मंगलवार, 3 जुलाई 2018

सड़गोड़ासनी

बुंदेली छंद:
सड़गोड़ासनी 
शुभ प्रभात 
*
सूरज नील गगन से झाँक 
शुभ-प्रभात कहता है।
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उषा-माथ सिंदूरी सूरज
दिप्-दिप्-दिप् दहता है।
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धूप खेलती आँखमिचौली,
पवन हुलस बहता है।
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चूँ-चूँ चहक रही गौरैया, 
आँगन सुख गहता है।
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नयनों से नयनों की बतियाँ, 
बज कंगन तहता है।
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नदी-तलैया देख सूखती
घाट विरह सहता है।
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पत्थर की नगरी में यारों! 
सलिल-ह्रदय रहता है।
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(टीप: सड़गोड़ासनी बुंदेली बोली का छंद है. मुखड़ा १५-१२ मात्रिक, चार मात्रा पश्चात् गुरु-लघु आवश्यक, अंतरा १६-१२,तथा मुखड़ा-अंतरा समतुकांती होते हैं. इस छंद को आधुनिक हिंदी खड़ी बोली में प्रस्तुत करने के इस प्रयास पर पाठकों की राय आमंत्रित है. अन्य देशज बोलिओं के छंद रचना विधान सहित हिंदी में रचे जाएं तो उन्हें अपने 'छंद कोष' में सम्मिलित कर सकूँगा
२.७.२०१८, ७९९९५५९६१८

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