शनिवार, 28 अप्रैल 2018

ॐ दोहा शतक: डॉ. नीलमणि दुबे


दोहा शतक:
मन के पंथ हजार
डॉ. नीलमणि दुबे
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जन्म: १.७.१९५९, सोहागपुर, शहडोल
आत्मजा: श्रीमती मिथलेश-श्री रघुनाथ प्रसाद तिवारी
जीवनसाथी: डॉ. राजेश दुबे
काव्य गुरु: माँ सरस्वती
शिक्षा: एम्. ए., एलएल. बी., पीएच. डी.।
लेखन विधा: दोहा, गीत, कुण्डलिया, ग़ज़ल, समीक्षा, समालोचक, शोध लेख आदि
प्रकाशित: खंडकाव्य- कृष्णार्जुन संवाद, स्मृति, काव्य- चेतना के फूल, विविध, दीवाने-आम और ग्यारह दिन आदि
उपलब्धि: स्वर्णपदक, अनेक सम्मान
संप्रति:प्राध्यापक हिंदी, शंभुनाथ सिंह महाविद्यालय शहडोल
सपर्क: मोदी नगर, रीवा मार्ग, शहडोल ४८४००१, चलभाष: ९४०७३२४६५०,  
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           डॉ. नीलमणि दुबे हिंदी वांग्मय और हिंदी शिक्षण दोनों की सीध्हस्त हस्ताक्षर हैं। त्रासदियों से आँख मिलाते हुए भी, चुनौतियों से जूझते हुए भी, सारस्वत साधना हेतु सतत समर्पित रहनेवाली नीलमणि जी 'नील सरोरुह स्याम, तरुन अरुन वारिज नयन' से 'करहु सो मम उर धाम' कहते हुए सृजन अनुष्ठान में समिधा समर्पित करती रहती हैं। विंध्याटवी का अप्रतिम प्राकृतिक सौंदर्य किसे नहीं मोहता? शहरों में अंधाधुंध उस-बढ़ रहे कोंक्रीती जंगलों में लगी आग से एक सीमा तक बचे विन्ध्य में मौसम के अनुबंध आज भी अपनी छटा बिखेरते हैं-
आग-आग सब शहर हैं, जहर हुए संबंध।
फूल-फूल पर लग गए, मौसम के अनुबंध।।
           नीलमणि जी की कहन गरार में सागर समाहित करने की तरह है। दोहा में एक भी अनावश्यक शब्द न रखना या दोहा के शब्द-शब्द को निहितार्थ सहित प्रयोग करना उनका वैशिष्ट्य है- 
विद्युत्-वल्ली कौंधती, रह-रह घन के बीच।
प्रगट ज्ञान की प्रभा ज्यों, छिपी लोक को सींच।। 
           देश में संसद से लेकर सड़क कर किसी न किसी बहाने अपने कर्तव्य का पालन न कर अन्यों को आरोपित करने की कला विज्ञान का रूप लेती जा रही है। नीलमणि जी ने विरोध दर्ज कराने का मौलिक और सार्थक सुझाव दिया है - 
करना है यदि बंद तो, बंद करें विश्राम।
दर्ज करें प्ररोध निज, कर-कर शत-गुण काम।।    
           दोहे के कथ्य के अनुरूप तत्सम-तद्भव शब्दावली, अथवा देशज शब्दावली का प्रयोग करने में वे निष्णात हैं-
अरुणा-प्राची में उदित, नव शशिकला अमंद।
लय अनुसारिणी अथच ज्यों, प्रथम अनुष्टुप छंद।। 
           अपनी माटी और जड़ों से जुडी नीलमणि जी ने जन्म और कर्मस्थली शहडोल की लोकभाषा बघेली के उन्नयन हेतु भी कार्य किया है। वे सत्य हे एकहाती हैं कि काव्य-सृजन की लक्ष्मी बड़भागी को ही मिलती है-
गोली सगलै दुःख हरै, कबौ न करे हरास।
या कविता के लच्छमी, होय न सबके पास।।
             नीलमणि काविषम पारिवारिक स्थितियों के बावजूद अल्प समय में इस अनुष्ठान में सहभागी होना हिंदी के सेवा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता दर्शाता है . 
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आग-आग सब शहर हैं, जहर हुए संबंध।
फूल-फूल पर लग गए, मौसम के अनुबंध।।
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सपने भी अपने नहीं, घर को रहे नबेर।
होली हो ली इस तरह, आए दिन के फेर।।
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खुशियाँ भटकी फिर रहीं, पीकर नौ मन भंग।
जाने इतने अनमने, क्यों होलीके रंग?
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कुमंत्रणा की होलिका, जली सुखी प्रह्लाद।
इसी तरह सबको सदा, मिले नया आल्हाद।।
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शतवर्णी धरती हुई, ऐसा मचा धमाल।
अंबर के मुख पर मला, ढेरों-ढेर गुलाल।।
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मन माहौरी, लाल मुँह,  आँखिन भरा गुलाल।
टसुआ पिचकारी चलैं, होरी आई काल।।
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मरु में नखलिस्तान है, नेह भरा व्यापार।
जीवन में वरदान सा, भ्रातृ-भगिनि सा प्यार।।
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सुप्रभात सुंदर-सुखद, शुभयुत आठों याम।
मंगलमय कल्याणप्रद, हो जीवन अभिराम।।
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प्रकृति की अनुपम छटा, देती नवल समृद्धि।
नित नूतन हो दिव्यता, नित्य नई श्रीवृद्धि।।
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आम्र-मंजरी मिस मधुर, देते अमृत घोल।
हिय में गहरे उतरते, पिक के मीठे बोल।।
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सरसों सकुचाई खड़ी, खिला-खिला कचनार।
कर सिंगार सँकुचा गई, हरसिंगार की डार।।
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अलि के मिस गुंजारता, जैसे कोई संत।
केसरिया टेसू रँगा, झूमे मस्त बसंत।।   ०
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सियाराम जू सकल सुख, दायक शुभ-आगार।
मातु-पिता, भरता-सखा, गुरु हितु, बंधु उदार।।          ?
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शतरंगीं हो कल्पना, चटकीले नवचित्र।
रंगपंचमी आपको, सुखमय हो प्रिय मित्र!!                  ?
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सर सरोज प्रात:-प्रभा, विकसित; गत तम-रैन।
करुना पूरित ह्रदय हों, शील-सनेही नैन।।
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श्रीगोवर्धन की कृपा, कालिंदी- बृजधाम।
सानुकूल सब पर रहें, अनुदिन राधेश्याम।।
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बुद्धि चित्त विकृत भ्रमित, मन के पंथ हजार।
भटक-भटक थक गया, मन के मत संसार।।
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कड़ी धूप संसार की, करती दाहक घाव।
प्रभु-पद प्रीति प्रतीति की, देती शीतल छाँव।।
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यदि मन में उत्साह है, कठिन कौन सा काम?
समय साध लेता वही, जिसके हाथ लगाम।।
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माँ भगिनि बेटी वधू, पत्नी प्रिय अनूप।
धरा-रूप तू प्रेरणा, ज्योतिमयी अपरूप।।
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एक कश्मकश जिंदगी, अक्सर लेती मोड़।
प्राण-स्फुरित बीज में, कर लेती है होड़।।
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सूरज से सपने उठें, चढ़ें नित्य परवान।
प्रखर तेज का विश्व को, मिले पूर्ण अवदान।।
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कृपा शीतला की रहे, शीतलतम सद्भाव।
प्रकृति चाँदनी सदृश हो, चंदन सदय सुभाव।।
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सृष्टि-रूप जीवन सुरभि, नारी सृष्टि महान।
सर्जन-पालन कर विमल, दीप्त आत्म-सम्मान।।
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पेड़ी तक दिखती नहीं, बस ऊपर छतनार।
आम्रवल्लिका-मूल सा, फैला भ्रष्टाचार।।
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लील सड़क पुल इमारत, भरा न पापी पेट।
सब विकास की योजना, कीं उदरस्थ समेट।।
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इस भौतिक परिवेश ने, बदले बहुत विचार।
पला व्यवस्था में सघन, जड़ से भ्रष्टाचार।।
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उत्सव मधुर मरंद का, दो दिन खिला वसंत।
आना-जाना सतत है, आएँगे फिर कंत।।
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सुमन खिला सौरभ लुटा, सुरभित हुआ दिगंत।
बीज बना मुरझा गया, जीवन सतत अनंत।।
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विद्या; नारी; अवनि; लत; लतिका बिना विलंब।
आश्याय मिलता जो सहज, ले लेतीं अविलंब।।
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माता की अनुदिन कृपा, शुभप्रद नवल रसाल।
नव संवत्सर सुखद प्रिय, हो उद्देश्य विशाल।।
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चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा, वासंतिक नवरात।
मंगलदायक; विध सुयश, वर्धित; जग-विख्यात।।
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शिव प्रमोददा अंबिके, महागौरि शुभ रूप।
श्वेत वृषभ आरूढ़ शुचि, श्वेतांबरी स्वरूप।।
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शैलसुते! करुणा-कृपा, ममता तव विख्यात। 
तपस्विनी हे भगवती!, दया रूप साक्षात।।
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ब्रम्ह्चारिणी जगजननि!, महिमा अमित-अपार।
दृष्टि-क्षेप से माँ करें, भव-वारिधि निस्तार।।
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खट्टी-मीठी मन बसी, बचपन तेरी याद।
हाय! खो गई जिंदगी, कहाँ करें फरियाद??
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चंद्रहासवदनी सुमुखि, वर शार्दुल सवाल।
शुभदात्री, कात्यायनी, कर दानव संहार।।
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श्री राघव पद-कमल-रज, भक्त-प्राण; सुख-मूल।
मिले अहर्निशि, युगल प्रिय, सदा रहें अनुकूल।।
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कदम-कदम पर दर्द है, गम भी मिले तमाम।
नाहा, मगर मन लगा मत, यह संसार हमाम।।
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सुबह बहुत लगती भली, दिन भी है अभिराम।
हँस सूरज ढल जाएगा, जब आएगी शाम।।
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टर्र-टर्र करते बहुत, उचक रहे हैं भेक।
अज्ञों के ज्यों विविध मत, चलते पंथ अनेक।।
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मेघों ने झाँपा-ढँका,  कुम्हलाया है अर्क।
सूखा ज्ञान, विवेक को, संवृत किए कुतर्क।।
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शस्य-श्यामला धरा ने, पहने नव परिधान।
सर-सरि, क्यारी-खेत रस, गूंजे मंगल गान।। 
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सन्मति के सम्मान में, है जग का भी मान।
गदराई बरसात जब, हरियाई है धान।।
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तापित मन को सींचती, अरमानों की धार।
आसमान का धरा पर, बरस रहा है प्यार।।
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सिझा-सिंका जीवन बहुत, पीड़ा की लौछार।
तन-मन शीतल कर रही, अब अमृत-बौछार।।
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झुके मेघ नव हर्षयुत, नाच रहा मन-मोर।
कल-कल करती सरि चली, क्यों सागर की ओर?
