शुक्रवार, 10 अगस्त 2018

chintan gurudev

स्वतंत्र चिंतन 
"पाखण्ड और प्रलाप की ओर बढ़ते कदम"
महाकवि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने 1928 में उस समय के चीन के नेता लियां-ची-चाओ से कहा था कि "अंग्रेज और यूरोपियन एशिया छोड़ कर चले जाएंगे, इस बात का पूर्वाभास मैं देख रहा हूँ" तो चाओ ने पूछा था "क्यों बेकार छोड़ कर चले जाएंगे। हम लोग उतने शक्तिशाली कहाँ हो पाए हैं।" इस प्रश्न के उत्तर में ठाकुर ने कहा "एशिया में सर्वत्र जागरण हो चुका है। गृहस्थ जब तक सोता रहता है तभी तक चोरों-तस्करों का सुयोग होता है। गृहस्थ जाग गया है तो तस्करों को भागना ही पड़ेगा। मैं सज्जन यूरोपियों की बात नहीं कर रहा हूँ। उनमें से अनेक वंदनीय हैं,परन्तु उनमें जो चोर और तस्कर हैं वे तभी तक लूटपाट कर सकते थे जब तक हम सोये हुए थे।अब वह सब नहीं चलेगा। किन्तु जाने से पहले वे हमें परेशान करने की पूरी व्यवस्था करके जाएंगे।जापान विज्ञान और शिल्प में अग्रसर है। परन्तु इसी के साथ वे उसे दस्युमंत्र अर्थात साम्राज्यवादी राष्ट्र की शिक्षा देते जा रहे हैं वही उसका सर्वनाश करेगी। भारत वर्ष में भी साम्प्रदायिकता और प्रादेशिकता की शिक्षा जोर शोर से दे रहे हैं। भारतवर्ष में जातिभेद कालधर्म के प्रभाव से क्रमशः क्षीण हो जाता, किन्तु क्या जनगणना, क्या अदालत में, शपथ पत्र में या अन्यत्र भी इस जाति भेद को अंग्रेज दिन-प्रति दिन प्रबलतर करते जारहे हैं और इसके द्वारा ही जाति-जाति में विच्छेद घटित होगा। हमारे भीतर भी कुछ ऐसे बुद्धिहीन हैं जो इसमें घृताहुति देंगे। चीन के बारे में भी मुझे कुछ ऐसा ही भय लग रहा है।" "नहीं, लियां-ची-चाओ का कहना था कि "चीन में जातिभेद नहीं है। सर्वत्र एक वर्णमाला के अधीन हमारी भाषा है। धर्म और सम्प्रदाय को लेकर हम कभी गोलमाल नहीं करते। ऐसी हालत में वे हमारा क्या कर लेंगे।" इस पर गुरुदेव बोले थे "तब शायद राजनीति के रास्ते से वे चीन में ऐसी आग लगा देंगे कि चीन दुर्बल होकर रहेगा। जापान, चीन और भारत को दुर्बल रख पाने में ही इन दस्युओं को किसी खतरे की संभावना नहीं रहेगी।"(बंगला साप्ताहिक, 6 नवम्बर 1948)।
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के इस चिन्तन को आचार्य क्षितिमोहन सेन ने स्पष्ट किया। कुबेरनाथ राय ने अपनी "चिन्मय भारत" पुस्तक के पृष्ठ तीन पर इसका उल्लेख किया है कि "आज हम देख रहे हैं कि कवि का दुःस्वप्न सही था। जापान को दस्युमंत्र(साम्राज्यवादी राष्ट्रवाद) की दीक्षा दे कर उसे चीन और भारत से विच्छिन्न कर दिया। चीन के दोनों दलों के मूलमंत्र (राष्ट्रवाद और मार्क्सवाद) यूरोप से ही प्राप्त हुए हैं। भारत छोड़ने से पहले अंग्रेज साम्प्रदायिकता की आग लगा कर देश को विभक्त कर गए। खण्डित भारत में भी हिन्दू को हिन्दू परेशान करता रहे, इसके लिए प्रादेशिकता के बीज बो गये। प्रदेश के भीतर भी शांति न रहे इसके लिए अनुसूचित 'गैर अनुसूचित" इत्यादि नाना प्रकार के बिष बीज बो गये। वे ग्राम दहन कारी दस्यु तो चले गए, परन्तु गांव में सौ सौ बाघ छोड़ गए। स्वार्थपरता , संकीर्णता और दम्भ के दांत बाघों के दांतों से भी ज्यादा तेज होते हैं। हमारे घर से बाहर हो जाने पर भी वे अपने शत-शत उत्तराधिकारी छोड़ गए हैं। हम कहां-कहां सम्हाल पाएंगे।" स्वर्गीय डा.राम मनोहर लोहिया कहा करते थे कि "मार्क्सवाद यूरोप द्वारा एशिया को पहनाई गयी आखिरी बेड़ी है जिसे हमें तोडना होगा।" स्वर्गीय कुबेरनाथ राय कह गए हैं कि "1947 के बाद हमारे प्रातः स्मरणीय भाग्यविधाताओं एवं उनके अनुचर हमारे विद्या और वाङ्ग्मय के पीठासीन आचार्यों ने अपने को ब्रिटिश राज्य का योग्य उत्तराधिकारी सिद्ध किया है,क्योंकि ये दोनों उनके द्वारा प्रदत्त आँखों से ही देखते हैं। ऐसे में अपनी असली आँख क्या है इसकी जानकारी जरूरी है। चश्मा यदि जरूरी हो तो एतराज नहीं है, परन्तु चश्में के भीतर निजी आँख ही होनी चाहिए।" अपनी इस स्थापना को बल प्रदान करने के लिए कुबेरनाथ राय डाक्टर श्यामाचरण दुबे के साथ अपनी एक चर्चा का उल्लेख करते हैं कि एक अनौपचारिक बातचीत में डाक्टर दुबे ने उनसे एक विदेशी पुस्तक की चर्चा की जिसके आधे निबंध लेखक विदेशी और आधे लेखक भारतीय थे। दिलचस्प बात यह थी कि विदेशी लेखकों ने अपने शोधपत्रों में अपनी स्थापनाओं के प्रमाण में मनुस्मृति, महाभारत, गीता और धम्मपद आदि का आश्रय लिया था तो भारतीय लेखकों में ये स्रोत सर्वथा नहीं तो प्रायः अनुपस्थित थे और इसकी जगह पर मार्क्स, दुखीम, बेवर, ग्रामची आदि मौजूद थे। इसमें जो दो बातें सामने आती हैं उनमें से पहली तो यह है कि भारतीय लेखकों को अपने देशी स्रोतों की प्रामाणिकता एवं युक्ति पर विश्वास नहीं है अथवा देशी विद्वानों का अपने वांगमय में कोई अभिनिवेश नहीं है। डाक्टर दुबे ने व्यंग्य में कहा था-"अब हिंदू धर्म क्या है, इसे विदेशी लेखक जब अंग्रेजी में समझायेंगे तभी हम समझ पाएंगे।"
भारतीय चिन्तन और धर्म को पश्चिमी चश्में और पश्चिमी आँखों से देखने और पश्चिमी बुद्धि से समझने का ही क्या यह दुष्परिणाम नहीं है कि हम भारत के शाश्वत सनातन धर्म को मजहब और यूरोप के मजहब को धर्म समझने लगे हैं ? इस संदर्भ में श्री कुबेर राय की राय उधार लूं तो बात यह हुई कि "भारतीय धर्म और पैगम्बर प्रदत्त मजहब या "रिलीजन" में एक और बड़ा बुनियादी अंतर है। एक बड़ा ही विलक्षण और बड़ा ही महत्वपूर्ण अंतर है, वह यह कि भारतीय धर्म में सिर स्वतन्त्र है, मस्तिष्क और प्रज्ञा को मुक्त रखा गया है, परन्तु सिर के नीचे हाथ-पांव जननेन्द्रियां,उदर को बांधने की चेष्टा की गयी है। इसके प्रतिकूल अन्य मजहबों में हाथ-पांव जननेन्द्रियां, उदर स्वतंत्र हैं, परन्तु सिर को कठोरतम अनुशासन में बांधा गया है और मुक्त चिन्तन की कोई गुंजाइश नहीं है। भारतीय धर्म-साधना में आचरण अनुशासनबद्ध है और चिन्तन स्वतंत्र है।
भारत अर्थात हम भारत के लोगों पर इस समय किया जा रहा बौद्धिक और सांस्कृतिक आक्रमण अप्रत्याशित नहीं है। इनके प्रति अनजान बनने का आत्मघाती प्रयास लज्ज़ाजनक है। हम अपने प्रति अपने चिन्तन, जीवन दर्शन, अपनी परम्परा और जिजीविषा के प्रति अपराधबोध से ग्रस्त हैं, नहीं तो हमने श्री अरविन्द की चेतावनी पर ध्यान दिया होता। हम और हमारा देश अपनी देशी मूल से कटते जा रहे हैं। हम अपनी अस्मिता को लेकर वाचाल हो गए हैं। हमारे जीवन का "छन्द" भंग हो गया। उसकी मात्राएं, उसका स्वर और उसका अनुस्वार असंतुलित हो गया है। हमारा जीवन संगीत बेसुरा और हमारी जीवन कविता अकविता बन गई है।
हमारे वासुदेव कृष्ण ने भारतीय जीवन की छंदबद्धता का महत्व बताने-समझाने के लिए ही अपनी विभूतियों का वर्णन करते हुए कहा था कि "वेदों में मैं सामवेद हूँ, अर्थात मैं जीवन का "छन्द" हूँ।" श्री कुबेरनाथ राय चिन्मय भारत में इसकी चर्चा करते हैं कि "वस्तुतः प्रत्येक सही कर्म या रचना में एक "छन्द" एक "छंदोबद्ध रूप" या आकृति रहती है। यह छन्द चाहे प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष। बिना इसके रचना में सुडौलता (सही अनुपात) नहीं आ पाती है। हर क्रिया में पद्धति का एक "प्रारूप" (फार्म) बनता है। वही उसका "छन्द" है। अतः इस वृहत्तर अर्थ में "साम" या "छन्द" की अनिवार्यता स्वीकार करनी पड़ती है।---गत महायुद्ध में जर्मनी बिल्कुल ध्वस्त हो गया था। जब जर्मनी के पुनः निर्माण का प्रश्न आया तो उस देश के प्रसिद्ध अस्तित्ववादी दार्शनिक स्पर्स ने जीवन निर्माण का दर्शन प्रस्तुत करते हुए कहा था: "उल्टा हाथ लगाओ। यह जान लो कि "विद्रोह" और "अवज्ञा" से कम प्रतिष्ठित नहीं है निष्ठा, "वफादारी" और "समर्पण" । "छन्द" की ओर लौटो।" जर्मनी ने निष्ठा और समर्पण के मूल्य को पहचाना "छन्द" स्थापित हुआ और जर्मनी पुनः सिर उठाकर खड़ा हो गया। हर बात में विद्रोह और छन्द-विमुखता का एकान्त समर्थन कभी रचनात्मक नहीं हो सकता। विद्रोह का शास्त्र शब्दों के घटाजाल से चाहे कितना भी आकर्षक क्यों न बनाया जाए, इसका विस्फरण कुछ समय के लिए भले ही हलचल पैदा कर दे, परन्तु इससे कोई रचनात्मक उपलब्धि नहीं होती।" अब क्या हो गया है हमें ? यही कि आज हम पाखण्डी हो गए हैं। हम बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के आगमन और उत्पाद, उनके आर्थिक और सांस्कृतिक आक्रमण और "बहुराष्ट्रीय बहू" का तो सार्वजनिक विरोध करते हैं लेकिन व्यक्तिगत जीवन में कोला गटकते हमें कोई शर्म-संकोच नहीं होता।
हमारा ध्यान इस ओर जाता ही नहीं कि हमारी जिह्वा का स्वाद हमारे शब्दों, सम्बोधनों, संस्कारों और जीवन को बर्बाद कर देगा। वात्सल्यमय, ममतामय और संवेदनशील "माँ" शब्द की जगह "मम्मी" और पिता की जगह "पापा" शब्द सम्बोधन से हमें चोट लगना बंद हो गया है। हर आम और ख़ास आदमी इसकी निन्दा तो करता है, लेकिन इसका निषेध कोई नहीं करता। देश के साधू-संत भी स्वयं के लिए "सेन्ट" सम्बोधन से गौरवान्वित होने लगे हैं। अधिकांश सन्तों का ध्यान अब आध्यात्म, ज्ञान और भक्तिमय दिव्यता पर नहीं साधनों और सुविधाओं एवं भौतिक भव्यता पर लगा हुआ दिखाई देता है। वे अपने शिष्यों-भक्तों के अभारतीय सम्बोधनों को सुनकर उन्हें रोकते-टोकते भी नहीं। वहां भी "शुभम्-सवागतम_" शब्दों को अब "टाटा" -"वेलकम" शब्दों ने धकिया दिया है। संतों के आश्रमों के भी इस रोग की चपेट में आ जाने से भारतीय आत्मसत्ता और अस्मिता बहुत ही आहत हो रही है। उसे उसका अंतिम कवच भी टूटता दिखाई दे रहा है।
हम विदेशों में जाते हैं तो वहां रह रहे भारतीय मूल के लोगों को यह सलाह देते हैं कि "ठीक है वहां की भाषा का प्रयोग किये बिना काम नहीं चलता तो बोलो वहां की भाषा, किन्तु अपने घर वापस आ कर परिवार में बच्चों, आगंतुकों-अतिथियों और घर वालों के साथ अपनी भाषा का प्रयोग तो कर ही सकते हो, करना भी चाहिए।" हमारी सलाह वे मानते भी हैं और अपने घर में अपनी मूल देशी भाषा का प्रयोग करते भी हैं, वहीं जन्में उनके बच्चे भी अपनी मातृ (माँ की) भाषा में बात करते हैं। लेकिन यहां, अपने देश में अपनी भाषा को हीनता का पर्याय मानकर अंग्रेजी बोलने को प्रगतिशील और आधुनिक होना माना जाता है। हम अपने दुधमुहें बच्चों को आकाश दिखाते हैं तो उस पर उगे तारों-नक्षत्रों को "तारे-सितारे" न कहकर "स्टार" कहने के लिए उन्हें प्रेरित करते हैं। विदेशी चोर और तस्कर हमारे राष्ट्र और लोकधर्म पर डाका डाल रहे हैं और हम हैं कि अपनी भाषा और बोली बोलने में भी लजाते हैं। माँ को "मम्मी" और पिता को "पापा" सम्बोधन सुनकर हमें सुखानुभूति होती है कि हमारे बेटे-बेटियां अंग्रेजी बोलते हैं। इतनी चेतावनियों, इनकी सलाहों और इतने अनुभवों के बाद भी हम अपनी आत्मसत्ता में स्थित न होकर पश्चिमी जूठन को भगवान् के प्रसाद की तरह खाते हैं और इस जूठन-जेवन में आधुनिक होने की गौरवानुभूति करते हैं। विदेशी भाषा, विदेशी विचार, विदेशी चरित्र, विदेशी पहनावा, विदेशी खानपान और विदेशी सम्बोधन को हमने हमारे देशी प्राण-धर्म का प्राण हरण करने की पूरी छूट दे रखी है। स्वदेशी और देशीपन केवल भाषणों-प्रवचनों और राजनीतिक रणनीति तक सिमट कर रह गया है।
मौका मिलते ही हम विदेशी चमक-दमक, विदेशी विचार, विदेशी उत्पाद और विदेशी व्यक्तियों की परिक्रमा करने लगते हैं कि जैसे हमारे पास कभी कुछ था ही नहीं, जैसे हमारे पास आज भी कुछ नहीं है और यदि इन्हें नहीं पकड़ा तो कल भी कुछ नहीं रहेगा। अपने विषय में यह अविश्वास, अपने प्रति यह अनास्था, यह असंयम, हमारा यह आतंकित भविष्य और हमारी यह परावलम्बिता हमारे भारत देश को काया-वाचा-मनसा गुलाम बना रही है। यदि हम समय रहते चेते-जागे नहीं, यदि हमने अपने श्रेष्ठ पुरुषों की चेतावनियों पर कान नहीं दिया, यदि हमने उनके अनुभवों और अनुभूतियों को आत्मसात नहीं किया और यदि स्वयं को विदेशी चश्में और विदेशी आँखों से देखने के लिए हम इसी तरह अपनी देशी आँख फाड़ लेते रहे तो न तो हमारी आत्मसत्ता शेष रहेगी और न अस्मिता। फिर हमारा भारत वह भारत नहीं रहेगा जिसका विधाता ने बड़ी जतन और विशिष्ट रूप से विश्व कल्याण के लिए सृजन किया है। शेष रह जाएगा केवल पाखण्ड, केवल प्रलाप, केवल प्रवचन, केवल खुशफहमी और भारतीय होने की गलतफहमी। "वयं राष्ट्रे जाग्रयामः पुरोहिता" की वेद ऋचा का आह्वान यदि हमारे संतों, नेताओं, माताओं, अध्यापकों, विज्ञानियों, व्यवसायियों और किसानों ने न सुना-माना तो यह प्रश्न हमसे कोई और पूछेगा कि हम क्यों मरे-मिटे से नाम शेष होने की ओर बढ़ रहे हैं। और हमारे पास इसका कोई उत्तर नहीं होगा।

प्रस्तुति-पं. कृष्ण मोहन शास्त्री 'मनोज'

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