बुधवार, 8 अगस्त 2018

ॐ दोहा शतक: श्री महातम मिश्र


उड़े तिरंगा शान से
दोहा शतक
महातम मिश्र (गौतम गोरखपुरी)
















जन्म: ९-१२-१९५८, गोरखपुर।
आत्मज: स्वर्गीया श्रीमती बादामी मिश्रा-श्री रामसबद मिश्र। 
जीवन संगिनी: श्रीमती रंभा मिश्रा।
शिक्षा : स्नातकोत्तर (मनोविज्ञान)।
प्रकाशन: कार्यालयीन वार्षिक पत्रिका “दर्शना” सहित अनेक पत्र-पत्रिकाओं  व जे.एम.डी. पब्लिकेशन (दिल्ली) द्वारा राष्ट्रभाषा हिंदी प्रचार-प्रसार योजनांतर्गत काव्य संग्रह काव्य अमृत में प्रकाशित।
उपलब्धि: युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच, दिल्ली द्वारा 'श्रेष्ठ रचनाकर',  'साहित्य गौरव २०१५'  सम्मान, नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति, अहमदाबाद द्वारा २०१६ में आयोजित काव्य पाठ प्रतियोगिता में पुरस्कार व सम्मान पत्र। अनेक पत्रिकाओं तथा समूहों द्वारा कई महत्वपूर्ण सम्मान।
संप्रति: भारत सरकार में वैज्ञानिकी कार्यसेवा में कार्यरत (वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी-१)।
संपर्क:  वर्तमान: बी १२१, तेजेंद्र प्रकाश सोसायटी विभाग-१, अहमदाबाद-३८२३५०।
स्थायी पता: ग्राम-भरसी, पोस्ट-डाड़ी, जिला गोरखपुर २७३४२३ उत्तर प्रदेश ।
चलभाष: ९४२६५ ७७१३९ (वाट्सएप), ८१६०८७ ५७८३।  ईमेल: mahatmrmishra@gmail.com
*
महातम मिश्र जी भोजपुरी अंचल में जन्मे, पीला और बढ़े फिर गुजरात में दीर्घकालिक निवास रहा। लंबे समय से हिंदी भाषी क्षेत्र से दूर रहते हुए भी हिंदी के प्रति लगाव न आपको सेवानिवृत्ति पश्चात् साहित्य सृजन हेतु प्रेरित किया है। भोजपुरी मिश्रित हिंदी में रचित दोहन में उनकी एक विशिष्ट शैली का अंकुरण होता दिखता है। शुद्ध खड़ी, शुद्ध भोजपुरी या दोनों की मिश्रित शैली तीनों राहें महातम जी के सृजन-कार्य हेतु उपलब्ध हैं। प्रकृति और पर्यावरण के प्रति चिंतित महातम जी माँ शीतला से पर्यावरण के साथ-साथ विचार की शुद्धि हेतु भी प्रार्थना करते हैं:
मातु शीतला अब बहे, शीतल नीम बयार।
निर्मल हो आबो-हवा, मिटे मलीन विचार।।
शिव-शिवा लीलाभूमि से नैकट्य का लाभ पा चुके मिश्र जी शिव के रागे-विरागी दोनों रूपों में अपने उपास्य को भजते हैं:
चंदा की सोलह कला, धारण करते नाथ।
गिरि-तनया अर्धांगिनी, सोहें शिव के साथ।।
प्रकृति के सान्निन्ध्य में रहते हुए पशु-पक्षियों का स्वभाषा-प्रेम उन्हें प्रेरित करता है साथ विस्मित भी करता है कि मानव को स्वभाषा बोलने पर हीनता की अनुभूति क्यों होती है?
पशु-पक्षी की बोलियाँ, समझ गया इंसान।
निज बोली पर हीनता, मूरख का अभिमान।।
कश्मीर से कन्याकुमारी तक सकल देश को एक सूत्र में बाँधता तिरंगा उड़ता देख्कार मिश्र जी का शीश गर्व से ऊँचा होना स्वाभाविक है:
उड़े तिरंगा शान से, लहराए ज्यों फूल।
हरित केशरी चक्र सह, शुभ्र रंग अनुकूल।।
लोकोक्ति है 'अपन भले तो जग भला'। मिश्र जी इस लोकोक्ति को अपने जीवनानुभव के साथ मिश्रित कर दोहे में पिरोते हैं:
मैं अति भला तुमहिं सरिस, भला मिला संसार।
जैसी जिसकी नजर है, वैसा है व्यवहार।।
मिश्र जी जमीन से जुड़े रचनाकार हैं। उनके लिए साहित्य सृजन विद्वता-प्रदर्शन का नहीं आत्माभिव्यक्ति का माध्यम है। मूल मानकों का पालन करते हुए भाषिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाए रखन उन्हें रुचिकर लगता है। भारत में हिंदी को आंचलिक बोलियों से मिल रही चुनौती और अलगाव भाव को देखते हुए वे हिंदी भोजपुरी को मिलकर रचना करने का प्रयोग उचित ही कर रहे हैं। ऐसे लेखन से बोलीओं के आंचलिक शब्द-भण्डार से हिंदी भाषी जुड़कर उन्हें अपना सकेगा और हिंदी शब्द-भण्डार को समृद्ध करेगा। 
*
पहले पूज्य गणेश जी, नंदन शिवा-महेश।
आसन विहँस विराजिए, भागें दुख अरु क्लेश।।
शिव कुल की महिमा अमिट, वंदउँ प्रथम गणेश।
शिवाशक्ति के लालना, जय शिव शंभु महेश।।
हे माँ वीणावादिनी!, वास करो आ कंठ।
कभी न कलम मलीन हो, साथ न आए चंठ।।
राधा छवि दर्पण लिए, मन कान्हा चितचोर।
मोरपंख सह बाँसुरी, वन-वन नाचत मोर।।
राधा-कृष्णा बोलिए, युगल रूप मकरंद।
प्रभु जब मंचासीन हों, तब आए आनंद।।
ममता बिन माता नहीं, वृक्ष बिना नहिं छाँव।
करुणाकर करुणामयी, हो अभाव नहिं गाँव।।
नीति विनीत चरित्र मन, विनय करूँ कर जोर।
भक्ति-शक्ति, तप-कर्म मम, नित साधना अँज़ोर॥
सदा भवानी पूजकर, रहे सुख कुशल-क्षेम।
विनय बुद्धि प्रतिपल बढ़े, जस कुबेर गृह हेम।।
हरि-हर अपने धाम में, लिए भूत-बैताल।
गणपति बप्पा मोरया, सदा रखें खुशहाल।।
बाबा शिव की छावनी, गणपति का ननिहाल।
धन्य-धन्य दोनों पुरा, गौरा मालामाल।।
वाहन नंदी सत्य शिव, डमरू नाग त्रिशूल।
भस्म भंग प्रभु औघड़ी, मृगछाला अनुकूल।।
चौदह स्वर डमरू बजे, सारेगामा सार।
जूट-जटा गंगा धवल, शिव बाबा-संसार।।
चंदा की सोलह कला, धारण करते नाथ।
गिरि-तनया अर्धांगिनी, सोहें शिव के साथ।।
बाबा भोले नाथ की, महिमा अपरंपार।
भंग-भस्म की आरती, शक्ति सत्य आपार।।
डम-डम डमरू बाजता, आदि कलश कैलाश।
अर्ध चंद्रमा खिल रहा, गंगा धवल प्रकाश।।