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विरह-सँदेशा यक्ष की, पीड़ा पकड़ अछोर।
नभ में घन फिर गरजते, जाते हैं किस ओर।।
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धार पनीली या हुई, दुबली नदिया पीन।
व्याकुल सागर को चली, छिप डबरे की मीन।।
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विद्युत्-वल्ली कौंधती, रह-रह घन के बीच।
प्रगट ज्ञान की प्रभा ज्यों, छिपी लोक को सींच।। 
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छप्पर-छानी चू रहे, चैन नहीं दिन-रैन।
सावन-भादों की घटा, बरस रहे हैं नैन।।
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सर पर है छाया नहीं, बसा नहीं घर-द्वार।
वर्षा से फुटपाथ का, उजड़ गया संसार।।
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 प्राणिमात्र को सींचती, बही सुधा की धार।
हर्षित प्रकृति गा उठी, सहसा मेघ मल्हार।।
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रस संग्रह कर मत रखो, बाँटो सदय विशेष।
वर्षा के मिस प्रकृति ने, दिया यही संदेश।। 
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मूलों को रस, फूल-फल, पत्तों को गुण-संग।
मधुप! बाँटकर मैं चली, कल-कली-कली को रंग।।
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कृमि-कीटों के लिए है, वर्षा प्रलय-प्रहार।
आँसू में बह जाएगा, यह नश्वर संसार।।
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मीन-पुंज तिरते सुखी, उड़ते मुदित विहंग।
प्रफुलित हुए प्रसून-कुल, मदिर डोलते भृंग।।
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बिखर-बिखर कर कह रहा, बुद-बुद जगत असार।
मस्ती में मन मत्त क्यों, रहना है दिन चार।।
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छिटक फुहारें मारता, पिए हुए ज्यों भंग।
आश्विन लगते मेघ के, बदल गए यों ढंग।।
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पचरंगी पोशाक में डाली-डाली डोल।
सुमन-हास पर बिक गया, तितली मन अनमोल।।
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रस्सी पूरी जल गई, गयी न अब तक ऐंठ।
जिव्हा अक्सर फिसलती, मंच-मंच घुस-पैठ।।
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गाँव-गाँव पीड़ा बसी, गली-गली संत्रास।
शहर-शहर आतंक है, नयन-नयन में प्यास।।
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भाषण के बाज़ार में, आश्वासन का माल।
कटुक करेला चढ़ गया, हरी नीम के डाल।।
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सबकी गति है एक सी, चलते एक लकीर।
चाहे हों कितने बड़े, रजा रंक फ़कीर।। 
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पीस रही है चक्रिका, प्रतिपल सब संसार।
कभी बाँधता जग ह्रदय, लगता कभी असार।।
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सत बँधा; बेबस पड़ा, सहता है अपमान।
चौराहे पर खड़ा हो. अनृत बघारे ज्ञान।।
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खेतों में जगता कृषक, सीमा जगे जवान।
पुलिस जागती रात-दिन, तब जगता ईमान।।
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धन्य वही जीवन-जगत, धन्य वही विश्वास। 
निष्ठां वेदी में सतत, हवन कर रहा श्वास।।
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पल-पल सेवा समर्पण, बंधा कर्म के पाश।
तत्पर जो कर्तव्य में, उसे कहाँ अवकाश?
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कितने कारण ढूँढ नित, भारत करते बंद।
सुगति-प्रगति-सन्मति रूँधी नए-नए छल-छंद।।
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करना है यदि बंद तो, बंद करें विश्राम।
दर्ज करें प्ररोध निज, कर-कर शत-गुण काम।।    
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 मानवता सुखदा जननि, बेटी कला नवीन।
सुरुचि; सुसंस्कृति; सभ्यता, सकल कला आधीन।।
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बढ़ा प्रदुषण निगलता, जीवन छोर-अछोर।
आसमान धुँधला हुआ, दुपहर लगती भोर।।
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धरती धरणि वसुंधरा, नित्य नवल श्रृंगार।
धरा नाम सार्थक करे, धर जीवन का भार।।
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ज्ञानीजन कहते यही, स्वप्न मात्र संसार।
मिट जाएगा एक दिन, रहना बस दिन चार।।
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झरना या विगलित बहा, धरणी-ह्रदय अमर्ष।
भावों का उत्कर्ष या, निर्झर झरता हर्ष।।
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चंदा है अंगार सा, त्रासद यमुना-नीर।
मधुवन-विषधर डँसे सखी, पीर हुई बेपीर।।
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बुनते जीवन में सुघर, पल-छीन अनगिन रंग।
रंग श्याम है यदि नहीं, सभी रंग बेरंग।।
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राखी बहिना भेजती, बिरना कर मनुहार।
नेही रक्षासूत्र घन!, वचन; नहीं उपहार।।
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फूलों का सत्संग पा, व्यस्त मधुप आसक्त।
गुन-गुन की धुन में मगन, रस-पराग अनुरक्त।।
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कितना सुंदर है भला, बचपन का संसार।
नानी-दादी की कथा, कुट्टी-मिट्ठी प्यार।।
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रवि तनया स्मृति नवल, सुख-दुःख दोनों तीर।
वेणु-क्रिया; वट-धैर्य; मन, कान्हा जीवन-नीर।।
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दाँव; जुआँ; फल; जिंदगी, वर; बंधन; छल; घात।
आतप; वर्षा; बुलबुला; तारा; बूँद; प्रभात।।
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संकटमोचन महाप्रभु, शास्वत; चेतन-रूप।
सहज ज्ञान-विज्ञानमय, हनुमत! अम्ल; अनूप।।
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अरुणा-प्राची में उदित, नव शशिकला अमंद।
लय अनुसारिणी अथच ज्यों, प्रथम अनुष्टुप छंद।। 
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ज्यों मधु-सरि में कमलिनी, बिंबित मुख-मुस्कान।
विद्रूप-सीपी में अलस, उषा-रश्मि अम्लान।।
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श्वास और प्रश्वास का, जब तक है व्यापार।
गत-आगत सब कुछ करो, स्वीकृत जगदाधार।।
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नदी; घाट; नद-तट हुआ, जीवन का उद्घोष।
कूल; कछारों; कुञ्ज में, लुटे ज्ञान के कोष।।
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गाते-हँसते चल पड़ा, जीवन नदिया-तीर।
सरिते! सरस-सुरम्य हर, पीर समीर अधीर।।
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बम की भाषा बोलते, आतंकी गद्दार।
लोहू पीने के लिए, राक्षस हैं तैयार।। 
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कीट-पतंगे खा करे, गौरैया निस्तार।
चूँ-चूँ करती चहकती, घर-आँगन गुलजार।।
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बर्बरता लज्जित करें, नवयुग के नव हूण। 
जन्म-पूर्व ही गर्भ में, मार डालते भ्रूण।।
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धक्के जनता खा रही, प्रतिनिधि जाते भूल।
बहुधा वादों पर पडी, देखी नौ मन धूल।।
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बघेली दोहे
गोली सगलै दुःख हरै, कबौ न करे हरास।
या कविता के लच्छमी, होय न सबके पास।।
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जात ऊँच ता होय का, करैं घिनउहाँ काम।
मूँड़ उचाये चलि रहें, गली-खोर बदनाम।।
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उमिर चार दिन के हियाँ, रेन बसेरा आय।
चिरई जब उड़ि जाए ता, धरा हिमैं रहि जाय।।
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बीछी सें ही सौ गुना, जीभ बिक्ख के आय।
कोहू का जो छूऐं ईं, अइंठ-अइंठ रहि जाय।।
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मुँह बिचकामैं देखि के, कइके इरखा-द्वेस।
पामैं बड़मनसी कहूँ, इनका होम कलेस।।
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सत्ता के सतरंज मा, राजनीति के गोट।
अँधरै आँधर खेलि के, खूब बटोरें नोट।।
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कनिहाँ टूटै देत माँ, लेत नहीं परहेज।
फइला कोढ़ समाज के, घिनहाँ बहुत सहेज।।
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