दोहा संग्रह, मीर होने की बेक़रारी है ग़ज़ल संग्रह (उर्दू), कण-कण में हनुमान---हनुमत दोहा चालीसा, साईं का पैग़ाम (साईं दोहा चालीसा)।
सम्मान: विभिन्न संस्थाओं द्वारा दो दर्जन से अधिक सम्मान ।
संपर्क: बी १०४ /१२ निराला नगर लखनऊ २२६०२० उ.प्र. ।
चलभाष: ०९४५०४८९७८९, ईमेल: hari.faizabadi@gmail.com ।
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ॐ 
दोहा शतक 

हे गणपति हे गजानन, हे  गणेश भगवान।
रिद्धि-सिद्धि के साथ दें, हमें अभय वरदान।।
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द्वापर युग में इंद्र का, तोड़ा ज्यों अभिमान।
त्यों सबकी रक्षा करें, कलियुग से भगवान।।
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इंद्र देव के वज्र से, हनु पर हुआ प्रहार।
कहलाए हनुमान तब, जग में पवनकुमार।।
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कर देती नौ रात में, जीवन का उद्धार।
माँ की महिमा यूँ नहीं, गाता है संसार।।
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जय हो शिव के ध्यान की, जय शंकर भगवान।
जग है शिव के ध्यान में, शिव को जग का ध्यान।।
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लोग सफलता के लिए, करते क्या-क्या काम।
मगर सफल होता वही, जिसे चाहते राम।।
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देव तरसते हैं जिसे, ऐसी मानव देह।
ऐ मानव! क्यों है नहीं, तुझको इससे नेह।।
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ऊपरवाले ने रचा, इसको मेरे मीत।
इसीलिए सबसे मधुर, है मन का संगीत।।
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कुत्तों की भी आदमी, जैसी ही तक़दीर।
कोई जूठन खा रहा, कोई मुर्ग़-पनीर।।
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अच्छा तो है बोलना, साफ़-साफ़ दो टूक।
लेकिन ऐसा हर जगह, अच्छा नहीं सुलूक।।
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निष्क्रिय होकर मत करें, जीवन को बेरंग।
पड़े-पड़े तो लौह भी, खा जाता है ज़ंग।।
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अपनी नेकी की रखें, ऐसी भी कुछ राह।
जिनका हो संसार में, केवल ख़ुदा गवाह।।
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साथ किताबी ज्ञान के, जो दे जीवन-ज्ञान।
शिक्षक वही प्रणम्य है, जिसके शिष्य महान।।
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हाथी-विषधर-शेर से, पा लेता जो पार।
अपने ही दिल से वही, मानव जाता हार।।
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इच्छा और लगाव से,थकता है इंसान।
वरना ये हर जीव से,होता है बलवान।।
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मानव का सबसे बड़ा, दुश्मन है अभिमान।
अंतर रावण-राम का, इसकी है पहचान।।
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तुम्हें एक त्रुटि बताता, शेष लोग हैं मौन।
शुभचिंतक सोचो तुम्हीं, यहाँ तुम्हारा कौन।।
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हम दोनोंं में बढ़ रही, रोज़ बहस-तकरार।
इसका मतलब रास्ते, पर है अपना प्यार।।
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अपने मन में जो तुम्हें, मिले नहीं भगवान।
फिर वो मिल सकते नहीं, ढूँढो सकल जहान।।
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भूल-चूक, ग़लती-क्षमा, आपस में तकरार।
इन सब बातों के बिना, कैसा रिश्ता-प्यार।।
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गायत्री-गीता-गऊ, गुरु का करिए मान।
जीवन होगा आपका, अपनेआप महान।।
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नदियाँ अपनी राह में, कितना करें कटाव।
मगर दिशा में वो नहीं, करती हैं बदलाव।।
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लड़ते हैं जिनके लिए, हम मानव नादान।
कभी सुना है, हों लड़े, ख़ुदा और भगवान।।
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अपनों से ही रूठने, लड़ने का अधिकार।
ग़ैरों से कैसा गिला, क्या झगड़ा-तकरार।।
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होता वो सबसे अधिक, पावरफ़ुल इंसान।
अपनी पावर की जिसे, होती है पहचान।।
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जीना पड़ता है उसे, जननी का किरदार।
यूँ ही हो जाता नहींं, कोई रचनाकार।।
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आख़िर चमके किस तरह, मेरा हिंदुस्तान।
यहाँ सफ़ाई भी नहीं, होती बिन अभियान।।
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अपने पर कुछ भूलकर, करना नहीं गुमान।
जीवन में जो हो रहा, सब है ईश-विधान।।
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मीठा सुनना ही नहीं, है उसकी तक़दीर।
जिसकी बोली को नहीं, मिली मधुर तासीर।।
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निर्धन होना पाप है, ठीक कह रहे आप।
मरना भी निर्धन मगर, इससे बढ़कर पाप।।
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रिश्ता यूँ होता नहीं, कोई अमर-बुलंद।
गुल मरते हैं तब कहीं, बनता है गुलकंद।।
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उसके जीवन को पढ़ो, देखो बिंब अनूप।
हर नारी में हैं छुपे, दुर्गा के नौ रूप।।
