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शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

हरिऔध, साधना वर्मा, गीतिका श्रीव, खड़ी बोली

हरिऔध स्मृति अनुष्ठान
सब मिल हिंद और हिंदी की करें आरती।
हो प्रसन्न दें वर नव आशा मातु भारती।।
अनिल अंगिरा पवन अपर्णा ईशाना मिल
यायावर संजीव विनय सह सुमन सकें खिल।
भगवान विराजें, राम किशोर प्रांजल
कुसुम सरोज नीलिमा नीलम अलका निर्मल।
गिरि कैलाश सरोज भावना संगीता शुभ
गोकुल में गोपाल सुरेश मनोहर प्रातिभ।
विजय विवेक हिमांशु हर्ष अमिताभ हो उदित
संदीप प्रदीप प्रगीत मनोज बिहारी प्रमुदित।
पुरुषोत्तम वीरेंद्र कीर्ति दस दिश गुंजित हो ३७ /१
राघवेश सोनम शशि खुशबू दीप जलाएँ
गीत प्रियंका सुना, कला अरविन्द दिखाएँ
मन महेंद्र बल राम बने, नव सूर्य उदय हो ९
सिंह अयोध्या के हरिऔध कृपालु सदय हो।
प्रिय प्रवास, रस कलश, अधखिला फूल धरोहर
वैदेही वनवास, रुक्मिणी परिणय रचकर।
कवि सम्राट, चौपदे चोखे-चुभते देकर
पारिजात, वेनिस का बाँका ज्यों रत्नाकर।
हिन्दी भाषा अरु साहित्य विकास कहानी
चंद्र खिलौना, खेल तमाशा कथा लुभानी।
बाल विलास-विभव, उपदेश कुसुम मन भाए
चाँद सितारे, पद्म प्रसून न युग बिसराए।
लिखी बाल गीतावली, चंदा मामा कृतियाँ
फूल-पत्ते अरु कल्पलता हिन्दी की निधियाँ।
ठाठ ठेठ हिन्दी का बिसरा समय न पाए
बोलचाल, इतिवृत्त सरुआजन की जय जय गाए।
हैं हरिऔध सूर्य हिन्दी के अजर-अमर भी।
कृतियाँ करतीं आप समय के साथ समर भी।
'सलिल' धन्य अभिषेक करे, पद प्रक्षालन भी
है साहित्य ज्ञानवर्धक अरु मन भावन भी।
दें युग को आशीष बने हिन्दी जगवाणी
भारत-भाषा विकसे-फूले जग कल्याणी
०००
खड़ी बोली की विशेषतायें
अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'*
इस समय खड़ी बोली की कविता में शब्द-विन्यास का जो स्वातन्त्रय फैला हुआ है, उसके विषय में विशेष लिखने के लिए मेरे पास स्थान का संकोच है। मैं केवल 'वैदेही-वनवास' के प्रयोगों पर ही अर्थात् उसके कुछ शब्द-विन्यास की प्रणाली पर ही प्रकाश डालना चाहता हूँ। इसलिए कि हिन्दी-भाषा के गण्यमान्य विद्वानों की उचित सम्मति सुनने का अवसर मुझको मिल सके। मैं यह जानता हूँ कि कितने प्रयोग वाद-ग्रस्त हैं, मुझे यह भी ज्ञान है कि मत-भिन्नता स्वाभाविक है, किन्तु यह भी विदित है 'वादे' 'वादे' जायते तत्तव बोध:।

हिन्दी भाषा की कुछ विशेषतायें हैं, वह तद्भव शब्दों से बनी है, अतएव सरल और सीधी है। अधिक संयुक्ताक्षरों का प्रयोग उसमें वांछनीय नहीं, वह उनको भी अपने 'ढंग में ढालती रहती है। वह राष्ट्र-भाषा-पद पर आरूढ़ होने की अधिकारिणी है, इसलिए ठेठ प्रान्तीय-शब्दों का अथवा ग्राम्य-शब्दों का प्रयोग उसमें अच्छा नहीं समझा जाता। ब्रज-भाषा अथवा अवधी शब्दों का व्यवहार गद्य में कदापि नहीं किया जाता। परन्तु पद्य में कवि-कर्म की दुरूहताओं के कारण यदि कभी कोई उपयुक्त शब्द खड़ी बोलचाल की कविता में ग्रहण कर लिया जाता है, तो वह उतना आपत्तिजनक नहीं माना जाता, किन्तु क्रियाएँ उनकी कभी पसन्द नहीं की जातीं। कुछ सम्मति उपयुक्त शब्द-ग्रहण की भी विरोधिनी है, परन्तु यह अविवेक है। यदि अत्यन्त प्रचलित विदेशी शब्द ग्राह्य हैं, तो उपयुक्त सुन्दर ब्रज-भाषा और अवधी के शब्द आग्राह्य क्यों? वह भी पद्य में, और माधुर्य उत्पादन के लिए। बहुत से प्रचलित विदेशी शब्द हिन्दी-भाषा के अंग बन गये हैं, इसलिए उसमें उनका प्रयोग निस्संकोच होता है। वह अवसर पर अब भी प्रत्येक विदेशीय भाषा के उन शब्दों को ग्रहण करती रहती है, जिन्हें उपयोगी और आवश्यक समझती है, इसी प्रकार प्रान्त-विशेष के शब्दों को भी। किन्तु व्यापक संस्कृत-शब्दावली ही उसका सर्वस्व है और इसी से उसका समुन्नति-पथ भी विस्तृत होता जा रहा है।

हिन्दी-भाषा की विशेषताओं का ध्यान रखकर ही उसके गद्य-पद्य का निर्माण होना चाहिए। जब तद्भव शब्द ही उसके जनक हैं, तो उसमें उसका आधिक्य स्वाभाविक है। अतएव जब तक हम ऑंख, कान, नाक, मुँह लिख सकते हैं, तब तक हमें अक्ष, कर्ण, नासिका, और मुख लिखने का अनुरक्त न होना चाहिए, विशेषकर मुहावरों में। मुहावरे तद्भव शब्दों से ही बने हैं। अतएव उनमें परिवर्तन करना भाषा पर अत्याचार करना होगा। ऑंख चुराना, कान भरना, नाक फुलाना और मुँह चिढ़ाना के स्थान पर अक्ष चुराना, कर्ण भरना, नासिका फुलाना और मुख चिढ़ाना हम लिख सकते हैं, किन्तु यह भाषाभिज्ञता की न्यूनता होगी। कुछ लोगों का विचार है कि खड़ी बोली के गद्य और पद्य दोनों में शुध्द संस्कृत शब्दों का ही प्रयोग होना चाहिए, जिससे उसमें नियम-बध्दता रहे। वे कहते हैं, चित के स्थान पर चित्त, सिर के स्थान पर शिर और दुख के स्थान पर दु:ख ही लिखा जाना चाहिए। किन्तु वे नहीं समझते कि इससे तो हिन्दी के मूल पर ही कुठाराघात होगा। तद्भव शब्द जो उसके आधार हैं, निकल जावेंगे और संस्कृत-शब्द ही अर्थात् तत्सम शब्द ही उसमें भर जाएँगे, जो दुरूहता और असुविधा के जनक होंगे और मुहावरों को मटियामेट कर देंगे। तद्भव शब्दों को तो सुरक्षित रखना ही पड़ेगा, हाँ अर्ध्द तत्सम शब्दों के स्थान पर अवश्य तत्सम शब्द ही रखना समुचित होगा। तद्भव शब्द चिरकालिक परिवर्तन के परिणाम और बोलचाल के शब्दों के आधार हैं, इसलिए उनका त्याग तो हो ही नहीं सकता। 'कर्म' शब्द बोलचाल के प्रवाह में पड़कर पहले कम्म बना (पंजाब में अब भी 'कम्म' बोला जाता है)। यही 'कम्म' इस प्रान्त में अब काम बोला जाता है। उसको हटाकर उसकी जगह पर फिर कर्म को स्थान देना वास्तवता का निराकरण करना होगा, हाँ गद्य-पद्य लिखने में यथावसर आवश्यकतानुसार दोनों का व्यवहार किया जा सकता है, यही प्रणाली प्रचलित भी है। यही बात सब तद्भव शब्दों के लिए कही जा सकती है। रही अर्ध्द तत्सम की बात। प्राय: ऐसे शब्द ब्रज-भाषा और अवधी-भाषा के कवियों के गढ़े हुए हैं, वे बोलचाल में कभी नहीं आये, कविता ही में उनके व्यवहार उन भाषाओं के नियमानुसार उस रूप में होते आये हैं, अतएव उनको तत्सम रूप में व्यवहार करने में कोई आपत्ति नहीं हो सकती। कत्तर्र, हृदय, निर्दय का प्रयोग आज भी सर्वसाधारण में नहीं है, पहले भी नहीं था, परन्तु उन भाषाओं की कविताओं में इनका प्रयोग करतार, हिरदय, निरदय के रूप में पाया जाता है, इसलिए इनका प्रयोग खड़ी बोली की कविता में शुध्द रूप में होना ही चाहिए, ऐसा ही होता भी है।

संयुक्ताक्षरों की दुरूहता निवारण और उनकी लिपि-प्रणाली को सुगम बनाने के लिए धर्म्म, मर्म, कर्म्म को धर्म, मर्म, कर्म लिखा जाने लगा है। इसी प्रकार गर्त, आवर्त, कैवर्त आदि को गर्त, आवर्त, कैवर्त। बात यह है कि जब वर्ण के द्वित्व का उपयोग नहीं होता, एक वर्ण के समान ही वह काम देता है तब उसको दो क्यों लिखा जाए। उत्पत्ति में 'त्ति' के द्वित्व का उच्चारण होता है, इसी प्रकार सम्मति में म्म का, इसलिए उनमें उनका उस रूप में लिखा जाना आवश्यक है, अन्यथा शब्द का उच्चारण ही ठीक न होगा। किन्तु उक्त शब्दों में यह बात नहीं है, अतएव उनमें द्वित्व की आवश्यकता नहीं ज्ञात होती। इसलिए प्राय: हिन्दी में अब उनको उस रूप में लिखा जाने भी लगा है। संस्कृत के नियमानुसार भी ऐसा लिखना स-दोष नहीं है। मुनिवर पाणिनि का यह सूत्र इसका प्रमाण है। 'अचोरहाभ्यां द्वे' इसी प्रकार पंचम वर्ण के स्थान पर अनुस्वार से काम लेना भी आरम्भ हो गया है। कल(, कद्बचन, मण्डन, बन्धन और दम्पती को प्राय: लोग कलंक, कंचन, मंडन, बंधन और दंपती लिखते हैं। बहुत लोग इस प्रणाली को पसन्द नहीं करते, संस्कृत रूप में ही उक्त शब्दों का लिखना अच्छा समझते हैं। यह अपनी-अपनी रुचि और सुविधा की बात है। कथन तो यह है कि उक्त द्वित्व वर्ण और पंचम वर्ण के प्रयोग में जो परिवर्तन हो रहा है, वह आपत्ति-मूलक नहीं माना जा रहा है। इसलिए जो चाहे जिस रूप में उन शब्दों को लिख सकता है। खड़ी बोली के गद्य-पद्य दोनों में यह प्रणाली गृहीत है, अधिकतर पद्य में। श्रुतबोधकार लिखते हैं-

संयुक्ताद्यं दीर्घ सानुस्वारं विसर्ग संमिश्रं।

विज्ञेयमक्षरं गुरु पादान्तस्थं विकल्पेन॥

संयुक्त अक्षर के पहले का दीर्घ, सानुस्वार, विसर्ग संयुक्त अक्षर गुरु माना जाएगा, विकल्प से पादान्तस्थ अक्षर भी गुरु कहलाता है।

इस नियम से संयुक्त अक्षर के पहले का अक्षर सदा गुरु अथवा दीर्घ माना जावेगा। प्रश्न यह है कि क्या हिन्दी में भी यह व्यवस्था सर्वथा स्वीकृत होगी? हिन्दी में यह विषय वादग्रस्त है। रामप्रसाद को रामप्प्रसाद नहीं कहा जाता, मुख क्रोध से लाल हो गया को मुखक्क्रोध से लाल हो गया नहीं पढ़ा जाएगा। पवित्र प्रयाग को न तो पवित्रप्प्रयाग कहा जाएगा, न कार्य क्षेत्र को कार्यच्क्षेत्र पढ़ा जाएगा। संस्कृत का विद्वान् भले ही ऐसा कह ले अथवा पढ़ ले, परन्तु सर्वसाधारण अथवा हिन्दी या अन्य भाषा का विद्वान् न तो ऐसा कह सकेगा, न पढ़ सकेगा। वह तो वही कहेगा और पढ़ेगा, जो लिखित अक्षरों के आधार से पढ़ा जा सकता है या कहा जा सकता है। संस्कृत का विद्वान भी न तो गोविन्दप्रसाद को गोविन्दप्प्रसाद कहेगा न शिवप्रसाद को शिवप्प्रसाद, क्योंकि सर्वसाधारण के उच्चारण का न तो वह अपलाप कर सकता है, न बोलचाल की भाषा से अनभिज्ञ बनकर उपहास-भाजन बन सकता है। अवधी और ब्रज-भाषा में इस प्रकार का प्रयोग मिलता ही नहीं, क्योंकि वे बोलचाल के रंग में ढली हुई हैं। 'प्रभु तुम कहाँ न प्रभुता करी, के 'न' को दीर्घ बना देंगे तो छन्दो-भंग हो जाएगा। हिन्दी-भाषा की प्रकृति पर यदि विचार करेंगे और लिपि-प्रणाली की यदि रक्षा करेंगे, यदि यह चाहेंगे कि जो लिखा है वही पढ़ा जावे, थोड़ी विद्या-बुध्दि का मनुष्य भी जिस वाक्य को जिस प्रकार पढ़ता है, उसका उच्चारण उसी प्रकार होता रहे तो संयुक्त वर्ण के पहले के अक्षर को हिन्दी में दीर्घ पढ़ने की प्रणाली गृहीत नहीं हो सकती, उसमें एक प्रकार की दुरूहता है। अधिकांश हिन्दी के विद्वानों की यही सम्मति है। परन्तु हिन्दी के कुछ विद्वान् उक्त प्रणाली के पक्षपाती हैं और अपनी रचनाओं में उसकी रक्षा पूर्णतया करते हैं। संयुक्ताक्षर के पहले का अक्षर स्वभावत: दीर्घ हो जाता है जैसे-गल्प, अल्प, उत्तर, विप्र, देवस्थान, शुभ्र, सुन्दर, गर्व, पर्व, किझित, महत्तम, मुद.र आदि। ऐसे शब्दों के विषय में कोई तर्क-वितर्क नहीं है, गद्य-पद्य दोनों में इनका प्रयोग सुविधा के साथ हो सकता है और होता भी है। परन्तु कुछ समस्त शब्दों में ही झगड़ा पड़ता है और वाद उन्हीं के विषय में है। ऐसे शब्द देवव्रत, धर्म्मच्युति, गर्वप्रहरी, सुकृति-स्वरूपा आदि हैं। संस्कृत में उनका उच्चारण देवव्व्रत, धर्मच्चयुति, गर्वप्प्रहारी और सुकृति-स्स्वरूपा होगा। संस्कृत के पण्डित भाषा में भी इनका उच्चारण इसी प्रकार करेंगे। परन्तु हिन्दी-भाषा भिज्ञ इनका उच्चारण उसी रूप में करेंगे जिस रूप में वे लिखे हुए हैं। अब तक यह विषय वादग्रस्त है। गद्य में तो संयुक्त शब्दों के पहले के अक्षर को दीर्घ बनाने में कोई अन्तर न पड़ेगा, किन्तु पद्य में विशेष कर मात्रिक-छन्दों में उसके दीर्घ उच्चारण करने में छन्दो-भंग होगा, यदि पद्यकर्त्ता ने उसको दीर्घ मानकर ही उसका प्रयोग नहीं किया है। परन्तु केवल भाषा का ज्ञान रखनेवाला ऐसा न कर सकेगा; हाँ, संस्कृतज्ञ ऐसा कर सकेगा। किन्तु हिन्दी कविता करनेवालों में संस्कृतज्ञ इने- गिने ही हैं। इसीलिए इस प्रकार के प्रयोग के विरोधी ही अधिक हैं, और अधिक सम्मति उन्हीं के पक्ष में है। मेरा विचार यह है कि विकल्प से यदि इस प्रयोग को मान लिया जावे तो वह उपयोगी होगा। जहाँ छन्दोगति बिगड़ती हो वहाँ समास न किया जावे, और जहाँ छन्दोगति को सहायता मिलती हो वहाँ समास कर दिया जावे। प्राय: ऐसा ही किया भी जाता है। परन्तु समास न करनेवालों की ही संख्या अधिक है, क्योंकि सुविधा इसी में है।

ब्रज-भाषा और अवधी का यह नियम है-

'लघु गुरु गुरु लघु होत है निज इच्छा अनुसार

गोस्वामी तुलसीदास जी जैसे समर्थ महाकवि भी लिखते हैं-

बन्दों गुरु पद पदुम परागा। सरस सुवास सुरुचि अनुरागा॥

अमिय मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भवरुज परिवारू॥

पराग को परागा, अनुराग को अनुरागा, चारु को चारू और परिवार को पारिवारू कर दिया गया है।

प्रज्ञाचक्षु सूरदासजी लिखते हैं-

जसुदा हरि पालने झुलावै।

दुलरावै हलराइ मल्हावै जोई सोई कछु गावै।

मेरे लाल को आउ निंदरिया काहे न आनि सोआवै॥

जसोदा को जसुदा, जोई के 'जो' को सोई के 'सो' को और मेरे के 'मे' को लघु कर दिया गया है। गोस्वामी जी के पद्य में लघु को दीर्घ बनाया गया है।

उर्दू में तो शब्दों के तोड़ने-मरोड़ने की परवा ही नहीं की जाती। एक शे'र को देखिए-

कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर नीमकश को।

यह ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता॥

जिन शब्दों के नीचे लकीर खिंची हुई हैं वे बेतरह तोड़े-मरोड़े गये हैं। लघु को गुरु बनाने तक तो ठिकाना था, पर उक्त शे'र में अक्षर तक उड़ गये हैं, शेर का असली रूप यह होगा-

