गुरुवार, 16 अगस्त 2018

ॐ दोहा शतक मनोज कुमार शुक्ल

ॐ 
मन विश्वास जगाइए  
दोहा संकलन
























मनोज कुमार शुक्ल ‘मनोज’

जन्म: १६  अगस्त १९५१ जबलपुर, मध्य प्रदेश। 
आत्मज:  स्व. नर्मदा देवी-स्व. रामनाथ शुक्ल ‘श्री नाथ’ 
जीवन संगिनी: श्रीमती ममता शुक्ला। 
शिक्षा:  एम.काम.
लेखन विधा: कविता, कहानी, निबंध, व्यंग्य आदि
प्रकाशन: कहानी संग्रह- क्रांति समर्पण, एक पाव की जिंदगी, काव्य संग्रह- संवेदनाओं के स्वर, याद तुम्हें मैं आऊॅंगा
संप्रति:  सेवा निवृत सहायक प्रबंधक विजया बैंक 
उपलब्धि: अनेक संस्थाओं से सम्मान व अलंकरण।दूरदर्शन एवं आकाशवाणी से प्रकाशन।  
विशेष: टोरंटो कनाडा में सम्मानित तथा हिंदी प्रचार-प्रसार हेतु समर्पित।  
संपर्क: आशीष दीप, ५८ उत्तर मिलौनीगंज, जबलपुर ४८२००२ मध्य प्रदेश   
चलभाष: ९४२५८६२५५० 
ई मेल: mkshukla४८@gmail.com
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हिंदी साहित्य सृजन की विरासत को मन-प्राण से सम्हालकर अपने यशस्वी पिता स्व. रामनाथ शुक्ल ‘श्री नाथ’ के रचनाकर्म को प्रकाश में लाने के पश्चात आप भी हिंदी साहित्य संवर्धन के प्रति समर्पित रहनेवाले मनोज शुक्ल 'मनोज' मूलत: कहानीकार हैं। कहानी तथा कविता के पश्चात दोहा से जुड़ाव का सुपरिणाम यह कि वे विविध प्रसंगों पर दोहा-कथा रच रहे हैं। यह प्रयोग बाल-शिक्षा हेतु उपयोगी हो सकता है। मनोज जी सृष्टि के रंगमंच पर श्वेत-श्याम का समायोजन देखते हैं- 
रंगमंच सा लग रहा, दुनिया का यह मंच।
कुछ करते हैं साधना, कुछ खल रचें प्रपंच।।
शीम्द्भाग्वाद्गीता का कर्म सन्देश 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन' को आत्मसात कर मनोज जी कर्मठ को ही उन्नति का मूल मानते हैं- 
कर्मठता इंसान को, करे शिखर-आसीन।
जीवन की खुशियाँ सभी, मिलें न बनिए दीन।।
ग्राम्यांचलों में चल रही परिवर्तन की हवा को देखकर बूढ़ी होती होती पीढ़ी की हैरानी को बरगद के माध्यम से मनोज जी ने बखूबी व्यक्त किया है-
बूढ़ा बरगद देखता, चौपालों की शाम।
कैसी हवा बदल रही, जीना हुआ हराम।।
इस काल में धन के प्रति बढ़ते अंध मोह ने आम जन स एलेकर नेता, धनपतियों और अधिकारीयों तक को ग्रास लिया है। दोहाकार धन को निस्सार नहीं मानता किन्तु वह धन को सब कुछ भी नहीं स्वीकारता, उसके अनुसार धन और विद्या-विवेक साथ हों तभी मंगलदायी होते हैं-
होती लक्ष्मी चंचला, उसका कहीं न ठौर।
सरस्वती को साथ रख, सदा रहेगी भोर।।
शुभाशुभ के संयोग से बनी प्रकृति में भले-बुरे हमेशा हे रहे हैं। मनुष्य को स्वविवेक से सही-गलत की पहचान कर जीवन जीना होगा-
हर कोई ढोंगी नहीं, सब न करें प्रतिघात। 
मन विश्वास जगाइए, तभी कटेगी रात।।
मनोज जी दोहे मनरंजन नहीं, जीवन-मूल्यों के प्रति चिंतनकर विचार के मोती लेने-देने के उद्देश्य से लिखते हैं। उनके दोनों में व्यन्जनात्मकता या लक्षणात्मकता पर अमिधात्मकता को वरीयता सहज दृष्टव्य है। मनोज की सार्थक और सकारत्मक लेखन के आग्रही हैं। उनका उद्देश्य नई पीढ़ी का दिशा-दर्शन है। दोहा उनके लिए इस उद्देश्य पूर्ति का उपकरण है।  
*
आदिशक्ति दुर्गा बनी, जग की तारण हार।
जिनके तेज प्रताप से, संकट भगे हजार।। 

मन चंचल होता बहुत, पाखी सा उड़ दूर।
वश में जिसने कर लिया, हँसता वही हुजूर।।

रंगमंच सा लग रहा, दुनिया का यह मंच।
कुछ करते हैं साधना, कुछ खल रचें प्रपंच।। 

नाते- रिश्ते झगड़ते, पहुँचाते संताप।
आस कभी मत पालिये, सपने में भी आप।।

पाला-पोसा चल दिये, जिगर तोड़कर लाल।
आशाओं को लूटकर, बना गये कंगाल।।

लोभ-जाल में जब फँसे, मछली होती मौत।
मोह-जाल में फँस मनुज, पालें अपनी सौत।।

बचपन गुजरा खेल में, गई जवानी झूम।
खड़ा बुढ़ापा मोड़ पर, मौत ले रही चूम।।

उम्र फिसलती जा रही, ज्यों मुट्ठी से रेत।
झट तन यह चुक जाएगा, हो जायेगा खेत।।   

जब सुख की बरसात का, दिखे हो रहा अंत।
दुख को अंगीकार कर, बन जाओ तब संत।। 

कुछ खाएँ पूँजी सकल, फिर कहते हे राम।
कुछ माथे पर लिख रहे, कर्म करो अविराम।।

विमुख रहे जो कर्म से, सदा भोगते कष्ट।
कर्म किया जिसने सदा, वही रहे संतुष्ट।।

साहस कर आगे बढ़ो, चखते सुफल अनेक।
राह किनारे बैठकर, कौन बना है नेक।।

पास रहा जो खो गया, चिंता है बेकार।
शेष बचा जो सामने, उसकी करो सँभार।।  

कर्मठता श्रम- लगन में, छिपा हुआ है राज। 
इस पथ पर जो भी चला, बनते बिगड़े काज।।

बढ़ना है संसार में, चलो उठाकर माथ।
सारी दुनियाँ आपको, लेगी हाथों-हाथ।।

कर्मठता इंसान को, करे शिखर-आसीन।
जीवन की खुशियाँ सभी, मिलें न बनिए दीन।।

विपदाओं के सामने, कभी न मानें हार।
श्रम जीवन की संपदा, पहनाए मणिहार।।  

बिना कर्म के व्यर्थ है, इस जग में इंसान।
गीता की वाणी कहे, कर्म बने पहचान।। 

प्रभु की दया असीम है, जो चाहें लें आप।
काम करें निष्काम यदि, मिट जाए सब पाप।।

अपने अंदर झाँकिये, बसे मिलेंगे राम। 
मन-मंदिर में बालिए, दीपक उम्र तमाम।।

महल संपदा जोड़कर, व्यर्थ अकड़ते आज। 
जब भी  किस्मत रूठती, छिन जाते हैं ताज।।

जीवन में जब क्रोध के, उठने लगें गुबार।
समझो तब फिर हो रहे, कष्टों के दीदार।।  

कितने कंटक राह में, बिछे पड़े हैं आज।
कौन बुहारेगा उसे, गूँज रही आवाज।।

मन संवेदनशील हो, तो होता कल्यान। 
शांति बसे उर में सदा, दूर रहे अभिमान।।

दुर्गम पथ जब भी लगे, जीवन हो दुश्वार। 
प्रभु से लगन लगाइए, सभी  हटेंगे भार।।

जीवन की इस डोर को, थामे रखना नाथ।
चटक कहीं यदि टूटती, होते तभी अनाथ।। 

जीवन के हर मोड़ पर, चलना सरल न काम।
मंजिल पाने के लिये, चलते चल अविराम।।

जीवन में जब दुखों का, लग जाए अंबार।
निर्धन कुटिया-झाँकना, कम होंगे भंडार।।

मन के रोगी बहुत हैं, तन के कम हैं रोग।
मन को ही यदि साध लें, दुखी न होंगे लोग।।

शर्मिंदा होना पड़े, ऐसा करें न काम ।
मन को निर्मल ही रखें, सदा बढ़े अविराम।।  
*
नारी को अबला समझ, करें नहीं नर भूल।
वह सबला चुन शूल अब, बिछा रहि है फूल।।
नारी नर की खान है, नर नारी का मान।
जब मिलते तब जन्म लें, हर युग में भगवान।।  
विश्व शांति का पक्षधर, मानवता की शान।
आदि काल से है यही, भारत की पहिचान।।
वेद और उपनिषद में, विश्व शांति संदेश।
ज्ञान योग विज्ञान में, पारंगत यह देश।।
अवतारों की भूमि है, ऋषियों का यशगान।
भारतवासी साथ मिल, गाते मंगल गान।।
सिया-राम, राधा-किशन, हनुमत; गौतम बुद्ध। 
महावीर, नानक कहें, रखो आचरण शुद्ध
पवन मेघ गिरि वृक्ष जल, ईश्वर के उपहार।
धरा-प्रकृति-आराधना, भारत के त्यौहार।।  
सदियों से भारत रहा, बहु पंथों का देश।
गंग-जमुन सम मिल रहे, किया न किंचित क्लेश।।
हर संस्कृति पलती यहाँ, पाती है सम्मान।
आपस में मिलकर रहे, यही सही पहचान।।
मंत्र हमारा एक है, शांति शांति औ शांति।
कभी नहीं छा रहे, जग में कहीं अशांति।।
शुभ कार्यों में हम सदा, पढ़ते जग-हित मंत्र।
आव्हान सुख-शांति का, पूजन करते यंत्र।।
आजादी के बाद से, हुआ समुन्नत देश।

राष्ट्र संघ में छा रहा, भारत का गणवेश।। 
रानी दुर्गावती यश-कथा  
रानी दुर्गावती का, अमर नाम-इतिहास।
वीर पराक्रम शौर्य की, अमर दुंदुभी खास।।
पंद्रह सौ चौबीस में, कीर्ति पिता की शान।
दुर्गाष्टमी के पर्व पर, कन्या हुई महान।।
माँ दुर्गा का रूप थी, दुर्गावती सुनाम।
मात-पिता हर्षित हुए, माँ को किया प्रणाम।।
राजमहल में खेलकर, तरकश तीर कमान।
बच्ची बढ़ युवती हुई, सभी गुणों की खान।।
सुतवधु नृप संग्राम की, दलपत की थी जान।
चंदेलों की लाड़ली, गौंड़वंश की शान।।
दलपतशाह-निधन हुआ, थमी शासन-डोर।
सिंहासन पर बैठकर, पाई कीर्ति-अँजोर।।
किया सुशासन अभय हो, फैली कीर्ति जहान।
नन्हें वीर नारायण, में बस्ती थी जान।।   
शासन सोलह वर्ष का, रहा प्रजा में हर्ष।
जनगण का सहयोग ले, किया राज्य-उत्कर्ष।।
ताल तलैया बावली, खूब किये निर्माण।
सुखी प्रजा सारी रही, पा विपदा से त्राण।।
सोने की मुद्राओं से, भरा रहा भंडार।
योद्धाओं की चौकसी, अरि पर सतत प्रहार।।
हुए आक्रमण शत्रु के, विफल किये हर बार।
रणकौशल में सिद्धहस्त, थी सेना-सरदार।।
थे दीवान धार सिंह, हाथी सरमन साथ।
दुश्मन पर जब टूटते, शत्रु पीटते माथ।।
बाजबहादुर को हरा, किया नेस्तनाबूत।
बुरी नजर जिनकी रही, गाड़ दिया ताबूत।।  
अकबर को यश खल गया, करी फौज तैयार।
आसफखाँ सेना बढ़ा, आ धमका इस बार।।
समरांगण में आ गईं, हाथी पर आरूढ़।
रौद्ररूप को देखकर, भाग रहे अरि मूढ़।।
अबला को निर्बल समझ, आए थे शैतान।
वीर सिंहनी भिड़ गयी, धूल मिलाई शान।।
वीरों का था आचरण, डटी रही दिन रात।
भारी सेना थी उधर, फिर भी दे दी मात।।  
चौबिस जून घड़ी बुरी, आया असमय पूर। 
अरि-सेना नाला नरइ, घिर रानी मजबूर।।
तीर आँख में आ घुसा, तुरत निकाला खींच।
मुगल-सैन्य के खून से, दिया धरा को सींच।।
बैरन तोपें गरजतीं, दुश्मन-सैन्य अपार।
मुट्ठी भर सेना न पर, शत्रु पा सका पार।।
अडिग रही वीरांगना, अंत सामने जान।
शत्रु-सैन्य से घिर गई,किया आत्म-बलिदान।।  
गरज सिंहनी ने तभी, मारी आप कटार।
मातृभूमि पर जान दे, सुरपुर गई सिधार।। 
*
नन्हीं चिड़िया  
मैं कुर्सी पर बैठकर, देख रहा परिदृश्य।
मन संवेदित हो गया, मुझे भा गया दृश्य।।

नन्हीं चिड़िया डोलती, शयन कक्ष में रोज।
चीं-चीं करती घूमती, कुछ करती थी खोज।।

चीं-चीं कर चूजे उन्हें,  नित देते संदेश।
मम्मी-पापा कुछ करो, क्यों सहते हो क्लेश।।

नीड़ बना था डाल पर, जहाँ न पत्ते फूल।
झुलसाती गर्मी रही, जैसे तीक्ष्ण त्रिशूल।।

वातायन से झाँककर, देखा कमरा कूल।
ठंडक उसको भा गयी, हल खोजा अनुकूल।।

कूलर से खस ले उड़ी, वह नन्हीं सी जान।
तेज तपन से थी विकल, वह अतिशय हैरान।।

पहुँच डाल उसने बुना, खस-तृण युक्त मकान।
ग्रीष्म ऋतु में मिल गया, लू से उसे निदान।।

सब में यह संवेदना, प्रभु ने भरी अथाह।
बोली भाषा अलग पर, सुख की सबको चाह।।

कौन कष्ट कब चाहता, जग में जीव जहान।

सुविधायें सब चाहते, पशु- पक्षी इन्सान।।  
*
बूढ़ा बरगद देखता, चौपालों की शाम।
कैसी हवा बदल रही, जीना हुआ हराम।।

घर-घर में छा रहा है, क्षुद्र स्वार्थ का रोग।
विपदा में हैं वृद्ध जन, माँगे मिले न भोग।।

