रविवार, 1 अप्रैल 2018

ॐ doha shatak abha saxena

ॐ 
दोहा शतक
आभा सक्सेना 'दूनवी' 



















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ॐ 

दोहा शतक 


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चित्रगुप्त प्रभु! आइए, मन-मंदिर में नाथ।
सत-शिव-सुंदर लेखनी, रचे उच्च हो माथ।।

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टिप-टिप बूँदों की हुई, जब प्रिय बिन बरसात। 
अंदर भी बारिश हुई, काटे कटी न रात।।
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धनतेरस के पर्व पर, कर लें कार्य महान। 
निर्धन को बर्तन करें, दान आप श्रीमान।।
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दीवाली लाए सदा, खुशियाँ अपरंपार। 
खील-बताशे कह रहे, हम खुश आकर द्वार।।
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लक्ष्मी संग गणेश को , पूजें खुश हों नाथ। 
मिले संपदा दूर हो, विघ्न नवाएँ माथ।।
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होई करवा चौथ का, सत्य अनोखा मेल। 
पर्वों की जैसे चली, धकापेल अब रेल।।
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इस दीवाली लग रही, फीकी सी सब ओर। 
सीमा पर प्रहरी तकें, एक सुहानी भोर।।
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आँखों में प्रभु बस रहे, देते हैं आनन्द।
सच्ची सुख अनुभूति हो,पाकर परमानंद।।   

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यादों के झूले दिए, मन-रस्सी पर डारबचपन आया झूलने, माँ आँगन कर पार।।
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ईंट रेत सीमेंट सेनिर्मित भव्य मकानपापा के जाते हुआ, बेगाना-वीरान
*
कानों के कच्चे मनुज, करते हैं अवरोध।
सुनी-सुनाई बात पर, नाहक ही प्रतिरोध।।

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यादों के सुर ताल ने छेड़ा आज अलाप। 
मेरी डोली में चला माँ का रुदन विलाप।।


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माँ-बेटी पढ़ सके तो, पढ़ लेता परिवार। 
जले दीप से दीप तो, घर में हो उजियार।।


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सूख गईं नदियाँ सभी, सूख गये हैं खेत।
तपता हुआ अलाव है, गंगा जी की रेत।।


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पगफेरी छत पर करेपायल पहने रात 
नूपुर की रुनझुन कहे, पूज रही अहिवात।।
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हरिद्वार में हो रहे, होटल सारे सील।
गंगा मैली हो रही, हम सब की है ढील।।


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चंदा करता साँझ सेमीठी सी मनुहार।
आना मेरे गाँव दूँतारों का उपहार।।


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कुछ सुत श्रवण कुमार बनकरें दिखावा रोज।
माँ से कितना प्यार हैकरें न मन में खोज।।


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बेटी आई मायके, नेह किवरियाँ खोलI
कुछ गुम-सुम सी लग रही, फूट न पाए बोल।।


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पीली पड़ती दूब सबपीले पड़ते खेत।
इस गर्मी ने झोंक दीमौसमआँखों रेत।।


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सूखे पत्ते गिर पड़े, बेचारे निर्दोष। 
खाद न पानी दे रहा, माली है मदहोश।।

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खेल-खिलौने खेलकर, मनुज खेलता खेल।
खेल-खेल में कर लिया, जीवन-पथ बेमेल।। 

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पुरवाई ने मेघ कोदी है चिठिया लाल।
अब की सावन में बरसभर नदियाँ-ताल।।

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जीवन एक मृृदंग हैकरे नित्य हुड़दंग।
जीवन की इस थाप सेहो मत जाना तंग।।

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पहचानी सी आहटें करतीं मुझे प्रफुल्ल।
पिय आवन की घड़ी है, मन होता उत्फुल्ल।।

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कान छिदे लड्डू बँटेघर भर में त्यौहार।
नानी लाई बालियाँमामा दें उपहार।।

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दोहे को परिशुद्ध करकर देते उद्धार।
मेरे मन में गुरु बसेनमन करूँ हर बार।।

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आँखों में लघु किरकिरी पल-पल देती त्रास। 
चपल हठीली रश्मियाँ, ज्यों देखे खग्रास।।

