बुधवार, 13 दिसंबर 2017

दोहा दुनिया

सुबह जगें शिव-शिव कहें,
होंगी शिवा प्रसन्न.
कार्तिक रक्षें, गजानन
हरें विघ्न आसन्न.
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शिव संयममय श्वास हैं,
शिव मंगलमय आस.
करें अशुभ को शुभ सतत,
मेट जगत का त्रास.
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शिव सचेत, निष्क्रिय नहीं,
शिव न तपस्वी मात्र.
शिव पल-पल सो-जागते,
शिव पुजते नवरात्र.
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भिन्न नहीं हैं शिव-शिवा,
इसमें उसका रूप.
उसमें इसके प्राण हैं,
दोनों तत्व अरूप.
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शिवा सलिल, शिव अग्नि हैं,
काम-अकाम सुसंग.
भाव-अभाव स्वभाव है,
ऊर्जा पुंज तरंग.
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