कई मेर दिल स पूछे, तर तीर नीमकश को।

य खलिश कहाँ स होती ज जिगर क पार होता।

खड़ी बोली की कविता में न तो लघु को दीर्घ बनाया जाता है और न दीर्घ को लघु। उर्दू की कविता के समान उसमें शब्दों का संहार भी नहीं होता। परन्तु कुछ परिवर्तन ऐसे हैं जिनको उसने स्वीकार कर लिया है। 'अमृत' शब्द तीन मात्र का है, परन्तु कभी-कभी उसको लिखा जाता है। 'अमृत' ही, परन्तु पढ़ा जाता है 'अम्मृत'। बोलचाल में उसका उच्चारण इसी रूप में होता है। बहुत लोगों का यह विचार है कि 'मृ' संयुक्त वर्ण है इसलिए उसके आदि के अक्षर ('अ') का गुरु होना स्वाभाविक है। इसलिए दो 'म' अमृत में नहीं लिखा जाता। परन्तु 'ऋ' युक्त वर्ण संयुक्त वर्ण नहीं माना जाता, इसलिए यह विचार ठीक नहीं है। परन्तु उच्चारण लोगों को भ्रम में डाल देता है। इसलिए उसका प्रयोग प्राय: अमृत के रूप में ही होता है। कभी-कभी छन्दो-गति की रक्षा के लिए 'अमृत' भी लिखा जाता है। संस्कृत का हलन्त वर्ण हिन्दी में विशेष कर कविता में प्राय: हलन्त नहीं लिखा दिखलाता, उसको सस्वर ही लिखते हैं। 'विद्वान' को इसी रूप में लिखेंगे, इसके 'न' को हलन्त न करेंगे। इसमें सुविधा समझी जाती है। संस्कृत में वर्ण-वृत्त का प्रचार है, उसमें हलन्त वर्ण को गणना के समय वर्ण माना ही नहीं जाता-

'रामम् रामानुजम् सीताम् भरतम् भरतानुजम्।

सुग्रीवम् बालि सूनुम् च प्रणमामि पुन: पुन:॥

अनुष्टुप छन्द का एक-एक चरण आठ वर्ण का होता है। यदि इस पद्य में वर्णों की गणना करके देखें तो ज्ञात हो जाएगा कि सब हलन्त वर्ण गणना में नहीं आते। परन्तु मात्रिक छन्दों में वह लघु माना ही जावेगा, इसलिए उसे हलन्त न करने की प्रणाली चल पड़ी है। परन्तु यह प्रणाली भी वाद-ग्रस्त है। हिन्दी-लेखक प्रायश: पद्य में हलन्त न लिखने के पक्षपाती हैं, परन्तु संस्कृत के विद्वान् उसके लिखे जाने के पक्ष में हैं। व्रज-भाषा और अवधी में भी हलन्त वर्ण को सस्वर कर देते हैं, जैसे-मर्म को मरम, भ्रम को भरम, गर्व को गरब, पर्व को परब, आदि। हिन्दी में चंचल लड़की, दिव्य ज्योति, स्वच्छ सड़क, सरस बातें, सुन्दर कली, कहने और लिखने की प्रण्ली है। कुछ लोग समझते हैं कि इस प्रकार लिखना अशुध्द है। चंचला लड़की, दिव्या ज्योति, स्वच्छा सड़क, सरसा बातें और सुन्दरी कली लिखना शुध्द होगा। किन्तु यह अज्ञान है। संस्कृत-नियम से भी प्रथम प्रयोग शुध्द है। मुनिवर पाणिनि का निम्नलिखित सूत्र इसका प्रमाण है-

'पुंवत् कर्म्मधारय जातीय देशेषु'

दूसरी बात यह कि संस्कृत के सब नियम यथातथ्य हिन्दी में नहीं माने जाते, उनमें अन्तर होता ही रहता है। आत्मा, पवन, वायु संस्कृत में पुल्लिंग हैं, किन्तु हिन्दी में वे स्त्री-लिंग लिखे जाते हैं। भारतेन्दु जी जैसे हिन्दी भाषा के प्रगल्भ विद्वान् लिखते हैं-

'सन सन लगी सीरी पौन चलन,

सहृदयवर बिहारीलाल कहते हैं-

'तुमहूँ लागी जगत गुरु जगनायक जगवाय'

कविवर वृन्द का यह कथन है-

बिना डुलाए ना मिलै ज्यों पंखा की पौन]

मैं पहले कह आया हूँ कि हिन्दी-भाषा की जो विशेषतायें हैं उन्हें सुरक्षित रखना होगा, वास्तवता यही है अन्यथा उसमें कोई नियम न रह जावेगा। समय परिवर्तनशील है, उसके साथ संस्कृति, भाषा, विचार, रहन-सहन, रंग-ढंग, वेश-भूषा आदि सब परिवर्त्तित होते हैं। परन्तु उसकी भी सीमा है और उसके भीतर भी नियम हैं। वैदिक-काल से अब तक भाषा में परिवर्त्तन होते आये हैं। संस्कृत के बाद प्राकृत, प्राकृत के उपरान्त अपभ्रंश; अपभ्रंश से हिन्दी का प्रादुर्भाव हुआ। एक संस्कृत से कितनी प्राकृत भाषाएँ बनीं और परस्पर उनमें कितना रूपान्तर हुआ, यह भी अविदित नहीं है। अन्य भाषाओं को छोड़ दीजिए, हिन्दी को ही गवेषणा-दृष्टि से देखिये तो उसके ही अनेक रूप दृष्टिगत होते हैं। शौरसेनी के अन्यतम रूप अवधी, व्रज-भाषा और खड़ी बोली हैं, किन्तु इन्हीं में कितना विभेद दिखलाता है। 'अवधी' जिसमें गोस्वामीजी का लोक-पूज्य रामचरितमानस सा लोकोत्तर ग्रंथ है, जायसी का मनोहर ग्रन्थ पद्मावत है, आज उतनी आदृत नहीं है। जो वज्र-भाषा अपने ही प्रान्त में नहीं, अन्य प्रान्तों में भी सम्मानित थी; पंजाब से बंगाल तक, राजस्थान से मध्य हिन्द तक जिसकी विजय-वैजयन्ती उड़ रही थी, जो प्रज्ञाचक्षु सूरदास की अलौकिक रचना ही से अलंकृत नहीं है, समादरणीय सन्तों और बड़े-बड़े कवियों अथवा महाकवियों की कृतियों से भी मालामाल है। पाँच सौ वर्ष से भी अधिक जिसकी विजय-दुंदुभी का निनाद होता रहा है, आज वह भी विशाल कविता क्षेत्र से उपेक्षित है, यहाँ तक कि खड़ी बोली कविता में उसके किसी शब्द का आ जाना भी अच्छा नहीं समझा जाता। इन दिनों कविता-क्षेत्र पर खड़ी बोली का साम्राज्य है और उसकी विशेषताओं की ओर इन दिनों सबकी दृष्टि है। हिन्दी-भाषा के अन्तर्गत व्रज-भाषा, अवधी, बिहारी, राजस्थानी, बुन्देलखण्डी और मध्य हिन्द की सभी प्रचलित बोलियाँ हैं। किन्तु इस समय प्रधानता खड़ी बोली की है। यथा काल जैसे शौरसेनी और व्रज-भाषा का प्रसार था, वैसा ही आज खड़ी बोली का बोल-बाला है। आज दिन कौन सा प्रान्त है, जहाँ खड़ी बोली का प्रसार और विस्तार नहीं। हिन्दी-भाषा के गद्य रूप में जिसका आधार खड़ी बोली है, भारतवर्ष के किस प्रधान नगर से साप्ताहिक और दैनिक पत्र नहीं निकलते। उसके पद्य-ग्रंथों का आदर भारत व्यापी है इसलिए खड़ी बोली आज दिन मँज गयी है और उसका रूप परिमार्जित हो गया है। व्रज-भाषा और अवधी आदि कुछ बोलियाँ अब भी समादरणीय हैं, अब भी उनमें सत्कविता करने वाले सज्जन हैं, विशेष कर व्रज-भाषा में। परन्तु उन पर अधिकतर प्रान्तीयता का रंग चढ़ा हुआ है। यदि इस समय भारत-व्यापिनी कोई भाषा है तो खड़ी बोली ही है। पचास वर्ष में वह जितनी समुन्नत हुई, उतनी उन्नति करते किसी भाषा को नहीं देखा गया। उर्दू के प्रेमी जो कहें, पर वह हिन्दी की रूपान्तर मात्र है और उसी की गोद में पली है। और इसीलिए कुछ प्रान्तों में समाद्रित भी है। हिन्दी-भाषा के योग्य एवं गण्यमान्य विबुधों ने खड़ी बोली को जो रूप दिया है और जिस प्रकार उसे सर्व गुणालंकृत बनाया है वह उल्लेखनीय ही नहीं अभिनन्दनीय भी है। अब भी उसमें देश काल की आवश्यकताओं पर दृष्टि रखकर उचित परिवर्तन होते रहते हैं। वास्तव बात यह है कि खड़ी बोली की हिन्दी का स्वरूप इस समय सन्तोषजनक और सर्वांग पुष्ट है। इधर थोड़े दिनों से कुछ लोगों की उच्छृंखलता बढ़ गयी है, मनमानी होने लगी है। मुहावरे भी गढ़े जाने लगे हैं और कुछ मनमाने प्रयोग भी होने लगे हैं, किन्तु इसके कारण अनभिज्ञता, अपरिपक्वता और प्रान्तीयता हैं। भाषा में ही नहीं, भावों में भी कतर-ब्योंत हो रहा है, आसमान के तारे तोड़े जा रहे हैं, स्वतन्त्रता के नाम पर मनस्विता का डिंडिम नाद कर कला को विकल बनाया जा रहा है या प्रतिभा उद्यान में नये फूल खिलाए जा रहे हैं। किन्तु ए मानस-उदधि की वे तरंगें हैं जो किसी समय विशेष रूप में तरंगित होकर फिर यथाकाल अपने यथार्थ रूप में विलीन हो जाती हैं। भाषा का प्रवाह सदा ऐसा ही रहा है और रहेगा। परन्तु काल का नियंत्रण भी अपना प्रभाव रखता है, उसकी शक्ति भी अनिवार्य है।

मैंने हिन्दी-भाषा के आधुनिक रूप (खड़ी बोली) के प्रधान प्रधान सिध्दान्तों के विषय में जो थोड़े में कहा है, वह दिग्दर्शन मात्र है। अधिक विस्तार सम्भव न था। उन्हीं पर दृष्टि रखकर मैंने 'वैदेही-वनवास' के पद्यों की रचना की है। कवि-कर्म की दुरूहता मैंने पहले ही निरूपण की है, मनुष्य भूल और भ्रान्ति रहित होता नहीं। महाकवि भी इनसे सुरक्षित नहीं रह सके। कवितागत दोष इतने व्यापक हैं कि उनसे बड़े-बड़े प्रतिभावान् भी नहीं बच सके। मैं साधारण विद्या, बुध्दि का मनुष्य हूँ, इन सब बातों से रहित कैसे हो सकता हूँ। विबुधवृन्द और सहृदय सज्जनों से सविनय यही निवेदन है कि ग्रंथ में यदि कुछ गुण हों तो वे उन्हें अपनी सहज सदाशयता का प्रसाद समझेंगे, दोष-ही-दोष मिलें तो अपनी उदात्त चित्त-वृत्ति पर दृष्टि रखकर एक अल्प विषयामति को क्षमा दान करने की कृपा करेंगे।

दोहा

जिसके सेवन से बने पामर नर-सिरमौर।

राम रसायन से सरस है न रसायन और॥

-हरिऔध 5-2-40



हरिऔध : एक परिचय 
अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध'(१५ अप्रैल, १८६५-१६ मार्च, १९४७) हिन्दी के कवि, निबन्धकार तथा सम्पादक थे। उन्होंने हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापति के रूप में कार्य किया। वे सम्मेलन द्वारा विद्यावाचस्पति की उपाधि से सम्मानित किये गए थे। उन्होंने प्रिय प्रवास नामक खड़ी बोली हिंदी का पहला महाकाव्य लिखा जिसे मंगलाप्रसाद पारितोषिक से सम्मानित किया गया था।

जीवनवृत

हरिऔध जी का जन्म उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के निजामाबाद नामक स्थान में हुआ। उनके पिता का नाम पंडित भोलानाथ उपाध्याय था। प्रारंभिक शिक्षा निजामाबाद एवं आजमगढ़ में हुई। पांच वर्ष की अवस्था में इनके चाचा ने इन्हें फारसी पढ़ाना शुरू कर दिया था। निजामाबाद से मिडिल परीक्षा पास करने के पश्चात हरिऔध जी काशी के क्वींस कालेज में अंग्रेज़ी पढ़ने के लिए गए, किन्तु स्वास्थ्य बिगड़ जाने के कारण उन्हें कॉलेज छोड़ना पड़ा। उन्होंने घर पर ही रह कर संस्कृत, उर्दू, फ़ारसी और अंग्रेजी आदि का अध्ययन किया और १८८४ में निजामाबाद में इनका विवाह निर्मला कुमारी के साथ सम्पन्न हुआ। सन १८८९ में हरिऔध जी को सरकारी नौकरी मिल गई। वे कानूनगो हो गए। इस पद से सन १९३२ में अवकाश ग्रहण करने के बाद हरिऔध जी ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में अवैतनिक शिक्षक के रूप से कई वर्षों तक अध्यापन कार्य किया। सन १९४१ तक वे इसी पद पर कार्य करते रहे। उसके बाद वह निजामाबाद वापस चले आए। इस अध्यापन कार्य से मुक्त होने के बाद हरिऔध जी अपने गाँव में रह कर ही साहित्य-सेवा कार्य करते रहे। अपनी साहित्य-सेवा के कारण हरिऔध जी ने काफी ख़्याति अर्जित की। हिंदी साहित्य सम्मेलन ने उन्हें एक बार सम्मेलन का सभापति बनाया और विद्यावाचस्पति की उपाधि से सम्मानित किया। सन् १९४७ ई० में निजामाबाद में इनका देहावसान हो गया।

