शुक्रवार, 23 मार्च 2018

दोहा शतक प्रेम बिहारी मिश्र

ॐ 
दोहा सलिला 
प्रेम बिहारी मिश्र















आत्मज: स्व. श्रीमती नन्ही मिश्र- स्व. श्री कैलाश बिहारी मिश्र।
जीवन संगिनी: श्रीमती सुलेखा मिश्र।
जन्म: १३ दिसंबर १९४६, ग्वालियर (म.प्र.)।
संप्रति: सहायक निदेशक, सीमा सुरक्षा बल (सेवा-निवृत्त), संस्थापक-संचालक दिल्ली कविता मंडल, महासचिव सुख-दुख के साथी, संयुक्त सचिव द्वारका फोरम, सदस्य सीनियर सिटीजन एसोसिएशन।
लेखनविधाएँ : कविता, गीत, ग़ज़ल, गीतिका, छन्द, मुक्तक, दोहा, माहिया, हाइकू, क्षणिकाएं, कविता।
प्रकाशन: एक मुक्तक संग्रह, आठ साझा काव्य संकलनों, एवं पत्र-पत्रिकाओं में।
प्रसारण: दूरदर्शन सहित तीन टी.वी. चैनलों एवं द्वारका-रेडियो पर कविताएँ/वार्ता/साक्षात्कार प्रसारित।
संपर्क: सी-५०१, चित्रकूट अपार्टमेंट्स, प्लाट न. ९, सेक्टर-२२, द्वारका, नई दिल्ली -११००७७।
दूरभाष:  ०९७१८६५१९, ई-मेल: pbmishra.bsf@gmail.com।

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दोहा सलिला

वंदन वीणावादिनी, भर दो मन सुविचार।
करें निराशा दूर सब, पग-पग बाँटें प्यार।।
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कर दो जगमग शारदे, शब्दों का संसार।
प्रज्ञा दो उज्ज्वल हमें, भावों में रसधार।।
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तनिक न चिंता नाम की, नहीं दाम से काम।
निश्छल मन की बात मैं, करता रहता आम।।
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टूट रहे परिवार सब, प्रीति रही है छूट।
घर-घर में शकुनी बसे, पनप रही है फूट।।
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समझाए समझे नहीं, बैठा कुमति चकोर।
करे कामना चाँद की, बैरी मन बरजोर।।
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चना चबैना बाजरा, मक्का रोटी साग।
सब ग़रीब से छिन गया, हुआ अमीरी राग।।
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बिजली की है रोशनी, घी का दिया न पास।
डी.जे. की है धूम अब, मंगल गीत उदास।।
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कलियों के काँटे चुभे, तितली के मन फाँस।
भौरों की आवाज नम, भरते गहरी साँस।।
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दीन-धर्म पैसा यहाँ, पैसा ही है प्यार।
अमराई छूटी यहाँ, नकली मिले बयार।।
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काट-काटकर पेड़ सब, सजा लिए घर-बार। 
खेत हटे जंगल घटे, सहें प्रकृति की मार।।
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पर्वत को जो तोड़ता, रहा वृक्ष को चीर।
अपने हाथों फोड़ता, अपनी ही तक़दीर।।
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जीवन देते वृक्ष जो, कैसा उनसे बैर।
उन्हें काट कर काटते, खुद अपने ही पैर।।
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ज़हर हवा में घोलते, कैसा करते पाप।
गड्ढा ख़ुद ही खोदते, जिसमें गिरते आप।।
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पेड़ गए पौधे गए, नहीं बरसता मेह।
साँसे लेकर विष भरी, भटक रही है देह।।
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एसी कूलर लग गए, गई नीम की छाँव।
कंकरीट के वन बढे, निगल रहे हैं गाँव।।
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मात-पिता में मानते, जब ईश्वर का रूप।
शूल फूल बनते तभी, शीतल लगती धूप।।
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एक घनेरी छाँव है, मात-पिता का हाथ।
जब तक सिर पर है रखा, ईश्वर रहते साथ।।
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तिनका बैठा अर्श पर, इतराता है खूब।
पंख दिए जिसने उसे, भूल गर्व में डूब।।
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मात-पिता से दूर हो, कितना ख़ुश नादान।
उनका ही है अंश पर, बन जाता अन्जान।।
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मात-पिता से भी बड़ा, सुख-वैभव है आज।
चरण वंदना तज रहे, सुत को आती लाज।।
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फटे हुए जो पहन कर, तुझको देते ताज।
