शनिवार, 24 मार्च 2018

दोहा शतक शुचि 'भवि'

ॐ 
दोहा शतक 
शुचि भवि
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दोहा शतक 
हे माँ वीणावादिनी, दे मुझको वरदान।
चले निरंतर लेखनी, जब तक है 'भवि' जान।।
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आशीषों से हों भरे, जीवन के सोपान।
हार और ‘भवि’ जीत क्या, बनो नेक इंसान।।
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सीधे-सच्चे को कहाँ, मिलता अब सम्मान।
दुम जिसकी जितनी हिले, उसका उतना मान।।
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बहुत दुखद है बात यह, बस मतलब का साथ।
मतलब निकले भूलता, बायाँ दायाँ हाथ।।
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रंग-बिरंगे फूल हैं, खिले हुए चहुँ ओर।
धरती का यह रूप लख, मन नाचे बन मोर।।
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ईश  तुम्हारे  साथ हैं, करते रहो प्रयास ।
जीवन में कितने मिलें, तुम्हें विरोधाभास।।
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नाकाफ़ी इस दौर में, 'भवि' जी तोड़ प्रयास।
चाटुकारिता के बिना, रखो नहीं कुछ आस।।
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सोचो 'भवि' है मतलबी, कितना वह इंसान।।
मतलब में इंसान को, बोले जो भगवान।।
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बातों से उस शख़्स की, कैसे हो पहचान।
जिसके मन में कंस है, होंठों पर भगवान।।
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ईश कहे जो आपको, तो समझें सच आप।
उसके मन में है भरा, निश्चित कोई पाप।।
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श्रेष्ठ हुए हैं जन्म से, कौन जगत में लोग।
कर्मों से ही श्रेष्ठता, का बनता संयोग।।
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जीवन जब नीरस लगे, समझो हुए तबाह।
याद करो 'भवि' ईश को, देगा नव उत्साह।।
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मन हो पावन आपका, रौशन आँगन-द्वार।
ईश करे घर में सदा ,’भवि’ हों ख़ुशियाँ-प्यार।।
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मन मयूर सा झूमता, सुन क़दमों की चाप।
यादों में आहट बिना, जबसे आए आप।।
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हद से हद मानव यहाँ, रह सकता सौ साल।  
छोड़ो उसके बाद के, सपनों का जंजाल।।
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जो भी करना आज तू, कर ले उसको आज।
वरना तेरा शेष कुछ, रोज़ बचेगा काज।।
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'भवि' अपनी मासूमियत, रखो सुरक्षित यार।
मन पर हो सकता नहीं, कभी उम्र का वार।।
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केवल मतलब के समय, जो पूजे भगवान।
पीड़ित दुख-दारिद्र्य से, रहता वह इंसान।।   
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अपने दिल से पूछिए, क्या उसको दरकार ।
उसे प्यार की प्यास है, या बस कारोबार।।
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टेढ़े जग में टूटता, मानव का भी दर्प।
बिल में जाने के लिए, सीधा होता सर्प।।
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मानवता सबसे बड़ा, जग में भवि है धर्म।
साध लिया तुमने अगर, उत्तम होंगे कर्म।।
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कर बुलंद ख़ुद को समझ, सबके हैं भगवान।
करते वे सब पर कृपा, निर्धन या धनवान।।
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ग़ुस्सा होता नाक पर, लालच में रख ध्यान।
विष बाहर का बेअसर, भीतर का बलवान।।
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कथनी-करनी है अलग, जिनकी मेरे ईश।
न्याय करेंगे किस तरह, ‘भवि’ वो न्यायाधीश।।
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दामन अपना देखिए, कैसा है किरदार।
केवल कहने से नहीं, जाता भ्रष्टाचार।।   
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लेखन हो जिनका विविध, बनो उन्हीं के शिष्य।
उत्तम गुरु के साथ ही, उत्तम बने भविष्य।।
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चलती जिससे सृष्टि है, उस पर ही अब शोक।
‘भवि’ बेटी के जन्म पर, क्यों हो कहिए रोक।।
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कितना भारी नाम हो, कितनी ऊँची ज़ात।
किसको भला कुकर्म से, जग में मिली निजात।।
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कटु वचनों से क्या कहीं, बनती है कुछ बात।
बोलो मीठे बोल तो, सुधरेंगे हालात।।
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ख़ुद ही ख़ुद को कह रहे, तुम ज्ञानी-विद्वान।
दुनिया दे आदर तुम्हें, भवि है वो सम्मान।।