रचनाएँ

उन्होंने ने ठेठ हिंदी का ठाठ , अधखिला फूल , 'हिंदी भाषा और साहित्य का विकास' आदि ग्रंथों की भी रचना की, किन्तु मूलतः वे कवि ही थे। उनके उल्लेखनीय ग्रंथों में शामिल हैं:प्रिय प्रवास - इसका रचनाकाल १९१४ ई० है। इसमें श्रीकृष्ण के बाल्यकाल से लेकर गमन तक की घटनाओं को वर्णित किया गया है। इसमें १७ सर्ग हैं। यह हरिऔध जी का सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण ग्रंथ है। यह हिंदी खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य है। इसे मंगलाप्रसाद पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। इसका प्रारंभिक शीर्षक ‘ब्रजांगना विलाप’ था। यह एक प्रबंध काव्य है। इसे हिन्दी साहित्य की अन्य रचनाओं में "मील का पत्थर" कहा जाता है।
कवि सम्राट
वैदेही वनवास - इसका रचनाकाल १९४० ई० है। इसमें कुल १८ सर्ग हैं। यह एक प्रबंध काव्य है। इसके अब तक ४ संस्करण निकल चुके हैं। यह खड़ी बोली में रचित है। यह रामकथा पर आधारित है जब श्रीराम के द्वारा सीता को निर्वासित किया गया था। इसमें करुण रस का प्रयोग किया गया है। इसमें आम बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया गया है।
पारिजात - इसका रचनाकाल १९३७ ई० है। यह १५ सर्गों में बंटा है। इसमें विविध विषयों की कविताएं संकलित की गई हैं। यह एक महाकाव्य है। इसका प्रारंभिक शीर्षक स्वर्गीय संगीत था।
रस-कलश (1940 ई .)
चुभते चौपदे (1932 ई.)
चोखे चौपदे (1924 ई .)
ठेठ हिंदी का ठाठ
अधखिला फूल
रुक्मिणी परिणय
हिंदी भाषा और साहित्य का विकास

अनुवादवेनिस का बाँका

बाल साहित्यबाल विभव
बाल विलास
फूल पत्ते
चन्द्र खिलौना
खेल तमाशा
उपदेश कुसुम
बाल गीतावली
चाँद सितारे
पद्य प्रसून

काव्यगत विशेषताएँ

वर्ण्य विषय - हरिऔध जी ने विविध विषयों पर काव्य रचना की है। यह उनकी विशेषता है कि उन्होंने कृष्ण-राधा, राम-सीता से संबंधित विषयों के साथ-साथ आधुनिक समस्याओं को भी लिया है और उन पर नवीन ढंग से अपने विचार प्रस्तुत किए हैं। प्राचीन और आधुनिक भावों के मिश्रण से उनके काव्य में एक अद्भुत चमत्कार उत्पन्न हो गया है।

वियोग तथा वात्सल्य-वर्णन - प्रिय प्रवास में कृष्ण के मथुरा गमन तथा उसके बाद ब्रज की दशा का मार्मिक वर्णन है। कृष्ण के वियोग में सारा ब्रज दुखी है। राधा की स्थिति तो अकथनीय है। नंद यशोदा आदि बड़े व्याकुल हैं। पुत्र-वियोग में व्यथित यशोदा का करुण चित्र हरिऔध ने खींचा है, यह पाठक के हृदय को द्रवीभूत कर देता है।प्रिय प्रति वह मेरा प्राण प्यारा कहाँ है?दुःख जल निधि डूबी का सहारा कहाँ है?लख मुख जिसका मैं आज लौं जी सकी हूँ।वह हृदय हमारा नैन तारा कहाँ है?

लोक-सेवा की भावना - हरिऔध जी ने कृष्ण को ईश्वर रूप में न दिखा कर आदर्श मानव और लोक-सेवक के रूप में चित्रित किया है। उन्होंने स्वयं कृष्ण के मुख से कहलवाया है-विपत्ति से रक्षण सर्वभूत का,सहाय होना असहाय जीव का।उबारना संकट से स्वजाति का,मनुष्य का सर्व प्रधान धर्म है।

कृष्ण के अनुरूप ही राधा का चरित्र है। वे दीनों की भगिनी, अनाश्रितों की माँ और विश्व की प्रेमिका हैं। अपने प्रियतम कृष्ण के वियोग का दुःख सह कर भी वे लोक-हित की कामना करती हैं।

प्यारे आवें सु-बयन कहें प्यार से गोद लेवें।

ठंढे होवें नयन, दुख हों दूर मैं मोद पाऊँ।

ए भी हैं भाव मम उर के और ए भाव भी हैं।

प्यारे जीवें जग-हित करें गेह चाहे न आवें॥

(प्रिय प्रवास, षोडश सर्ग / ९८)


सत्कर्मी हैं परम-शुचि हैं आप ऊधो सुधी हैं।

अच्छा होगा सनय प्रभु से आप चाहें यही जो।

आज्ञा भूलूँ न प्रियतम की, विश्व के काम आऊँ।

मेरा कौमार-व्रत भव में पूर्णता प्राप्त होवे।

(प्रिय प्रवास, षोडश सर्ग / १३५ )


प्रकृति-चित्रण - हरिऔध जी का प्रकृति चित्रण सराहनीय है। अपने काव्य में उन्हें जहाँ भी अवसर मिला है, उन्होंने प्रकृति का चित्रण किया है। और उसे विविध रूपों में अपनाया है।हरिऔध जी का प्रकृति-चित्रण सजीव और परिस्थितियों के अनुकूल है। संबंधित प्राणियों के सुख में प्रकृति सुखी और दुःख में दुखी दिखाई देती है। कृष्ण के वियोग में ब्रज के वृक्ष भी रोते हैं:फूलों-पत्तों सकल पर हैं वादि-बूँदें लखातीं,रोते हैं या विपट सब यों आँसुओं की दिखा के।

जहाँ हरिऔध जी ने वृक्षों आदि को गिनाने का प्रयत्न किया है, वहाँ उनका प्रकृति-वर्णन कुछ नीरस और परंपरागत-सा लगता है, किंतु ऐसा बहुत कम हुआ है। अधिकतर उनका प्रकृति चित्रण सरल और स्वाभाविक और ह्रदयग्राही है। संध्या का एक सुंदर दृश्य:दिवस का अवसान समीप था,गगन था कुछ लोहित हो चला।तरु शिखा पर थी जब राजती,कमलिनी-कुल-वल्लभ का प्रभा।

भाषा

हरिऔध जी ने ब्रजभाषा और खड़ी बोली दोनों में ही कविता की है, किंतु उनकी अधिकांश रचनाएँ खड़ी बोली में ही हैं। हरिऔध की भाषा प्रौढ़, प्रांजल और आकर्षक है। कहीं-कहीं उसमें उर्दू-फारसी के भी शब्द आ गए हैं। नवीन और अप्रचलित शब्दों का प्रयोग भी हुआ है। संस्कृत के तत्सम शब्दों का तो इतनी अधिकता है कि कहीं-कहीं उनकी कविता हिंदी की न होकर संस्कृत की सी ही प्रतीत होने लगती है। राधा का रूप-वर्णन करते समय:रूपोद्याम प्रफुल्ल प्रायः कलिका राकेंदु-बिंबानना,तन्वंगी कल-हासिनी सुरसि का क्रीड़ा-कला पुत्तली।शोभा-वारिधि की अमूल्य मणि-सी लावण्य लीलामयी,श्री राधा-मृदु भाषिणा मृगदगी-माधुर्य की मूर्ति थी।

भाषा पर हरिऔध जी का अद्भुत अधिकार प्राप्त था। एक ओर जहाँ उन्होंने संस्कृत-गर्भित उच्च साहित्यिक भाषा में कविता लिखी वहाँ दूसरी ओर उन्होंने सरल तथा मुहावरेदार व्यावहारिक भाषा को भी सफलतापूर्वक अपनाया। उनके चौपदों की भाषा इसी प्रकार की है। एक उदाहरण लीजिए:नहीं मिलते आँखों वाले, पड़ा अंधेरे से है पाला।कलेजा किसने कब थामा, देख छिलता दिल का छाला।।

शैलीहरिऔध जी ने विविध शैलियों को ग्रहण किया है। मुख्य रूप से उनके काव्य में निम्नलिखित शैलियाँ पाईं जाती हैं-१. संस्कृत-काव्य शैली - प्रिय प्रवास में।
२. रीतिकालीन अलंकरण शैली - रस कलश में।
३. आधुनिक युग की सरल हिंदी शैली - वैदेही-वनवास में।
४. उर्दू की मुहावरेदार शैली - चुभते चौपदों और चोखे चौपदों में।

रस-छंद-अलंकार

रस - हरिऔध जी के काव्य में प्रायः संपूर्ण रस पाए जाते हैं: करुण, वियोग, शृंगार और वात्सल्य रस की पूर्णरूप से व्यंजना हुई है।

छंद - हरिऔध जी की छंद-योजना में पर्याप्त विविधता मिलती है। आरंभ में उन्होंने हिंदी के प्राचीन छंद कवित्त सवैया, छप्पय, दोहा आदि तथा उर्दू के छंदों का प्रयोग किया। बाद में उन्होंने इंद्रवज्रा, शिखरिणी, मालिनी वसंत तिलका, शार्दूल, विक्रीड़ित मंदाक्रांता आदि संस्कृत के छंदों को भी अपनाया।

अलंकार - रीतिकालीन प्रभाव के कारण हरिऔध जी अलंकार प्रिय है, किंतु उनकी कविता-कामिनी अलंकारों से बोझिल नहीं है। उनकी कविता में जो भी अलंकार हैं, वे सहज रूप में आ गए हैं और रस की अभिव्यक्ति में सहायक सिद्ध हुए हैं। हरिऔध जी ने शब्दालंकार और अर्थालंकार दोनों ही को सफलता पूर्वक प्रयोग किया है। अनुप्रास, यमक, उपमा उत्प्रेक्षा, रूपक उनके प्रिय अलंकार हैं।

विरासत

हरिऔध जी ने गद्य और पद्य दोनों ही क्षेत्रों में हिंदी की सेवा की। वे द्विवेदी युग के प्रमुख कवि है। उन्होंने सर्वप्रथम खड़ी बोली में काव्य-रचना करके यह सिद्ध कर दिया कि उसमें भी ब्रजभाषा के समान खड़ी बोली की कविता में भी सरसता और मधुरता आ सकती है। हरिऔध जी में एक श्रेष्ठ कवि के समस्त गुण विद्यमान थे। उनका 'प्रिय प्रवास' महाकाव्य अपनी काव्यगत विशेषताओं के कारण हिंदी महाकाव्यों में 'मील का पत्थर' माना जाता है। श्री सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' के शब्दों में हरिऔध जी का महत्त्व और अधिक स्पष्ट हो जाता है:

"इनकी यह एक सबसे बड़ी विशेषता है कि ये हिंदी के सार्वभौम कवि हैं। खड़ी बोली, उर्दू के मुहावरे, ब्रजभाषा, कठिन-सरल सब प्रकार की कविता की रचना कर सकते हैं।"




राष्ट्रीय भावधारा के सशक्त रचनाकार हरिऔध जी
- डॉ . साधना वर्मा


अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' (१८६५ - १९४७) द्विवेदी युग के एक ऐसे साहित्यकार हैं जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से भारतीय समाज में राष्ट्रीयता और एकता के बीज बोए। उनके साहित्य में राष्ट्रीय एकता केवल एक नारा नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना और सामाजिक समरसता का एक गहरा दर्शन है। 'हरिऔध' जी के साहित्य में राष्ट्रीय एकता के प्रमुख पहलुओं को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:पौराणिक पात्रों का आधुनिक एवं मानवीय रूप: हरिऔध जी ने 'प्रियप्रवास' जैसे महाकाव्य में कृष्ण और राधा के पारंपरिक स्वरूप को बदलकर उन्हें 'लोक-रक्षक' और 'समाज-सेवक' के रूप में प्रस्तुत किया। यह परिवर्तन व्यक्तिवाद से ऊपर उठकर राष्ट्रहित और जन-कल्याण की भावना को दर्शाता है, जो राष्ट्रीय एकता की आधारशिला है।