जीवन भर रिश्ते गढ़े, कुछ न आ रहे काम।
अपने ही मुँह फेरकर, हुए अचानक वाम।।

धीरे से दिल ने कहा, चल खोजें अब ठौर।
अपना घर अब है नहीं, यही हवा का दौर।। 

माला गूँथी  प्रेम की, सभी रहेंगे साथ।
सूखी रोटी देखकर, सबने खींचे हाथ।।

आज समझ में आ गया, नहीं किया अहसान।
अपनों की खातिर जिये, तब हम थे नादान।।

समाचार के पृष्ठ पर, आँखें करती खोज। 
कौन हमारा चल दिया, पढ़ें यही अब रोज।। 

हर कोई ढोंगी नहीं, सब न करें प्रतिघात। 
मन विश्वास जगाइए, तभी कटेगी रात।।

लोग न चाहें आपको, मिलने से हों दूर।
मन-झाँकें; देखें कमी, हो मुखड़े पर नूर।।

मन चंचल होता बहुत, पाखी सा उड़ दूर।
वश में जिसने कर लिया, हँसता वही हुजूर।। 

सदा बड़ों को चाहिए, छोटों को दें प्यार।
छोटों को भी चाहिए, सदा करें मनुहार।।

अज्ञानी सिर पीटता, हो जाता लाचार।
ज्ञानी अपने ज्ञान से, लाता नये विचार।।  

शहनाई की गूँज संग, डोली आती  द्वार।
साजन संग अठखेलियाँ, आँगन मिले दुलार।।

बाबुल का घर छोड़कर, जब आती ससुराल।
वधु अपनापन ढूॅँढ़ती, घर-आँगन खुशहाल।।  

पाखंडी धरने लगेे, साधु संत का रूप।
धर्म ज्ञान वैराग्य को, करने लगे कुरूप।।

भोले-भाले भक्त जन, करते हैं विश्वास।
उनकी श्रृद्धा भक्ति का, करें कुटिल उपहास।। 

आडंबर फैला रखा, धन पर रखते ध्यान। 
अधिक दान यदि दे सके, तब लेते संज्ञान।।

बाह्य रंग को देखकर, फँस जाते यजमान।
पाप-पुण्य के फेर में, बस इनका कल्यान।।

धर्म मर्म से विमुख हैं, तिलक लगाते माथ।
तृप्ति बोध से दूर हो, नित खुजलाते हाथ।।

चमचों की जयकार से, खुश होते श्रीमान।
दया धर्म आता नहीं, मन में है अभिमान।।

मिथ्या ज्ञान बघारते, करें न कुछ उपकार।
नारी को ही ज्ञान दें, पुरूषों को फटकार।।

दूजों कोेे उपदेश दें, धर्म-कर्म के नाम।
खुद के जीवन में सदा, करते उल्टे काम।।

शिक्षित होंगे यदि सभी, नहीं फँसेंगे लोग।
बुद्धिमान ही जगत में, पायें मोहन भोग।।

वेद उपनिषद् में भरा, बृहद् ज्ञान भंडार। 
जिसने इसको है पढ़ा,जीवन उसका पार।। 

समझदार के पास ही, धन का है उपयोग।
अज्ञानी के हाथों से, मिट जाते सब योग।।

होती लक्ष्मी चंचला, उसका कहीं न ठौर।
सरस्वती को साथ रख, सदा रहेगी भोर।।  

जहाँ प्रकृति सौंदर्य हैं, वहीं बसें  भगवान।
अनुपम छवि को देखकर, नत मस्तक इंसान।। 




कविता संग की दोस्ती, थामा उसका हाथ।
मुझसे जब-जब रूठती, तब-तब हुआ अनाथ।।

प्रश्न करे जग बावरा, लिखता जो दिन रात ।
कौन पढ़ेगा यह सभी, तेरे दिल की बात ।।

कुछ अपनेे ही कोसते, देख मेरा यह काज।
प्रतिपल समय गवाँ रहा, आती है ना लाज।।

तन की ताकत के लिये, पौष्टिक हैं आहार ।
मन की शक्ती के लिये, जीवन में सुविचार ।।

कविता कभी न चाहती, मानवता पर घात ।
जिसमें जग का हित रहे, उसे सुहाती बात ।।

मिटे विषमता देश की, अरू मानव मन भेद ।
प्रगति राह में सब बढ़ें, व्यर्थ बहे न श्वेद ।।

जगे हृदय संवेदना, या बदले परिवेश ।
यही सोच कर लिख रहा, शायद बदले देश ।।8


छल प्रपंच की आड़ ले..............
करुणा जागृत कीजिये, निज मन में श्री मान ।
अहंकार की विरक्ति से, जग होता कल्यान ।।

दूर छिटकने जब लगें, सारे अपने लोग ।
तब समझो है लग गया, अहंकार का रोग ।।

मन ग्लानि से भर उठे, अपने छोड़ें साथ ।
काम न ऐसा कीजिये, झुक जायेे यह माथ।।

मन अशांत हो जाय जब, मत घबरायें आप ।
विचलित कभी न होइयेे, करंे शांति का जाप ।।

गिर कर उठते जो सदा, करते ना परवाह ।
पथ दुरूह फिर भी चलें, मिलती उनको राह ।।

कष्टों में जीवन जिया, मानी कभी न हार ।
सफल वही होते सदा, जीत मिले उपहार ।।

भूत सदा इतिहास है, वर्तमान ही सत्य ।
कौन भविष्यत जानता, काल चक्र का नृत्य ।।

छल प्रपंच की आड़ ले, बना लिया जो गेह ।
पंछी यह उड़ जाएगा, पड़ी रहेगी देह ।।8

समय चक्र के सामने.....................
बच्चे हर माँ बाप को, लगें गले का हार।।
समय चक्र के सामने, फिर होते लाचार।।

समय अगर प्रतिकूल हो, मात-पिता हों साथ।
बिगड़े कार्य सभी बनें, कभी न छोड़ें हाथ।।

जीवन का यह सत्य है, ना जाता कुछ साथ।
आना जाना है लगा, इक दिन सभी अनाथ।।

मन में होता दुख बहुत, दिल रोता दिन रात ।
आँखों का जल सूखकर, दे जाता  आघात ।।

जीवन का दर्शन यही, हँसी खुशी संग साथ ।
जब तक हैं संसार में, जियो उठाकर माथ ।।

तन पत्ता सा कँापता, जर्जर हुआ शरीर ।
धन दौलत किस काम की, वय की मिटें लकीर ।।

जीवन भर जोड़ा बहुत, जिनके खातिर आज ।
वही खड़े मुँह फेर कर, हैं फिर भी नाराज ।।

छोटे हो छोटे रहो, रखो बड़ों का मान ।
बड़े तभी तो आपको, उचित करें सम्मान ।।

दिल को रखें सहेज कर, धड़कन तन की जान ।
अगर कहीं यह थम गयी, तब जीवन बेजान।।

परदुख में कातर बनो, सुख बाँटो कुछ अंश।
प्रेम डगर में तुम चलो, हे मानव के वंश ।।

सास-ससुर,माता-पिता................
बहू अगर बेटी बने, सब रहते खुशहाल ।
दीवारें खिचतीं नहींे, हिलमिल गुजरें साल ।।

सास अगर माता बने, बढ़ जाता है मान ।
जीवन भर सुख शांति से, घर की बढ़ती शान ।।

सास बहू के प्रेम में, छिपा अनोखा का राज ।
रिद्धि सिद्धि समृद्धि का, रहता सिर पर  ताज ।।

खुले दिलों से सब मिलें, ना कोई खट्टास ।
वातायन जब खुला हो, सुख शान्ति का वास।।

रिश्तों का यह मेल ही, खुशियों की बरसात ।
दूर हटें संकट सभी, सुख की बिछे बिसात।।

सास-ससुर, माता-पिता, दोनों एक समान ।
कोई भी अन्तर नहीं, कहते वेद पुरान ।।8

रिश्तों में  खट्टास का.....
रिश्तों में खट्टास का, बढ़ता जाता रोग ।
समय अगर बदला नहीं, तो रोएँगे लोग ।।

लोभ मोह में लिप्त हैं, आज सभी इंसान ।
ऊपर बैठा देखता, समदर्शी भगवान ।।

अगला पिछला सब यहीं, करना है भुगतान ।
पुनर्जन्म तक शेष ना, कभी रहेगा जान ।।

जीवन का यह सत्य है, ग्रंथों का है सार ।
जो बोया तुमने सदा, वही काटना यार ।।

संस्कृति कहती है सदा, यह मोती की माल ।
गुथी हुयी उस डोर से,  टूटे ना हर हाल ।।

रिश्तों में बंधकर रहें, हँसी खुशी के साथ ।
बरगद सी छाया मिले, सिर पर होवे हाथ ।।

रिश्ते नाते हैं सदा, खुशियों के भंडार ।
सदियों से हैं रच रहे, उत्सव के संसार  ।।7


पाखंडी धरने लगेे ...........
शिक्षा सबको है मिले, ज्ञान बढ़े दिन रात।
शिक्षित मानव ही सदा, तम को देंवंे मात।।11


प्रिये आपकी बात को, सुनता हूँ  ...
प्रिये आपकी बात को, सुनता हूँ दिन रात ।
नहीं सुनी तुमने कभी, मेरे दिल की बात ।।
भावुक मेरा यह हृदय,क्या लिखता दिन रात।
कभी नहीं तुमने कहा, मुझे सुनाओ तात।। 
ऐसे ही जीवन गया, कैसा है संगात।
मेरे भावों से रहीं, तुम बिल्कुल अज्ञात।।
कविता के आकाश में, जब भी भरूँ उड़ान ।
सारी हवा निकाल कर, बन जातीं नादान ।।
कविता मेरे दिल बसी, मिला नेक संसार।
पाकर उसको खुश हुये, यह जीवन आधार ।।
हर पल रहती साथ में, दिन हो चाहे रात ।
प्रियतम जैसी है वही, समझे हर जज्बात।।
हर कवि की पीड़ा यही,स्वजनों में न खास।
दूजांे के दिल में बसें, पत्नी रहे उदास।।
कवि की यह अंतरव्यथा, चाहे तुलसी दास ।
रखा नाम रत्नावली, जग जाहिर इतिहास ।। 
पत्नी की झिड़की सुनी, छोड़ गये घर द्वार।
कविता के संग में रहे, दिया विश्व उपहार।।
राम चरित मानस लिखा, अदभुत् सौंपा ग्रंथ ।
जन मानस में छा गये, दिखा गये नव पंथ ।।
पति पत्नी का धर्म है, यदि कविता हो साथ।
सहर्ष उसे स्वीकारिये, ऊँचा होगा माथ।। 
कविता के बल पर कवि, जग में हुये महान ।
युग अभिनंदन कर रहा, लोग करे गुणगान।।12


कलियुग में धन ही सदा.............
कलियुग में धन ही सदा, आता सब के काम।
सदियों से हर आदमी, इसका रहा गुलाम।।

धन ही सबकी चाह है, सदा रहा सिरमौर।
घर में कितना हो भरा, सभी चाहते और।।

धन लूटन को हैं खड़े, सारे चोर डकैत। 
सुख की नींद न सो सकें, पालें सभी लठैत।।

धन सहेजना है सरल, अधिक कठिन है ज्ञान।
धन अनुगामी ज्ञान का, यही सत्य है जान।।

शुभ धन कहलाता वही, नेक रहें जब श्रोत।
गलत राह से जब मिले, सुख की नींद न सोत।।

धन से होता है बड़ा, जीवन में सद्ज्ञान ।

जिसके बल पर आदमी, बन जाता इन्सान ।।8

पानी की बूँदें कहें ......................



बादल बरखें नेह के, धरती भाव विभोर।
हरित चूनरी ओढ़कर, हर्षित होती भोर।।

पानी की बूँदें  कहें, मुझको रखो सहेज।
व्यर्थ न बहने दो मुझे, प्रभु ने दिया दहेज।।

जल जीवन मुस्कान है, समझें इसका अर्थ।
पानी बिन सब सून है, नहीं बहायें  व्यर्थ।।

ताल तलैया बावली, बनवाने का काम।
पुण्य कार्य करते रहे, पुरखे अपने नाम।।

निर्मल जल पीते रहे, दुनिया के सब लोग।
नहीं किसी को तब हुआ, इससे कोई रोग।।

अविवेकी मानव हुआ, दूषित कर आबाद।
नदी सरोवर बावली, किए सभी बरबाद।।

जल को संचित कीजिये, बाँध नदी औ कूप। 
साफ स्वच्छ इनको रखें, नहीं चुभेगी धूप।।

सरवर गंदे हो गये, जीवन अब दुश्वार। 
जल.थल.नभचर,जड़.अचर,संकट बढ़ें हजार।।

नदी ताल औ बाँध हैं, जगती के अवतार। 
इनका नित वंदन करें, हैं जीवन आधार।।

आकाशवाणी 11 मई 2018



खिड़की से अब झाँकते.................
खिड़की से अब झाँकते, हर बूढ़े माँ बाप ।
गुम सुम से हैं देखते, सूरज का संताप ।।

जीवन भर दौड़े बहुत, नहीं किया विश्राम ।
आया जब संकट समय,उन पर लगा विराम।। 

श्वासें अब हैं टूटतीं, रोते नेत्र निचोर ।
नील गगन में डूबती, आशाओं की भोर ।।

विश्वासों की पोटली, संजाये थे साथ।
काल परिंदा ले उड़ा, क्षण में किया अनाथ।।

जीवन की संध्या घड़ी, अंधकार गहराय ।
आशाओं के दीप को,उर में कौन जलाय।।

जिन गलियों में खेलकर, बड़े हुये युवराज ।
उन राहों को लाँघ कर, चले गये सरताज ।।

नये क्षितिज पर उड़ गये, बेटा भानु प्रताप।
काट डोर सम्बन्ध कीे, बिछुड़ गये माँ बाप ।।

