मंगलवार, 21 अगस्त 2018

दोहा में गण

दोहा रचना में गण व्यवस्था 
*
सरस्वती को नमन कर, हुई लेखनी धन्य। 
शब्द साधना से नहीं, श्रेष्ट साधना अन्य
रमा रहा जो रमा में, उससे रुष्ट रमेश

भक्ति-शक्ति संपन्न है, दोहा दिव्य दिनेश
भाषा-सागर मथ मिला, गीतिकाव्य रस कोष
समय शंख दोहा करे, सदा सत्य का घोष
गीति काव्य रस गगन में, दोहा दिव्य दिनेश
अन्य छंद शशि-तारिका, वे सुर द्विपदि सुरेश

चलते-चलते 
किस मिस को कर मिस रहे, किस मिस को किस आप.
देख मिसेस को हो गया, प्रेम पुण्य से पाप.

*


दोहा में होता सदा, युग का सच ही व्यक्त.
देखे दोहाकार हर, सच्चे स्वप्न सशक्त..
 - सलिल

दोहा साक्षी समय का, कहता है युग सत्य।
ध्यान समय का जो रखे, उसको मिलता गत्य॥



शुचिर्दक्षः शान्तः सुजनः विनतः सूनृत्ततरः.
कलावेदी विद्वानति मृदुपदः काव्य चतुरः.
रसज्ञौ दैवज्ञः सरस हृदयः सतकुलभवः.
शुभाकारश्ददं दो गुण विवेकी सच कविः.


अर्थात-

नम्र निपुण सज्जन विनत, नीतिवान शुचि शांत.
काव्य-चतुर मृदु पद रचें, कहलायें कवि कान्त.
जो रसज्ञ-दैवज्ञ हैं, सरस हृदय सुकुलीन.
गुनी विवेकी कुशल कवि, होता यश न मलीन.
 


ठोंका-पीटा-बजाया, साधा सधा न वाद्य.
बिना चबाये खा लिया, नहीं पचेगा खाद्य.. 

मनु जी! आपने अंग्रेज दोहाकार स्व. श्री फ्रेडरिक पिंकोट द्वारा रचे गए दोहों का अर्थ जानना चाहा है. यह स्वागतेय है. आपने यह भी अनुभव किया कि अंग्रेज के लिए हिन्दी सीखना और उसमें दोहा को जानकार दोहा रचना कितना कठिन रहा होगा. श्री पिंकोट का निम्न सोरठा एवं दोहा यह भी तो कहता है कि जब एक विदेशी और हिन्दी न जाननेवाला इन छंदों को अपना सकता है तो हम भारतीय इन्हें सिद्ध क्यों नहीं कर सकते? पाशं केवा इच्छाशक्ति का है, छंद तो सभी को गले लगाने के लिए उत्सुक है. 

बैस वंस अवतंस, श्री बाबू हरिचंद जू.
छीर-नीर कलहंस, टुक उत्तर लिख दे मोहि.


शब्दार्थ: बैस=वैश्य, वंस= वंश, अवतंस=अवतंश, जू=जी, छीर=क्षीर=दूध, नीर=पानी, कलहंस=राजहंस, तुक=तनिक, मोहि=मुझे.

भावार्थ: हे वैश्य कुल में अवतरित बाबू हरिश्चंद्र जी! आप राजहंस की तरह दूध-पानी के मिश्रण में से दूध को अलग कर पीने में समर्थ हैं. मुझे उत्तर देने की कृपा कीजिये.

श्रीयुत सकल कविंद, कुलनुत बाबू हरिचंद.
भारत हृदय सतार नभ, उदय रहो जनु चंद.


भावार्थ: हे सभी कवियों में सर्वाधिक श्री संपन्न, कवियों के कुल भूषण! आप भारत के हृदयरूपी आकाश में चंद्रमा की तरह उदित हुए हैं.

सुविख्यात सूफी संत अमीर खुसरो (संवत १३१२-१३८२) 

गोरी सोयी सेज पर, मुख पर डारे केस.
चल खुसरो घर आपने, रैन भई चहुँ देस..

खुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग.
तन मेरो मन पीउ को, दोउ भये इक रंग..

सजन सकारे जायेंगे, नैन मरेंगे रोय.
विधना ऐसी रैन कर, भोर कभी ना होय..




सोचै सोच न होवई, जे सोची लखवार. 
चुप्पै चुप्प न होवई, जे लाई लिवतार..
इक दू जीभौ लख होहि, लाख होवहि लख वीस.
लखु लखु गेडा आखिअहि, एकु नामु जगदीस..
*
सरसुती के भंडार की, बड़ी अपूरब बात.
ज्यों खर्चे त्यों-त्यों बढे, बिन खर्चे घट जात.

समय बिताने के लिए, करना है कुछ काम.
शुरू करो अन्त्याक्षरी, लेकर हरी का नाम. 


"जो तोको काँटा बुवै, ताहि बोय तू फूल।
तोको फूल को फूल है, वाको है तिरसूल॥"

होनी तो होकर रहे, अनहोनी ना होय.
जाको राखे साइयां, मार सके नहिं कोय. 

"तुलसी भरोसे रामके, निरभय होके सोय।
अनहोनी होनी नहीं, होनी हो सो होय॥"


"जाको राखे साइयां, मार सके ना कोय।
बाल न बाँका कर सके, जो जग बैरी होय॥"

"तुलसी जस भवितव्यता, तैसी मिले सहाय।
आप न जाए ताहि पे, ताहि तहाँ ले जाय॥"

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