शनिवार, 3 मार्च 2018

शिव दोहावली

दोहा में शिव तत्व
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दोहा में शिव-तत्व है, दोहा भी शिव-तत्व।
'सलिल' न भ्रम यह पालना, दोहा ही शिव-तत्व।।
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अजड़ जीव, जड़ प्रकृति सह, सृष्टि-नियंता मौन।
दिखते हैं पशु-पाश पर, दिखें न पशुपति, कौन?
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अक्षर पशु ही जीव है, क्षर प्रकृति है पाश।
क्षर-अक्षर से परे हैं, पशुपति दिखते काश।।
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पशुपति की ही कृपा से, पशु को होता ज्ञान।
जान पाश वह मुक्त हो, कर पशुपति का ध्यान।।
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पुरुषोत्तम पशुपति करें, निज माया से मुक्त।
माया-मोहित जीव पशु, प्रकृति मायायुक्त।।
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क्षर प्रकृति अक्षर पुरुष, दोनों का जो नाथ।
पुरुषोत्तम शिव तत्व वह, जान झुकाकर माथ।।
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है अनादि बिन अंत का, क्षर-अक्षर संबंध।
कर्मजनित अज्ञान ही, सृजे जन्म अनुबंध।।
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माया शिव की शक्ति है, प्रकृति कहते ग्रंथ।
आच्छादित 'चिद्' जीव है, कर्म मुक्ति का पंथ।।
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आच्छादक तम-तोम है, निज कल्पित लें मान।
शुद्ध परम शिव तम भरें, जीव करे सत्-भान।।
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काल-राग-विद्या-नियति, कला भोगता जीव।‌
पुण्य-पाप सुख-दुख जनित, फल दें करुणासींव।।
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मोह वासना अविद्या, जीव कर्म का मैल।
आत्मा का आश्रय गहे, ज्यों  पानी पर तैल।।
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कर्म-नाश हित भोग है, मात्र भोग है रोग।
जीव-भोग्या है प्रकृति, हो न भोग का भोग।।
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शिव-अर्पित कर कर्म हर, शिव ही पल युग काल।
दशा, दिशा, गति, पंथ-पग, शिव के शिव दिग्पाल।।
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३.३.२०१८

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