अपेक्षायें न राखिये, अपनों से कुछ आप ।
मन दर्पण सा टूट कर, बन जाये अभिशाप।।8

नीड़ बनाने को उड़ा, इक दिन पँछी भोर .........
नीड़ बनाने को उड़ा, इक दिन पँछी भोर ।
लेकर तिनका चोंच में, चला विहग उस ओर ।।  
पंख पसारे पहुँच गया, सुन जंगल का शोर ।
जहाँ प्रकृति की गोद में, नाच रहा था मोर ।।
वृक्षों ने आश्रय दिया, फैला दी निज बाँह ।
यहाँ बसेरा तुम करो, हम सब देंगे छाँह ।।
निर्भय होकर तुम रहो, ऊँची उड़ो उड़ान ।
मीठे फल खाते रहो, श्रम से नहीं थकान ।।
हरियाली मन मोहती, पशु पक्षी वनराज ।
झरने नदी पहाड़ संग, छेड़ो अपना साज ।।
कोयल  की जब गूँजतीे, मनमोहक आवाज ।
सारा जंगल झूमता,  पवन  बजाता साज ।।
हर्षित हो कर नाचता,  पंख फैलाए मोर ।
सबके मन को मोहता, कुहू कुहू का शोर  ।।
हम रक्षक इस विपिन के, पाते जग से मान ।
मिलकर आपस में रह़ें, यही हमारी शान ।।
सृष्टि का हम मिल सभी, करते नित श्रंगार । 
त्रिविध पवन गिरि फूल से, भरते कोषागार ।। 
सुबह शाम बस छेड़ना, अपनी मधुरिम तान । 
करतल घ्वनि से हम सभी, करते हैं  सम्मान ।।

वृक्षों की यह बात सुन, पँछी हुआ विभोर ।
नीड़ बनाया डाल में, यहीं हमारा ठौर ।।12

अहंकार रवि को हुआ ................

अहंकार रवि को हुआ, मैं इस जग की शान ।
कौन जगत में है यहाँ, मुझसे बड़ा महान ।।
कहकर रवि जाने लगा, संग गया प्रकाश ।
अंधकार छाने लगा, तब जग हुआ हताश ।।
बात उठी तब चतुर्दिश, प्रश्न बना सरताज ।
देगा कौन प्रकाश अब, अंधकार का राज ।।
दीपक कोने से उठा, फैला गया उजास ।
मानो सब से कह रहा, क्यों हैं आप उदास ।।
मैं छोटा सा दीप हूँ, जग में करूँ प्रकाश ।
सदियों से मैं लड़ रहा, कभी न हुआ निराश ।।
सुप्त मनोबल जग उठा, जागा दृढ़ विश्वास ।
जाग उठी नव चेतना, परिवर्तन की आस ।।
तब मानव ने है कहा, सुन सूरज यह बात ।
हम सब तुम से कम नहीं, तुझको दूॅँगा मात ।।
कमर कसी उसने तभी, रवि को देने मात ।
ऊर्जा श्रोत तलाश कर, तम से दिया निजात ।।
न्यूक्लियर में खोजता, ऊर्जा के अब श्रोत ।
अंधकार से भिड़ गया, इक छोटा खद्योत ।।
अविष्कार वह कर रहा, उस दिन से वह रोज ।
परख नली में कर रहा, नव जीवन की खोज ।।
जूझ चुनौती से रहा, मानव आज जहान ।
बौद्धिक क्षमता से हुआ, वह सच में बलवान ।।
आकाशवाणी 11 मई 2018 

नारी ने पैदा किये, जग में देव महान।
उसकी छाया में पले, राम कृष्ण भगवान।।
नारी कोमल फूल सी, पुरुष वृक्ष की छाँह।
जिसकी छाया में सजे, घर-आँगन की बाँह।।
संस्कारों की गंध को, फैलाती चहुँ ओर।
उसके इसी प्रयास से, घर घर होती भोर।।
मध्यकाल अबला रही, ढाये जुल्म अनेक। 
दासी हो कर रह गयी,नियत नहीं थी नेक।।
सुरा सुंदरी चाह ने, कोठे किये अबाद।
नारी महिमा भूलकर, किया उसे बरबाद।।
बदल गया है अब समय, शिक्षित है इंसान।
नर नारी का भेद हर, दिया उचित स्थान।। 
अबला अब सबला हुई, दौड़ रही सब ओर।
पीछे सबको छोड़कर, पकड़ रही हर छोर।।
मोह सदा गुड़-चाशनी, मक्खी सा चिपकाय ।
इसमें जो भरमा गया, जीवन भर पछताय।।
कविता मेरी है सखा, मेरा दिल बहलाय ।
मेरे मन को वह सदा, नित संबल पहुँचाय ।।

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