बुधवार, 11 अप्रैल 2018

नवगीत: जाल न फैला

नवगीत:
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जाल न फैला
व्यर्थ मछेरे
मछली मिले कहाँ बिन पानी।
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नहा-नहा नदियाँ की मैली
पुण्य,  पाप को कहती शैली
कैसे औरों की हो खाली
भर लें केवल अपनी थैली
लूट करोड़ों, 
बाँट सैंकड़ों
ऐश करें खुद को कह दानी।
*
पानी नहीं आँख में बाकी
लूट लुटे को हँसती खाकी
गंगा जल की देख गंदगी
पानी-पानी प्याला-साकी
चिथड़े से
तन ढँके गरीबीे
बदन दिखाती धनी जवानी।
*
धंधा धर्म रिलीजन मजहब
खुली दुकानें, साधो मतलब
साधो! आराधो, पद-माया
बेच-खरीदो प्रभु अल्ला रब
तू-तू मैं-मैं भुला,
थाम चल
भगवा झंडा, चादर धानी।
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10.4.2018

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