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बचे कैमरे से मगर, यह सोचें श्रीमान।
कहाँ ईश की दृष्टि से, ओझल है इंसान।।
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धन-दौलत, यश कुछ नहीं, ‘भवि’ आएगा हाथ।
तू कर्मों पर ध्यान दे, जो जाएँगे साथ।।   
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शिष्य मिले अच्छा तभी, बढ़ता गुरु का मान।
चहुँदिश उसके ज्ञान का, होता तब सम्मान।।
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पहले जैसी अब कहाँ, पर्वों में झंकार।
अब तो हैं बस नाम के, पर्व तीज त्यौहार।।
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स्वच्छ हवा-पानी नहीं, दूषित हृदय विचार।
करें देव भी किस तरह, अर्घ्य आज स्वीकार।।
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जन्नत का दर था कभी, 'भवि' हर घर का द्वार।
मगर जहन्नुम हो गया, अब सारा संसार।।
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होठों पर छाई हँसी, अंतस रोता पीर।
'भवि' मन की मजबूरियाँ, देतीं सीना चीर।।
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अपने कर्मों पर करें, दिल से सभी विचार।
असभ्यता के रोग का, तब होगा उपचार।।
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डिग्री प्रतिभा तब तलक,'भवि' समझो बेकार।
जब  तक  है  इस देश  में, आरक्षण  की मार।।  
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अहंकार ने खा लिया, उसका सारा ज्ञान।
वरना रावण था बड़ा, 'भवि' ज्ञानी-विद्वान।।
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बूँद-बूँद विश्वास से, बनती है पहचान।
पल भर में कोई कभी, होता नहीं महान।।
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झूठे उस इंसान को, शायद नहीं गुमान।
कौन बचा 'भवि' ईश की, लाठी से इंसान।।
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फल अनाज पानी हवा, शुद्ध नहीं कुछ आज।
'भवि' कैसे इस हाल में, जीवित रहे समाज।।
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पूजन करते राम का, रघुकुल से अंजान।
वचन निभाते 'भवि' नहीं, तुम हो मृतक समान।।
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सोने  सी  काया  हमें, देते  हैं  करतार।
मिट्टी करते हैं हमीं, यह स्वर्णिम उपहार।।
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मँहगाई से ज़िंदगी, किसकी है दुश्वार।
थिरक रहा हर हाथ में, 'भवि' मोबाइल यार।।  
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तन के सुख में इस क़दर, झूम रहा संसार।
मन के सुख की बात अब, ’भवि’ करना बेकार।।
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निर्भर मन की दौड़ पर, सारा जोश-उमंग।
मन हारा तो जानिए, 'भवि' जीवन बेरंग।।
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राधा सोचे किसलिए, दुनिया का डर लाज।
उसके दिल पर एक बस, मोहन का ही राज।।
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जीवन का 'भवि' देखिए, दर्शन बिल्कुल साफ़।
करनी अपनी भोगना, ईश करें क्यों माफ़।।
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कृपा सभी पर कीजिए, ईश हमेशा आप।
सद्गुण सबको दीजिये, करे न कोई पाप।।
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धूप सेंकना-रेडियो, चाय गप्प अख़बार।
मोबाइल में खो गया,जाने क्या-क्या यार।। 
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कृपा सभी पर कीजिए, ईश हमेशा आप।
सद्गुण सबको दीजिये, करे न कोई पाप।।
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कल जो मेरे साथ था, आज हुआ है दूर।
सच में होता वक़्त का, बड़ा अजब दस्तूर।।   
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माना है सच्चा कथन, वक़्त बड़ा बलवान।
लेकिन हिम्मत हारना, कायर की पहचान।।
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अंग्रेज़ों की चाल से, फैला ऐसा रोग।
भूले अपनी संस्कृति, हम भारत के लोग।।
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संवत्सर से ‘भवि’ शुरू, अपना है नववर्ष।
एक जनवरी की धमक, है अंग्रेज़ी हर्ष।।
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धन-दौलत की है नहीं, भवि मुझको दरकार।
सिर्फ़ प्रेम से प्रेम का, मिलता रहे उधार।।  
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ऐसा भी क्या क्रोध में, कर जाना ‘भवि’ काम।
खा जाए जो ज़िंदगी, सारी इज़्ज़त-नाम।।
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कर्मों पर ही चल रहा, 'भवि' सारा संसार।
थोथी बातों से नहीं, होगा बेड़ा पार।।
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जिनकी गर्मी का कभी, दिल पर था 'भवि' राज।
उन रिश्तों की ठंड से, लहू जम रहा आज।।
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सरदी लेकर आ गया, नया-नवेला साल।
फाल्गुन कहने आ रहा, खेलो रंग-गुलाल।।
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काग़ज़-दिल  मेरा  लिए, कितने  ही जज़्बात।
कोई समझे तो कहूँ, 'भवि' मैं दिल की बात।।
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दिल में ख़ुशियाँ चाहिए, जीवन में 'भवि' रंग।
बिना डोर के कब उड़ी, नभ में कहें पतंग।।
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जीवन का हर स्वाद है, 'भवि' जिनसे आबाद।
भूल  रहे  क्यों आज हम, उन हाथों का स्वाद।।    
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दुख सबको मिलते नहीं, मानें ईश-प्रसाद।
ईश-कृपा जो मानता, उसे न हो अवसाद।।
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अट्टहास 'भवि' हर तरफ़, करता अत्याचार।
काँप  रही थर-थर धरा, ऐसी बहे बयार।।
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लाख शोर झूठे करें, झूठा अब परिवेश।
सच की ख़ुश्बू से मगर, महकेगा ‘भवि’ देश।।
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छुरे लिए भवि हाथ में, हुआ ज्ञान का अंत।
लाल रंग सरसों हुई, रोए आज वसंत।।
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हावी बम-बंदूक है, ग़ायब केसर-सेब।
निगल गया कश्मीर को, आतंकी आसेब।।   
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एक दिवस मत कीजिए, 'भवि' बेटी को याद।
प्रभु का यह वरदान ही, करती जग आबाद।।
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घर के कोने में पड़ा, सिसक रहा ईमान।
सच में कितना गिर गया, इस युग में इंसान।।  
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जीवित की चिंता नहीं, मुर्दों पर 'भवि' ध्यान।
करे तरक़्क़ी किस तरह, मेरा हिंंदुस्तान।।
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ये जो मेरे नयन हैं, देखें नित घनश्याम।
'सावन की अंधी' कहो, या दो कोई नाम।।
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करो निभाने का जतन, जब तक लेना साँस।
बचना तुम उससे मगर, रिश्ता जो हो फाँस।।
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टूटा सपना जब जुड़े, दिल में भरे उमंग।
अगर ईश गुण तुम धरो, होगे मस्त मलंग।।  
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सभी चाहते सुख मगर, दुखी सकल संसार।
क्यों 'भवि' ऐसा हो रहा, आओ करें विचार।।
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बच्चे अपने आजकल, क्यों भूले आचार।
इस पर भी तो हम कभी, मिलकर करें विचार।।
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आया 'भवि' संसार में, मानव अतिथि समान।
जीवन का है खेल कुल, चार दिनों की शान।।   
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आदर चाहो तो सदा, सबको दो सम्मान।
बच्चो जीवन मंत्र यह, है कितना आसान।।   
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बुरा समय सबसे बड़ा, जादूगर है मित्र।
यही बताता है हमें, सबका सही चरित्र।।
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जीवन में दुख लाख हों, नहीं ईश को भूल।
कर्म-लगन-विश्वास से, समय बने अनुकूल।।
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चुग़ली-निंदा के समय, रखें सदा यह ध्यान।
इसमें औरों का नहीं, अपना है नुक़सान।।
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नाहक़ ही मन को दुखी, कर मत मेरे यार।
कलियुग में संभव नहीं, सतयुग वाला प्यार।।
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टूटा धागा गाँठ से, जुड़ सकता है यार।
यदि टूटा विश्वास तो, रिश्ता बचे न प्यार।।
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चैन-सुकूं की बात अब, करना है बेकार।
दिल पर तेरे इश्क़ का, छाया हुआ बुख़ार।।   
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साँसें महकेंगी भला, कब तक होगा प्यार।
पीछे से कोई अगर, करे प्यार में वार।।
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कुछ भी कर सकते नहींं, 'भवि' इसमें तुम यार।
अगर किसी के बस गया, दिल-दिमाग़ में प्यार।।
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कितना ऊँचे तुम उठो, रहे सदा यह ध्यान।
तुमको 'भवि' तहज़ीब का, महकाना उद्यान।।
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ख़ामोशी का कम नहींं, अपना रुतबा मित्र।
नज़रों की क्यों गुफ़्तगू, लगती तुम्हें विचित्र।।
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अनुभव से मुझको मिला, 'भवि' यह जीवन ज्ञान।
धैर्य-भक्ति से आपको, मिल सकते भगवान।।
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'भवि' अधीन दिल के हुए, रहे नहींं आज़ाद।
तुम्हीं कहो अब कुछ नई, कैसे हो ईजाद।।
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प्रेम अमर यूँ ही नहीं, उनका है भरपूर।
कृष्ण-राधिका ने रखा,लज्जा का 'भवि' नूर।।  
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भूल गया इंसान क्यों, नारी का सम्मान।
जिसके आगे ख़ुद रहे, नतमस्तक भगवान।।
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कर्मों के अनुसार ही, न्याय ईश का जान।
तेरे कर्मों का सदा, फल देते भगवान।।
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होली में हम क्यों पिएँ, अनायास भवि भंग।
जब टेसू के साथ है,दिल में तेरा रंग।।
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सभी जानते थे मुझे, जब तक घर था गाँव।
किसको ‘भवि’ पहचानती, आख़िर शहरी छाँव।।
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दिल से दिल के हैं जुड़े, जहाँ नहीं ‘भवि’ तार।
ऐसे रिश्तों में कभी, समय न कर बेकार।। 
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गहने-कपड़े का उसे, बेशक है अरमान।
लेकिन पहले चाहती, हर नारी सम्मान।।
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माना चहुँदिश गंदगी, यत्र-तत्र दुर्गंध।
जीवन में सत्कर्म की, रखिए व्याप्त सुगंध।।  
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जीवन का सबसे सरल, यही एक है मंत्र ।
सबसे सम व्यवहार हो, सबके प्रति सम तंत्र।।
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दुनिया में हर आदमी, उसे बनाता मित्र। 
धन से पहले जो सदा, देखे उच्च चरित्र।।
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देखे इस संसार में, मानव रूप अनेक।
पर कोई दिखता नहीं, मुझको तुम सम नेक।।
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जो डूबा उसने किया, अमृत का ‘भवि’ पान।
केवल उथला जो रहा, उसका किसको ध्यान।।
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ख़ुद पर है विश्वास तो, रखिए यह विश्वास।
डोर प्रेम की दूर के, रिश्ते करती पास।।  १०१ 
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कुछ और दोहे 
बेटी निर्धन बाप की,जबसे हुई जवान।
भूला है संसार वो,क्या सोचे पकवान।।
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चाहे हो सौ साल की, या कोई नादान।
औरत केवल भोग का, होती है सामान।।
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सबसे हँसकर भी ज़रा, मिला करो कम यार।
ठीक नहीं है आजकल, बहुत लुटाना प्यार।।
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दर्पण जैसा मित्र हो, परछाईं सा मीत।
धर्मराह हो फिर स्वयं, होगी तेरी जीत।।
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नाम रटो तुम ईश का, बेशक सुबहोशाम।
लेकिन सब बेकार है, बिना किए सद्काम।।
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शुभकर्मों में ‘भवि’ सदा, रहते हैं जो हाथ।
पकड़े रहते हैं सदा, उन हाथों को नाथ।।
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पावरफुल आशीष ही, मिलता उनके हाथ।
बच्चों किस्मत दे बदल, मात-पिता का साथ।।
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घर बेशक चमका रही, झाड़ू सुबहो-शाम।
मन से कैसे साफ़ हो, द्वेष-बैर औ' काम।।
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जीवन में चाहो अगर, रहो नहीं बदहाल।
ईश कृपा पर तुम सदा, रहना बस ख़ुशहाल।।
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अक्षर मन का आईना, और भाव  दिल-जान।
लेखन को 'भवि' तू नहीं, काम समझ आसान।।
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बस्तर सा सुंदर नहीं, ज़िला मगर ‘भवि’ काश।
ख़त्म वहाँ से हो सके, राजनीति का पाश।।
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बूँद स्वाति की जिस तरह, ले लेती है सीप।
धारण कर लो ईश गुण,नहीं रहोगे चीप।।
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चाटुकारिता से बड़ा, हुनर नहीं है आज।
मंच-पोस्ट ग्रुप हर जगह, भवि इसका ही राज।।
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कापी जँच पाती नहीं, आ जाता परिणाम।
इम्तिहान क्या आजकल, ‘भवि’ क्या है अंजाम।।
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तू चंदा मैं चाँदनी, पावन अपनी प्रीत।
ऐसे में दिल झूमता, पाकर तुमसा मीत।।
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आन-बान की शान की, एक अलग पहचान।
परंपराओं की धरा, 'भवि' है राजस्थान।।
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