बुधवार, 6 जून 2018

सड़गोड़ासनी 3 श्री श्री आइए

सड़गोड़ासनी 3
श्री श्री आइए
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श्री श्री आइए मन-द्वारे,
चित पल-पल मनुहारे।

सब जग को देते प्रकाश नित,
हर लेते अँधियारे।

मृदु मुसकान अधर की शोभा,
मीठा वचन उचारे।

नयनों में है नेह-नर्मदा,
नहा-नहा तर जा रे!

मेघ घटा सम छाओ-बरसो,
चातक प्राण पुकारे।

अंतर्मन निर्मल करते प्रभु,
जै-जैकार गुँजा रे।

श्री-चरणों की रज पाना तो,
खुद को धरा बना रे।

कल खोकर कल सम है जीवन,
व्याकुल पार लगा रे।

लोभ मोह माया तृष्णा तज
गुरु का पथ अपना रे!

श्री-वचनों का अमिय पानकर
जीवन सफल बना रे!
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6.6.2018, 7999559618
salil.sanjiv@gmail.com

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