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एक-दूसरे से रहें, कितने हम नाराज़।
ध्यान रहे जाए नहीं, और कहीं ये राज़।।
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अच्छे लोगों के मधुर, कटु भी समझो बोल।
मोती कचरे में गिरे,फिर भी है अनमोल।।
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दिलवाते हैं कर्म ही, हमें दंड-सम्मान।
जीवन में इस बात का, हरदम रखिए ध्यान।।
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लंकापति को खा गया, ख़ुद उसका अभिमान।
वरना रावण की नहीं, जा सकती थी जान।।
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रूप-बुद्धि सबको अलग, देते हैं करतार।
कैसे होगा सोचिए, सबका एक विचार।।
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जीवन में हरगिज़ नहीं, छोड़ें उनका हाथ।
बुरे दिनों में आपका, दिया जिन्होंने साथ।।
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उनके ऊपर प्रभु कृपा, समझो बड़ी असीम।
जिन गाँवों में आज भी, पीपल-बरगद-नीम।।
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चाहे जितनी कोशिशें, कितना करें प्रयास।
फिर मिलना बचपन नहीं, या टूटा विश्वास।।
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भले ख़ूबियों पर नहीं, तेरी करे विचार।
बख़्श नहीं सकता तुझे, ग़लती पर संसार।।
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शुभ कामों का फल सदा, शुभ ही हो श्रीमान।
व्यर्थ कभी जाता नहीं, प्रभु सुमिरन या दान।।
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मिसरी हो या फिटकरी, दोनों एक समान।
बाहर से अच्छा नहीं, अंदर का अनुमान।।
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शकुनि-मंथरा भी यहाँ, होते बिल्कुल फ़ेल।
भारत में जो चल रहा, राजनीति का खेल।।
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अगर नाम की चाह है, तो करिए कुछ काम।
दुनिया में किसको मिला, बिना काम का नाम।।
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सर पर जो मँडरा रहा, नहीं दिख रहा काल।
बाक़ी है इंसान को, सब कुछ यहाँ ख़याल।।
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सच्चे हो तो कुछ नहीं, देना कहीं जवाब।
दुनिया के आरोप से, कितना लगे ख़राब।।
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पक्ष रखो अपना तभी, होगा बेड़ा पार।
मौन रहे तो और भी, दुख देगा संसार।।
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दुनिया में हर बात का, होता है कुछ अर्थ।
उचित कहीं पर मौन है, कहीं बोलना व्यर्थ।।
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'हे माँ' जैसे कष्ट में, बोलें अपने आप।
हैरत में हम बोलते, 'अरे बाप रे बाप'।।   
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आज नहीं तो क्या हुआ, कल निखरेगा चित्र।
छोड़ो मत उम्मीद का, दामन मेरे मित्र।।
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पैसे से पहले करें, लोगों का सम्मान।
चार लोग ही आपको, छोड़ेंगे शमशान।।
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कभी किसी पर भी नहीं, क़ायम करिए राय।
कार और घर देखकर, या फिर उसकी आय।।
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दिल पर ली जाती नहीं, उन लोगों की बात।
जिनकी यादों से सजी, है दिल की बारात।।
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घर पावन जैसे नहीं, है बिन तुलसी मित्र।
ये शरीर होता नहीं, बिन हरि भजन पवित्र।।
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बोल न सकने के सबब, पशु होते हैरान।
हद से बाहर बोलकर, दुख सहता इंसान।।
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वादे-शर्तों से नहीं, निभते हैं संबंध।
दिल-दिल मिलने से टिके, रिश्तों का अनुबंध।।
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आत्मज्ञान का ख़ुद-ब-ख़ुद, हासिल होगा गोल।
अनुशासित यदि ज़िंदगी, मन पर है कंट्रोल।।
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पुनर्जन्म पर हर बहस, और तर्क है व्यर्थ।
जन्म-मृत्यु का जब तलक, पता नहीं है अर्थ।।
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महका दे माहौल जो, होता है वो इत्र।
जिससे महके ज़िंदगी, उसको कहते मित्र।।
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दर्पण की उसके लिए, आख़िर क्या दरकार।
जिसे दिया हो ईश ने, दिल का सच्चा यार।।
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धन्यवाद उसका करें, तोड़े जो विश्वास।
खोली उसने आँख भी, दिल यदि किया उदास।।
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मर्यादा इंसान की, खा जाती ज्यों भूख।
त्यों दिल की इंसानियत, धन में जाती सूख।।
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माना सब कटने नहीं, पूर्वजन्म के पाप।
लेकिन जितनी हो सके,कोशिश करिए आप।।
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चमक नहीं सकता किसी, फ़ेसवाश से फ़ेस।
अगर आपका मन मलिन,स्वच्छ नहीं है बेस।।
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रिश्तों में कुछ मित्र ही, मिलते देवसमान।
बाक़ी होते आदमी, या फिर कुछ इंसान।।
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सोच-समझकर ही करें, जीवन में हर बात।
