शनिवार, 16 जून 2018

साहित्य त्रिवेणी १६ डॉ.सरस्वती माथुर छंद: एक विवेचन

१६ छंद: एक परिचय
डॉ.सरस्वती माथुर
परिचय: डॉ .सरस्वती माथुर, प्राचार्य पी .जी. कॉलेज, जन्म: ५ अगस्त, शिक्षा: एम. एससी. (प्राणिशास्त्र) पीएच.डी , पी. जी .डिप्लोमा इन जर्नालिस्म (गोल्ड मेडलिस्ट), शिक्षाविद व सोशल एक्टिविस्ट, प्रकाशन: काव्य संग्रह एक यात्रा के बाद, मेरी अभिव्यक्तियाँ, मोनोग्राम  राजस्थान के स्वतंत्रता सेनानी : मोनोग्राम हरिदेव जोशी विज्ञान  जैवप्रोधोयोगिकी (Biotechnology) सम्मान -पुरुस्कार, १९७० में दिल्ली प्रेस द्वारा कहानी "बुढ़ापा" पुरुस्कृत, भारतीय साहित्य संस्थान म.प्र .द्वारा काव्य में बेस्ट कविता के लिये पुरुस्कार, झालावाड डिस्ट्रिक्ट एसोसिएशन द्वारा साहित्य में योगदान के लिये फेलिसिटेशन एवं पुरुस्कार, ऑथर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया, पब्लिक रिलेशंस सोसाइटी ऑफ़ इंडिया राजस्थान चैप्टर की सदस्य, संपर्क: ए - २, हवा सड़क, सिविल लाइन, जयपुर-६  ईमेलjlmathur@hotmail.com।
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छंद क्या है: कविवर रामधारी 'सिंह ' दिनकर' के अनुसार 'छंद स्पंदन समग्र सृष्टि में व्याप्त है। कला ही नहीं जीवन की प्रत्येक शिरा में यह स्पंदन एक नियम  से चल रहा है। विश्व की प्रकृति, सूर्य, पृथ्वी, गृहमंडल मात्र में एक लय है जो समय की ताल पर यति लेती हुई अपना काम कर रही है। एेसा लगता है कि सृष्टि के उस छंद-स्पंदन युक्त आवेग की पहली मानवीय अभिव्यक्ति कविता और संगीत थे। हिंदी में असंख्य छंद हैं। राग रागनियाँ भी छंद ही हैं। हिंदी में वर्णिक छंद के अतिरिक्त मात्रिक छंद भी होते हैं। (हिंदी ही नहीं हर भाषा में वाचिक छंदों का सतीत्व है, जो मात्रिक-वार्णिक छंदों ही नहीं सांगीतिक बंदिशों के भी जनक हैं -सं.) वर्णिक छंद गणों द्वारा निर्धारित किये जाते हैं और मात्रिक मात्राओं के द्वारा। पाणिनी के अनुसार 'जो आल्हादित करे, प्रसन्न करे, वह छंद है।'  उनके अनुसार छंद 'चदि' धातु से निकला है । यास्क ने निरुक्त में छंद की परिभाषा इस प्रकार दी है-'छंदांसि छादनात अर्थात छंद की व्युत्पत्ति छदि धातु से है जिसका अर्थ है 'आच्छादन'। प्रायः सभी भाषाओं के प्राचीन ग्रंथ छंद में ही लिपिबद्ध हैं। पद शीघ्र याद होता है और याद की गई बात शीघ्र नष्ट नहीं होती है।प्रथम छंदकार पिंगल ऋषि नें छंद की कल्पना (रचना) कब की, ज्ञात नहीं किंतु छंद उनके नाम का पर्याय बन गया है। छंद संस्कृत वांग्मय में सामान्यतः लय बताने के लिये प्रयोग किया गया है। प्राचीन काल के ग्रंथों में संस्कृत में कई प्रकार के छंद मिलते है जो वैदिक काल जितने पुराने है। वेद-सूक्त छंदबद्ध है। पिंगल-रचित छंदशास्त्र इस विषय का मूल ग्रंथ है। छंद पर चर्चा सर्वप्रथम ऋृग्वेद  में हुई है। यदि गद्य की कसौटी व्याकरण है तो कविता की कसौटी छंद शास्त्र है। पद्य रचना का समुचित ज्ञान छंद शास्त्र के बिना नहीं होता है। काव्य और छंद का आरंभ  'अगण' यानि अशुभ गण से न हो। 