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रीत गए हैं कूप सबसूख गए तालाब।
जेठ बजाए बाँसुरी, जी न सके सुरखाब।। 

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जिए सड़क पर मुंबईदौड़ रही दिन-रात।
बड़ा-पाव खाकर करेचौपाटी पर बात।।

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बहती धारा गृहस्थी, ग्रहणी नौका काठ
पति-बच्चे पतवार हैं, तालमेल से ठाठ।।

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हम ऐसे अनुबंध परसही कराएँ आज।
मानव मानव बंधु होंबने न शत्रु समाज।।
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अपने अंदर  ढूँढ लीएक सुनहरी चाह I
अंधे को जैसे मिली, पहचानी सी राह।।

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आँख मिलाए श्याम पर, मिल न पा रहे नैन
राधा आँख चुरा रहीं, मन उन्मन  बेचैन।। 
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जेठ जेठ हैं एक से, गर्माते हैं खूब
पर्दा कर पर्दा लगा,  बहुरिया ऊब।।

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बहती धारा गृहस्थी, घरनी धारा-नीर।
पति-बच्चे पतवार प्रभु!, पार लगा धार धीर।। 

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पंछी अब भी कूजते मधुर नहीं आवाज़। 
गर्मी से व्याकुल हुएभूल गये परवाज़।।

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पीले पत्ते कह रहेयही हमारा भाग्यI
विधना को मंजूर थागिरे यही दुर्भाग्य।।
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चुन काफिया-रदीफ़ लो, मन माफिक सरकार|
ग़ज़ल बने चुटकी बजा, हों सुंदर अशआर।।
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नई बहू शरमा रहीघूंघट पट की ओट।
गये बराती गाँव कोसास निकाले खोट।। 

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श्रमिक नहीं कहना उन्हेंजिनने जोते खेत। 
धरा-पुत्र कहिये उन्हेंहँस सम्मान समेत
।।
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मन वीणा के तार परजब होती झंकार।
यतिगतिलय, मिल साथ होंदोहा ले आकार।।

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सूरज में दिन-दिन बढ़े, गरमागरम प्रवाह।
लू भी थककर चूर हैछाया रही कराह।।

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लिखते-लिखते ही करूँदोहों का अभ्यास।
कालजयी दोहे कहें, अनथक करो प्रयास।।

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पपड़ी सी पपड़ागयी नदी किनारे छाँव।
जेठ दुपहरी ढूँढतीपीपल नीचे ठाँव।।

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सूरज की पहली किरनजल से करे किलोल।
मधुर छटायें खोजतींप्रेम पगा माहौल।।

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निकले पपड़ी परत सीगरम धूप छतनार।
जेठ दुपहरी खिल रहीलाल रंग कचनार।।

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मन-पनघट पर कर रहीकविता सुर में बात।
लयगति-यति को साधतेहोने आया प्रात।।

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आँख आँख से कह रही,  कह कुछ मन की बात।
आँखों से क्यों हो रहींदिवस–रात बरसात।।

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तू जब नयनों में बसारहा न तेरा नेह। 
बरखा बाहर हो रही, किन्तु न मन में मेह।।
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अंतस में न समेटिये चिंताओं के जाल।
कह देना ही है उचितमन होता खुशहाल।।

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जेठ दुपहरी तवे सी, जलती भट्टी साँझ।  
चाँद निकलता रात को, किन्तु चांदनी बाँझ।। 

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है बनारसी पान कास्वाद बहुत ही नीक। 
जिव्हा स्वाद ले झूमकर, कुरता ढोए पीक
।।
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पाती दई पठाय हैभेज दिया है तार।
बेटी अबकी आ रही माँ बाबूजी द्वार।।

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जेठ-दुपहरी तप रहीकुम्हलाती है शाम। 
चाँद न ठंडक दे सकाहाय! विधाता वाम
।।
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गरज-तरजकर कर रहे, बादल दल आवाज।
बरखा की शादी करेंखूब सजाएँ साज।।
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सूखी रोटी में मिलेमाँ-हाथों से स्वाद। 
भू-नभ से आशीष देंसबकी है फरियाद

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काला चश्मा आँख परझट से हुआ सवार। 
धूप न लगती धूप सीधूमिल सा संसार
।।
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दिग-दिगंत तक हो रहीमातृ दिवस की बात। 
माताएँ बेबस पडींचल बदलें हालात
।।
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हर आहट से बँध रही, मुझे पिया की आस। 
पल युग सम कटता नहींकब आएँ प्रिय पास
।।
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माँ सम सुंदर चंद्र हैताप-पीर हर मौन। 
अमिय-किरण बरसा रहाकैसे बूझे कौन
।।
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पगफेरी छत पर करेपायल पहने रात। 
नूपुर की रुनझुन कहेप्रिय को चाहे गात
।।
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बादल ने भिजवा दियापत्र पवन के हाथ।
पिय लिखते ही रह गयेमन की मन में बात।।

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आवारा बादल करेमस्त पवन से बात।
साथ-साथ क्यों तू चलेदिन हो या फिर रात।।

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बेटा ठंडी छाँव हैबहू गुनगुनी धूप।
बेटे के कारण मिलेऐसी भेंट अनूप
।।
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मित्र फेस बुक के सभीबने एक परिवार।
ऐसे मित्रों को नमनस्वागत बारंबार
।।
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खिड़की पर पर्दे पड़े, बेपर्दा है धूप
दामन सूरज से बचा, छिपती साँझ अनूप।।

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काँप रही है दीप-लौ ,धुआँ निकलता श्याम।
जीवन का ऋगवेद पढ़, होगा समय न वाम।। 

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नीम पड़े झूले कहेंसावन कुछ दिन बाद।
आना बिटिया मायकेमाँ करती है याद।।

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वाणी में मधु घोलियेकरिए मीठी बात। 
बजे चैन की बाँसुरीपुलकित हो मन गात
।।
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सूरज खिड़की पर खड़ादेता है आवाज।
जाग मुसाफिर भोर मेंकरो सुबह के काज।।

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जेठ न दौड़े आजकलचलता कछुआ चाल।
गर्मी की इस मार नेकिया बुरा है हाल।। 

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तारे-जुगनू का मिलनअजब-अनूठा मेल। 
दोनों टिमटिम कर रहेज्योति-किरण का खेल
।।
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अंतस घायल हो गयासही न जाए पीर।
तीक्ष्ण व्यंग की मार नेदर्द दिया गंभीर।।

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आघातों की बारिशें फिसलन चारों ओर।
फिसलेंगे दादुर सभीकरते नाहक शोर।।

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बीज पिता माता तनाबेटा सुदृढ़ शाख। 
बेटी शोभित सुमन सीसंग रहें तो साख
।।
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बेटा तो है शाख साबेटी चिपकी डार।
वृद्ध वृक्ष माता-पिता ,जीवन का हैं सार।।

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बेटा घर की शान हैबेटी घर का मान। 
जिस घर दोनों शोभते, दुनिया दे सम्मान॥

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आँगन की शोभा बहूबेटा घर का द्वार। 
बेटी ज्योतित दीप समजामाता उजियार
।।
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अलस्सुबह उठ चाय मेंघोला प्यार-दुलार। 
हाय विधाता! माँगतेप्रियतम क्यों अख़बार
।।
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धूप कुलाँचे मारती, ढूँढे ठंडी छाँव।
पीपल तरु की शरण जा, तभी  मिलेगी ठाँव।।

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धूप निगोड़ी सो रही, मूँड़ उघारे आज
पीपल झौरे बैठकर, बिसरी परदा-लाज।।

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आँख झुकी पति रीझतेआँख उठी हों मुग्ध।
पलकें मुँदती देखकर, हुए क्षुब्ध चुप दग्ध।।
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रिश्तों की फसलें उगीं, खरपतवारी खूब।
उम्मीदी आँधी चली, कुम्हलाई है दूब।। 

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जुगनू की है रोशनीभले बहुत ही अल्प। 
फिर भी जुगनू खोजताकोई ठोस विकल्प।।
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जीवन पापड़ हो गयाबेल-बेल दिन रात। 
थकी न लेकिन मैं रुकीयह मेरी औकात
।।
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चिंतन की द्रुत गामिनीचले तीर की भांति।
सद्विचार बाहर निकलपा जाता है ख्याति।।

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कानाफूसी मत करें, हो जाता मन-भंग।
बिना बात की बात काबनता व्यर्थ प्रसंग।। 


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पलक द्वार पर है खड़ीनींद सरीखी नार।
कब आएँगे साजनाले सपनों का हार।।

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माया का सब खेल हैमाया से है जीत।
माया बिन कुछ भी नहींयही जगत की रीत।।

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राजनीति की भीड़ मेंचीख रही है चीख।
अब तो हद ही हो गयीजान माँगती भीख।।

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आस पखेरू उड़ चलाभरता नयी उड़ान। 
ऊँचा उड़ दिखला रहाजग को अपनी शान
।।
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केवट सुरसरि तीर परधोए-पोंछे पाँव। 
राम लखन सिय से कहेफिर-फिर आना गाँव
।।
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रेतीले पर्वत यहाँसूखे की है मार।
रेत फिसलती पाँव सेलू की पैनी धार।। 

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सागर है दोहा विधाबहुत तरह के रत्न।
मोती पाने के लिए, करूँ निरंतर यत्न।। 

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आस पखेरू उड़ चलाभरता नई उड़ान।
जग को वह दिखला रहाअपनी ऊँची शान।।

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तप्केश्वेर में महादेवबसते देहरादून।  
बूँद गिरें शिवलिंग परसबको मिले सुकून
।।  
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राम तुम्हारे द्वार परचढ़ा न पाई भेंट।
अंजुरी भर श्रृद्धा लिए, आई खाली टेंट।।
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दोहा लिखने की कलासिखला दो गुरु आज।
मैं भी दोहा लिख करूँ, हिंदी माँ का काज।।
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तू-मैं दोनों एक हैंतू-तू मैं-मैं व्यर्थ।

'आभा' आ भा जब कहेंतब जीवन का अर्थ।। १०० 
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कुछ और दोहे 
माँ की कमी न दूर होमाँ के बिन सब सून।
माँ जब तक जीवित रहीघर था देहरादून।।
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गीत लिखे गज़लें लिखीं, छपे-भरे अख़बार।
छूट रहीं क्यों गलतियाँदोहे में हर बार।।
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मन व्यथित अब हो गया ,ना है मन को चैन।
दोहा लिखना छोड़ करप्रभु भजूं दिन रैन।।  
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जीवन बीहड़ हो गयानहीं एक भी पेड़।
बहती धारा भक्ति कीबन श्रद्धा की मेंड़।। 
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दोपहरी भारी हुईभारी होती सांझ।
अम्मा ने पकड़ा दियावधु को दूना काज।। 

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चिंता चिता सदृृश्य हैचित्त धरहु प्रभु ओर।
प्रभुहिं नाम ही नाम हैप्रभु के बिना न ठौर।। 

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गीत लिखे गजलें लिखींलिखे छन्द नव गीत।
लिख न सकी अब तक भजनगयी जिन्दगी बीत।।

सघन मनोरम कुञ्ज लखिदृग निरखत ही जात।
ऐसी किरपा प्रभु करोमनहिं बसे दिन रात।।

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पुरवाई चलने लगीझूम रहे हैं पात।
वृक्ष वृक्ष करने लगा बूटा बूटा बात।।

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उपवन के मेले लगेभांति भांति के फूल।
कुछ छूने में रेशमी कुछ के संग तिरशूल।। 
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रदीफ़ काफिया ढूंढ लो, मन माफिक सरकार|
ग़ज़ल बने चुटकी बजा, हों सुंदर अशआर||
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शेरों के मुँह लग गया, इंसानों का खून। 
हर दिन ही अब देखिये, देते इंसा भून।।
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दल दल में तुम मत पड़ो, दल दल दल-दल भाँति।
दल से मुँह मत फेरना, दल के बिना न ख्याति। 

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गर्म कचौड़ी-पूरियाँ, कटहल, मिर्च अचार। 
मीठे की मनुहार फिरखीर जायकेदार।।

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गीत लिखे गज़लें लिखीं, छपे-भरे अख़बार।
छूट रहीं क्यों गलतियाँदोहे में हर बार।।

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मन व्यथित अब हो गया ,ना है मन को चैन।
दोहा लिखना छोड़ करप्रभु भजूं दिन रैन।।

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