शुक्रवार, 1 जून 2018

ओशो चिंतन: दोहा गुंजन

ओशो चिंतन 6: दोहा गुंजन *

गुरुओं-निर्देशित रहा, युग-युग से यह देश।
चाहें सत-विपरीत हों,  सब मानें आदेश।।
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मैं करता हूँ  निवेदन,  व्यर्थ न दूँ आदेश।
ढाँचे में बँधता नहीं, कभी न दूँ उपदेश।।
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निपट अकेला घूमता,  जो-जब लगता ठीक।
करूँ निवेदन मात्र वह,  फिक्र न क्या है लीक।।
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मित्र-शत्रु कोई नहीं, कभी बनाया सत्य।
काम न मेरा वह रहा, तरफ आपकी कृत्य।।
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जब-जो कहना; कह दिया, कहें न जिम्मेदार।
कल कह; कल ही मर गया, वक्ता आज न भार।।
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पल-पल मैं हूँ बदलता, पल-पल बदले बात।
नहीं बाँधकर देखिए,  प्रश्न न संगत तात।।
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मामूली कोई नहीं, अपने तईं विशेष।
हर जन है यह मानता,  असामान्य नि:शेष।।
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तुलना हिंसा कराती, कह दूजा सामान्य।
है विशेष हर एक ही,  सत्य अटल यह मान्य।।
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प्रभु इंसां को बनाकर, कहे कान में बात।
तुमसे बढ़कर बनाई, कोई नहीं जमात।।
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हर आता ले धारणा,  वह है खासुलखास।
शेष सभी सामान्य हैं, भले सहे उपहास।।
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या तो सब सामान्य हैं,  या हैं सभी विशेष।
कुछ को अधिक महत्व क्यों, क्यों कम पाएँ शेष।।
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करूँ विभाजन मैं नहीं, बातें करूँ न भिन्न।
यह मेरे वश का नहीं, करूँ प्रसन्न न खिन्न।।
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आप न हों; दीवाल हो,  श्रोता तब भी बात।
वही कहूँ; जो कह रहा,  अगर यही हालात।।
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मंडन या शंकर नहीं, बैठे सुनने ठीक।
मूल दुबारा हों नहीं,  प्रतिलिपि उचित न लीक।।
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एक एक है यथावत्, कब कोई पुनरुक्त?
जैसा है वैसा रहे, होगा तभी प्रयुक्त।।
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बुद्धू बुद्ध न हो सके, जितना है यह सत्य।
बुद्ध न बुद्धू हो सकें, यह भी नहीं असत्य।।
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1.6.2018, 7999559618
salil.sanjiv@gmail.com

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