शनिवार, 18 अगस्त 2018

doha shatak gopal krishna chaurasia

ॐ 
दोहा शतक 
गोपाल कृष्ण चौरसिया 'मधुर'

अभियंता गोपाल कृष्ण चौरसिया 'मधुर' स्वतंत्रता सत्याग्रही-राष्ट्रीय भावधारा के प्रखर कवि स्व. मानिकलाल चौरसिया मुसाफिर के कुल दीपक हैं। माँ शारदा की ऐसी कृपा कि ३ भाई स्व. जवाहर लाल चौरसिया 'तरुण', श्री कृष्ण कुमार चौरसिया 'पथिक' तथा बहिन भी  सशक्त कवयित्री हैं। 'मधुर जी' नव पीढ़ी को देश की स्वतंत्रता तथा रक्षा के लिए शहीद होने की परंपरा को सशक्त करने के लिए बलिदान को याद रखने को आवश्यक मानते हैं:
शौर्य वीरता त्याग ही. स्वतंत्रता का मान। 
वीर शहीदों का सदा, याद रखें बलिदान।।
सनातन सभ्यतापरक विरासत में मिले जीवन मूल्यों को बिसारकर पश्चिम से थोपे गए मिथ्याचार को अपनाती युवा पीढ़ी को देखकर चिंता होना स्वाभाविक है:   
माखन-मिश्री की जगह, अण्डों का व्यापार।
निज संस्कृति को भूलते, करते मिथ्याचार।।
जिस देश में कभी सुई भी आयात होती थी, वही देश विश्व के उन्नत देशों को कड़ी टक्कर देकर चंद्र और मंगल तक यान भेज रहा है। इस परिदृश्य को बदलने में अभियंताओं का योगदान सर्वोपरि है: 
रोटी कपड़ा जल सड़क, रहने सुलभ मकान। 
अभियंता निर्माण की, हर युग में पहचान।।
शासन और प्रशासन तंत्र में निरंतर बढ़ता भ्रष्टाचार दोहाकार की चिंता का विषय है। कहते हैं 'बद अच्छा बदनाम बुरा', दिशाहीन-सत्ता केन्द्रित दल प्रधान राजनीति जुमलेबाजी की बाजीगरी कर देश को निराश कर रहा है: 
भांग कुँए में घुल गयी, धुत्त नशे में तंत्र। 
जादूगरी दिखा रहा, बदनामी का जंत्र।।
मधुर जी देश के विकास और एकता के लिए हिंदी को व्यवहार में लाने और विदेशी भाषा को श्रेष्ठ मानने की रुग्ण मानसिकता को छोड़ने पर बल देते हैं;
हिंदी भाषा राष्ट्र की, हिंदी में हो काम। 
छोड़ गुलामी मानसिक, सनसे दुआ-सलाम।।
मधुर जी अभियंता होने के नाते अंग्रेजी भाषा पर अधिकार रखने के बावजूद हिंदी की सामर्थ्य को जानते हैं। उनके दोहे प्रसाद गुण संपन्न हैं। वे सरसा, सरल तथा सहज बोल-चाल के हिमायती है। इन दोहों में अमिधा में ही बात कही गयी है। मधुर जी के दोहे जीवन मूल्यों की जय-जयकार गुंजाकर नव पीढ़ी को उनमें शिक्षित-दीक्षित करने के प्रति आग्रही है। 
 
      

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