शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

दोहा दुनिया

दोहा दुनिया
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शिव न जोड़ते श्रेष्ठता,
शिव छोड़ते त्याज्य.
बिछा भूमि नभ ओढ़ते,
शिव जीते वैराग्य.
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शिव सत् के पर्याय हैं,
तभी सती के नाथ.
अंग रमाते असुंदर,
सुंदर धरते माथ.
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शिव न असल तजते कभी,
शिव न नकल के साथ.
शिव न भरोसे भाग्य के,
शिव सच्चे जग-नाथ.
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शिव नअशिव से दूर हैं,
शिव न अशिव में लीन.
दम्भ न दाता सा करें
कभी न होते दीन.
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शिव ही मंगलनाथ हैं
शिव ही जंगलनाथ.
जंगल में मंगल करें,
विष-अमृत ले साथ.
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शिव सुरारि-असुरारि भी,
शिव त्रिपुरारि अनंत.
शिव सचमुच कामरि हैं,
शिव रति-काम सुकंत.
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शिव माटी के पूत हैं,
शिव माटी के दूत.
माटी-सुता शिवा वरें,
शिव अपूत हो पूत.
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शिव असार में सार हैं,
शिव से है संसार.
सलिल शीश पर धारते,
सलिल शीश पर धार.
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शिव न साधना लीन हों,
शिव न साधना-मुक्त.
शिव न बाह्य अन्तर्मुखी,
शिव संयुक्त-विमुक्त.
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संजीव
8.12.2017

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