मंगलवार, 26 मई 2009

काव्य-किरण

क्षणिकाएँ

सरला खरे, भोपाल

जब देश पर विपत्ति आएगी

तब काम आएगा

विदेशी बैंकों में

संचित किया धन॥

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देश जूझ रहा है,

मंदी की मार है.

सकल देश में

चुनाव की बहार है॥

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क्या पियेंगे पानी?

कैसे कटेंगी रातें?

बिन पानी सब सून।

बिन बिजली सब अँधेरा॥

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पहले भी थे मंत्री,

सरकार भी थी जोरदार।

आगे भी आयेंगे,

ऐसे ही कर्णधार?

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वादा है- छवि सुधारेंगे।

जिनसे वोट खरीदे है,

उन्हीं को तो तारेंगे॥

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3 टिप्‍पणियां:

M.M.Chatterji ने कहा…

rochak kshanikayen.

Pramod Jain ने कहा…

Pathneeya hain.

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

पोल खोलक भावनाएं
जो भावनाओं में ही
खनक पैदा कर दें