तेरी उतरन के लिए, तरस रहे वो आज।।
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कुत्ते बिल्ली रख लिए, किन्तु न उनको ठौर।
जो तुमको देते रहे, अपने मुँह का कौर।।
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भुला दिया उस कोख को, जन्मे जहाँ सपूत।
किसके होंगे मीत जो, बेचें शर्म कपूत।।
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मात-पिता को छोड़कर, मत इतराएँ आप।
पत्ता टूटा पेड़ से, सूखे अपने आप।।
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मान अतिथि को देवता, हुई पुरानी बात।
अब घर में आफत लगें, खुद के ही पित-मात।।
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हर मंजिल आसां करे, वृद्ध जनों का प्यार।
मात-पिता की चरण रज, माथे का श्रृंगार।।
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बने पखेरू उड़ गए, भूल गए निज धाम।
ढूँढ रहे हैं छाँव अब, बिना वृक्ष अविराम।।
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हुई अमावस ज़िंदगी, चाँद गया परदेस।
दीपक रीता हो गया, मिला नहीं संदेस।।
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चरखी-माँझे में भरे, जीवन के सब रंग।
मिली ज़रा सी ढील तो, अटकी तुरत पतंग।।
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पूरब के सूरज गए, ऐसे पश्चिम दौड़।
लौट न पाए फिर कभी, चक्रव्यूह को तोड़।।
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पंख मिले तो उड़ गए, नीड़ न रहे सम्हाल।
तिनका-तिनका जो गढ़ें , रीढ़ बिना बेहाल।।
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पिता भाग्य को कोसते, अम्मा है बेहाल।
हवा कौन सी ले गई, घर से मेरा लाल।।
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राखी ले बहिना सजी, छोड़-छाड़ सब काज।
छत से गिनती रह गई, कितने उड़े जहाज।।
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चमक-दमक में खो गए, गोरी के भरतार।
सौतन पछुआ ने रचे, ऐसे स्वांग हज़ार।।
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खुशियाँ पश्चिम को गईं, बचा नहीं कुछ और।
आँखों में आँसू बसे, मिला न किंचित ठौर।।
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जीवन भर उड़ता रहा, छू न सका आकास।
ऋण धरती का भूल कर, कहाँ लगाई आस।।
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भर आए जो बिन कहे, देख पराई पीर।
सागर से भी है बड़ा, उन नयनों का नीर।।
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इधर-उधर भटका करूँ, किंतु न मिलती थाह।
मन-खेतों में नित उगें, तृष्णा, चिंता, आह।।
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औरों की थाली दिखे, व्यंजन से भरपूर।
ऐसे जीव सदा रहें, सच्चे सुख से दूर।।
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सुख-दुःख दोनों मीत हैं, आते-जाते  साथ।
अपनी-अपनी सोच है, किसका पकड़ें हाथ।।
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अपने मन में मैल है, दे औरों को दोष।
अपना चश्मा साफ़ कर, हो उज्वलता-घोष।।
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यदि तेरे मन पाप है, निश्चित है संताप।
जलता काला कोयला, बन अंगारा आप।।
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बिना परिश्रम चाहते, सभी सुखों की खान।
ऐसे नर को क्या कहें, हैरत में भगवान।।
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दमक रही ज्यों दामिनी, मन में मचा बवाल।
चमक रही त्यों चाँदनी, कैसा माया जाल।।
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महल द-महले घर बड़े, व्यर्थ सभी बिन प्रीत।
तूने दुनिया जीत ली, जीत सके दिल जीत।।
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अलग-अलग हर खेल की, अलग-अलग है रीत।
सब कुछ हारें प्यार में, इससे बड़ी न जीत।।
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वे छत पर जो आ गए, नाच उठे सब मोर।
मावस पूनम हो गयी, मचा गली में शोर।।
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हँस कर वे शर्मा गए, नैन हुए जब चार।
दृग में उतरी चाँदनी, बसा प्रणय संसार।।
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चरखी पकड़े दिख गए, इंद्रधनुष के रंग।
पेच नैन के लड़ गए, पल में कटी पतंग।।
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उतरी छत पर चाँदनी, चाँद खड़ा है संग।
मीठी-मीठी आग में, जलता सारा अंग।।
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नूपुर नित्य सँवारती, थिरकें सारे अंग।
चपला चपल निहारती, मन में जगे अनंग।।
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प्यार बना व्यापार अब, मिले न सच्चा नेह।
चातक प्यासा ही रहे, बरसे कितना मेह।।
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मन बसते प्रभु आपके, आप नहीं कमज़ोर।
पहचानो बस स्वयं को, पा जाओगे ठौर।।
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अपनी धरती छोड़ कर, ओढ़ रहे आकाश।
धन के धागे जोड़ कर, तोड़ रहे विश्वास।।
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भूल गया ऋण जगत का, व्यर्थ न पूँजी जोड़।
भेष नाम भाषा तलक, यहीं मिले दे छोड़।।
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दरवाजे से दर सटा, मगर नहीं पहचान।
आज पड़ोसी हो गए, अनजाने महमान।।
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हाय! विदूषक हो गए, कविओं के सम्राट।
कुछ तो हैं बाज़ार-पटु, कुछ हैं चारण-भाट।।
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दर्पण धुँधले हो गए, कुटिल जमी है धूल।
फलते रहते शूल अब, दुर्लभ गंधित फूल।।
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बेटी घर की जान है, है अपना अभिमान।
त्याग तपस्या प्यार की, ईश्वर निर्मित खान।।
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गर बेटी को कोसते, और लगें वे भार।
लक्ष्मी दुर्गा पूजना, बिल्कुल है बेकार।।
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बाक़ी रिश्ते जगत में, धन-दौलत के मीत।
माँ है मूरत त्याग की, दूर करे भव-भीत।।
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जिस नारी को कोस कर, बनता स्वयं महान।
उस नारी की कोख में, पलती तेरी जान।।
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मन बैरी वाचाल है, जब-तब मारे डंक।
चाह बढ़ाए दस गुनी, ज्यों जीरो का अंक।।
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अब तो बीच बजार में, बिकते नेता मोल।
काले धन के खेल में, बोली अपनी बोल।।
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वोट मिलें अब नोट में, मेरा देश महान।
नेता बिकते नोट में, नोट बने भगवान।।
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चलती ज्यूँ गज गामिनी, नाचे जैसे मोर।
आते-जाते बल पड़ें, कटि नदिया में घोर।।
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वारिद कुंतल केश हैं, दामिन दृग वाचाल।
पर्वत-घाटी सब भरे, अंग-अंग भूचाल।।
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जहँ-तहँ चपल निहारती, अधर धरे मुस्कान।
पग-पग पर भरमा रही, छोड़ नयन से बान।।
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नागिन जैसी चाल है, अधर मदिर मुस्कान।
चल-फिर हँस घायल करें, आँखें तीर कमान।।
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सत्य अहिंसा सो गए, भूल गए सब राम।
गाँधी टोपी बिक गई, दो कौड़ी के दाम।।
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मैं छोटी सरिता भली, हरती सबकी प्यास।
सागर बनकर क्या करूँ, गरजे-तोड़े आस।।
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मन मूरख वाचाल है, भरमा पाता त्रास।
ज्यों मृग छौना रेत में, करता जल की आस।।
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रोटी दें जो जगत को, रोते वही किसान।
बच्चे बिलखें भूख से, देते अपनी जान।।
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बादल सम यह मन बना, बहे हवा कर गेह। 
पानी हो बरसे वहीं, जहाँ मिल सके नेह।।
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उजले कपड़े पहन कर, विषधर घूमें आज।
जनसेवक खुद को कहें, तनिक न आती लाज।।
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मन यदि तेरे प्रीत है, फिर कैसी है भीत।
शक्ति छिपी वह प्रीत में, बने शत्रु भी मीत।।
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पात-पात झर कर कहे, पतझर से कर प्यार। 
नव कोंपल का मिलेगा, वासंती उपहार।।
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हुई दम्भ की दौड़ अब, और अहं की होड़।
सबसे प्रबल जुगाड़ है, बाक़ी बातें छोड़।।
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जो देखो सो बुन रहा, मकड़ी जैसा जाल।
मानव खुद से खेलता, अब शतरंजी चाल।।
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रिश्ते-नातों का हुआ, आज बुरा क्या हाल।
घर-घर शकुनी चल रहा, ज्यों चौसर की चाल।।
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नई रोशनी खा गई,  आपस का विश्वास।
रिश्तों में है गाँठ अब, खोई सभी मिठास।।
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धन की अंधी दौड़ में, रोगों का भंडार।
नफ़रत की है होड़ अब, प्यार पड़ा बेज़ार।।
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स्वार्थ बड़ा भगवान से, बैठे हैं कर जोड़।
ऐसे जन को क्या कहें, रहे स्वयं को तोड़।।
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घर में मंदिर है बड़ा, दिल में बैठा चोर।
मन प्रपंच का विष भरा, राम नाम का शोर।।
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मंदिर के ठेके बिकें, पूजा है व्यापार।
कैसे-कैसे ठग यहाँ, बन बैठे अवतार।।
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करें दलाली धर्म की, बढ़ा-बढ़ाकर केश।
लें धंधे के काम वे, गीता के संदेश।।
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जो बोता जो काटता, रहता खस्ता हाल।
मण्डी भरें तिजोरियाँ, नेता मालामाल।।
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इस जग को जो पालता, भरता पेट किसान।
खुद वह भूखा सो रहा, धरती का भगवान।।
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कृषकों के उत्थान की, बनें योजना लाख।
बातें करते हैं बड़ी, मिली ख़ाक में साख।।
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नील गगन में बैठकर, इतराता है चाँद।
झेल झमेले जगत के, झट भागेगा फाँद।।
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पाल ईर्ष्या, छल-कपट, करे क्रोध से राग।  
कैसा पागल आदमी, जले लगाकर आग।।
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मैं तो छोटा ही भला, बनूँ स्वाति की बूँद।
कहीं कीट मोती बने, पड़ा आँख जो मूँद।।
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मानव का तो भाग्य है, कर्मों का ही दान।
कर्म करे सो जानता, जीवन का विज्ञान।।
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शब्दकोष से अब हटे , शत्रु, धूर्त, मक्कार।
मार-काट धोखा-धड़ी, कपट, ठगी, व्यभिचार।।
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मेल-जोल का बल गढ़ें, होली के औज़ार।
सबको उन्नति पथ मिले, खुले मिलें सब द्वार।।
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अंत करें आतंक का, होली के अंगार।
ख़त्म न हों सुख के कभी, झोली में भंडार।।
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होली में पूरा जले, आतंकी संसार।
बैर-भाव सब भूलकर, बढ़े आपसी प्यार।।
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बम बनकर कर ख़त्म तू, दहशत का व्यापार।
तोप-तमंचों की जगह, प्यार बने हथियार।।
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बड़ा पेड़-जड़ हो अगर, मिट्टी में कम हीन।
ज़रा तेज़ आँधी चले, मिट्टी में मिल दीन।।
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माटी उड़ी जमीन से , जाऊँगी आकाश।
हो न सकी आकाश की, रहा न धरती-पाश।।
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