गुरुवार, 28 जून 2018

दोहा संवाद

दोहा संवाद:
बिना कहे कहना 'सलिल', सिखला देता वक्त।
सुन औरों की बात पर, कर मन की कमबख्त।।
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आवन जावन जगत में,सब कुछ स्वप्न समान।
मैं गिरधर के रंग रंगी, मान सके तो मान।। - लता यादव
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लता न गिरि को धर सके, गिरि पर लता अनेक।
दोहा पढ़कर हँस रहे, गिरिधर गिरि वर एक।। -संजीव
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मैं मोहन की राधिका, नित उठ करूँ गुहार।
चरण शरण रख लो मुझे, सुनकर नाथ पुकार।। - लता यादव
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मोहन मोह न अब मुझे, कर माया से मुक्त।
कहे राधिका साधिका, कर मत मुझे वियुक्त।। -संजीव
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ना मैं जानूँ साधना, ना जानूँ कुछ रीत।
मन ही मन मनका फिरे,कैसी है ये प्रीत।। - लता यादव
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करे साधना साधना, मिट जाती हर व्याध।
करे काम ना कामना, स्वार्थ रही आराध।। -संजीव
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सोच सोच हारी सखी, सूझे तनिक न युक्ति ।
जन्म-मरण के फेर से, दिलवा दे जो मुक्ति।। -लता यादव
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नित्य भोर हो जन फिर, नित्य रात हो मौत।
तन सो-जगता मन मगर, मौन हो रहा फौत।। -संजीव
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वाणी पर संयम रखूँ, मुझको दो आशीष।
दोहे उत्तम रच सकूँ, कृपा करो जगदीश।। -लता यादव
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हरि न मौन होते कभी, शब्द-शब्द में व्याप्त।
गीता-वचन उचारते, विश्व सुने चुप आप्त।। -संजीव
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२८-६-२०१८, ७९९९५५९६१८
छंद अर्थात अनुशासन और अनुशासन के बिना समस्त ब्रह्मांड में कुछ भी नहीं।
कहा जा सकता है कि यह जगत ही छांदसिक है। कोई लाख छंदमुक्त होना चाहे, हो
ही नहीं सकता। कब, कैसे और कहाँ छंद उसे अपने अंदर ले लेंगे, उसे खुद ही
पता नहीं चलेगा। ठीक यही बात हमारे लोकगीतों के ऊपर भी लागू होती है।
छंदबद्ध रचनाओं का इतिहास हमारी गौरवशाली परंपरा का एक महत्वपूर्ण अंग
है। धार्मिक से लेकर लौकिक साहित्य तक, छंदों ने अपनी गरिमामय उपस्थिति
दर्ज कराई है। लोकगीत, स्थानीय भावनाओं की उन्मुक्त अभिव्यक्ति होते हैं।
उनके रचयिता अक्सर उनको किसी दायरे में बँधकर नहीं लिखना चाहते परंतु
छंदों की सर्वव्यापकता के कारण ऐसा हो नहीं पाता। मैं बिहार के जिस
क्षेत्र से हूँ वहाँ मगही को स्थानीय बोली का पद प्राप्त है। हमारे देश
के अन्य हिस्सों की तरह यहाँ भी लोकगीतों की एक समृद्ध परंपरा रही है जो
कि निरंतर जारी है। इन गीतों को यदि हम छंदों की कसौटी पर परखें तो विविध
छंदों के सुंदर दृश्य सामने आते हैं। जैसे कि इसी गीत को लें,

कत दिन मधुपुर जायब, कत दिन आयब हे।
ए राजा, कत दिन मधुपुर छायब, मोहिं के बिसरायब हे॥1॥
छव महीना मधुपुर जायब, बरिस दिन आयब हे।
धनियाँ, बारह बरिस मधुपुर छायब, तोहंे नहिं बिसरायब हे॥2॥
बारहे बरिस पर राजा लउटे दुअरा बीचे गनि ढारे हे।
ए ललना, चेरिया बोलाइ भेद पूछे, धनि मोर कवन रँग हे॥3॥
तोर धनि हँथवा के फरहर,, मुँहवा के लायक हे।
ए राजा, पढ़ल पंडित केर धियवा, तीनों कुल रखलन हे॥4॥
उहवाँ से गनिया उठवलन, अँगना बीचे गनि ढारे हे।
ए ललना, अम्माँ बोलाइ भेद पुछलन, कवन रँग धनि मोरा हे॥5॥
तोर धनि हँथवा के फरहर, मुँहवा के लायक हे।

इसकी पंक्तियों में "सुखदा छंद" जो कि १२-१० मात्राओं पर चलता है और अंत
गुरु से होता, उसकी झलक स्पष्ट देखी जा सकती। इसी प्रकार

देखि-देखि मुँह पियरायल, चेरिया बिलखि पूछे हे।
रानी, कहहु तूँ रोगवा के कारन, काहे मुँह झामर[1] हे॥1॥
का कहुँ गे[2] चेरिया, का कहुँ, कहलो न जा हकइ हे।
चेरिया, लाज गरान[3] के बतिया, तूँ चतुर सुजान[4] हहीं गे॥2॥
लहसि[5] के चललइ त चेरिया, त चली भेलइ झमिझमि[6] हे।
चेरिया, जाइ पहुँचल दरबार, जहाँ रे नौबत[7] बाजहइ हे॥3॥
सुनि के खबरिया सोहामन[8] अउरो मनभावन हे।
नंद जी उठलन सभा सयँ[9] भुइयाँ[10] न पग परे हे॥4॥
जाहाँ ताहाँ भेजलन धामन,[11] सभ के बोलावन हे।
केहु लयलन पंडित बोलाय, केहु रे लयलन डगरिन हे॥5॥
पंडित बइठलन पीढ़ा[12] चढ़ि, मन में विचारऽ करथ[13] हे।
राजा, जलम लेतन[14] नंदलाल जगतर[15] के पालन हे॥6॥
जसोदाजी बिकल सउरिया,[16] पलक धीर धारहु हे।
जलम लीहल तिरभुवन नाथ, महल उठे सोहर हे॥7॥

यह गीत विद्या छंद के १४-१४ मात्राओं का काफी हद तक पालन करता दिखा है।

तिलक समारोह में गाया जाने वाला एक सुंदर गीत देखिए

सभवा बइठले रउरा[1] बाबू हो कवन बाबू।
कहवाँ से अइले पंडितवा, चउका[2] सभ घेरि ले ले॥1॥
दमड़ी दोकड़ा के पान-कसइली।
बाबू लछ[3] रुपइया के दुलहा, बराम्हन भँडुआ ठगि ले ले॥2॥
बाबू, लछ रुपइया के दुलहा, ससुर भँडुआ ठगि ले ले॥3

इसको गाते समय जो लय होती है, वह कुकुभ के १६-१४ के बेहद निकट जान पड़ती।
अंत में दो गुरुओं का भी दर्शन यहाँ हो रहा है।

- कुमार गौरव अजीतेन्दु
बाल शिक्षा में छंद ..
सवाल उठता हैं कि छंद आखीर है क्या ? तो मन तुरंत जवाब देता है कि व्याकरण के
नियमों में बंधे हुए वाक्य को छंद कहते हैं | जिसमे यति,गति,तुक,मात्रा, विराम अदि का
ध्यान रखा जाता है | तो अब प्रश्न यह उठता है कि इतना सब एक छोटे से बच्चे के
कोमल मन-मस्तिष्क में कैसे समाए ? बाल मन जिज्ञासू होता है पर कोमल भी वह
जिज्ञासा वश सीखने को आतुर रहता है पर ब्याकरण के कठिन नियमों को वह इतनी
जल्दी आत्मसात नहीं कर पाता; तो छंद क्या है उसके लिए ? उसके नन्हें कोमल मन
को छंदों से कैसे परिचित कराया जाय ? ये सारे प्रश्न एक साथ मन में उठने स्वाभाविक
हैं |
बाल शिक्षा में छंद का प्रथम ज्ञान
मेरा ऐसा मानना है कि एक शिशु जब जन्म लेता है तो उसका पहला स्पर्श माँ से होता
है | वह माँ के स्पर्श में जो सुख पाता है वही उसका पहला छंद है जिसका माध्यम स्पर्श
है क्यों कि सैकड़ों हजारों में वह माँ का स्पर्श पहचान लेता है | फिर जब माँ उसके माथे
पर हाथ फेरते हुए कुछ गुनगुनाती है, भले ही उनमें कोई शब्द ना हो..सिर्फ बंद होठों से
कोई ध्वनी फूट रही हो; जिसमें किसी आचार्य मम्मट के काव्यशास्त्र का ज्ञान नही..
यति..गति..तुक..विराम नहीं..उस टूटी-फूटी ध्वनि में हैं तो सिर्फ वात्सल्य..! शिशु के लिए
वही छंद है | उसी छंद के रस में डूबा वह माँ की गोद में दुनिया जहान से बेखबर सुख
की नींद सो जाता है | फिर जैसे-जैसे वह बड़ा होता है उसके लिए चिड़ियों की चहक..
कोयल की कूक में जो सुर है..लय है..वही उसका छंद है..वर्षा की बूँदों की छम-छम
उसका छंद है..पवन के वेग से पत्तों की खनक ही उसका छंद है..जिसमे कहीं कोई
व्याकरण का नियम नहीं है | अपनी शैशवावस्था में बाल मन इन्हीं सब चीजों से एक
लय को आत्मसात करता है जो उसके लिए छंद है ऐसा मैं मानती हूँ | क्यों कि जिसमें
सुर है..स्वर है,,लय है..वही उसका छंद है | बच्चे का छंदों से प्रथम परिचय मैं इसे ही
मानती हूँ |
द्वितीय..विद्यालय में
बचपन की कुछ धुंधली सी यादें हैं जब हमारी कक्षा वृक्षों की छाँव में लगा करती थी..लम्बी-
लम्बी चटाइयों के रोल हम सब छात्र-छात्राएँ मिल कर बिछाते और उसी पर कतारबद्ध बैठते,
एक कक्षा में सिर्फ एक ही लकड़ी की कुर्सी होती थी जिसपर मा-साब बैठा करते थे और
उनके हाथ में पतली नीम की छड़ी हुआ करती थी | मुझे आज भी याद आता है, अपने
विद्यालयी यात्रा की वो पहली प्रार्थना (जो आज-कल लुप्त-सी हो गयी है) जो गाते हुए हम

ऐसे भक्ति रस में डूबते थे कि राष्ट्रगान के लिए आँखें न खुलती थीं | वह प्रार्थना आज भी
कंठस्थ है -
वह शक्ति हमें दो दयानिधे, कर्त्तव्य मार्ग पर डट जावें।
पर-सेवा पर-उपकार में हम, जग(निज)-जीवन सफल बना जावें॥
॥वह शक्ति हमें दो दयानिधे...॥
हम दीन-दुखी निबलों-विकलों के सेवक बन संताप हरें।
जो हैं अटके, भूले-भटके, उनको तारें खुद तर जावें॥
॥वह शक्ति हमें दो दयानिधे...॥
छल, दंभ-द्वेष, पाखंड-झूठ, अन्याय से निशिदिन दूर रहें।
जीवन हो शुद्ध सरल अपना, शुचि प्रेम-सुधा रस बरसावें॥
॥वह शक्ति हमें दो दयानिधे...॥
निज आन-बान, मर्यादा का प्रभु ध्यान रहे अभिमान रहे।
जिस देश-जाति में जन्म लिया, बलिदान उसी पर हो जावें॥
॥वह शक्ति हमें दो दयानिधे ||
प्रार्थना..राष्ट्रगान और भारतमाता की जय के बाद पहली कक्षा हिन्दी की होती थी | रहीम
और कबीर के दोहे हम स-स्वर गा कर याद किया करते थे | तब हमें लेश मात्र भी ये ज्ञान
नही था कि ये दोहा छंद है और इसमें चार चरण और १३-११ की मात्राएँ भी होती हैं | बिना
किसी मात्रिक ज्ञान के ही हमने काबीर और रहीम के सारे दोहे उसी समय रट लिए थे जो
आज भी काम आ रहे हैं |
‘रूठ के बैठा चाँद एक दिन माता से यह बोला’..’यदि होता किन्नर नरेश मैं’..’उठो लाल अब
आँखें खोलो’ आदि कवितायें आज ढूढें नहीं मिलतीं पर मैं आज तक नहीं भूली | ये तो रही मेरे
बालपन की बात जो आज के दौर में बहुत पीछे छूट हाई है |
एक समय था, जब बच्चों को पाँच वर्ष के बाद ही विद्यालय भेजा जाता था विद्याध्ययन के
लिए |पर आज ऐसा नहीं है | आज के सामय में अगर बच्चा ढाई या तीन वर्ष की उम्र में
विद्यालय नहीं गया तो वह अपनी शिक्षा की दौड़ में पिछड़ जाता है; ऐसा माना जाता है |
क्यों कि आज की शिक्षा विद्याध्ययन के लिए नहीं बल्कि धनार्जन के लिए ली और दी जा
रही है | इस लिए आज माता-पिता अपने नन्हें-नन्हें बच्चों की पीठ पर शिक्षा का भारी बोझ
लाद कर स्कूल भेज देते हैं | परन्तु जो बात आज भी एक-सी है, वह है; वो पहली प्रार्थना जो
बच्चा पहले दिन ही हाथ जोड़ कर खड़ा हो जाता है गाने ले लिए, भले ही भाषा कोई भी हो
| यहीं उसका परिचय होता है स्कूल के पहले छंद से फिर धीरे-धेरे वह सीखने लगता है |

कक्षा में जब अध्यापिका गा-गा कर, ‘तितली रानी इतने सुन्दर पंख कहाँ से लायी हो’ ..
‘चुहिया रानी बड़ी सयानी’..’मछली जल की रानी है’ आदि कविताएँ बच्चे को सुनाती है तो
बच्चा भी सुर में सुर मिलाता है और यूँ ही वह मात्रा, यति, गति, तुक, विराम के ज्ञान के
बिना भी छंदों को आत्मसात करता हुआ आगे बढ़ने लगता है |
कहने का तात्पर्य ये कि बाल मन में सीखने की तीव्र इच्छा होती है, ललक होती है |
समस्या तब आती है जब शिक्षक उसे व्याकरण के आधार पर सिखाने का प्रयास करते हैं
तब सीखना बच्चे के लिए कठिन हो जाता है | जहाँ सुर है..लय है वहीँ छंद है | बच्चे को
यदि लालित्यपूर्ण ढंग से सिखाने का प्रयास किया जाय तो बालपन का सीखा हुआ आजीवन
नहीं भूलता |
बाल शिक्षा में छंदों का प्रभाव
अभी तक मैं यही कहने का प्रयास कर रही थी कि बाल शिक्षा में छंदों कितना गहरा प्रभाव
है यदि उसे हम लालित्यपूर्ण ढंग से सिखाते हैं तो वह आसानी से सब सीखता है | एक बच्चे
को सीधे तौर पर हम नहीं सिखा सकते कि छन्द कितने प्रकार के होते हैं और उसके पहचान
क्या-क्या है ? बच्चा ऊब जाएगा और उसके लिए सीखना बोझिल हो जाएगा | विद्यालय
जाने से कतराने लगेगा | इस लिए आज शिक्षक और माता-पिता दोनों का दायित्व बढ़ जाता
है | शिक्षा बच्चे का सर्वांगीण विकास करती है परन्तु आज की शिक्षा केवल व्यवसायिक हो
कर रह गयी है | विद्यालय में ढेर सारा कक्षा कार्य और घर में शिक्षक का दिया हुआ गृह
कार्य करने में ही बच्चे का पूरा दिन व्यतीत हो जाता है और वह रोबोट या रट्टू तोता बन
कर रह जाता है |
नैतिक..सामजिक और मानसिक प्रभाव
वैसे तो सीखने की कोई उम्र नहीं होती परन्तु बालपन में जो हम सीखते हैं; मन पर उसका
प्रभाव हमेशा बना रहता है | बच्चे की प्रथम शिक्षा घर पर ही आरम्भ होती है जब वह
विद्यालय में औपचारिक शिक्षा ग्रहण करने जता है तब वह एक व्यक्तित्व के साथ जाता है
जो उसकी अनौपचारिक शिक्षा का परिणाम होता है | यदि घर और विद्यालय में बच्चों को
छंदों के माध्यम से प्रकृति का ज्ञान कराया जाय तो वह आसानी से अपने को प्रकृति से जोड़
सकेगा | आज जो पर्यावर का भीषण संकट उत्पन्न हुआ है उसके बारे में अगर हम उन्हें
छंदों के माध्यम से समझाएं तो वह आसानी से समझेंगे कि जल और वायु उनके लिए क्या
महत्व रखते हैं, वृक्ष उनके लिए क्यों उपयोगी हैं, नदियाँ उनके जीवन को किस तरह
प्रभावित करती हैं ! आज वह समय आ गया है कि इन बातों से बच्चे बाल्यकाल से ही
परिचित हों | इन सब बातों का ज्ञान उन्हें किसी भारी-भरकम तकनीकी के माध्यम से नहीं
बल्कि छंदों के माध्यम से उनको दिया जा सकता है | इस बात को अभिभावक और शिक्षक
दोनों को गम्भीरता से समझना होगा |

आज समाज में स्त्री हिंसा, भ्रष्टाचार, चोरी, बलात्कार आदि विभिन्न प्रकार की बुराइयाँ बढ़ती
जा रहीं हैं उसके बारे में भी यदि छन्दों के माध्यम से बच्चों को बताया जाय कि कैसे इनसे
दूर रहना है तो बच्चे आसानी से समझ सकेगें | बचपन में ही उनके मन में इन बुराइयों से
दूर रहने की प्रवृत्ति जागेगी और यही बच्चे कल सच्चे और इमानदार नागरिक के रूप में एक
स्वस्थ समाज और राष्ट्र के निर्माण में सहायक होंगे | आज विद्यालयों में नैतिक शिक्षा पर
विशेष ध्यान नहीं दिया जाता है जो कि आज के समय में अति आवश्यक है |
अंत में इतना ही कहूँगी कि बाल शिक्षा में छंदों का विशेष महत्व है | कहते हैं कि बालपन
की सीख ही एक बच्चे की आगे की सोच तय करती है इस लिए अभिभावक और शिक्षक
दोनों को इस ओर विशेष ध्यान देना होगा | बच्चे को ये समझाना होगा कि वह प्रकृति,
समाज और राष्ट्र का ऋणी है और उसे ये ऋण भविष्य में प्रकृति का संरक्षण व समाज और
राष्ट्र के प्रति ईमानदार हो कर उतारना है | ये सारी महत्वपूर्ण बातें बड़ी आसानी से छंदों के
माध्यम से बच्चों के मन-मस्तिष्क में बैठाया जा सकता है | कहते हैं ना कि एक बच्चा आगे
चल कर कैसा नागरिक बनेगा इसकी नींव बचपन में ही पड़ जाती है और इस नींव को
मजबूत करने में छन्दों का विशेष योगदान है | बाल शिक्षा में छंद उतना ही महत्व रखता है
जितना कि मृत्य शैय्या पर पड़े हुए व्यक्ति के लिए साँसें | ऐसा मेरा मानना है |
मीना धर
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परिचय
नाम- मीना धर
कार्य – अध्यापन, स्वतंत्र लेखन
शिक्षा- कानपुर यूनिवर्सिटी, हिन्दी से परास्नातक
रूचि- संगीत सुनना, साहित्यिक कर्यक्रमों में भाग लेना , किताबें पढना , प्राकृतिक स्थलों
पर घूमना .
'अंतर्मन ' ब्लॉग का सफल संचालन ,
प्रकाशित कृति – (साझा संग्रह)-‘अपना-अपना आसमा’, ‘सारांश समय का’, ‘जीवन्त
हस्ताक्षर-2’, ‘काव्य सुगंध भाग-2’, ‘सहोदरी सोपान-2’, ‘जीवन्त हस्ताक्षर-3’ ‘लघुकथा
अनवरत’ और ‘जीवंत हस्ताक्षर -4’
‘लमही’, ‘हिन्दुस्तान’, ‘जागरण’, ‘कथाक्रम’ विश्वगाथा, भाषा-भारती, ‘निकट’, उत्तर प्रदेश
सरकार की पत्रिका ‘उत्तर-प्रदेश’ व भारत सरकार की पत्रिका ‘इन्द्रप्रस्थ भारती’ समहुत
आदि अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ व कविताएँ प्रकाशित होती रहती हैं ,
विभिन्न ई -पत्रिकाओं और ब्लॉग परभी रचनाएँ प्रकाशित हुईं हैं .
सम्मान - शोभना वेलफेयर सोसायटी द्वारा-शोभना ब्लॉग रत्न सम्मान 2012, माण्डवी
प्रकाशन द्वारा 2014 में ‘साहित्यगरिमा’, अनुराधा प्रकाशन से ‘विशिष्ट हिन्दी सेवी’ सम्मान

तथा ‘विश्व हिन्दी संस्थान कल्चरल आर्गेनाइजेशन,कनाडा द्वारा उपन्यास ‘खट्टे-मीठे रिश्ते’
में रचना धर्मिता के लिए सम्मान 2015 प्राप्त हुआ और कहानी ‘शापित’ 92.7 big fm
द्वारा सम्मानित हुई ..
ई - मेल आईडी-- meenadhardwivedi1967@gmail.com
फोन-0 9838944718
पता-
मीना पाठक
437, दामोदर नगर, बर्रा,
कानपुर-208027

(U.P.)

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