सोमवार, 9 अप्रैल 2018

दोहा सलिला

दोहा सलिला
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कथ्य, भाव,  छवि, बिंब, लय,  रस,  रूपक,  का मेल।
दोहा को जीवंत कर, कहे रसिक आ खेल।।
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शब्द-शब्द की अहमियत,  लय माधुर्य तुकांत।
भाव, बिंब, मौलिक,  सरस,  दोहा की  छवि कांत।।
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शब्द सार्थक-सरल हों,  कथ्य कर सकें व्यक्त।
संप्रेषित अनुभूति  हो,  रस-छवि रहें न त्यक्त।।
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अलंकार चारुत्व से, दोहे का लालित्य।
बालारुण को प्रखरकर,  कहे नमन आदित्य।।
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दोहे को मत मानिए, शब्दों की दूकान।
शब्द न नहरें भाव बिन,  तपता रेगिस्तान।।
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9.4.2018

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