सोमवार, 23 अप्रैल 2018

doha doha virasat

दोहा-दोहा विरासत:
संत कबीर दास 
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इस स्तंभ के अंतर्गत कुछ अमर दोहकारों के कालजयी दोहे प्रस्तुत किये जा रहे हैं जिनमें विषम चरण के अंत में 'सरन' के अतिरिक्त ने गण प्रयोग में लाए गए हैं. किसी एक पिंगल ग्रंत्ज की मान्यता के आधार पर क्या हम अपनी विरासत में मिले इन अमूल्य दोहा-रत्नों को ख़ारिज कर दें या इस परंपरा को स्वीकारते हुए आगे बढ़ाएं? विचार करें, अपने अभिमत के पक्ष में तर्क भी दें किन्तु अन्य के अभिमत को ख़ारिज न करें ताकि स्वस्थ्य विचार विनिमय और सृजन हो सके. 
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कबीर रोड़ा होइ रहु बात का, तजि मनु का अभिमान.
ऐसा कोई दासु होइ, ताहि मिलै भगवानु. विषम चरण पदांत जगण 
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कबीर पालि समूह सरवरु भरा, पी न सकै कोइ नीर.
भाग बड़े तो पाइ यो तू, भरि-भरि पीउ कबीर. विषम चरण पदांत यगण
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कबीर मुद्धा मुनारे किया, चढ़हि साईं न बहिरा होइ.
जा कारण तू बाग़ देहि, दिल्ही भीतर जोइ. विषम चरण पदांत जगण
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कबीर मनु जानै सब बात, जानत ही अवगुन करै.विषम चरण पदांत जगण
काहे की कुसलात, हाथ दीप कूए परै. विषम चरण पदांत जगण
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कबीर ऐसा बीज बोइ, बारह मास फलंत. विषम चरण पदांत जगण
सीतल छाया गहिर फल, पंखी कल करंत.
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हरि हैं खांडु रेत महि बिखरी, हाथी चुनी न जाइ.
कह कबीर गुरु भली बुझाई, चीटी होइ के खाइ. विषम चरण पदांत यगण
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संत तुलसीदास
गिरत अंड संपुट अरुण, जमत पक्ष अन्यास.
आल सुबान उपदेस केहि, जात सु उलटि अकास.विषम चरण पदांत जगण
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रावण रावण को हन्यो, दोष राम कह नाहिं. विषम चरण पदांत मगण
निज हित अनहित देखू किन, तुलसी आपहिं माहिं.
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रोम-रोम ब्रम्हांड बहु, देखत तुलसी दास.
बिन देखे कैसे कोऊ, सुनी माने विश्वास. विषम चरण पदांत मगण
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मात-पिता निज बालकहि करहिं इष्ट उपदेश.
सुनी माने विधि आप जेहि, निज सिर सहे कलेश.विषम चरण पदांत जगण
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बिहारी
पत्रा ही तिथि पाइये वा, घर कैं चहुँ पास. विषम चरण पदांत यगण
नित प्रति पून्याईं रहै, आनन ओप-उजास.
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रहति न रन जयसाहि-सुख, लखि लाखनु की फ़ौज.
जाँचि निराखरऊ चलै लै, लाखन की मौज. विषम चरण पदांत यगण
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सीस-मुकुट कटि-काछनी, कर-मुरली उर-माल.
इहिं बानक मो मम सिद्धा, बसौ, बिहारी लाल. विषम चरण पदांत यगण
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कहै यहै श्रुति सुमृत्यौ, यहै सयाने लोग. विषम चरण पदांत यगण
तीन दबवात निस कही, पातक रजा रोग.
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