शुक्रवार, 20 अप्रैल 2018

निमाड़ी लघु कथाएँ

निमाड़ी लघुकथाएँ:
१. दो भाई 
पद्म श्री स्व. राम नारायणजी उपाध्याय.  
साहित्य वाचस्पति  

विचार तथा आचार  दोनों सगे भाई थे, दोनों एक ही दिन पैदा हुए, विचार पहले आचार उसके बाद में। उम्र में बड़ा होने पर भी विचार चंचल स्वभाव का था। वह कभी एक जगह टिकता नहीं था, हमेशा दूर-दूर की सोचता रहता था। आयु में छोटा होने पर भी आचार गंभीर स्वभाव का था। उसके मुखमण्डल पर सदा शालीनता उभरती थी, वह हमेशा कुछ न कुछ करता रहता था। शरीर से भारी-भरकम और सदा काम-धंधे से लदे  होने के कारण वह मन होने के बाद भी विचार के साथ खेल-कूद नहीं पाता था।    
एक दिन न जाने किस बात पर दोनों भाइयों में कहा-सुनी और मन-मुटाव हो गया। विचार गुस्सा होकर अपने घर से इतनी दूर निकल गया कि आचार उसे खोज ही नहीं सका। विचार के अभाव में आचार सूखने लगा, बहुत दुबला हो गया। अब उसका मन किसी काम में नहीं लगता था। वह करना कुछ चाहता हो और हो कुछ जाता। लोगों की निगाह में उसका कोई महत्व नहीं रह गया, वह एकदम भावशून्य हो गया।
घर से भागकर विचार ने सीधा रास्ता पकड़ा किन्तु बाद में वह तर्क-कुतर्क के आड़े-टेढ़े रास्ते पर भटकता रहा। आचार का घर छोड़ने के बाद से कोई विचार की बात का भरोसा नहीं करता था। वह जहाँ भी जाता लोग उसे आचारहीन कहकर उसकी उपेक्षा करते थे। आखिर में एक दिन अपने उजड्डपन से थक-हार कर विचार अपने घर वापिस आ गया। 
आचार ने दौड़कर उसकी आवभगत की। तब दोनों भाइयों में समझौता हुआ कि विचार जहाँ भी जाएगा अपने छोटे भाई आचार को भी साथ ले जाएगा। आचार जो भी करेगा अपने बड़े भाई विचार को साथ में लेकर करेगा। इस तरह मिल-जुलकर दोनों भाई सुखी-संपन्न हो गए। 
*
संपर्क: साहित्य कुटीर  पं . राम नारायण उपाध्याय वार्ड, खण्डवा म.प्र. 
चलभाष: ९४२५० ८६२४६, ९४२४९४९८३९,  ७९९९७४९१२५ gangourknw@gmail.com lekhakhemant17@gmail.com 
============================
२. खिलौने 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
दिन भर कार्यालय में व्यस्त रहने के बाद थका-हारा घर पहुँचा तो पत्नी ने किराना न लाने का उलाहना दिया। उलटे पैर बाजार भागा, किराना लेकर लौटा तो बिटिया रानी शिकायत लेकर आ गई "मम्मी पिकनिक नहीं जाने दे रही।" जैसे-तैसे  श्रीमती जी को मनाकर अनुमति दिलवाई तो मुँह लटकाए बेटे ने बताया: "कोचिंग जाना है,  फीस चाहिए।" जेब खाली देख, अगले माह से जाने के लिए कहा और सोचने लगा कि धन कहाँ से जुटाए? माँ के खाँसने और पिता के कराहने की आवाज़ सुनकर उनसे हाल-चाल पूछा तो पता चला कि दवाई  खत्म हो गई और शाम की चाय भी नहीं मिली। बिटिया को चाय बनाने के लिए कहकर बेटे को दवाई लाने भेजा ही था कि मोबाइल बजा। जीवन बीमा एजेंट बोला: "किस्त तुरंत न चुकाई तो पॉलिसी लैप्स हो जाएगी।" एजेंट से शिक्षा ऋण पॉलिसी की बात कर कपड़े बदलने जा ही रहा था कि दृष्टि आलमारी में रखे,  बचपन के खिलौनों पर पड़ी।
पल भर ठिठककर उन पर हाथ फेरा तो लगा खिलौने कहने लगे: "तुम्हरे चहरे से मुस्कान क्यों गायब है? तुम्हें ही जल्दी पड़ी थी बड़ा होने की, अब भुगतो। छोटे थे तो हम तुम्हारे हाथों के खिलौने थे,  बड़े होकर तुम हो गए हो दूसरों के हाथों के खिलौने।
***
संपर्क: विश्व वाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१ 
चलभाष़:७९९९५५९६१८ /९४२५१८३२४४, ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com 
===========================
३. किस्मत 
सुरेश कुशवाहा 'तन्मय' 
*
रात के १० बजे ठेकेदार के चंगुल से छूटकर घर की ओर लौटते हुए दिहाड़ी मजदूर रास्ते में खड़े एक सब्जी वाले से सब्जी के भाव कम करने की मिन्नतें कर रहे थे: "भैया! थोड़ा कम दाम लगा लो न, हम सबको मिल कर ज्यादा भी तो लेना है।"
सब्जीवाले द्वारा भाव कम नहीं करने पर अंतिम कोशिश  के रूप में पुनः मजदूर आग्रह के स्वर में कहने लगे: "भैया! वैसे भी सब्जी बासी हो कर सड़ने-गलने लगी है, सुबह तक तो ये किसी के खाने लायक भी नहीं रहेगी। अब इतनी रात को दूसरे ग्राहक तुम्हें कहाँ मिलेंगे?"
"देखो भाई लोगो! जैसे आप लोग अपने परिवार का पेट पालने के लिए इतनी रात तक काम करते रहे हो, वैसे ही मैं भी यहाँ किसी उम्मीद से ही खड़ा हूँ और ये तो कहो मत कि सब्जियाँ खराब हो गई तो फेंकने में जाएगी। वे चमचमाती होटलें दिख रही हैं न, थोड़ी देर बाद सुनसान होने पर मेरी और मेरे जैसे ठेलों की पूरी सब्जियाँ खुशी-खुशी वहाँ खप जाएँगी। रात भर उनके फ़्रिज में आराम कर, चटपटे मसलों के साथ यही सब्जियाँ  फिर से ताजी हो कर मँहगी प्लेटों में सज कर बड़े-बड़े रईस लोगों को परोस दी जाएगी।
यह जानने के बाद जरूरत की सब्जी लेकर मजदूर आपस में बातें करते अपने मुकाम की ओर लौट चले: "यार! हम तो अभी तक सोचते थे कि, तंगी की वजह से हमारी किस्मत में ही ताजी सब्जियाँ नहीं है, पर आज पता चला कि पैसे वाले इन बड़े लोगों की किस्मत भी इस मामले में अपने से अच्छी नहीं है।"
*
संपर्क: २२६ नर्मदे नगरबिलहरीजबलपुर,चलभाष: ९८९३२६६०१४, ,ईमेल: sureshnimadi@gmail.com


