मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

doha salila

दोहा सलिला
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नेह-छोह राखब सदा, आपन मन के जोश.
सत्ता का बल पाइ कs, 'सलिल' न छाँड़ब होश..
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आरक्षित ने मिल दिया, सीता को वनवास.
राम न रक्षा कर सके, साक्षी है इतिहास.
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अविश्वास प्रस्ताव की, दिखा रहे थे धौंस.
औंधे मुँह गिर पड़े हैं, लड़ें न बाकी हौंस.
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एक-दूसरे को कहें, हम दोनों मिल चोर.
वेतन-भत्ते मिल बढ़ा, चहकें भाव-विभोर.
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जिस सीढ़ी से तू चढ़ा, उसको देना तोड़.
दूजा चढ़कर ले सके, 'सलिल' न तुझसे होड़.
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गौ भाषा को दूहकर, दोहा देता अर्थ.
अर्थ न अन्तर्निहित यदि, तो लिखना है व्यर्थ.
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सगा न कोई सगा है, गैर सभी हैं गैर.
बैर बैर से पालकर, मने किस तरह खैर?
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लोक नहीं है लोभ का, तंत्र करे षड्यंत्र.
'गण' पर नित 'गन' तानता, फूँक शोक का मंत्र.
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'अच्छे दिन अब आ रहे', सुनिए उनकी बात.
नीरव सँग तोते उड़े, हाथ मल रहे तात.
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घर में ही दुश्मन पले, जब-तब लेते काट.
खोज-खोज पप्पू थका, खोज न पाया काट.
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पुजती रहीं गणेश सँग, लछमी हरि को छोड़.
'लिव इन' होते देखकर, शीश न अपना फोड़.
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तू दो दूनी पाँच कह, मैं बोलूँगा तीन.
चार कहे जो वह गलत, नचा बजाकर बीन.
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क्या लाया? ले जाए क्या?, कौन कभी यह सोच.
जोड़-तोड़ किसके लिए?, कुछ तो कर संकोच.
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लीक पकड़कर चलाचल, सब ठोंकेंगे पीठ
लीक छुटी कोड़े पड़े, सभी दिखाएँ दीठ
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सिग्नल चाहे वीक हो, न हो बैटरी लीक
बातों से बातें बढ़ें, मोबाइल पर ठीक
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इंद्रप्रस्थ के तख़्त पर, नर नरेंद्र आसीन.
शाह ताज बिन घूमता, सेवक के आधीन.
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पट्टा बाँधे आँख पर, घोड़ा माफिक भाग
हरी घास मत देखना, मालिक देगा त्याग
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दोहा दुनिया अनोखी, करे गुणों का मोल.
सत-शिव-सुन्दर को रही, करतल ध्वनी से तोल.
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दिल दिलवर दिलरुबा भी, दोहा है दिलराज
मन मन्मथ मनसिज मधुर, मन मोहे किस काज?
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जन्म ब्याह राखी तिलक, गृह प्रवेश त्यौहार.
'सलिल' बचा, पौधे लगा, दें पुस्तक उपहार.
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दोहा-धड़कन नित्य सुन, मंत्र आरती श्लोक
भजन कीsर्तन सबद जप, प्रेयर हम्द अशोक
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कथ्य भाव रस बिंब लय, लक्षण-व्यंजन अंत.
शब्द-शब्द चुन रत्न सम, दोहा कहते संत.
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पत्थर दिल है हर शहर, अनगिन बने मकान.
घर न खोज मिल पा रहा, गए कहाँ इंसान?
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पूज रहे सब रमा को, किसको याद रमेश.
बलिहारी है समय की, बालें दिया दिनेश.
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दोहा-दर्पण में दिखे, 'सलिल' अगर कुछ खोट.
देख अन्य की ओर मत, खुद पर ही कर चोट.
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मत परिवर्तन का करो, समझे बिना विरोध.
परिवर्तन से ही सखे!, हो उन्नति का बोध.
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हिंदी आटा माढ़िए, उर्दू मोयन डाल
'सलिल' संस्कृत सान दे, पूरी बने कमाल
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नियम रोक लें राह ही, यदि न दिखाकर राह.
तो नियमों को बदलकर, पूरी कर लो चाह.
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परिवर्तन का हेतु हो, स्वार्थ नहीं , सर्वार्थ.
कार्य श्रेष्ठ है वही जो, किया जाए परमार्थ.
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दोहा कहता युग कथा, प्रस्तुत कर इतिहास.
होता 'सलिल' भविष्य का, दोहे से आभास.
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कथ्य, भाव, छवि, बिंब, लय, रस, रूपक, का मेल।
दोहा को जीवंत कर, कहे रसिक आ खेल।।
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दोहे को मत मानिए, शब्दों की दूकान।
शब्द न नहरें भाव बिन, तपता रेगिस्तान।।
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शब्द-शब्द की अहमियत, लय माधुर्य तुकांत।
भाव, बिंब, मौलिक, सरस, दोहा की छवि कांत।।
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अलंकार चारुत्व से, दोहे का लालित्य।
बालारुण को प्रखरकर, कहे नमन आदित्य।।
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दोहे को मत मानिए, शब्दों की दूकान।
शब्द न नहरें भाव बिन, तपता रेगिस्तान।।
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मत विमर्श को मानिए, आपस का टकराव.
मत-वैविध्य भले रहे, घटे नहीं सद्भाव.
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मतभेदों का भय नहीं, हो विमर्श से ज्ञान.
मन-भेदों को दें नहीं, हम किंचित भी स्थान.
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दोहा तो वट वृक्ष है, छाया पा हम धन्य.
भाव पखेरू चहकते, संध्या-उषा अनन्य.
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कथ्य, भाव, छवि, बिंब, लय, रस, रूपक, का मेल।
दोहा को जीवंत कर, कहे रसिक आ खेल।।
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शब्द-शब्द की अहमियत, लय माधुर्य तुकांत।
भाव, बिंब, मौलिक, सरस, दोहा की छवि कांत।।
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शब्द सार्थक-सरल हों, कथ्य कर सकें व्यक्त।
संप्रेषित अनुभूति हो, रस-छवि रहें न त्यक्त।।
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अलंकार चारुत्व से, दोहे का लालित्य।
बालारुण को प्रखरकर, कहे नमन आदित्य।।
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दोहे को मत मानिए, शब्दों की दूकान।
शब्द न नहरें भाव बिन, तपता रेगिस्तान।।
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