मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

navgeet

नवगीत
दिन दहाड़े
.
दिन दहाड़े लुट रही
इज्जत सड़क की
.
जन्म से चाहा
दिखाकर राह सबको
लक्ष्य तक पहुँचाए
पर पहुँचा न पाई.
देख कमसिन छवि
भटकते ट्रक न चूके
छेड़ने से, हॉर्न
सीटी भी बजाई.
पा अकेला ट्रालियों ने
रौंद डाला-
बमुश्किल रह सकी
हैं श्वासें धड़कती.
सेल्फ़ी लेती रही
आसें गुजरती.
.
जो समझ के धनी
फेंकें रोज कचरा
नासमझ आकर उठा
कुछ अश्रु पोंछें.
सियासतदां-संत
फ़ुसला, बाँह में भर
करें मुँह काला
ठठाकर रौंद भूले.
काश! कुछ भुजबल
सड़क को मिल सके तो
कर नपुंसक दे उन्हें
इच्छा मचलती.
बने काली हो रही
इच्छा सड़क की.
.
भाग्य चमके
भूलते पगडंडियाँ जो
राजपथ पा गली
कुलियों को न हेरें.
जनपथों को मसल-
छल, सपने दिखाते
लूट-भोगें सुख, न
लेकिन हैं अघाते.
भाग्य पलटे, धूल
तख्तो-ताज लोटे
माँ बनी उनकी
चुपाती, खुद सिसकती.
अनाथों की नाथ है
छवि हर सड़क की.
***
संजीव, ९४२५१८३२४४ 
salil.sanjiv @gmail.com
#हिन्दी_ब्लॉगर, www.divyanarmada.in 

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