=======================
४.  सही कौन? 
हेमंत उपाध्याय
*
एक दावत में बहुत स्वादिष्ट पकवान बने थे। 
नगर सेठ से पूछा कि भोजन कैसा बना है तो उसने कहा: 'दाल में नमक अधिक है।'                        
कालेज के  प्राचार्य साहब से पूछा तो वे बोले: 'भात में नमक काम है।'     
गाँव के मुखिया से पूछा तो उन्होंने दाल-भात मिलाकर खाते हुए कहा: 'सब एकदम बढ़िया बना है, अन्नपूर्णा माँ की साक्षात कृपा है तुम पर।'                                   
*
संपर्क: साहित्य कुटीर  पं . राम नारायण उपाध्याय वार्ड, खण्डवा म.प्र. 
चलभाष: ९४२५० ८६२४६, ९४२४९४९८३९,  ७९९९७४९१२५ 
gangourknw@gmail.com / lekhakhemant17@gmail.com 
============================



५. बीच सड़क पर
-मोहन परमार मोहन
*



खरगोन शहर, तपती दुपहरी,  आती-जाती भीड़ पर कोई असर नहीं,  न जाने कहाँ से आते इतने लोग और न जाने कहाँ जाते,  डाकघर चौराहे पर दो चौड़े रास्ते एक दूसरे को काटकर सँकरी राह में बदल जाते हैं। दिन भर लगा रहता जाम, आठ-आठ घंटे खड़े यातायात पुलिसवालों की कड़ी परीक्षा होती हर समय, जब लोग यातायात  नियमों की धज्जियाँ उड़ाते। चौराहे के बीच में लगी छतरी की छाया कभी पुलिसकर्मी को नहीं मिलती। धूप असह्य होने पर पुलिसकर्मी किनारे पर पान की दूकान पर जा खड़ा हुआ।
उसी समय तेजी से साइकिल चलाकर आता एक लड़का अधेड़ महिला से टकरा गया। पुलिसवाला जोर से चिल्लाया- "क्यों बे! सड़क पर चलना नहीं आता? बाएँ हाथ से चलने का नियम नहीं जानता क्या?"
लड़के ने उठते हुए उत्तर  दिया- "तू वहाँ क्यों खड़ा है?, तू भी नियम नहीं जानता क्या?" भीड़ ठठाकर हँस पड़ी, पुलिसवाला कभी भागता हुए लड़के को देखता,  कभी हँसी हुई भीड़ को। उसे लगा वह छत्री भी उसकी हँसी उड़ी रही है।
***
संपर्क: ए २२ गौरीधाम,  खरगोन ४४५००१. चलभाष: ९८२६७४४८३७ 
================
६. रोटियाँ
अशोक  गर्ग "असर"
*
माँ-बाप ने शहर में पढ़ रही बेटी के पास जाने का सोचा। बेटी को शहर में ढंग का खाना नहीं मिलता होगा सोचकर माँ ने जल्दी-जल्दी रोटी-सब्जी बनाकर, बाप ने जरूरी सामान समेटा और सुबह ६ बजे वाली बस से लंबा सफर तयकर बेटी के पास पहुँचे। सफर की थकान मिटाकर माँ-बाप, बेचारा साथ खाना खाने बैठे। थाली पर नजर पड़ते ही बेटी गुस्सा कर माँ से बोली "यह क्या ले आई? ठंडी रोटियाँ और बेस्वाद सब्जी,  कौन खाएगा?" 
बेटी तनतनाते हुए बगैर रोटी खाए अपने कमरे में चली गई। माँ को अपनी माँ याद आ गई,  जब वह शहर में पढ़ती थी तो अपनी माँ की दी रोटियाँ २-३ दिन तक बचा-बचाकर खाती थी, उसे उन रोटियों में अपनी माँ की असीम ममता नजर आती थी। माँ की आँखें डबडबा रही थीं और पिता की भी।
***
द्वारा: आर. के. महाजन, २६ विवेकानंद कॉलोनी,  खरगोन। चलभाष: ९४२५९ ८१२१३ 
====================
७. फोर जी
शरदचंद्र त्रिवेदी 
*
"मम्मी! हम छुट्टियों में कहाँ जाएंगे?"
"बेटा! हम नाना जी के घर चलेंगे।"
"वहाँ क्या है?" चिंटू ने मम्मी से पूछा।
"वहाँ नाना - नानी हैं,  मामा-मामी और उनके बच्चे हैं। नाना जी की बड़ी सी बखरी है,  आम का बाग, खेलने के लिए खलिहान, तैरने के लिए तालाब सब कुछ है। नानी बता रही थीं इस साल आमों पर बहार आई है। हम पूरी गर्मी वहीं रहेंगे,  खूब मजे करेंगे।"
"मम्मी मुझे नहीं जाना वहाँ।"
माँ ने चौंकते हुए पूछा "क्यों?"
"क्योंकि वहाँ फोर जी नहीं मिलता।
*
संपर्क: ए ४५ गौरी धाम,  खरगौन, चलभाष:९४०६८१६४११   
=================
८. वापसी
ब्रजेश बड़ोले
*
पति-पत्नी के बीच घरेलू काम-काज को लेकर आए दिन झगड़े होते रहते थे। पत्नी चूल्हा-चौका कर जताती कि वह पूरे परिवार पर अहसान कर रही है। वह अकसर कहती- "मैं यदि घर छोड़कर चली जाऊँ तो सबको मालूम पड़ जाए, सुबह से उठकर चाय भी नहीं मिल पाएगी।"
पत्नी आखिर एक दिन अपना बोरिया-बिस्तर बाँधकर मायके चली गई। माता-पिता,  भाई-भाभी, भरा-पूरा परिवार था उसका,  सबने उसका स्वागत किया। आठ-दस दिनों तक तो सब ठीक  चलता रहा,  फिर गड़बड़ होने लगी। उसका बैठे-बैठे खाना सबको अखरने लगा, खासकर भाभियों को। सबका लाड़-प्यार कुछ ही दिनों में काफूर हो गया। अब उसे भी काम करना पड़ता था। परिवार बड़ा होने के कारण काम भी अधिक था, भाभियाँ आए दिन मायके जाने लगीं। जिस काम से बचने के लिए वह भागता यहाँ आई थी,  उसने यहाँ भी  पीछा नहीं छोड़ा था। 
अब वह पुन: घर जाने की तैयारी कर रही थी।
*
संपर्क: ए १३ गौरीधाम, खरगोन चलभाष: ९९७७०७२८६४ 
==================
९. मोक्ष

सुनील गीते
*
ससुर के श्राद्ध दिवस पर ब्रम्हभोज का आयोजन चल रहा था। वृद्ध सास स्वयं अपने हाथों से ब्राह्मणों को परोसने के उद्देश्य से खड़ी हुई तो पानी के गिलास से टकरा गई।
बिखरा पानी देख बहू बिफरी- "मांजी! आप चुपचाप एक जगह बैठी क्यों नहीं रहती?" फिर  बुदबुदाई, " न जाने कब इनसे मुक्ति मिलेगी?"
मकान की छत पर बैठे एक कौवे ने यह बात सुनी और अपना हिस्सा लिए बिना, दूर आकाश में उड़ गया।
संपर्क: वयम, १०२ आदर्श नगर, खंडवा रोड़, खरगोन ४५१००१, चलभाष ९८२७२३१३१६  
===========================

१०. जीवन डोर
कुंवर उदय सिंह ‘अनुज’
*
एक गाँव में भारुड नाम का एक व्यक्ति रहता था। एकदम सीधा-सादा, अँगूठा छाप, स्वभाव से भोला। काम के नाम पर रोज बकरी चराने जाना और शाम को आकर रूखा-सूखा खाकर सो जाना। 
बकरी चराने के रास्ते के बीच में एक श्मशान था. रोज दो-चार मुर्दों को जलते हुए टकटकी लगाकर देखता था। मुर्दे का साथ आये लोगों से पूछता इस व्यक्ति को क्या हो गया? लोग बताते कि जीवन डोर कट गई तो यह आदमी मर गया।  
रोज-रोज जीवन डोर टूटने की बात सुनकर भारुड मन ही मन हँसता और सोचता कि ये कैसे मूर्ख लोग हैं कि जीवन की डोर मजबूती से नहीं भाँजते। यदि जीवन डोर मजबूत होती तो फिर मरने का सवाल ही नहीं है. इस विचार के साथ उसने अपने लिए एक मोटी और मजबूत रस्सी बाँट ली और उस रस्सी को अपनी जीवन डोर समझ एक पेटी में बंद कर ताला लगा दिया। इस निश्चिन्तता के साथ कि इस मजबूत और सुरक्षित जीवन डोर के रहते हुए मेरी मृत्यु कैसे होगी?
बकरी चराते-चराते कई दिनों बाद उसे जीवन-डोर की याद आए. उत्सुकतावश उसने पेटी खोली, देखा तो उसका यह देखकर दिल धक् से रह गया कि रस्सी में दीमक लग गयी गई और पूरी रस्सी तुकडे-तुकडे में बदल गयी है।   
भारुड को बोध हुआ आदमी कुछ भी कर ले जीवन रस्सी को टूटना है तो टूटेगी ही।   
=========================
११. ककड़ी चाहिए, बेटी नहीं
 विजय जोशी 
काकी ने काका जी  से कहा कि एक खुश-खबरी है। अपनी बड़ी बहुरानी फिर से गर्भवती हो गई। काका जी  के चेहरे पर कोई खुशी की झलक नहीं दिखाई दी। एक गंभीर भाव से बिना कोई खुशी व्यक्त किए बोले- "हे ईंश्वर  चौथी बार बेटा ही देना यदि चौथी बार भी बेटी ही हुई तो,  क्या करेंगे?" काका ने काकी से कहा: "सुनो भाग्यवान! क्यों ना हम बहू का लिंग परीक्षण करा लें और यदि बेटी हुई तो वह अंग्रेजी में क्या कहते हैं ना!  हाँ अबार्शन वही करवा देते हैं।"
लेकिन काकी ने कहा: ''बड़ा बेटा रमेश कह रहा था कि इसमें बहू की जान को खतरा है।" 
काका बोले: " रमेश क्या जाने दुनियादारी को ?  हमने दुनिया देखी है। क्या हम बहू की जान के दुश्मन हैं? हमें भी तो परिवार का वारिस उसी से मिलने वाला है लेकिन यदि रमेश और बहू अपनी मनमानी करेंगे और यदि बेटी हुई तो मैं उन्हें बच्चों सहित अपने घर जायदाद से बेदखल कर दूँगा।" 
इतनी चर्चा चल ही रही थी कि खेत से, मजदूर दौड़ते दौड़ते हुए हाँफते-हाँफते  आकर कहने लगा "काका जी, काका जी ' हमने जो सौ सवाँ सौ काकड़ी के बीज लगाए थे उसमे से 80 -90 पेड़ ककड़ी के बीज नर प्रजाति के निकले जिसमें ककड़ी फलों का आना संभव नहीं है। मात्र १०  से २० पेड़ ही मादा प्रजाति के है।" 
 इतना सुनकर काका के होश उड़ गए: "अरे! यह तो बहुत नुकसान का सौदा हो जाएग । सुनो तुम जल्दी से जाओ और वह मंगत तांत्रिक को बुला कर लाओ।  वह  नर ककड़ी के पेड़ों पर अभिमंत्रित खिला कूटकर नर पेड़ को मादा  पेड़ों  में बदलने की लगाने की क्रिया जानता है।  अतः उसे जल्दी बुला कर लाओ वरना हमारा लाखों का नुकसान हो जाएगा।"
मंगत दाजी ने काका के घर आकर वस्तुस्थिति को देखा और बड़ी बहू के चेहरे की भाव भंगिमा को देख कर वह सारी वस्तुस्थिति जान गया।
"वाह रे काका!  तुमको उत्पादन के लिए काकड़ी चाहिए और घर में बेटी नहीं। बेटी के लिए परहेज करते हो बहू को परेशान करते हो । जाओ ऐसे दोगले इंसानों के घर मैं कोई अभिमंत्रित खिले नहीं कूटनेवाला।"
मंगत दाजी की बात सुनकर काका की आँखें खुल गई।
*
विजय कुमार जोशी, सहस्त्रार्जुन मार्ग महेश्वर, खरगोन ४५१२२४, 
चलभाष: ९६१७२५९५३५ ईमेल: vijayjoshimhs@gmail.com
--------------------------------
१२. पहले अच्छे थे 
डॉ. पारवती व्यास 'प्रीति'  
*
एक मित्र अपने मित्र को उदास देखकर पूछा: 'तू दुखी क्यों बैठा है यार? तुझे तो खुश होना चाहिए तेरे चचा आए हैं जो तुझे सौ-सौ के कोरे नोट देते हैं। कुछ वे देते हैं, कुछ तू उनकी जेब से चुपचाप निकल लिया करता है अब तो तेरे मजे ही मजे हैं'
 
दूसरा मित्र मुँह लटका कर बोला: 'यार! चाचा जी अब पहले जैसे नहीं रहे

पहले मित्र ने पूछा: क्यों उनके पास अब पैसे नहीं रहते?' 

'बात ऐसी नहीं है, अब उन्होंने पीना छोड़ दिया है" पहले मित्र ने उत्तर दिया. 

'इससे तो पहले ही अच्छे थे' दूसरे ने कहा
*
४४ विश्व सखा कोलोनी, खरगोन ४५१००१, चलभाष: ७९७४९९७७५ 
*





कोई टिप्पणी नहीं: