गुरुवार, 29 अक्तूबर 2015

vyatirek alankar

अलंकार सलिला: २६ 


व्यतिरेक अलंकार 
*



















*
हिंदी गीति काव्य का वैशिष्ट्य अलंकार हैं. विविध काव्य प्रवृत्तियों को कथ्य का अलंकरण मानते हुए 

पिंगलविदों ने उन्हें पहचान और वर्गीकृत कर समीक्षा के लिये एक आधार प्रस्तुत किया है. विश्व की 

किसी अन्य भाषा में अलंकारों के इतने प्रकार नहीं हैं जितने हिंदी में हैं.




आज हम जिस अलंकार की चर्चा करने जा रहे हैं वह उपमा से सादृश्य रखता है इसलिए सरल है. उसमें 



उपमा के चारों तत्व उपमेय, उपमान, साधारण धर्म व वाचक शब्द होते हैं.


उपमा में सामान्यतः उपमेय (जिसकी समानता स्थापित की जाये) से उपमान (जिससे समानता 



स्थापित की जाये) श्रेष्ठ होता है किन्तु व्यतिरेक में इससे सर्वथा विपरीत उपमेय को उपमान से भी श्रेष्ठ 

बताया जाता है.

श्रेष्ठ जहाँ उपमेय हो, याकि हीन उपमान. 
अलंकार व्यतिरेक वह, कहते हैं विद्वान..


तुलना करते श्रेष्ठ की, जहाँ हीन से आप. 
रचना में व्यतिरेक तब, चुपके जाता व्याप..



करें न्यून की श्रेष्ठ से, तुलना सहित विवेक. 
अलंकार तब जानिए, सरल-कठिन व्यतिरेक..
उदाहरण:

१. संत ह्रदय नवनीत समाना, कहौं कविन पर कहै न जाना. 
निज परताप द्रवै नवनीता, पर दुःख द्रवै सुसंत पुनीता..    - तुलसीदास (उपमा भी)

यहाँ संतों (उपमेय) को नवनीत (उपमान) से श्रेष्ठ प्रतिपादित किया गया है. अतः, व्यतिरेक अलंकार है.

२. तुलसी पावस देखि कै, कोयल साधे मौन. 
अब तो दादुर बोलिहैं, हमें पूछिहैं कौन..   - तुलसीदास (उपमा भी)

यहाँ श्रेष्ठ (कोयल) की तुलना हीन (मेंढक) से होने के कारण व्यतिरेक है.

३. संत सैल सम उच्च हैं, किन्तु प्रकृति सुकुमार..

यहाँ संत तथा पर्वत में उच्चता का गुण सामान्य है किन्तु संत में कोमलता भी है. अतः, श्रेष्ठ की हीन से तुलना होने के कारण व्यतिरेक है.

४. प्यार है तो ज़िन्दगी महका
हुआ इक फूल है ! 
अन्यथा; हर क्षण, हृदय में 
तीव्र चुभता शूल है !     -महेंद्र भटनागर

यहाँ प्यार (श्रेष्ठ) की तुलना ज़िन्दगी के फूल या शूल से है जो, हीन हैं. अतः, व्यतिरेक है.

. धरणी यौवन की
 सुगन्ध से भरा हवा का झौंका -राजा भाई कौशिक

६. तारा सी तरुनि तामें ठाढी झिलमिल होति.
    मोतिन को ज्योति मिल्यो मल्लिका को मकरंद.

    आरसी से अम्बर में आभा सी उजारी लगे

    प्यारी राधिका को प्रतिबिम्ब सो लागत चंद..--देव 

७. मुख मयंक सो है सखी!, मधुर वचन सविशेष 

८. का सरवर तेहि देऊँ मयंकू, चाँद कलंकी वह निकलंकू  

९. नव विधु विमल तात! जस तोरा, उदित सदा कबहूँ नहिं थोरा (रूपक भी) 

१०. विधि सों कवि सब विधि बड़े, यामें संशय नाहिं 
     
     खट रस विधि की सृष्टि में, नव रस कविता मांहि

११. अवनी की ऊषा सजीव थी, अंबर की सी मूर्ति न थी 

१२. सम सुबरन सुखमाकर, सुखद न थोर 
     
     सीय-अंग सखि! कोमल, कनक कठोर

१३. साहि के सिवाजी गाजी करयौ दिल्ली-दल माँहि, 

                                          पाण्डवन हूँ ते पुरुषार्थ जु बढ़ि कै 

     सूने लाख भौन तें, कढ़े वे पाँच रात में जु, 

                               द्यौस लाख चौकी तें अकेलो आयो कढ़ि कै 

१४. स्वर्ग सदृश भारत मगर यहाँ नर्मदा वहाँ नहीं 

     लड़ें-मरें सुर-असुर वहाँ, यहाँ संग लड़ते नहीं  - संजीव वर्मा 'सलिल'

***

कोई टिप्पणी नहीं: