गुरुवार, 1 मार्च 2018

देवकी नंदन 'शांत'

सुकवि अभियंता देवकी नन्दन 'शांत' लखनऊ
जन्म दिवस पर शत अभिनन्दन
अर्पित अक्षत कुंकुम चन्दन
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जन्म दिवस पर दीप जलाओ, ज्योति बुझाना छोडो यार
केक न काटो बना गुलगुले, करो स्नेहियों का सत्कार

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शीश ईश को प्रथम नवाना, सुमति-धर्म माँगो वरदान
श्रम से मुँह न चुराना किंचित, जीवन हो तब ही रसखान

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आलस से नित टकराना है, देना उसे पटककर मात
अन्धकार में दीप जलना, उगे रात से 'सलिल' प्रभात
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शांत जी की एक रचना

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दीपक बन जाऊँ या फिर मैं दीपक की बाती बन जाऊँ
दीपक बाती क्या बनना है दिपती लौ घी की बन जाऊँ

दीपक बाती घृत-युत लौ से अन्तर्मन की ज्योति जलाकर
मन-मन्दिर में बैठा सोचूँ, पूजा की थाली बन जाऊँ

पूजा की थाली की शोभा अक्षत चन्दन सुमन सुगंधित
खुशबू चाह रही है मैं भी शीतल चन्दन सी बन जाऊँ

शीतल चन्दन की खुशबू में रंगों का इक इन्द्रधनुष है
इन्द्रधनुष की है अभिलाषा तान मैं सरगम की बन जाऊँ

सरगम के इन ‘शान्त’ सुरों में मिश्रित रागों का गुंजन है
तान कहे मैं भी कान्हा के अधरों की वंशी बन जाऊँ

— देवकी नन्दन ‘शान्त’

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