'छंद' शब्द के मूल में गति का भाव है। वाक्यों में प्रयुक्त अक्षरों की संख्या एवं क्रम, मात्रा-गणना तथा यति-गति से संबद्ध विशिष्ट नियोजित पद्य छंद है। छंद योजना को बिना कठिन साधना के कविताओं में साकार नहीं किया जा सकता। किसी वांग्मय की समग्र सामग्री का नाम साहित्य है। छंदों के रचना-विधान तथा गुण-अवगुण के अध्ययन को छंद शास्त्र  कहते है। पिंगल-रचित छंद शास्त्र सबसे प्राचीनतम ग्रंथ है, इसे पिंगल शास्त्र ग्रंथ कहा जा सकता है। विशिष्ट अर्थों में छंद कविता या गीत में वर्णो की संख्या या स्थान से संबंधित नियमों को कहते हैं जिनसे काव्य में लय व रंजकता आती है। छोटी-बड़ी ध्वनियाँ, लघु-गुरु मात्राओं के अनुसार वर्णों की व्यवस्था, एक विशिष्ट नामवाला छंद कहलाता है। जैसे चौपाई, दोहा, सोरठा और गायत्री छंद आदि। इस प्रकार की व्यवस्था में मात्रा अथवा वर्णों की संख्या,विराम,गति,लय,तथा तुक आदि नियमों को भी निर्धारित किया गया है जिसका पालन कवियों को करना होता है।
छंद-भेद: छंद मुख्यत: तीन प्रकार के हैं: क. वर्ण वृत्त: जिन छंदों की रचना वर्णों की गणना के नियमानुसार होती हैं, उन्हें 'वर्ण वृत्त' कहते हैं। ख. मात्रिक छंद: जिन छंदों की रचना मात्रा-गणना-अनुसार की जाती है, वे वे 'मात्रिक' छंद हैं।  ग. मुक्तक: जिन छंदों की रचना में वर्णों अथवा मात्राओं की संख्या का कोई नियम नहीं होता, उन्हें 'मुक्तक' छंद कहते हैं। (वाचिक छंद: जिन छंदों का सृजन गायकी के आधार पर किया जाता है, वे वाचिक छंद हैं। गायक मात्रा अथवा छंद विधान न जानते हुए भी 'लय' के आधार पर गुनगुनाते-गाते हुई छंद-रचना कर लेता है। प्राचीन अनपढ़ या अशिक्षित कवियों ने रचनाएँ इसी प्रकार की हैं। ऐसी रचनाएँ उक्त तीनों मे से किसी भी वर्ग की हो सकती हैं। लोक काव्य के छंद पराया: वाचिक परंपरा में ही जन्मे और रचे जाते हैं। -सं.)  
रचना: छंद वस्तुत: एक ध्वनि समष्टि है । छोटी-छोटी अथवा छोटी बडी ध्वनियाँ जब एक व्यवस्था के साथ सामंजस्य प्राप्त करती हैं तब उसे एक शास्त्रीय नाम छंद दे दिया जाता है। मात्रा अथवा वर्णॊं की संख्या, विराम, गति, लय तथा तुक आदि के नियमों से युक्त रचना को छंद अथवा पद्य (पद) कहते हैं।  मात्रा-आधारित छंद को मात्र-वृत्त, वर्ण-आधारित छंद को वर्ण-वृत्त कहते हैं। छंदस् शब्द 'छद' धातु से बना है । इसका धातुगत व्युत्पत्तिमूलक अर्थ है - 'जो अपनी इच्छा से चलता है'। अत:, छंद शब्द के मूल में गति का भाव है। 
छंद के अंग: अ. गति - पद्य के पाठ में जो बहाव होता है उसे गति कहते हैं। आ.यति - पद्य पाठ करते समय गति को तोड़कर जो विश्राम दिया जाता है उसे यति कहते हैं। इ. तुक - समान उच्चारण वाले शब्दों के प्रयोग को तुक कहा जाता है। पद्य प्रायः तुकान्त होते हैं। ई. मात्रा - वर्ण के उच्चारण में जो समय लगता है उसे मात्रा कहते हैं। मात्रा २ प्रकार की होती है लघु और गुरु । ह्रस्व उच्चारण वाले वर्णों की मात्रा लघु होती है तथा दीर्घ उच्चारण वाले वर्णों की मात्रा गुरु होती है। लघु मात्रा का मान १ होता है और उसे । चिह्न से प्रदर्शित किया जाता है। गुरु मात्रा का मान २ होता है और उसे ऽ चिह्न से प्रदर्शित किया जाता है। 
ऊ. गण (ध्वनिखंड): मात्राओं और वर्णों की संख्या और क्रम की सुविधा के लिये तीन वर्णों के समूह को एक गण मान लिया जाता है। गणों की संख्या ८ है: यगण (।ऽऽ), मगण (ऽऽऽ), तगण (ऽऽ।), रगण (ऽ।ऽ), जगण (।ऽ।), भगण (ऽ।।), नगण (।।।) और सगण (।।ऽ)। गणों को आसानी से याद करने के लिए एक सूत्र बना लिया गया है- यमाताराजभानसलगा । सूत्र के पहले आठ वर्णों में आठ गणों के नाम हैं। अन्तिम दो वर्ण ‘ल’ और ‘ग’ छंदशास्त्र के दग्धाक्षर हैं। जिस गण की मात्राओं का स्वरूप जानना हो उसके आगे के दो अक्षरों को इस सूत्र से ले लें जैसे ‘मगण’ का स्वरूप जानने के लिए ‘मा’ तथा उसके आगे के दो अक्षर- ‘ता रा’ = मातारा (ऽऽऽ) । ‘गण’ का विचार केवल वर्ण वृत्त में होता है मात्रिक छंद इस बंधन से मुक्त होते हैं। 
