शनिवार, 16 दिसंबर 2017

दोहा दुनिया- शिव

शिव हैं हर्षित चंद्र से,
सज्जित कर निज शीश.
विकल पूर्णिमा मोहनी,
कहाँ जाऊँ हे ईश!
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मुदित चंद्र शिव शीश चढ़,
आभा रहा बिखेर.
देख सोम भूषण उमा,
हर्षित हुईं अबेर.
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सुधा लिए शशि, नाग विष,
शिव को दोनों काम्य.
विरति और रति में रखें,
आशुतोष नित साम्य.
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जगत्पिता जंगल बसे,
मनुज मूढ़ मत काट.
जगजननी पर्वतसुता,
खोद न पर्वत-घाट.
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शिव को प्रिय जलधार है,
जल से उमा प्रसन्न.
जो जल को गंदा किया,
समझ विपद आसन्न.
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