रविवार, 8 जुलाई 2018

मन के दोहे

मन के दोहे
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मन जब-जब उन्मन हुआ, मन ने थामी बाँह।
मन से मिल मन शांत हो,  सोया आँचल-छाँह।।
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मन से मन को राह है, मन को मन की चाह।
तन-धन हों यदि सहायक, मन पाता यश-वाह।।
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चमन तभी गुलजार हो, जब मन को हो चैन।
अमन रहे तब जब कहे,  मन से मन मृदु बैन।।
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द्वेष वमन जो कर रहे, दहशत जिन्हें पसंद।
मन कठोर हो दंड दो, मिट जाए छल-छंद।।
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मन मंजीरा हो रहा, तन कीर्तन में लीन।
मनहर छवि लख इष्ट की, श्वास-आस धुन-बीन।।
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नेह-नर्मदा सलिल बन, मन पाता आनंद।
अंतर्गमन में गूँजते, उमड़-घुमड़कर छंद।।
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मन की आँखें जब खुलीं, तब पाया आभास।
जो मन से अति दूर है, वह मन के अति पास।।
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मन की सुन चेता नहीं, मनुआ बेपरवाह।
मन की धुन पूरी करी, नाहक भरता आह।।
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मन की थाह अथाह है, नाप सका कब-कौन।
अंतर्गमन में लीन हो, ध्यान रमाकर मौन।।
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धुनी धूनि सुलगा रहा, धुन में हो तल्लीन।
मन सुन-गुन सुन-गुन करे, सुने बिन बजी बीन।।
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मन को मन में हो रहे, हैं मन के दीदार।
मन से मिल मन प्रफुल्लित, सिर पटरे दीवार।।
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८.७.२०१८, ७९९९५५९६१८ 

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