सोमवार, 12 मार्च 2018

दोहा सलिला

गले मिले दोहा-यमक
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दो ने दोने में दिया, दो को दो का भाग।
दो में दो का भाग दे, शेष एक अनुराग।।
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दो से दो मिल चार हों, गणित न केवल यार।
आॅंख चार परिवार हों, दो के दो हों चार।।
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दो सुख तो वापस न लो, दो दुख कभी न मीत।
दो अपनापन तो बढ़ा, ऐक्य रखो शुभ रीत।।
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दो जब तक दो ही रहे, टकराते थे खूब।
दो मिल जबसे एक हैं, तनिक न होती ऊब।।
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दो हों एक अनेक फिर, हों अनेक से एक।
दो 'डू' हो कहता करो, 'अनडू' नहीं विवेक।।
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१२.३.२०१८,
ए१/२२ चित्रकूट एक्सप्रैस

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