बुधवार, 1 अगस्त 2018

२०.२.२०१८
आ जाओ सब भूलकर, दिल में शेष न सब्र।
आस टूटकर श्वास की, बना नहीं दे कब्र।।
लय सांचे में ढालिए, मन की बात विचार।
दोहा बनता खुद-ब-खुद, हों न तनिक बेज़ार।।
शुभ प्रभात अरबों लुटा, कहो रहो बेफिक्र। चौकीदारी गजब की, सदियों होगा जिक्र।।
दोहों की महिमा अमित, कहते युग का सत्य
जो रचता संतुष्ट हो, मंगलकारी कृत्य
धरती मैया निरुपमा, धरती रूप अनूप
कभी किसी की कब हुई?, जीत मर गए भूप .
२६.२.२०१८
होली फागुन पर हुई, दोहों की बौछार। तन-मन दोनों मुदित हो, निरखें नेह-बहार।।
निरुपमा उपमान पा, उपमा को ले संग। भांग भवानी कर ग्रहण, नाच बजाती चंग।।
सजन दूर मन खिन्न है, लिखना लगता त्रास।
सजन निकट कैसे लिखूँ, दोहा हुआ उदास।।


दोहा मुक्तिका
*
खुद से खुद मिलते नहीं, जो वे हैं मशहूर।
हुए अकेले मर गए, थे कमजोर हुजूर।।
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जिनको समझा था निकट, वे ही निकले दूर।
देख रहा जग बदन की, सुंदरता भरपूर।
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मन सुंदर हो, सबल हो, लिए खुदाई नूर।
शैफाली सा महकता, पल-पल लिए सुरूर।।
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नेह नर्मदा 'सलिल' है, निर्मल विमल अथाह।
शिला संग पर रह गई, श्यामल हो मगरूर।।
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कल न गंवाएं व्यर्थ कर, कल की चिंता आप।
दोहा-पुष्पा सुरभि से, दोहा दुनिया मस्त
दोस्त न हो दोहा अगर, रहे हौसला पस्त.
किलकिल तज कलकल करें, रहें न खुद से दूर।।
कथ्य, भाव, लय, बिंब, रस, भाव, सार सोपान।
ले समेट दोहा भरे, मन-नभ जीत उड़ान।।


संजीव






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