मंगलवार, 12 जून 2018

साहित्य त्रिवेणी १७. विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र' हास्य, व्यंग्य काव्य में छंद


हास्य, व्यंग्य काव्य में छंद

विवेक रंजन श्रीवास्तव
परिचय: जन्म २८.७.१९५९, अभियांत्रिकी स्नाकोत्तर, व्यंग्य लेख, नाटक तथा तकनीकी लेखन हेतु ख्यात। प्रकाशित आक्रोश -कविताएँ, रामभरोसे तथा कौआ कान ले गया -व्यंग्य संग्रह, हिन्दोस्तान हमारा -नाटक संग्रह, जादू शिक्षा का नाटक पुरस्कृत, जल जंगल और जमीन तथा बिजली का बदलता परिदृश्य -तकनीकी। संप्रति अधीक्षण अभियंता विद्युत् मंडल मध्य प्रदेश।    संपर्क: ए १ , शिला कुंज , रामपुर , जबलपुर ४८२००८  मो ७०००३७५७९८, vivekranjan.vinamra@gmail.com 
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हास्य-व्यंग्य एक सहज मानवीय प्रवृति है। दैनिक व्यवहार में भी हम जाने-अनजाने कटाक्ष, परिहास, व्यंग्योक्तियो आदि का उपयोग करते हैं। साहित्य की दृष्टि से  मानवीय वृत्तियों को आधार मानकर व्याकरणाचार्यों ने ९ मूल मानवीय भावों हेतु  ९ रसों का वर्णन किया है।श्रंगार रस अर्थात रति भाव, हास्य रस अर्थात हास्य की वृत्ति, करुण रस अर्थात शोक का भाव, रौद्र रस अर्थात क्रोध, वीर रस अर्थात उत्साह, भयानक रस अर्थात भय, वीभत्स रस अर्थात घृणा या जुगुप्सा, अद्भुत रस अर्थात आश्चर्य का भाव  तथा शांत रस अर्थात निर्वेद भाव में सारे साहित्य को विवेचित किया जा सकता है। १० वें रस के रूप वात्सल्य रस को में अलग से विश्लेषित किया गया है, किंतु मूलतः वह श्रंगार का ही एक सूक्ष्म उप विभाजन है। मनोविज्ञान के विशेषज्ञों ने हास्य को मूल प्रवृत्ति के रूप में समुचित स्थान दिया है। आनंद के साथ हास्य का सीधा संबंध है। हास्य तन-मन के तनाव दूर करता है, स्वभाव की कर्कशता मिटाता है, व्यंग्य  आत्मनिरीक्षण और आत्मपरिष्कार के साथ ही मीठे ढंग से समाज सुधार का मार्ग प्रशस्त करता है, व्यक्ति और समाज की थकान दूर कर उनमें ताजगी भरता  है। भरत का नाट्यशास्त्र , भाव प्रकाश , साहित्य दर्पणकार , दशरूपककार आदि  साहित्य में रसछंद के प्रामाणिक पुरातन ग्रंथ हैं। 
       विपरीतालंकारैर्विकृताचाराभिधान वेसैश्च
      विकृतैरर्थविशेषैहंसतीति रस: स्मृतो हास्य:।। - भरत मुनि, नाट्यशास्त्र  
       प्रीतिर्विशेष: चित्तस्य विकासो हास उच्यते।  - भावप्रकाश 
वर्णदि वैकृताच्चेतो विकारो हास्य इष्यते  - साहित्य दर्पणकार 
       विकृताकारवाग्वेशचेष्टादे: कुहकाद् भवेत्।।
       विकृताकृतिवाग्वेरात्मनस्यपरस्य वा
       हास: स्यात् परिपोषोऽस्य हास्य स्त्रिप्रकृति: स्मृत:।। -दश रूपककार 
निष्कर्षत: हास्य एक प्रीतिपरक भाव है। हास्य का प्रादुर्भाव आकार, वेष, आचार, अभिधान, अलंकार, अर्थविशेष, वाणी, चेष्टा आदि भाव भंगिम आदि की असामान्यता से होता है। वैचित्र्य से निर्मित असामान्य स्थितियाँ अभिनेता, वक्ता, गायक, संचालक या अन्य किसी की हों उनसे हास्य का उद्रेक होता है। कवि कौशल द्वारा हमें  रचना में इस तरह के अनुप्रयोग से  आल्हादित करता है।  यह विचित्रता हमारे मन को पीड़ा न पहुँचाकर,  गुदगुदाती है, यह अनुभूति ही हास्य है। हास्य के भाव का उद्रेक देश-काल-पात्र-सापेक्ष होता है. घर पर कोई खुली देह बैठा हो तो दर्शक को हँसी न आएगी किंतु किसी उत्सव में भी वह इसी तरह पहुँच जाए तो उसका आचरण प्रत्याशित से विपरीत या विकृत माना जाकर उसे हँसी का पात्र बना देगा। युवती श्रृंगार करे तो उचित है किंतु किसी  वृद्धा का श्रृंगार परिहास का कारण होगा। केले के छिलके पर फिसलने वाले को देखकर हम हँसते हैं परंतु छत से गिरनेवाले बच्चे के प्रति  हमारी करुणा उमड़ेती है। हास्य का उद्भव परिस्थिति सापेक्ष होता है। 
हास्य के दो भेद आत्मस्थ और परस्थ हैं। हास्य पात्र का स्वत: हँसना आत्मस्थ हास्य और दूसरों को हँसाना परस्थ हास्य है। हास्य के छह स्मित, हसित, विहसित, उपहसित, अवहसित और अतिहसित हैं। विदेशी विद्वानों ने हास्य रचना  के पाँच प्रमुख प्रकार ह्यूमर (विनोद), विट (वाग्वैदग्ध्य), सैटायर (व्यंग्य), आइरनी (वक्रोक्ति) और फार्स (प्रसहन) बताये हैं। ह्यूमर और फार्स हास्य के विषय से संबंधित हैं जबकि विट, सैटायर और आइरनी का संबंध उक्ति के कौशल से है। पैरोडी (रचना परिहास) भी हास्य की एक विधा है जिसका संबंध रचना कौशल से है। आइरनी का अर्थ कटाक्ष या परिहास है। विट अथवा वाग्वैदाध्य को एक विशिष्ट अलंकार कहा जा सकता है। 
आकृतिक बेतुकापन, मोटापा, कुरूपता, भद्दापन, अंग-भंग, अति कोमलता, तोंद, कूबड़, अटपटी चाल, नारी-उपहासपरक हास्य अब उपयुक्त नहीं माना जाता। प्रकृति या स्वभाव का बेतुकापन, उजड्डपन, बेवकूफी, पाखंड, झेंप, चमचागिरी, अमर्यादित फैशनपरस्ती, कंजूसी, दिखावा पांडित्य का बेवजह प्रदर्शन, अनधिकार अहं, बेतुकापन, पारिस्थितिक वैचित्र्य,  समय की चूक, समाज की असमंजसता में व्यक्ति की विवशता आदि हास्यपरक छंद-काव्य के विषय हैं। वेश का बेतुकापन, हास्य पात्रों, नटों और विदूषकों का प्रिय विषय  रहा है और प्रहसनों, रामलीलाओं, रासलीलाओं, "गम्मत", तमाशों आदि में छांदस हास्य प्रयोग बहुधा प्रस्तुत किये जाते हैं।
प्राचीन संस्कृत साहित्य हास्य-व्यंग्य से भरपूर है। कालिदास के रचना कौशल का यह एक उदाहरण दृष्टव्य है: राजा भोज ने घोषणा की जो नया श्लोक रचकर लाएगा उसे एक लाख मुद्राएँ पुरस्कार में मिलेंगी परंतु पुरस्कार किसी को मिल ही नहीं पाता था क्योंकि  मेधावी दरबारी पंडित नया श्लोक सुनते ही उसे दुहरा देते और इस प्रकार उसे पुराना घोषित कर देते थे। कालिदास ने श्लोक में दावा किया राजा निन्नानबे करोड़ रत्न देकर अपने पिता को ऋणमुक्त करें और इस पर पंडितों का साक्ष्य ले लें। यदि पंडितगण कहें कि यह दावा उन्हें विदित नहीं है तो फिर इस नए श्लोक की रचना के लिए एक लाख मुद्रा दी जाए। इसमें "कैसा छकाया" का भाव सन्निहित है। 
       स्वस्तिश्री भोजराज! त्रिभुवनविजयी धार्मिकस्ते पिताऽभूत्
       पित्रा ते मे गृहीता नवनवति युता रत्नकोटिर्मदीया।
       तान्स्त्वं मे देहि शीघ्रं सकल बुधजनैज्र्ञायते सत्यमेतत्
       नो वा जानंति केचिन्नवकृत मितिचेद्देहि लक्षं ततो मे।।    
हिंदी के वीरगाथाकाल, भक्तिकाल और रीतिकाल में छंद बद्ध हास्य रचना के अनेक प्रसंग हैं। रामचरिमानस का नारद मोह प्रसंग, शिव विवाह प्रसंग, परशुराम प्रसंग आदि  सूरसागर का माखन चोरी प्रसंग, उद्धव-गोपी-संवाद आदि छांदस हास्य के अच्छे उदाहरण हैं। तुलसीदास जी जैसे धीर-गंभीर कवि ने जरा जर्जर तपस्वियों की श्रंगार लालसा पर मजेदार चुटकी ली है:
       विंध्य के वासी उदासी तपोव्रतधारी महा बिनु नारि दुखारे
       गौतम तीय तरी तुलसी सो कथा सुनि भे मुनिवृंद सुखारे।
       ह्वै हैं सिला सब चंद्रमुखी, परसे पद मंजुल कंज तिहारे
       कीन्हीं भली रघुनायक जू जो कृपा करि कानन को पगु धारे।।   
घाघ, भड्डरी, गिरधर, गंग, बेनी कविरा के भड़ौवे आदि इस काल की प्रसिद्ध हास्य व्यंग्य रचनायें हैं। भारत जीवन प्रेस ने इस काल की फुटकर हास्य रचनाओं का कुछ संकलन अपने "भड़ोवा संग्रह" में प्रकाशित किया था। इस काल में, विशेषत: दान के प्रसंग को लेकर, कुछ मार्मिक रचनाएँ हुई हैं जिनकी रोचकता आज भी कम नहीं कही जा सकती:
       चीटे न चाटते मूसे न सूँघते, बांस में माछी न आवत नेरे,
       आनि धरे जब से घर में तबसे रहै है जा परोसिन घेरे,
       माटिहु में कछु स्वाद मिलै, इन्हैं खात सो ढूढ़त हर्र बहेरे,
       चौंकि परो पितुलोक में बाप, सो आपके देखि सराध के पेरे।। 
एक कंजूस  ने संकट आने पर अपने वजन के बराबर दान करना कबूल किया। फिर वजन घटाने की नानाविध तरकीबें कीं:  
       बारह मास लौं पथ्य कियो, षट मास लौं लंघन को कियो कैठो
       तापै कहूँ बहू देत खवाय, तो कै करि द्वारत सोच में पैठो
       माधौ भनै नित मैल छुड़ावत, खाल खँचै इमि जात है ऐंठो
       मूछ मुड़ाय कै, मूड़ घोटाय कै, फस्द खोलाय, तुला चढ़ि बैठो।।
अपने समय के शिखर हस्ताक्षर, हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू  के महारथी प्रेमा संपादक रामानुज लाल श्रीवास्तव 'ऊँट बिलहरीवी' (जन्म २८ अगस्त १८९८-निधन २६ अप्रैल १९७६) ने मधुशालाकार बच्चन जी की प्रथम कविता प्रेमा में प्रकाशित की थी। ऊँट जी के हास्य दोहे तत्कालीन परिदृश्य प्रस्तुत करते हैं:
कहा कहों छवि आज की, भले बने हो लाल / बिन इस्त्री की पेंट है, बिना सेंट रूमाल
कमर हमारी लचलची, गला सुराहीदार / कहैं असुन्दर ऊँट को, जो वे निपट गँवार
भूख छिपाए णा छिपे, कोटक करो उपाय/या ते भारत-नारि अब, पेट रहीं दिखराय
'पत्नीवाद' के प्रणेता हास्यरसावतार गोपाल प्रसाद व्यास की कालजयी रचना ससुराल  (१६ मात्रिक संस्कारी जातीय पादाकुलक, पदपादाकुलक तथा पद्धरि छंद मिश्रित -सं.) की कुछ पंक्तियों का आनंद लें:
तुम बहुत बन लिए यार संत, अब ब्रम्हचर्य में नहीं तंत,
क्यों दंड व्यर्थ में पेल रहे, ससुराल चलो बुद्धू बसंत।
मुख में बीड़ा, कर में गजरा, आँखों में मस्ताना कजरा,
कुर्ते में चुन्नट डाल चलो, ससुराल चलो, ससुराल चलो...
काका की फुलझड़ियाँ, काका के प्रहसन, लूटनीति मंथन करि,  खिलखिलाहट,  काका तरंग, जय बोलो यार सप्तक, जय बोलो बेईमान की, काका के व्यंग्य बाण आदि के रचयिता काका हाथरसी की हास्य कविताओं में छंद का बोलबाला रहा है। काका की षट्पदियों में विविध छंदों का सम्मिश्रण है किंतु जन सामान्य उन्हें कुण्डलियाँ कहता रहा।  
पत्रकार दादा बने, देखो उनके ठाठ।
कागज़ का कोटा झपट, करें एक के आठ।। -दोहा छंद 
करें एक के आठ, चल रही आपाधापी ।
दस हज़ार बतलाय, छपें ढाई सौ कापी ।। -रोला छंद 
विज्ञापन दे दो तो, जय-जयकार कराएं।
मना करो तो उल्टी-सीधी न्यूज़ छपाएं ।। -दिक्पाल / मृदुगति छंद 
कभी-कभी मस्तिष्क में, उठते प्रश्न विचित्र।
पानदान में पान है, इत्रदान में इत्र।।        -दोहा 
इत्रदान में इत्र,सुनें भाषा विज्ञानी।    ११-१३, रोला 
चूहों के पिंजड़े को, कहते चूहेदानी।   १२-१२ दिक्पाल 
कह 'काका' इनसान रात-भर सोते रहते। ११-१३ सोरठा 
उस परदे को मच्छर दानी क्यों कर कहते।। १२-१२
हास्य-व्यंग्य के साथ राष्ट्रीय भावधारा के सशक्त कवि निर्भय हाथरसी की रचनाओं में देश-चिंता व्याप्त है। राजनैतिक भ्रष्टाचार पर प्रहार करती निम्न रचना ( २९ मात्रिक माहयौगिक जातीय छंद में है जिसमें १६-१३ पट यति है-सं.) आज और अधिक प्रासंगिक है :
कुर्सी पर कपटी बैठे हैं, गद्दी पर गद्दार हैं
नोटों की बौछार हुई है, वोटों का व्यापार है
बढ़ती आबादी निश्चय बर्नादी को बेज़ार है
आज़ादी की दुल्हन का अंगारों से श्रृंगार है
उनका सौदा नगद हुआ है, इनका अभी उधार है
जिसको देखो वही यहाँ पर हिंसा को तैयार है
केंकड़ा तथा अन्य हास्य संग्रहों के रचयिता झलकन लाल वर्मा 'छैल' की रचनाओं में मौलिकता तथा सामयिकता का सम्मिश्रण है। निम्न गीत (२४ मात्रिक अवतारी जातीय  वस्तुवदनक छंद में मुखड़ा और ३२ मात्रिक लाक्षणिक जातीय सवाई  छंद में मुखड़ा -सं.) में रहनैतिक नेताओं पर शब्द-प्रहार देखने योग्य है- 
दुनिया मंहगाई में पिसती है, पिसा करे
मैं क्यों न भला अवसर पाकर व्यापार करूँ.
नेता हूँ, मुझको क्या डर है? मेरे दिमाग में लेक्चर है.
फटकार जहाँ पर दिया वहाँ पूरा कर लिया किला सर है।
पाँचों उँगली घी में तर है, घी भरी कड़ाही सर पर है.
हर एक महकमा मेरा है, हर दफ्तर खला का घर है
मैं नगद घूस ही लेता हूँ, कौड़ी भी नहीं उधार करूँ
जबलपुर के ख्यात हास्य कवि रासबिहारी पांडे के छकडे (षट्पदी) काका हाथरसी की हे तरह हैं जिनमें दोहा और रोला का मिश्रण है किंतु  आदि-अंत में शब्द या शब्द समूह साम्य नहीं है-
नेताजी बेहाल हैं, आया निकट चुनाव
वोटर के छूकर चरण, दिखलाये कुछ भाव
दिखलाये कुछ भाव, कि भौंचक वोटर भोले
'अरे, अरे क्या करते?, हाथ जोड़कर बोले 
नेता बोले: आज हमें बस नाक रगड़ना
तुमको तो है पाच साल तक पूरे सड़ना 
हुल्लड़ मुरादाबादी की रचनाओं में भी कथ्य को शिल्प  पर वरीयता दी गयी है-
चार बच्चों को बुलाते, तो दुआएँ मिलतीं,   १४-११
साँप को दूध पिलाने, की जरूरत क्या थी ? १३-११ -सारस छंद 
मत करो बुढ़ापे में, इश्क की तमन्नाएँ              १२-१२ 
क्योंकि फ्यूज बल्बों में, बिजलियाँ नहीं होतीं।। १२-१२ अवतारी जातीय छंद 
हुल्लड़ जी में  तात्क्षणिक रचनाधर्मिता की अद्भुत प्रतिभा थी। एक बार उनसे किसी श्रोता ने लालू जी पर कुछ सुनाने की माँग की।  हुल्लड़ जी मंच से "अच्छा है पर कभी कभी" उन्वान की रचना पढ़ रहे थे , उन्होने तुरंत ही सुनाया:
हमने देखा कल सपने में, लालू जी ने दूध दिया        १६-१४ 
गाय, भैंस का चारा खाना, अच्छा है पर कभी-कभी।।१६-१४ महातैथिक जातीय छंद 
कविता का मूल उद्देश्य केवल हँसी या मनोरंजन ही नहीं होता। श्रोता/ पाठक को हँसी के अतिरिक्त कुछ न मिले तो वह कविता बेमानी है, व्यर्थ है। हुल्लड़जी ने वर्षों भौतिक तापों की प्रबल आँच झेली किंतु उनकी आशावादी जिजीविषा और सृजनात्मक कर्मनिष्ठा ने उस जीवन संघर्ष पर विजय पाई जिसमें कोई अन्य व्यक्ति टूट जाता।  एक कुण्डलिया छंद में उन्होंने इसकी चर्चा की है: 
बीता हर गम मर चुका, मत ढो उसकी लाश।
वर्तमान में जिए जा, छू लेगा आकाश।।         -दोहा 
छू लेगा आकाश, समय जो आनेवाला,
कैसा होगा कौन, तुझे बतलाने वाला।
सुख-दु:ख मन के खेल, व्यर्थ मत करो फजीता,
अब आगे की सोच, भूल जा जो भी बीता।      -रोला 
१७ मई १९३७ को जन्मे अल्‍हड़ बीकानेरी (श्‍याम लाल शर्मा) की  'रेत पर जहाज' संग्रह में प्रकाशित एक गजल दिल को छूने वाली है :
     ''मरुस्‍थल तो मनाता है नदी को    १९ 
      तरस लेकिन कब आता है नदी को १९
      नए शाइर-सा ये गुस्‍ताख झरना   १९ 
      गजल अपनी सुनाता है नदी को   १९ 
      हिमाकत देखिए इक बुलबुले की  १९ 
      इशारों पर नचाता है नदी को''     १९ महापौराणिक जातीय, पिंडी छंद
ओम प्रकाश आदित्य की (मनहरण या कवित्त घनाक्षरी में ८-८-८-७ वर्णिक बंधन में निबद्ध -सं) निम्न रचना उनकी भाषिक तथा छांदस सामर्थ्य की परिचायक है- 
छंद को बिगाड़ो मत, गंध को उजाड़ो मत   
कविता-लता के ये सुमन झर जाएँगे।        
शब्द को उघाड़ो मत, अर्थ को पछाड़ो मत,
भाषण-सा झाड़ो मत गीत मर जाएँगे।
हाथी-से चिंघाड़ो मत, सिंह से दहाड़ो मत
ऐसे गला फाड़ो मत, श्रोता डर जाएँगे।
घर के सताए हुए आए हैं बेचारे यहां
यहाँ भी सताओगे तो ये किधर जाएँगे। 
प्रदीप चौबे की सत्रह मात्रा भार के महासंस्कारी जातीय छंद में रचित निम्न रचना उच्चारण के आधार पर रची गयी वाचिक रचना है, इसलिए वर्णानुसार गिने जाने पर अंतर मिलता है. 
हर तरफ गोलमाल है साहब      १७ 
आपका क्या खयाल है साहब     १७ 
कल का भगुआ चुनाव जीता तो १८ 
आज भगवत दयाल है साहब     १७ 
लोग मरते रहें तो अच्छा है        १८ 
अपनी लकड़ी की टाल है साहब १८ 
आपसे भी अधिक फले फूले      १७ 
देश की क्या मजाल है साहब     १७ 
मुल्क मरता नहीं तो क्या करता१८ 
आपकी देखभाल है साहब         १७ 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' पेशे से इंजीनियर हैं। अंतर्जाल पर बोलोग, ऑरकुट, फेसबुक, वाट्सएप, मेसेंजर, ऑरकुट अर्थात हर मंच और दिव्य नर्मदा जाल पत्रिका में गत २ दशकों से निरंतर लिखने ही नहीं छंद शिक्षण के महा अभियान में प्राणप्रण से समर्पित रहने के साथ हास्य रचनाओं में छंद पिरोने में उनका सानी नहीं है। 'अंतर्राष्ट्रीय बुक डे' पर षट्पदी देखे:
राह रोक कर हैं खड़े, 'बुक' ले पुलिस जवान
वाहन रोकें 'बुक' करें, छोड़ें ले चालान       -दोहा 
छोड़ें ले चालान, कहें 'बुक' पूरी भरना
छूट न पाए एक, न नरमी तनिक बरतना -रोला 
कारण पूछा- कहें, आज 'बुक डे' है भैया  
अगर हो सके रोज, नचें कर ता-ता थैया  -रोला 
बत्तीस मात्रिक अश्वावातारी जातीय सार सवैया में रचित 'ठेंगा' शीर्षक रचना की कुछ पंक्तियाँ उनकी मौलिकता का नमूना हैं-
है ठेंगे में 'ठ', ठाकुर में 'ठ', ठठा हँसा जो वह ही जीता १६-१६
कौन ठठेरा?, कौन जुलाहा?, कौन कहाँ कब जूते सीता?१६-१६
ठेंगा दर्शन बेज़ार करे, ठेंगे बिन मिलता चैन नहीं १६-१६
ठेंगे बिन दिवस नहीं कटता, ठेंगे बिन कटती रैन नहीं १६-१६
अवतारी जातीय सारस छंद में रचित हास्य-व्यंग्य मुक्तिका का आनंद लें:
आँख खुले भी ठोकर खाई धत्तेरे की / नेता से उम्मीद लगाई धत्तेरे की
पूज रहा गोबर गणेश पोंगा पण्डज्जी / अंधे ने आँखें दिखलाई धत्तेरे की
चौबे चाहे छब्बे होना, दुबे रह गए / अपनी टेंट आप कटवाई धत्तेरे की
अपन लुगाई आप देख के आँख फेर लें / छिप-छिप ताकें नार पराई धत्तेरे की
एक कमा दो खरचें, ले-लेकर उधार वे / अपनी शामत आप बुलाई धत्तेरे की 
हास्य दोहों के माध्यम से अंग्रेजी प्रेम और शब्दों के गलत प्रयोग पर सलिल जी व्यंग्य बाण अपनी मिसाल आप हैं:  
शब्दों से खिलवाड़ का, लाइलाज है रोग..  
कहें 'स्टेशन' आ गया, आते-जाते लोग.
'पौधारोपण' कर कहें, 'वृक्षारोपण' आप.
गलत शब्द उपयोग कर, करते भाषिक पाप..
'ट्रेन' चल रही किन्तु हम, चला रहें हैं 'रेल'. 
हिंदी माता है दुखी, देख शब्द से खेल..
कहते 'हैडेक' पेट में, किंतु नहीं 'सिरदर्द'.
बने हँसी के पात्र तो, मुख-मंडल है ज़र्द..
'फ्रीडमता' 'लेडियों' को, मिले दे रहे तर्क.
'कार्य' करें तो शर्म है, गर्व करें यदि 'वर्क'..
सीतापुर के वास्तुविद अभियंता अम्बरीष श्रीवास्तव 'अम्बर' ने हास्य-व्यंग्य दोहों के माध्यम से अपना स्थान बनाया है:
चिमटा बेलन प्रेम का, खुलकर करें बखान.
जोश भरें हर एक में, ले भरपूर उड़ान.
चमचों से डरते रहें, कभी करें मत बैर.
चमचे पीछे यदि पड़े, नहीं आपकी खैर..
नैनों से सुख ले रहे, नाप रहे भूगोल.
सारे भाई-बंधु हैं, नहीं इन्हें कुछ बोल.
गलती कर मत मानिए, बने खूब पहचान.
अड़े रहें हल्ला करें, सही स्वयं को मान..
अहंकार दिखता बड़ा, ‘मैं’ छाया बिन प्राण.
‘मैं’ ‘मैं’ ‘मैं’ ही कीजिये, होगा अति कल्याण..
लखनऊ के अभियंता-गायक-हास्य कवि राजेश अरोरा 'शलभ'रचित पैरोडी संग्रह, हास्य पिटारा, हास्य बम, ग़ज़ल संग्रहों, कैसेटों तथा सीडी आदि ने उन्हें शिखरस्थ किया है. उनके एक गीत में  (२९ मात्रिक महायौगिक जातीय छंद, १६-१३ पर यति -सं.) अन्तर्निहित व्यंग्य सोचने को विवश करता है:
देश न इसका, देश न उसका, देश हमारे बाप का
जितना चाहूँ उतना खाऊँ, क्या जाता है आपका?
मेरे घर में छापा डाले, किसकी ये औकात है?
कोतवाल है ताऊ मेरा, इंस्पेक्टर दामाद है
मेरे दो-दो मुँह हैं भैया, इक नर का, इक साँप का  
मूलतः संस्कृत काव्यों के हिन्दी काव्यानुवाद तथा राष्ट्रीय कवि के रूप में समादृत   प्रो. चित्रभूषण श्रीवास्तव 'विदग्ध' ने हास्य में भी पताका फहराई है:
होली का त्यौहार है सभी खेलते रंग 
मैं भी इससे आ गया ले पिचकारी संग 
उनकी एक संदेश पूर्ण व्यंग्य कविता है ...
हो रहा आचरण का निरंतर पतन,राम जाने कि क्यो राम आते नहीं
हैं जहां भी कहीं हैं दुखी साधुजन देके उनको शरण क्यों बचाते नहीं
विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र' हास्य-व्यंग्य लेखों के साथ-साथ व्यंग्य कविता लेखन में भी स्थान बना चुके हैं:
सड़क हो न हो मंजिलें तो हैं फील गुड  
अपराधी को सजा मिले न मिले 
अदालत है , पोलिस भी फील गुड 
उद्घाटन हो पाये न हो पाये 
शिलान्यास तो हो रहे हैं फील गुड 
 डा. अजय जनमेजय की हिंदी गजल ( मापनी २२२ २२२ २२२ २२)  में हास्य-व्यंग्य मिश्रित है:
संबंधों को यार निभाना सीख गया       
हाँ, मैं भी अब आँख चुराना सीख गया
मन्वन्तर के हास्य हाइकु (५-७-५ ध्वनि आधारित वर्ण संख्या पर लिखित जापानी त्रिपदिक छंद-सं.) अभिनव प्रयोग है:
अजब गेट / कोई न करे पार / रे! कोलगेट।
एक ही सेंट /  नहीं सकते सूंघ / है परसेंट।
कौन सी बला / मानी जाती है कला? / बजा तबला।
सारत:, छंद ने हास्य-व्यंग्य कविताओं की सरसता में वृद्धि कर उन्हें लोकप्रियता के शिखर पर पहुँचाया है। छंद मुक्त हास्य कविताओं में कोइ एक छं भले ही न हो किन्तु उनकी विविध पंक्तियाँ विविध छंदों का मिश्रण होती है। यति-स्थान से पंक्ति परिवर्तन कर देने पर पंक्तियाँ छोटी-बड़ी दिखने लगती हैं। छंद हास्य-व्यंग्य को उभारने और उसे श्रोता-पाठक तक पहुँचाने में उत्प्रेरक का कार्य करता है।  
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