जय गणेश जय कार्तिके, जय नंदी महाराज।
जयति-जयति माँ पार्वती, धन्य शीतला राज।।
डोला माँ का सज गया, जय चैत्री नवरात।
नित-नव गरवा घूमती, जननी दुर्गा मात।।
भूल-चूक कर माँ क्षमा, विनय करूँ कर जोर।
सेवक 'गौतम' पग पड़ा, दे आशीष अंजोर।।
मातु शीतला अब बहे, शीतल नीम बयार।
निर्मल हो आबो-हवा, मिटे मलीन विचार।।
डोला मैया आप का, बगिया का रखवार।
माली हूँ अर्पण करूँ, नीम पुष्प जलधार।।
जन्म-दिवस है आप का, आज वीर हनुमान।
चरण पवन सुत मैं पडूँ, ज्ञानी गुण बलवान।।
शुभकामना बधाइयाँ, जन-जन पहुँचे राम।
हनुमत के हिय में बसें, लखन सिया श्रीराम।।
गंगोत्री सु-यमुनोत्री, बद्रीनाथ केदार।
चारों धाम विराजते, शिव; महिमा साकार।।
मातु पार्वती ने दिया, अपना घर उपहार।
आ बैकुंठ विराजिए, ममता विष्णु दुलार।।
स्वर्गलोक की छावनी, देव भूमि यह धाम।
ब्रम्हा विष्णु महेश को, बारंबार प्रणाम।।
दर्शन करके तर गए, पूर्वज सहित अनेक।
सकल कामना सिद्धता, आए बुद्धि विवेक।।
बार बार सब तीर्थ कर, एक बार हरि-धाम।
प्रेमिल रसना आरती, बोल विष्णु का नाम।।
दोहा अपनी बात से, मन को लेता मोह।
चकित करे हर मोड़ पर, काहु न बैर बिछोह।।
पशु-पक्षी की बोलियाँ, समझ गया इंसान।
निज बोली पर हीनता, मूरख का अभिमान।।
दोहा है ऐसी विधा, कहे छंद सत सार।
तेरह-ग्यारह पर रुके, रचना स्वर अनुसार।।
दोहा अपने आप में, रखता सुंदर भाव।
जागरूक करता सदा, लेकर मोहक चाव।।
पर्यावरण सुधार लो, सबकी साधे खैर।
जल-जीवन सब जानते, जल से किसका बैर।।
पर्यावरण विशुद्ध हो, नाशे रोग-विकार।
प्रेमी सींचें बाग-वन, मन में रख उपकार।।
मानव तेरा हो भला, मानवता की राह।
कभी न दानव संग हो, करते मन गुमराह।।
वो दिन कहाँ चले गए, ओल्हा पांती पेड़।
अभी कहाँ नियरात हैं, मोटे-तगड़े मेड़॥
उड़े तिरंगा शान से, लहराए ज्यों फूल।
हरित केशरी चक्र सह, शुभ्र रंग अनुकूल।।
झंडा डंडे से बँधा, मानवता की डोर।
काश्मीर जिसकी शिखा, कन्याकुमारी छोर।।
कड़क रही है दामिनी, बादल सह इतराय।
पलक बंद पल में करे, देखत जिय डरि जाय।।
क्यों रूठे हो तुम सखे, कुछ तो निकले बैन।
व्याकुल विरह बढ़ा रहा, पड़े न मन को चैन।।
तनिक बरस भी जाइए, आँगन मेरा सून।
गर्मी से राहत मिले, शीतल हो दिन जून।।
बारिस भी यह खूब है, बिन मर्जी के होय।
कहीं गिरे कहिं धौकनी, बिना रंग की पोय।।
किसे कहूँ? कैसे लिखूँ, दोहा तुझसे नेह।
परवश होती प्रीत है, मानों परमा स्नेह।।
गड़बड़ झाला देख के, पड़ा कबीरा बोल।
मौसम ऋतु वीरान है, पीट रहे दिग ढोल।।
कैसे तुझे जतन करूँ, पुष्प पराग नहाय।
अपने पथ नवयौवना, महक बसंत बुलाय॥
रंग-रंग पर चढ़ गया, दिखे न दूजा रंग।
अंग-अंग रंगीनियाँ, फड़क रहा हर अंग॥
ऋतु बहार ले आ गई,पड़ें न सीधे पाँव।
कदली इतराती रही, बैठी पुलकित छाँव॥
महुआ कुच दिखने लगे, बौर गए हैं आम।
मेरे कागा बोल मत, सुबह हुई कत शाम॥
नहि पराग कण पाँखुड़ी, कलियन मह नहि वास।
कब वसंत आया-गया, चित न चढ़ें मधुमास॥
सोनचिरैया उड़ चली, पिंजरा हुआ पराय।
नात बात रोवन लगे, जस-तस निकसत हाय॥
कई मंजिला घर मिला, मिली जगह भरपूर।
छूट जाय घर मानवा, जीवन जग दस्तूर॥
निर्धन-मरा जुआरिया, धनी मरा संताप।
मानवता पल में मरी, मरि-मरि जिए अनाथ॥
लोभी क्रोधी धूतरा, दिख सज्जन बड़ वेष।
उतराए दिन-रात है, कतहु न मिले निमेष।।
माया महिमा साधुता, उगी ठगी चहुँ ओर।
जातन देखि विलासिता, भीड़ भई मतिभोर॥
ऊटपटांग न बोली, बनते बैन बलाय।
हर्ष भरे मन शूरमा, फिर पाछे पछिताय॥
पाप-पुण्य की आस में, जीवन बीता जाय।
नहीं भक्ति नहि कर्म भा, दिन में रात दिखाय॥
भली भलाई पारकी, मन संतोष समाय।
खुद की थाली कब कहे, रख दे औरन खाय॥
कैसे कहूँ महल सुखी, दिग में सुखी न कोय।
बहुतायती अधीर है, रोटी मिले न भोय।।
मुट्ठी भरते लालची, अपराधी चहुँ ओर।
कोना-कोना छानते, मणि ले चले बटोर।।
गाय दुधारू को सभी, करते खूब दुलार।
दूध नहीं दाना नहीं, चला करे तलवार।।
पूत पिता को तौलते, लिए तराजू चोर।
हीरा हिंसक एक से, बँसवारी में शोर।।
समय-समय की बात है, आज बहुत है ठंड।
भीग रहे हैं छाँव में, बिना काम का फंड।।
सम समानता अरु समय, होता है अति वीर।
बुद्धि-विवेक बहुत भले, अपनाते हैं धीर।।
वीणा का स्वर अति मधुर, मन को लेती मोह।
मानों कोयल कूकती, बौर-बौर चित सोह।।
जगत जहाँ बढ़ता गया, बढ़ते गए फ़क़ीर।
बाबा ढोंगी हो गये, अब क्या करें कबीर।।
मिलन-मिलन में फेर है, मिल लीजे मन खोल।
अंतिम समय विछोह है, सब कुछ पोलम-पोल।।
खुश रहिये मेरे सखा, सब कुछ भगवत-हाथ।
कभी न चिंता कीजिये, करनी-भरनी साथ।।
डाली-डाली झूमती, लादे रहती बोझ।
झुक जाती है फल लिए, कैसा किसका झोझ।।
दुख में दुखी न होइए, धीरज दीजे मान।
क्लेश होत नहिं स्वार्थी, आता जाता शान।।
कभी न मन में रार हो, कभी न छाए द्वेष।
बोली भाषा एक सी, अलग अलग है भेष।।
लहर रही है ओस अब, ठिठुर रही है रात।
सूझत नाहीं कत गया, भौंरा गुंजत प्रात।।
चादर मैली हो गई, धोया जिसको खूब।
अजी खाद-पानी बिना, फैल गई है दूब।।
मैं अति भला तुमहिं सरिस, भला मिला संसार।
जैसी जिसकी नजर है, वैसा है व्यवहार।।
अलंकार साहित्य का, गहना भूषण मान।
छंदस मात्रा सादगी, आभूषण सुविधान।।
उचित कर्म सौंदर्य है, मंशा महक महान।
रे साथी! अब चेतना, क्रोध न करना जान।।
ज्ञान नहीं भूगोल का, लिखन चला इतिहास।
अर्थशास्त्र के महारथी, द्रव्य करे उदभास।।
करो अध्ययन लालना, मानों सखा किताब।
बिना पढ़े नहिं ज्ञान हो, यह पूँजी नायाब।।
कर्म बिना सत्कर्म क्या, धन होता बेकार।
सोच-समझ ले रे मना, तब करना तकरार।।
नेह-निमंत्रण आप को, पहुँचे मेरे मीत।
कोयलिया की स्वर सुधा, मीठी बोली गीत।।
मनन बुद्धि गर शुद्ध हो, बने आचरण नेक।
कड़वी पर शीतल लगे, नीम छाँव प्रतिरेक।।
निराधार हम सब सखे!, अगर नहीं आधार।
ठेंगा ही पहचान है, बाकी सब बेकार।।
मेरे परमात्मा सदा, करना तू मजबूत।
नित्य नमन आराध्य को, करता हो अभिभूत।।
नदी किनारा देख के, मन होता खुशहाल।
कलकल सरिता बह रहीं, जल-मछली बदहाल।।
रे मन! धीरज रख तनिक, नाहक क्यों हैरान।
समय-समय की बात है, समय सदा बलवान।।
सृजन सहज हो सामयिक, लय में हो प्रभु गान।
सुरावली हो सूर की, हो कबीर का मान।।
मानव होकर क्यों करें, यह झूठा अभिमान।
कर्म-धर्म होता सगा, जीवन जोगी जान।।
आविष्कारक हर किता, करता है अनुमान।
इस विकास की दौड़ में, खुद को भी पहचान।।
मंगलमय होता सदा, सु-मनसा अनुष्ठान।
सर्वकामना सिद्ध हो, हों प्रबल प्रतिष्ठान।।
हरियाली लहरा रही, झूम रहे हैं खेत।
सरसों भी फूलन लगे, रे किसान गृह चेत।।
मारा-मारी हो रही, मिल जाए अधिकार।
कुछ भी बोलो साथिया, मन नहिं हो व्यभिचार।।
करूँ नहीं अधिकल्पना, मन में रखता धीर।
स्वागत सबका हँस करूँ, निर्धन राजा पीर।।
जिम्मेदारी है बहुत, लेकर चलता आज।
जितना कर पाता भला, उतना करता राज।।
सिंहासन सजता रहा, आदिकाल से अंत।
कितने आए अरु गए, कैसे-कैसे संत।।
मरती है संवेदना, मानव तेरा हाल।
एक हाथ में हाथ है, एक हाथ में खाल।।
सहनशीलता पावनी, देती शीतल छाँव।
मानों बैठा है भगत, जिय के भीतर गाँव।।
मिला खूबसूरत जहाँ, क्यों करते हो रार।
हे बलशाली मानवा, मतकर जल को खार।।
नैतिकता की आड़ में, लूट रहे सब खूब।
खेतों में जकड़ा रहा, भल किसान जस दूब।।
देना आशीर्वाद माँ!, आया तेरे धाम।
रमा रहे मन भक्ति में, शुद्ध भाव निष्काम।।
सकारात्मक जब हुआ, आया चिंतन काम।
नकारात्मक क्यों बनें, हे मेरे अभिराम।।
रोजगार बिन फिर रहा, डिग्री-धार सपूत।
घूम रहा पगला जहाँ, जैसे काला भूत।।
नमन करूँ प्रभु आप का, रखकर हृदय विशाल.
स्वस्थ रहें साथी सकल, सज्जित पूजा-थाल।।
***

कोई टिप्पणी नहीं: