गुरुवार, 28 जून 2018

साहित्य त्रिवेणी २४. मगही लोकगीत: कुमार गौरव

२४. मगही लोक गीतों में छंद-छटा
कुमार गौरव अजितेंदु
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परिचय: नवोदित कवि, प्रकाशित: मुक्त उड़ान हाइकु संग्रह, संपर्क: द्वारा: श्री नवेंदु भूषण कुमार, शाहपुर, ठाकुरबाड़ी मोड़ के पास, पोस्ट दाउदपुर, दानापुर कैंट, पटना ८०१५०२ बिहार, चलभाष ९६३१६५५१२९।
छंद अर्थात अनुशासन और अनुशासन के बिना समस्त ब्रह्मांड में कुछ भी नहीं है। यह सकल सृष्टि जगत ही छांदसिक है। कोई लाख छंदमुक्त होना चाहे, हो ही नहीं सकता। कब, कैसे और कहाँ छंद उसे अपने अंदर ले लेंगे या उसके अन्दर समाहित हो जाएँगे, उसे खुद ही पता नहीं चलेगा। छंदबद्ध रचनाओं का इतिहास हमारी गौरवशाली परंपरा का एक महत्वपूर्ण अंग है। धार्मिक से लेकर लौकिक साहित्य तक, छंदों ने अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज कराई है। लोकगीत, स्थानीय भावनाओं की उन्मुक्त अभिव्यक्ति करते हैं। उनके रचयिता उनको किसी दायरे में बँधकर नहीं लिखते परंतु छंदों की सर्वव्यापकता के कारण ऐसा हो नहीं पाता। बिहार की प्राचीन लोक भाषाओँ में मगही का महत्वपूर्ण स्थान है। देश की अन्य लोकभाषाओँ की तरह मगही में भी लोकगीतों की एक समृद्ध परंपरा है। इन गीतों को यदि हम छंदों की कसौटी पर परखें तो विविध छंदों के सुंदर दृश्य सामने आते हैं:
कत दिन मधुपुर जायब, कत दिन आयब हे। / ए राजा, कत दिन मधुपुर छायब, मोहिं के बिसरायब हे॥
छव महीना मधुपुर जायब, बरिस दिन आयब हे। / धनियाँ, बारह बरिस मधुपुर छायब, तोहं नहिं बिसरायब हे॥
बारहे बरिस पर राजा लउटे दुअरा बीचे गनि ढारे हे। / ए ललना, चेरिया बोलाइ भेद पूछे, धनि मोर कवन रँग हे॥
तोर धनि हँथवा के फरहर,, मुँहवा के लायक हे। / ए राजा, पढ़ल पंडित केर धियवा, तीनों कुल रखलन हे॥
उहवाँ से गनिया उठवलन, अँगना बीचे गनि ढारे हे। / ए ललना, अम्माँ बोलाइ भेद पुछलन, कवन रँग धनि मोरा हे॥
तोर धनि हँथवा के फरहर, मुँहवा के लायक हे।
इसकी पंक्तियों में "सुखदा छंद" जो कि १२-१० मात्राओं पर यति, अंत गुरु की झलक स्पष्ट है। इसी प्रकार
देखि-देखि मुँह पियरायल, चेरिया बिलखि पूछे हे। / रानी, कहहु तूँ रोगवा के कारन, काहे मुँह झामर हे॥
का कहुँ गे चेरिया, का कहुँ, कहलो न जा हकइ हे। / चेरिया, लाज गरान के बतिया, तूँ चतुर सुजान हहीं गे॥
लहसि के चललइ त चेरिया, त चली भेलइ झमिझमि हे। / चेरिया, जाइ पहुँचल दरबार, जहाँ रे नौबत बाजहइ हे॥
सुनि के खबरिया सोहामन अउरो मनभावन हे।/ नंद जी उठलन सभा सयँ भुइयाँ न पग परे हे॥
जाहाँ ताहाँ भेजलन धामन, सभ के बोलावन हे। / केहु लयलन पंडित बोलाय, केहु रे लयलन डगरिन हे॥
पंडित बइठलन पीढ़ा चढ़ि, मन में विचारऽ करथ हे। / राजा, जलम लेतन नंदलाल जगतर के पालन हे॥
जसोदाजी बिकल सउरिया, पलक धीर धारहु हे। जलम लीहल तिरभुवन नाथ, महल उठे सोहर हे॥
यह गीत विद्या छंद के १४-१४ मात्राओं का अनुपालन करता है। एक तिलक गीत देखिए:
सभवा बइठले रउरा बाबू हो कवन बाबू। / कहवाँ से अइले पंडितवा, चउका सभ घेरि ले ले॥
दमड़ी दोकड़ा के पान-कसइली। / बाबू लछ रुपइया के दुलहा, बराम्हन भँडुआ ठगि ले ले॥
बाबू, लछ रुपइया के दुलहा, ससुर भँडुआ ठगि ले ले॥
इसकी लय कुकुभ छंद (३० मात्रिक, यति १६-१४) के बेहद निकट है। अंत में दो गुरु भी प्रतिष्ठित हैं।
मगही लोक गीत जीवन के हर क्षेत्र (सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक आदि) के क्रिया-कलापों से जुड़े हैं। विस्मय यह है कि अधिकाँश लोकगीत अल्प शिक्षित या अशिक्षित लोक कवियों द्वारा रचे जाने के बाद भी उनमें छंदों के मूल विधान का पालन किया गया है। मात्रा या वर्ण गणना के स्थान पर ध्वनिखंड के आधार पर परिक्षण किया जाए तो ये लोकगीत छांदस परंपरा में रचे गए हैं। स्थानीय उच्चारण भेद के कारण वर्ण या मात्रा गणना में यत्किंचित भिन्नता सहज स्वीकार्य होनी चाहिए।
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रुनुक झुनुक बिछिया[1] बाजल, पिया पलँग पर हे।
ललना, पहरि कुसुम रँग चीर, पाँचो रँग अभरन[2] हे॥1॥
जुगवा खेलइते तोंहे देवरा त, सुनहऽ बचन मोरा हे।
देवरा, भइयाजी के जलदी बोलावऽ, हम दरदे बेयाकुल हे॥2॥
जुगवा खेलइते तोंहे भइया त, सुनहऽ बचन मोरा हे।
भइया, तोर धनि दरद बेयाकुल, तोरा के बोलावथु[3] हे॥3॥
डाँर[4] मोर फाटहे करइली जाके, ओटिया चिल्हकि मारे हे।
पसवा त गिरलइ बेल तर, अउरो बबूर तर हे।
ललना, धाइ के पइसल गजओबर, कहु धनि कूसल हे॥4॥
हथिया खोलले हथिसरवा, त घोड़े घोड़सार खोलल हे।
राजा, का कहूँ दिलवा के बात, धरती मोर अन्हार लागे हे॥5॥
घोड़ा पीठे होबऽ असवार त डगरिन[5] बोलवहु हे॥6॥
कउन साही[7] के हहु तोही बेटवा, कतेक[8] राते आयल हे॥8॥
राजा, घोड़े पीठ भेलन असवार, त डगरिन बोलावन हे॥7॥
के मोरा खोले हे केवड़िया त टाटी फुरकावय[6] हे।
हम तोरा खोलऽ ही केवड़िया त टाटी फुरकावहि हे।
किया तोरा हथु गिरिथाइन[13] कते राते आयल हे॥10॥
डगरिन, दुलरइता[9] साही के हम हीअइ बेटवा, एते राते आयल हे॥9॥
किया तोरा माय से मउसी[10] सगर[11] पितियाइन[12] हे।
न मोरा माय से मउसी, न सगर पितिआइन हे।
डगरिन, हथिन मोर घर गिरिथाइन एते राते आयल हे॥11॥
डगरिन, जब मोरा होयतो त बेटवा, त कान दुनु सोना देबो हे।
हथिया पर हम नहीं जायब, घोड़े गिरि जायब हे।
लेइ आबऽ रानी सुखपालक,[14] ओहि रे चढ़ि जायब हे॥12॥
जवे तोरा होयतो त बेटवा, किए देबऽ दान दछिना हे।
जबे तोरा होयतो लछमिनियाँ, त कहि के सुनावह हे॥13॥
काहेला डगरिन रोस करे, काहेला बिरोध करे हे।
डगरिन, जब होयत मोरा लछमिनियाँ, पटोर[15] पहिरायब हे॥14॥
सोने के सुखपालकी चढ़ल डगरिन आयल हे।
डगरिन बोलले गरभ सयँ, सुनु राजा दसरथ ए॥15॥
राजा, तोर धनि हथवा के साँकर,[16] मुहँवा के फूहर हे।
नहीं जानथू[17] दुनियाँ के रीत, दान कइसे हम लेबो हे॥16॥
जुग-जुग जियो तोर होरिलवा, लबटि अँगना आयब हे॥18॥
डगरिन हम देबो अजोधेया के राज, लहसि[18] घर जयबऽ हे॥17
इयरी पियरी पेन्हले डगरिन, लहसि घर लउटल हे।

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