छंद से हृदय को सौंदर्यबोध होता है। छंद मानवीय भावनाओं को झंकृत करते हैं। छंद में स्थायित्व होता है। छंद सरस होने के कारण मन को भाते हैं।    छंद के निश्चित आधार पर आधारित होने के कारण वे सुगमतापूर्वक कण्ठस्त हो जाते हैं। उदाहरण:  भभूत लगावत शंकर को, अहिलोचन मध्य परौ झरि कै। / अहि की फुँफकार लगी शशि को, तब अमृत बूँद गिरौ चिरि कै। / तेहि ठौर रहे मृगराज तुचाधर, गर्जत भे वे चले उठि कै। / सुरभी-सुत वाहन भाग चले, तब गौरि हँसीं मुख आँचल दै॥  अर्थात् (प्रातः स्नान के पश्चात्) पार्वती जी शंकर जीके मस्तक पर भभूत लगा रही थीं। थोड़ा सा भभूत झड़कर शिव जी के वक्ष पर लिपटे साँप की आँखों में गिरा। (आँख में भभूत गिरने से साँप फुँफकारा और उसकी) फुँफकार शंकर जी के माथे पर स्थित चंद्रमा को लगी (वह काँपने लगा जिससे उसके भीतर से) अमृत की बूँद छलक कर गिरी। वहाँ पर (शंकर जी की आसनी) जो बाघम्बर था, वह (अमृत बूँद के प्रताप से जीवित होकर) उठ कर गर्जना करते हुये चलने लगा। सिंह की गर्जना सुनकर गौ पुत्र बैल, जो शिव जी का वाहन है, भागने लगा तब गौरी जी मुँह पर आँचल रख हँसने लगीं मानो शिव जी से प्रतिहास कर रही हों कि देखो मेरे वाहन (पार्वती का एक रूप दुर्गा का है तथा दुर्गा का वाहन सिंह है) से डरकर आपका वाहन कैसे भाग रहा है।वैदिक छंद: वेदों के मंत्रों में प्रयुक्त कवित्त मापों को कहा जाता है। श्लोकों  में मात्राओं की संख्या और उनके लघु-गुरु उच्चारणों के क्रमों के समूहों को छंद कहते हैं। वेदों में लगभग१५ प्रकार के छंद प्रयुक्त हुए हैं। गायत्री छंद इनमें सबसे प्रसिद्ध है जिसके नाम ही एक मंत्र का नाम गायत्री मंत्र पड़ा है। इसके अतिरिक्त अनुष्टुप, त्रिष्टुप इत्यादि छंद हुए हैं। छंद शब्द अनेक अर्थों में प्रयुक्त किया जाता है। "छंदस" वेद का पर्यायवाची नाम है। छंद शब्द मूल रूप से छन्दस् अथवा छन्दः है। इसके शाब्दिक अर्थ दो है: ‘आच्छादित कर देने वाला’ और ‘आनंद देने वाला’ । लय और ताल से युक्त ध्वनि मनुष्य के हृदय पर प्रभाव डालकर उसे एक विषय में स्थिर कर देती है और मनुष्य उससे प्राप्त आनंद में डूब जाता है । यही कारण है कि लय और ताल वाली रचना छंद कहलाती है. इसका दूसरा नाम वृत्त है । वृत्त का अर्थ है प्रभावशाली रचना । वृत्त भी छंद को इसलिए कहते हैं, क्यों कि अर्थ जाने बिना भी सुननेवाला इसकी स्वर-लहरी से प्रभावित हो जाता है । यही कारण है कि सभी वेद छंद-रचना में ही संसार में प्रकट हुए थे ।सामान्यतः वर्णों और मात्राओं की गेयव्यवस्था को भी छंद कहा जाता है। इसी अर्थ में पद्य शब्द का भी प्रयोग किया जाता है। पद्य अधिक व्यापक अर्थ में प्रयुक्त होता है। भाषा में शब्द और शब्दों में वर्ण तथा स्वर रहते हैं। इन्हीं को एक निश्चित विधान से सुव्यवस्थित करने पर छंद का नाम दिया जाता है। छंदशास्त्र अत्यन्त पुष्ट शास्त्र माना जाता है क्योंकि वह गणित व ध्वनि विज्ञान पर आधारित है। छंदशास्त्र की रचना इसलिये की गई जिससे अग्रिम संतति इसके नियमों के आधार पर छंदरचना कर सके। छंदशास्त्र के ग्रंथों को देखने से यह भी ज्ञात होता है कि जहाँ एक ओर आचार्य प्रस्तारादि के द्वारा छंदो को विकसित करते रहे वहीं दूसरी ओर कविगण अपनी ओर से छंदों में किंचित् परिर्वन करते हुए नवीन छंदों की सृष्टि करते रहे जिनका छंदशास्त्र के ग्रथों में कालांतर में समावेश हो गया।
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