सोमवार, 30 अप्रैल 2018

श्री श्री चिंतन: दोहा गुंजन ५, shri shri chintan doha gunjan 5

श्री श्री  चिंतन: दोहा गुंजन ५
इच्छाएँ
(७.१.१९९८, मिलानो, इटली)
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इन्द्रिय सुख इच्छा क्षणिक, विद्युत् जैसी जान।
विषय वस्तु की ओर बढ़, खो प्रभाव बेजान।।
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निज सत्ता के केंद्र-प्रति, इच्छाएँ लो मोड़।
हो रोमांचित; चिरंतन, सुख पा तजकर होड़।।
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अपने अन्दर मिलेगा, तुम्हें नया आयाम।
प्रेम सनातन शाश्वत, परमानन्द अनाम।।
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लोभ ईर्ष्या वासना, ऊर्जा सबल अपार।
स्रोत तुम्हीं; कर शुद्ध दे, निष्ठा-भक्ति सुधार।।
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सुख की विद्युत्-धार हो, तुम्हीं समझ लो आप।
घटे लालसा, शांति आ, जाती जीवन-व्याप।।
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मृत्यु सुनिश्चित याद रख, जिओ आज में आज।
राग-द्वेष से मुक्त हो, प्रभु-अर्पित कर काज।।
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२६.४.२०००, आश्रम बेंगलुरु
इच्छाओं का लक्ष्य हैं, खुशियाँ; यदि हों नष्ट।
मन में झाँको देख लो, खुशियाँ करें अनिष्ट।।
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इच्छा करते ख़ुशी की, दुःख की किंचित चाह।
कभी न थी; होगी नहीं, मन रह बेपरवाह।।
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भाग-भाग जब क्लांत हो, नन्हा मन तब आप।
इच्छाएँ छीनें खुशी, सच महसूसे आप।।
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१४.४.२०१८

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