शनिवार, 14 अप्रैल 2018

मुक्तक सलिला

मुक्तक सलिला:  
बोल जब भी जबान से निकले,
पान ज्यों पानदान से निकले 
कान में घोल दे गुलकंद 'सलिल-
ज्यों उजाला विहान से निकले।।
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जो मिला उससे है संतोष नहीं, 
छोड़ता है कुबेर कोष नहीं। 
नाग पी दूध ज़हर देता है- 
यही फितरत है, कहीं दोष नहीं।। 
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बाग़ पुष्पा है, महकती क्यारी, 
गंध में गंध घुल रही न्यारी।
मन्त्र पढ़ते हैं भ्रमर पंडित जी-
तितलियाँ ला रही हैं अग्यारी।।
आज प्रियदर्शी बना है अम्बर,
शिव लपेटे हैं नाग- बाघम्बर।
नेह की भेंट आप लाई हैं-
चुप उमा छोड़ सकल आडम्बर।।
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ये प्रभाकर ही योगराज रहा, 
स्नेह-सलिला के साथ मौन बहा।
ऊषा-संध्या के साथ रास रचा-
हाथ रजनी का खुले-आम गहा।।
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करी कल्पना सत्य हो रही,
कालिख कपड़े श्वेत धो रही।
कांति न कांता के चहरे पर- 
कलिका पथ में शूल बो रही।।
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१८-४-२०१४

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