सोमवार, 23 अप्रैल 2018

doha salila

दोहा सलिला:
*
लीक पकड़कर चलाचल, सब ठोंकेंगे पीठ 
लीक छुटी कोड़े पड़े, सभी दिखाएँ दीठ

*
पट्टा बाँधे आँख पर, घोड़ा माफिक भाग 
हरी घास मत देखना, मालिक देगा त्याग

*
क्या लाया? ले जाए क्या?, कौन कभी यह सोच.
जोड़-तोड़ किसके लिए?, कुछ तो कर संकोच.

*
तू दो दूनी पाँच कह, मैं बोलूँगा तीन. 
चार कहे जो वह गलत, नचा बजाकर बीन.

*
आरक्षित ने मिल दिया, सीता को वनवास. 
राम न रक्षा कर सके, साक्षी है इतिहास.

*
पुजती रहीं गणेश सँग, लछमी हरि को छोड़.
'लिव इन' होते देखकर, शीश न अपना फोड़.

*
'अच्छे दिन अब आ रहे', सुनिए उनकी बात. 
नीरव के सँग उड़ गए, हाथ मल रहे तात.

*
अविश्वास प्रस्ताव की, दिखा रहे थे धौंस.
औंधे मुँह गिर पड़े हैं, लड़ें न बाकी हौंस.

*
घर में ही दुश्मन पले, जब-तब लेते काट.
खोज-खोज पप्पू थका, खोज न पाया काट.

*
एक-दूसरे को कहें, हम दोनों मिल चोर.
वेतन-भत्ते मिल बढ़ा, चहकें भाव-विभोर.

*
लोक नहीं है लोभ का, तंत्र करे षड्यंत्र.
'गण' पर नित 'गन' तानता, फूँक शोक का मंत्र.

*
जिस सीढ़ी से तू चढ़ा, उसको देना तोड़.
दूजा चढ़कर ले सके, 'सलिल' न तुझसे होड़.

*
सगा ना कोई सगा है, गैर सभी है गैर.
बैर बैर से पालकर, मने किस तरह खैर?
*
गौ भाषा को दूहकर, दोहा देता अर्थ.
अर्थ न अन्तर्निहित यदि, तो लिखना है व्यर्थ.
*
इंद्रप्रस्थ के तख़्त पर, नर नरेंद्र आसीन.
शाह ताज बिन घूमता, सेवक के आधीन.
*
२२.४.२०१८ 

कोई टिप्पणी नहीं: