शनिवार, 7 जुलाई 2018

दोहा सलिला

दोहा सलिला:
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अधिक कोण जैसे जिए, नाते हमने मीत। 
न्यून कोण हैं रिलेशन, कैसे पाएँ प्रीत।। 
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हाथ मिला; भुज भेंटिए, गले मिलें रह मौन। 
किसका दिल आया कहाँ बतलायेगा कौन?
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रिमझिम को जग देखता, रहे सलिल से दूर।
रूठ गया जब सलिल तो, उतरा सबका नूर
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माँ जैसा दिल सलिल सा, दे सबको सुख-शांति
ममता के आँचल तले, शेष न रहती भ्रांति
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वाह, वाह क्या बात है, दोहा है रस-खान।
पढ़; सुन-गुण कर बन सके, काश सलिल गुणवान
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आप कहें जो वह सही, एक अगर ले मान
दूजा दे दूरी मिटा, लोग कहें गुणवान
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यह कवि सौभाग्य है, कविता हो नित साथ
चले सृजन की राह पर, लिए हाथ में हाथ
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बात राज की एक है, दीप न हो नाराज
ज्योति प्रदीपा-वर्तिका, अलग न करतीं काज
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कभी मान-सम्मान दें, कभी लाड़ या प्यार
जिएँ ज़िंदगी साथ रह, करें मान-मनुहार
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साथी की सब गलतियाँ, विहँस कीजिए माफ़
बात न दिल पर लें कभी, कर सच्चा इंसाफ
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साथ निभाने का यही, पाया एक उपाय
आपस में बातें करें, बंद न हो अध्याय
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खुद को जो चाहे कहो, दो न और को दोष
अपना गुस्सा खुद पियो, व्यर्थ गैर पर रोष
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सबक सृजन से सच मिला, आएगा नित काम
नाम मिले या मत मिले, करे न प्रभु बदनाम
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जो न सके कुछ जान वह, सब कुछ लेता जान
जो भी शब्दातीत है, सत्य वही लें मान
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ममता छिप रहती नहीं, लिखा न जाता प्यार। 
जिसका मन खाली घड़ा, करे शब्द-व्यवहार।।
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७.७.२०१८, ७९९९५५९६१८  

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