शनिवार, 18 अगस्त 2018

ॐ doha shatak avinash beohar


दोहा शतक
खोटे सिक्के चल रहे



















अविनाश ब्यौहार
जन्म: २८.१०.१९६६, उमरियापान, जिला कटनी, मध्य प्रदेश।
आत्मज: श्रीमती मीरा ब्यौहार-श्री लक्ष्मण ब्यौहार।
जीवन संगिनी:
काव्य गुरु: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'।
लेखन विधा: दोहा, काव्य, व्यंग्य आदि।
प्रकाशन: अंधा पीसे कुत्ते खाएँ व्यंग्य काव्य संग्रह, पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ।
उपलब्धि: गुरु का आशीष।
संप्रति: व्यक्तिगत सहायक महाधिवक्ता कार्यालय, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय जबलपुर। 
संपर्क: राॅयल स्टेट काॅलोनी, कटंगी रोड, माढ़ोताल जबलपुर ।
चलभाष: 9826795372, 9584015234
ईमेल: a1499.9826795372@gmail.com
*
अविनाश ब्योहार दोहा दुनिया में निरंतर गतिशील हैं। वे दोहा के शिल्प और भाषा की समझ रखते हैं। कथ्य को दोहा में ढालने का बौद्धिक व्यायाम उन्हें मनोरंजन की तरह प्रिय है। शहरों में बढ़ती आधुनिकता, नष्ट होती हरियाली, अंधानुकरण करते गाँव और लुप्त होती परंपरा  की छाँव की त्रासदी को अविनाश ने धूप के माध्यम से रूपायित किया है:
शहर आधुनिक हो गये, पीछे-पीछे गाँव।
धूप न खोजे पा सके, थककर थोड़ी छाँव।।
युग-परिवर्तन के साथ आरहे मांगलिक बदलावों में से एक बेटी-बेटे में समानता का विचार है जो सतत पल्लवित-पुष्पित हो रहा है: 
बेटे-बेटी में रहा, अब न जरा भी फर्क।
भेद-भाव जो कर रहा, उसका बेड़ा गर्क।।
ग्राम और शहर से एक साथ जुड़ने का अवसर पाकर अविनाश जी अपने दोहों में दोनों को सहेजते हैं। फसलों के पकाने और अमराई में आम आने के साथ तोतों का सहगान उन्हें संसद में उठने वाले शोर की याद दिलाता है: 
झूमी फसलें खेत में, महक रही है बौर।
अमराई संसद बनी, है तोतों का शोर।।
संसार को माया कहना और फी उसी में रमे रहना, यह दोहरा आचरण दोहाकार को कहलाता है। नदी की धार और घाट के माध्यम से सच-झूठ की मरीचिका को इंगित किया गया है:
रिश्ते-नाते झूठ हैं, फिर सच क्या है यार।
पूछ रही तट-घाट से, बह नदिया की धार।।
राजनीति में बढ़ती मूल्यहीनता से सामान्य देशवासियों की तरह अविनाश जी भी चिंतित हैं। अवसरवादी नेताओं की सत्ताप्रियता और सफलता दोनों पर व्यंग्य करता यह दोहा खीसें निपोरना और खोटे सिक्के चलने जैसे मुहावरों का सार्थक प्रयोग  अविनाश की सामर्थ्य का संकेत करता है- 
फूट डालकर पा रहे, सत्ता यहाँ खबीस।
खोटे सिक्के चल रहे, खरे निपोरें खीस।।
अविनाश के दोहे 'पूत के पाँव पलने में दीखते हैं' कहावत को चरितार्थ करते हैं। जैसे-जैसे वे दोहा लेखन में आगे बढ़ेंगे, उनकी कलम  की धार अधिकाधिक पैनी होती जाएगी। 
*
बने रहेंगे फासले, बना रहेगा प्यार।
साझे की खेती बुरी, साझे का व्यापार।।
आग बबूला हो गया, जेठ मास में सूर्य।
इस मौसम में क्या बजे, हरियाली का तूर्य।।
नदिया दुबली हो गई, सूख गया है नीर।
कब तक अंबुद घिरेंगे, धरणी हुई अधीर।।
बंधु-बहिन दो फूल हैं, बगिया है परिवार।
रक्षाबंधन पर्व है, ईश्वर का उपहार।।
दीवाली त्यौहार में, चहुं दिश है उजियार।
अँधियारे भी रीझते, दीपक पर सौ बार।।
नाते कडुवाहट भरे, नहीं किसी से मेल।
भटकन पाॅंवों से बँधी, पकड़ न पाए रेल।।
कोयल कुहके बाग में, जंगल मिले हुलास।
मधु़ऋतु में होने लगा, मीठा सा अहसास।।
बेटे-बेटी में रहा, अब न जरा भी फर्क।
भेदभाव जो कर रहा, उसका बेड़ा गर्क।।
रंग भौजियों के दिए, देवर जी ने गाल।
होली के त्यौहार में, पुलकित रंग-गुलाल।।
धान रोपते गा रहे, बनिहारे मिल गीत।