जीवन में नुक़सान ही, करते हैं जज़्बात।।
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फ़िल्मी दुनिया की तरह, अब सारा संसार।
आप सफल तो आपका, हर कोई है यार।।   
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चलकर ख़ुद ही आपके, आएँगे प्रभु पास।
मन में यदि प्रह्लाद या, शबरी सा विश्वास।।
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रक्षा मेरे मित्र की, करना ऐ भगवान।
गड्ढे को भी मानता, वो समतल मैदान।।
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अपने जैसा ही मुझे, लगता हर इंसान।
बड़ी कठिन मेरे लिए, दुनिया की पहचान।।
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हरदम ख़ाली पेट जो,रहता है दिन-रात।
कर पाए वो किस तरह, कोई पूरी बात।।
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जिन लोगों को भी लगा, जग में "मैं का रोग।
बिल्कुल रावण की तरह, नष्ट हुए वो लोग।।
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रामचन्द्र को राज की, जगह मिला वनवास।
नामुमकिन है वक़्त की, करवट का आभास।
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बदल चुके हैं प्यार के, आज सभी आधार।
मैं नाहक़ ही ढो रहा, पहले वाला प्यार।।
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ऊपरवाला किस तरह, करता मालामाल।
करके देखें तो सही, अपना हृदय विशाल।।
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बहुत भरोसे आज तक, टूटे कई क़रार।
लेकिन आदत है वही, करना सबसे प्यार।।
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माफ़ उसे मत कीजिए, जिसके दिल में खोट।
जिसका मक़सद आपके, दिल पर करना चोट।।
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मन तो सबके पास है, इसमें क्या है ख़ास।
ख़ास बात है आपके, रहे मनोबल पास।।
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मानव के मन में बना, शायद कोई छिद्र।
कितना भी मिलता इसे, रहता सदा दरिद्र।।
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रिश्तों के संसार में, जैसै फूल-सुगंध।
होता है बिल्कुल वही, पति-पत्नी संबंध।।
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चलिए ढूँढें हम उसे, है वो किसके पास।
आपस में तो है नहीं, आपस का विश्वास।।
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मछली से होती बड़ी, कछुए की तक़दीर। 
जल-धरती दोनों जगह, है उसकी जागीर।।
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सच्चाई का देखते, झूठे आज हिसाब।
इससे बढ़कर और क्या, होगा वक़्त ख़राब।।
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जैसे तन की पीर का, हल्दी करे निदान।
दर्द दूर मन का करे, वैसे ही मुस्कान।।
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सरल इस क़दर भी रखो, मत अपना व्यक्तित्व।
ख़तरे में जो डाल दे, मान और अस्तित्व।।
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आत्मसात हर बात जो, कर ले हर हालात।
सच्चा योगी है वही, जिसमें है यह बात।।
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पतझड़ के बिन पेड़ पर, आती नहीं बहार।
जीवन बिन संघर्ष के, कैसे हो गुलज़ार।।
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सरल-भला भी आजकल, होना एक गुनाह।
बहुत बुरे हालात हैं, ख़ैर करे अल्लाह।।
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चलो मोहब्बत का रचें, हम ऐसा संसार।
मँहगाई जैसा घटे, कभी न अपना प्यार।।
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औरों को ख़ुश देख जो, ख़ुश होते इंसान।
उसे दुखी होने नहीं, देते हैं भगवान।।
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चैन-सुकूं की बात अब, करना है बेकार।
पहले जैसा अब कहाँ, है जीवन-संसार।।
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हिचकोले हों राह में, कितने रहें तनाव।
डूब नहीं सकती मगर, कभी सत्य की नाव।।
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जग में चुभने के लिए, काँटे हैं बदनाम।
इस धोखे में फूल भी, कर जाते यह काम।।
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दवा और उसके लिए, दुआ हुई बेकार।
जो भी इस संसार में, "मैं" का हुआ शिकार।।
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उठे अगर तो देव हो, गिरने पर हैवान।
हे प्रभु! तूने भी अजब, जीव रचा इंसान।।
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पत्थर रखकर पेट पर, जीना है आसान। 
अच्छा लगता है किसे, वरना सर पर भार।।
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धर्म नहीं अंधा यक़ीं, केवल है बकवास।
बिन समझे कुछ मानना, सिर्फ़ अंधविश्वास।।
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उदाहरण देना कहीं, है बेहद आसान।
उदाहरण तुम ख़ुद बनो, तो है काम महान।
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ख़ामोशी का कम नहीं, अपना रुतबा मित्र।
लोग समझ पाते नहीं, बेशक इसका चित्र।।   
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उलझी बातें भी मधुर,हो सकती हैं मित्र।
जलेबियाँ इस बात का,प्रस्तुत करतीं चित्र।।१०१ 
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