सामाजिक समरसता और जाति-पाति का विरोध:


हरिऔध जी ने अपने साहित्य में जातिगत भेदभाव को देश की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा माना। उनके अनुसार, गुण की पूजा होनी चाहिए, न कि किसी जाति विशेष की। जब तक समाज में ऊंच-नीच का भाव रहेगा, राष्ट्रीय एकता का स्वप्न अधूरा रहेगा।


भाषा के माध्यम से सांस्कृतिक एकता:


हरिऔध जी ने 'ठेठ हिन्दी का ठाठ' और 'अधखिला फूल' जैसे उपन्यासों के माध्यम से भाषा को आम जनमानस से जोड़ने का प्रयास किया। उनका मानना था कि एक साझा भाषा और लिपि (देवनागरी) पूरे देश को एकता के सूत्र में पिरो सकती है।


देशप्रेम और लोक-मंगल की भावना:


उनकी कविताओं में राष्ट्र के प्रति अगाध प्रेम और देशवासियों के प्रति सहानुभूति झलकती है। वे केवल हिंदू-मुस्लिम एकता की ही बात नहीं करते, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र को एक परिवार के रूप में देखते हैं जहाँ मानवता सर्वोपरि है।




समालोचनात्मक विश्लेषण


हरिऔध जी के साहित्य का मूल्यांकन करते समय यह स्पष्ट होता है कि उनकी राष्ट्रीयता समावेशी थी। जहाँ एक ओर वे प्राचीन भारतीय संस्कृति के गौरव का गान करते थे, वहीं दूसरी ओर वे समाज में व्याप्त कुरीतियों और जड़ता पर प्रहार करने से भी पीछे नहीं हटे।


सकारात्मक पक्ष:


उन्होंने भक्ति को 'लोक-सेवा' से जोड़कर राष्ट्रीय आंदोलनों के लिए एक वैचारिक धरातल तैयार किया। उनके साहित्य ने तत्कालीन जनता में स्वाभिमान और एकता का संचार किया।


आलोचना :


कुछ आलोचकों का मानना है कि उनकी भाषा कभी-कभी अत्यधिक संस्कृतनिष्ठ हो जाती थी, जो आम जनता के लिए कठिन हो सकती थी। हालांकि, उन्होंने बाद में 'बोलचाल' और 'चोखे चौपदे' जैसी रचनाओं के माध्यम से सरल और मुहावरेदार भाषा अपनाकर इस कमी को दूर किया।




निष्कर्ष


संक्षेप में, हरिऔध जी का साहित्य राष्ट्रीय एकता का एक जीवंत दस्तावेज है। उन्होंने साहित्य को केवल मनोरंजन का साधन न मानकर राष्ट्र के निर्माण और समाज के परिष्कार का सशक्त माध्यम बनाया। उनकी रचनाएं आज भी हमें यह सिखाती हैं कि सच्ची राष्ट्रीयता मानवतावाद और आपसी भाईचारे में निहित है।
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हिन्दी के सांस्कृतिक पुनर्जागरण में हरिऔध जी का अवदान
- गीतिका श्रीव
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अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' आधुनिक हिंदी साहित्य के उन स्तंभों में से हैं, जिन्होंने 'द्विवेदी युग' के दौरान अपनी रचनाओं के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना को एक नई दिशा दी। उनका साहित्य केवल कलात्मकता तक सीमित नहीं है, बल्कि वह तत्कालीन भारत की सामाजिक और राजनैतिक परिस्थितियों का जीवंत दस्तावेज़ है।
हरिऔध के साहित्य में राष्ट्रीय चेतना के प्रमुख आयाम निम्नलिखित हैं:


सांस्कृतिक पुनर्जागरण और गौरवशाली अतीत
हरिऔध ने भारतीय इतिहास और पौराणिक कथाओं को आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत किया। 'प्रियप्रवास' में उन्होंने कृष्ण को एक ईश्वर के बजाय एक लोक-नायक और जन-सेवक के रूप में चित्रित किया। उनका उद्देश्य समाज को यह समझाना था कि राष्ट्र की रक्षा और सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है।


मानवतावाद और विश्व बंधुत्व
उनकी राष्ट्रीयता संकुचित नहीं थी। उन्होंने 'विश्व-प्रेम' को राष्ट्रप्रेम का आधार माना। उनके काव्य में यह संदेश स्पष्ट है कि एक सच्चा देशभक्त वही है जो संपूर्ण मानवता के कल्याण की बात करे। 'वैदेही वनवास' में सीता का चरित्र त्याग और राष्ट्रीय गरिमा का प्रतीक बनकर उभरता है।


समाज सुधार और एकता
हरिऔध का मानना था कि जब तक समाज आंतरिक रूप से मजबूत नहीं होगा, तब तक राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है। उन्होंने अपनी रचनाओं में:छुआछूत और जातिवाद का कड़ा विरोध किया।
नारी शिक्षा और उनकी गरिमा पर बल दिया।
किसानों और मजदूरों की दयनीय स्थिति पर अपनी कलम चलाई।


स्वभाषा और स्वदेशी का गौरव
भारतेंदु युग की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने 'हिंदी' की सेवा को ही राष्ट्र की सेवा माना। उन्होंने 'ठेठ हिंदी का ठाठ' और 'अधखिला फूल' जैसी रचनाओं के माध्यम से आम बोलचाल की भाषा को सम्मान दिलाया। उनका मानना था कि निज भाषा की उन्नति ही देश की उन्नति का मूल है।


पराधीनता के विरुद्ध स्वर
उनकी कविताओं में अंग्रेजी शासन के प्रति प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से गहरा असंतोष झलकता है। उन्होंने भारतीय जनता को उनकी सोई हुई शक्ति का अहसास कराया और उनमें आत्मसम्मान की भावना जगाई।


निष्कर्ष:
संक्षेप में कहें तो हरिऔध का साहित्य उस समय के भारत का दर्पण है, जो अपनी जड़ों की ओर लौटते हुए आधुनिकता को गले लगा रहा था। उन्होंने कविता को 'रीति' के श्रृंगार से निकालकर 'राष्ट्र' के आंगन में खड़ा कर दिया।
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