फसल लहलहा रही है, हुई कृषक की जीत।।
झूमी फसलें खेत में, महक रही है बौर।
अमराई संसद बनी, है तोतों का शोर।।
जाड़ा ऐसा पड़ रहा, काॅंप रहा है संसार।
सूरज चंदा सा लगे, बुझते ज्यों अंगार।।
कोहरे में डूबी सुबह, सूरज अंतर्ध्यान।
हाड़ कंपाती ठंड है, कुछ दिन की मेहमान।।
गरमी में ऐसा लगे, दिनकर उगले आग।
पोखर; नदिया; ताल के, फूट गये हैं भाग।।
रिश्ते-नाते  झूठ हैं, फिर सच क्या है यार।
पूछ रही तट-घाट से, बह नदिया की धार।।
अमराई की गंध से, मौसम है मदहोश।
कोयल कूकी बाग में, तब आया है होश।।
दफ्तर का बाबू हुआ, ज्यों अफसर का खास।
ले-दे यह मालिक हुआ, वह है इसका दास।।
स्वाभिमान मत छोड़ना, स्याने देते सीख।
हाकिम क्या जो माँगता, हाथ पसारे भीख।।
मौसम ऐसा खुशनुमा, नृत्य कर रहे मोर।
मेहा रिमझिम बरसते, है गर्जन का शोर।।
गरमी में काँटा नदी, वर्षा में फुँफकार।
डरा कहे बचकर रहो, शरद-बाँटती प्यार।।
रितु करती ऋतुराज का, फूलों से श्रृंगार।
भौंरें गुन-गुन कर रहे, सुना मंगलाचार।।
रूप मनोहर देखकर, मन है भाव-विभोर।
जन्म-जन्म के मीत हम, जैसे चाँद-चकोर ।।
कानों में रस घोलती, मधुकर की गुंजार।
कली-कली सुन डोलती, नाचे मुग्ध बहार।।
अमराई गंधों भरी, गंधों भरे मधूक।
मन को भाती जा रही, है कोयल की कूक।।
फूट डालकर पा रहे, सत्ता यहाँ खबीस।
खोटे सिक्के चल रहे, खरे निपोरें खीस।।
कलयुग में मिल रहे हैं, गिरगिट जैसे यार।
छुरा पीठ में भौंकते, कर जीवन दुश्वार।।
हैं अमावसी रात के, जुगनू जी सरताज।
तारे भी शर्मा रहे, इनके आगे आज।।
आया ऐसा दौर कि, जोबन है बेकार।
श्याम सफेदी देखती, शीशा बारंबार।।
प्रजातंत्र में भी लगे, रहे गुलामी-झेल।
शासन दुःशासन हुआ, उठा-पटक है खेल।।
राजनीति व्यभिचारणी, करे न कोई फर्क।
शर-शैया पर सो रहे, सच के तर्क-वितर्क।।
आमदनी है अठन्नी, खर्च रूपैया रोज।
तांडव करती गरीबी, कर्जा करता भोज।।
बगिया में हँस खिल रहा, इठला सुर्ख कनेर।
सबसे हिल-मिलकर रहे, ऋतु-परिवर्तन हेर।।
बड़े बुजुर्गों से लगे, पीपल-बरगद पेड़।
देते हैं छाया घनी, बता रही है मेड़।।
है पलाश वन दहकता, ज्यों जल रहा अलाव।
लाली देखी आँख में, सेमल दाबे पाँव।।
काला-काला रंग है, मिसरी से मधु बोल।
चातक-कोयल स्वर मधुर, सुन दिल जाता डोल।।
काँव-काँव कर टेरता, बैठा काग मुंडेर।
पाहून कोइ आ रहा, घर पर देर सबेर ।।
प्रजातंत्र में बन गया, ले खा ही इतिहास।
जेब गर्म जो करेगा, वही बनेगा खास।।
दिल्ली के दरबार में, नेताओं की भीड़।
जनहित-पंछी खोजता, केवल अपना नीड़।।
राजनीति कुल्टा हुई, काले धन से यार।
कितना भी धोओ इसे, सारा श्रम बेकार।।
शहर आधुनिक हो गये, पीछे-पीछे गाँव।
धूप न खोजे पा सके, थककर थोड़ी छाँव।।
इस मिथ्या संसार की, टकसाली हर बात।
रोज सुनहरी भोर हो, रोज चाँदनी रात।।
अँधियारे की दौड़ में, गया उजाला छूट ।
अंधाधुंध कटाई से, वृक्ष-वृक्ष है ठूॅंठ।। 
पतझड़ की ऋतु आई है, झरने लगे चिनार।
ऐसे मोहक दृष्य लख, सब गम जाते हार।।
गपबाजों के शहर में, हम क्या हाॅंके डींग ।
ईमाॅं बचा लिया अगर, समझो खरहा-सींग ।।
एक भयावह रात थी, आंखों में थे ख्वाब।
अलग हो गये इस तरह, ज्यों गायब सुर्खाब।। 
अटल, अटल थे, अटल ही, है उनका यश-मान।
ऐसे काल पुरुष न अब मिल पाते; लें मान।।
धनपतियों ने थाम ली, अब शासन की डोर ।
जन-प्रतिनिधि बन गए हैं, एक नंबरी चोर ।।४७
नेतागण मक्कार हैं, सच्चा मिला न एक।
पावन आत्मा देश की, जार जार है रोई ।।
व -ुनवजर्याा ऐसी हो रही, मेघ करें जलदान ।
कुदरत का ये खेल है, मान ले रे इन्सान ।।



कोई टिप्पणी नहीं: