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शनिवार, 4 जुलाई 2026

जुलाई ४, मुकरी, ग़ज़लिका, गीत, बरखा, सॉनेट, पर्याय, मुक्तक, बाल, दोहा गीत, कुण्डलिया

सलिल सृजन जुलाई ४
*
प्रयोगात्मक कहमुकरी
० 
मिला समर्थन सबसे ज्यादा
है वज़ीर नहिं कोई प्यादा
जनता करती जय-जयकार
क्या सखि! मोदी?
नहिं सखि! योगी।

आज कहे कल पलटी मारे
नहीं किसी का हुआ सगा रे!
जहाँ-तहाँ जाता फटकारा
क्या बंजारा?
ट्रंप बेचारा।

किसको भाता स्वेच्छाचार
कहे, न लेकिन करती प्यार
करती सबका सत्यानाश
शूर्पणखा है?
नहीं, सिया है। 

मन की बात अनकही कहती
मधुर सरस सुधियाँ हँस तहती
प्यास बुझाती जैसे सरिता
क्या सखि वनिता?
ना सखि कविता।

लहर-लहर पर लहराती है।
कलकल सुनकर सुख पाती है।।
मनभाती सुंदर मन हरती
क्या सखि सजनी?
ना सखि नलिनी।

(दोहा मुकरी )
नाप न कोई पा रहा।
सके न कोई माप।।
श्वास-श्वास में रमे यह
बढ़ा रहा है ताप।।
सूरज बेशक।
नहिं सखी है शक।
गीत 
मेघा आए
रिमझिम बरसे, 
धरा तृप्ति पाने को तरसे
.
अपने सपने सब हरियाए
दूब जमा जड़ बढ़ती जाए।
पत्ता-पत्ता झूम-झूमकर-
मादल ढोल मृदंग बजाए।
मिल इठलाए
बेल लिपटकर
तरुवर हो अवलंबन सरसे।
मेघा आए
रिमझिम बरसे, 
धरा तृप्ति पाने को तरसे...
.
ताल-तलैया-नदी पुनर्नवा
सेवन कर ज्यों हुए फिर जवां।
काढ़ा पी गिलोय का बादल
अश्वगंध पा हवा संग हवा।
सदा सुहागन
फूले हरषे
रामा-श्यामा तुलसी विकसे।
मेघा आए
रिमझिम बरसे, 
धरा तृप्ति पाने को तरसे...
.
कहे बुढ़ापा फिर बच्चा बन
दुनिया झूठी तू सच्चा बन।
पक्के भवन लगें मुर्दाघर
तू झोपड़ियों सम कच्चा बन।
नाव बहा दे
नन्हें कर से
बहती रहे, देख छिप दर से।
मेघा आए
रिमझिम बरसे, 
धरा तृप्ति पाने को तरसे...
०००
ग़ज़लिका
अवसरवादी मौका ताड़े 
किसी तरह हो, झंडा गाड़े
.
साथ रहे हरदम सत्ता के
संकट में झट पल्ला झाड़े
.
गिरते को तृण-मूल समझकर
आ जाता है पग-पग आड़े
.
झुक जाता अनुचर के आगे
बनता पैर न अगर उखाड़े
.
जैसे ही सच्चाई खुलती
होकर बेबस कपड़े फाड़े
.
हो गजराज न क्रुद्ध हमेशा
चेता जाओ गर वह चिंघाड़े
.
'सलिल' शांत हो नेह-नर्मदा
अन्यायी पा सिंह दहाड़े
४.७.२०२६
०००
बरखा गीत
रिमझिम रिमझिम बरसे बरखा, झूलें सारद मैया
रमा-उमा तालियाँ बजाएँ, पेंग देख खें दैया
टेसू की ऊँची डारी सें, लिपट रातरानी ने
बेल चमेली की महकाई, पिक कूकी बानी ने
छप छपाक् छप करतीं सखियाँ, खेलें ता ता थैया
रिमझिम रिमझिम बरसे बरखा, झूलें सारद मैया
अमुआ ब्रह्मा, बेल बैठ शिव, हरसिँगार हरि टेरें
हनुमत लला विराजे पीपल, नचे मयूरा हेरें
मुदित 'सलिल' माँ के जस गाए, बैठ नीम की छैंया
रिमझिम रिमझिम बरसे बरखा, झूलें सारद मैया
रीझ बरसता काला बादल, बिजली जलती खोट
संध्या-उषा-निशा सँग सँकुचे, सूरज झाँके ओट
चाँद-चाँदनी ढाबा खोजें, चाहें भजिया-चैया
रिमझिम रिमझिम बरसे बरखा, झूलें सारद मैया
४.७.२०२५
०0०
सॉनेट
.
नित करती सवाल फुलबगिया
पौधे-तरु जड़ कहाँ जमाएँ?
नर-पिशाच धरती कब्जाएँ है
मतलबपरस्त सब दुनिया।
सिसक रही बेबस फुलवरिया
सूर्य तपे, पौधे कुम्हलाएँ।
पवन-सलिल बिन पनप न पाएँ?
क्षुधित-तृषित भटके गौरैया।
फुलबगिया में हृदय रहे मिल
द्वैत मिटा अद्वैत वर रहे
भ्रमर-तितलियाँ करते गुंजन।
मन सचेत हो रहो न ग़ाफ़िल
भोग भोगकर व्यर्थ मत दहे
खिल महके कर भव-भय-भंजन।
३.७.२०२५
०0०
गीता ज्ञान
*
'मैं' से हो मन मुक्त यदि, 'तुम' को जाए भूल
कर कर 'हम' की साधना, हो बगिया का फूल
हो बगिया का फूल, फूलकर कुप्पा मत हो
तितली भ्रमर पराग पा सकें, देने रत हो
संचय मोह व क्रोध, अहं पालक पातक हैं
इनसे हो जो मुक्त, न उसको व्याप सके मैं
४-७-२०२१
***
शब्द, पर्याय और अर्थ
साभार सामग्री स्रोत : अर्थान्तर न्यास - डॉ. सुरेश कुमार वर्मा
*
वाक् (भाषा) :
भाषा मनुष्य की शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक शक्तियों का संघात है। मनुष्य जन्म से परिवार की शाला में भाषा के पाठ सीखता है।सीखने की भावना मनुष्य ( वअन्य जीव-जंतुओं) के रक्त में जन्मजात वृत्ति के रूप में रहती है। वह वस्तु जगत के विविध पदार्थों का ज्ञान प्राप्त और व्यक्त करता है। भाषा ज्ञेय भी है और ज्ञान भी। शैशवावस्था में भाषा ज्ञातव्य वस्तु है और जबकि विकास की परिणत अवस्थाओं में दृश्य एवं सूक्ष्म जगत के नाना स्तरों का ग्राहक ज्ञान। वस्तु जगत की क्रमशः: वर्धित जानकारी मनुष्य के मानसिक क्षेत्र में जटिल आवर्त उत्पन्न करती है जो क्रमश: भाषा के अरण्य में जटिलता उत्पन्न करते हैं। अरण्य के विरल, सघन एवं सघनतम क्षेत्रों के समान्तर भाषा के अंतर्गत अर्थों के सरल, गूढ़ एवं रहस्यात्मक स्तर निविष्ट रहते हैं। शब्दों के सजग-सतर्क नियोजन से भाषा शुद्ध, सुचारु और सहज बनती है। सतत प्रयोग से भाषा जीवन का अविभाज्य अंग बनकर लोक जीवन, दैनंदिन व्यवहार एवं आत्म-चिंतन का आधार और अंग बन जाती है। भाषा और शब्द विशेष परिस्थिति की उपज है। वह विज्ञान विशेष परिस्थिति में ही अपनी मूल भावना को व्यक्त करता है। पर्यायवाचिता उसे किसी दूसरी परिस्थिति और प्रयोग के निकट लाकर उसकी मूल भावना को आहत कर देती है। एक पर्याय सभी परिस्थितियों में प्रयुक्त नहीं किया जा सकता। पर्यायवाचिता एक सीमा तक ही क्रियाशील रह सकती है। हिंदी पर्यायवाचिता को विकास के कारण हैं - विविध भाषाओं-बोलिओं की एक क्षेत्र में एक ही समय में प्रचलित होना, आरोपित अर्थ, सांस्कृतिक प्रभाव, अपस्तरीय वाक् आदि। विशेषणों की पर्यायभावना, व पर्यायपद भी अर्थपरक दृष्टि से विचारणीय है। अर्थ की विलोमस्थिति सैद्धांतिक कम व्यावहारिक अधिक है। अर्थांतर की दृष्टि से विदेशी शब्दों (जिनसे हिंदी पर्याय युग्मों की रचना हुई) का अनुशीलन महत्वपूर्ण है। भाषा और संस्कृति में अनिवार्य समाश्रयता है। भाषा संस्कृति की पोषिका और उसके विकास की संवाहिनी है। यह संवहन अर्थ के माध्यम से होता है।
अर्थ
ध्वनि के सामान की भी परिवर्तन शील सत्ता है। ध्वनिशास्त्र के कठोर परीक्षण में किसी ध्वनि का यथावत (हू-ब-हू ) उच्चारण कठिन माना गया है। अभिव्यक्ति की भी यही स्थिति है। प्रत्येक प्रेषण में वक्त अर्थ को उसी आयाम और इयत्ता से व्यक्त कर रहा है, कहना कठिन है। अर्थ मन और बुद्धि की जटिल सारणियों से प्रवाहित होता है, उसे प्रवाहित करनेवाली बाह्य एवं आंतरिक शक्तियाँ असंख्य हैं। व्यक्ति के आशय को नाना प्रकार के ध्वनि संयोजनों में रूपायित होना पड़ता है। इससे अर्थ के विचलन की संभावना बढ़ जाती है। यह विचलित अर्थ फिर-फिर प्रयोगों से नवीन अर्थ के रूप में प्रतिष्ठित और लोकमान्य हो जाता है। अर्थ का इतिहास अर्थ परिवर्तन का इतिहास है। अर्थान्तर वाक् की मूलभूत संवेदनाओं में से एक है।
अर्थ वाक् का आरंभ भी है और अंत भी। वक्ता अपने आशय को व्यक्त करने के लिए धवनियों का संयोजन करता है और उसकी प्राप्ति के पश्चात् उसका लोप। अर्थ पद और वाक्य की केंद्रीय सत्ता है। अर्थ एक अभौतिक स्थिति है। उसकी प्रक्रिया जटिल और सूक्ष्म है। उसकी प्रवृत्तियों और परिस्थितियों के अध्ययन और मानकीकरण का प्रयास ध्वनिशास्त्र, ध्वनिग्रामशास्त्र, रूपग्रामशास्त्र आदि की तरह प्रचलित और प्रसिद्ध नहीं हो सका। हिंदी अर्थ विज्ञा पर केवल डॉ. सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या, डॉ. बाबूराम सक्सेना, डॉ. हरदेव बाहरी, डॉ. धीरेन्द्र वर्मा, डॉ, उदय नारायण तिवारी, डॉ. सुरेश कुमार वर्मा आदि ने ही कार्य किया है। डॉ. बाहरी ने ने अंग्रेजी में लिखित शोध प्रबंध 'हिंदी सेमेंटिक्स' हिंदी भाषा को अर्थविज्ञान के विविध कोणों से स्पर्श किया गया है। डॉ. केशवराम पाल का हिंदी अर्थ से सम्बद्ध शोध प्रबंध 'हिंदी में प्रयुक्त संस्कृत शब्दों के अर्थ परिवर्तन' की परिधि सीमित है। अर्थान्तर की नींव वस्तु - नामांकन के समय ही पड़ जाती है। एक नामांकन दूसरे नामांकन को जन्म देता है। इससे प्रथम में अर्थान्तर की छाया उत्पन्न हो जाती है।
वाक्य और अर्थ में अर्थवैज्ञानिक एवं व्याकरणिक संबंध है। वाक्य के भेद-प्रभेद अर्थ को भिन्न-भिन्न स्तर प्रदान करते हैं। शब्द शक्तियों काव्य वैभव में वृद्धि करती हैं। हिंदी अर्थ परिवर्तन में लक्षणा और व्यंजना का अभूतपूर्व योगदान है।
हिंदी क्रियाओं के अंतर्गत अर्थ के लक्षणात्मक परिवर्तन, विशेषार्थक व्यंजनाओं, तथा संध्वनीय भिन्नार्थी रूपों का ज्ञान रचनाकार को होना आवश्यक है।
अर्थ की दृष्टि से विशेषणों की अस्पष्टता व विसंगति, उनके प्रयोग भेद, विरुद्धार्थी विशेषणों की सापेक्ष स्थिति का परिचय स्थिर अर्थ को गतिमान कर सकता है। विशेषणों के अर्थों को प्रत्यय योजना भी प्रभावित करती है। संज्ञा और विशेषण की भिन्नार्थक समध्वनीयता रचनाओं में रोचकता और लालित्य की वृद्धि करती हैं।
क्रमश:
४-७-२०२०
***
मुक्तक - कसूर
*
ओ कसूरी लाल! तुझको कया कहूँ?
चुप कसूरों को क्षमाकर क्यों दहूँ?
नटखटी नटवर न छोडूँ साँवरे!
रास-रस में साथ तेरे हँस बहूँ.
*
तू कहेगा झूठ तो भी सत्य हो.
तू करे हुडदंग तो भी नृत्य है.
साँवरे ओ बाँवरे तेरा कसूर
जगत कहता ईश्वर का कृत्य है.
*
कौन तेरे कसूरों से रुष्ट है?
छेड़ता जिसको वही संतुष्ट है.
राधिका, बाबा या मैया जशोदा-
सभी का ऐ कसूरी तू इष्ट है.
***
: बाल कविता :
*
आन्या गुडिया प्यारी,
सब बच्चों से न्यारी।
.
गुड्डा जो मन भाया,
उससे हाथ मिलाया।
.
हटा दिया मम्मी ने,
तब दिल था भर आया।
.
आन्या रोई-मचली,
मम्मी थी कुछ पिघली।
.
''नया खिलौना ले लो'',
आन्या को समझाया।
.
शाम को पापा आए
मम्मी पर झल्लाए।
*
हुई रुआँसी मम्मी
आन्या ने ली चुम्मी।
*
बोली: ''इनको बदलो
साथ नये के हँस लो''।
***
आभार
*
आभार ही
आ भार.
वही कहे
जो सके
भार स्वीकार.
४-७-२०१७
***
दोहा गीत
*
जो अव्यक्त हो,
व्यक्त है
कण-कण में साकार
काश!
कभी हम पा सकें,
उसके भी दीदार
*
कंकर-कंकर में वही
शंकर कहते लोग
संग हुआ है किस तरह
मक्का में? संजोग
जगत्पिता जो दयामय
महाकाल शशिनाथ
भूतनाथ कामारि वह
भस्म लगाए माथ
भोगी-योगी
सनातन
नाद वही ओंकार
काश!
कभी हम पा सकें,
उसके भी दीदार
*
है अगम्य वह सुगम भी
अवढरदानी ईश
गरल गहे, अमृत लुटा
भोला है जगदीश
पुत्र न जो, उनका पिता
उमानाथ गिरिजेश
नगर न उसको सोहते
रुचे वन्य परिवेश
नीलकंठ
नागेश हे!
बसो ह्रदय-आगार
काश!
कभी हम पा सकें,
उसके भी दीदार
४-७-२०१६
***
कृति चर्चा:
अँधा हुआ समय का दर्पन : बोल रहा है सच कवि का मन
चर्चाकार: आचार्य संजीव
*
[कृति विवरण: अँधा हुआ समय का दर्पन, डॉ. रामसनेही लाल शर्मा 'यायावर', नवगीत संग्रह, १९०९, आकार डिमाई, पृष्ठ १२७, १५०/-, आवरण बहुरंगी सजिल्द जैकेट सहित, अयन प्रकाशन दिल्ली, संपर्क: ८६ तिलक नगर, फीरोजाबाद १८३२०३, चलभाष: ९४१२३६७७९,dr.yayavar@yahoo.co.in]
*
श्रेष्ठ-ज्येष्ठ साहित्यकार डॉ. रामसनेहीलाल शर्मा 'यायावर' के आठवें काव्य संकलन और तीसरी नवगीत संग्रह 'अँधा हुआ समय का दर्पण' पढ़ना युगीन विसंगतियों और सामाजिक विडम्बनाओं से आहत कवि-मन की सनातनता से साक्षात करने की तरह है. आदिकाल से अब तक न विसंगतियाँ कम होती हैं न व्यंग्य बाणों के वार, न सुधार की चाह. यह त्रिवेणी नवगीत की धार को अधिकाधिक पैनी करती जाती है. यायावर जी के नवगीत अकविता अथवा प्रगतिवादी साहित्य की की तरह वैषम्य की प्रदर्शनी लगाकर पीड़ा का व्यापार नहीं करते अपितु पूर्ण सहानुभूति और सहृदयता के साथ समाज के पद-पंकज में चुभे विसंगति-शूल को निकालकर मलहम लेपन के साथ यात्रा करते रहने का संदेश और सफल होने का विश्वास देते हैं.
इन नवगीतों का मिजाज औरों से अलग है. इनकी भाव भंगिमा, अभिव्यक्ति सामर्थ्य, शैल्पिक अनुशासन, मौलिक कथ्य और छान्दस सरसता इन्हें पठनीयता ही नहीं मननीयता से भी संपन्न करती है. गीत, नवगीत, दोहा, ग़ज़ल, हाइकु, ललित निबंध, समीक्षा, लघुकथा और अन्य विविध विधाओं पर सामान दक्षता से कलम चलाते यायावर जी अपनी सनातन मूल्यपरक शोधदृष्टि के लिये चर्चित रहे हैं. विवेच्य कृति के नवगीतों में देश और समाज के सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक परिदृश्य का नवगीतीय क्ष किरणीय परीक्षण नितांत मलिन तथा तत्काल उपचार किये जाने योग्य छवि प्रस्तुत करता है.
पीर का सागर / घटज ऋषि की / प्रतीक्षा कर रहा है / धर्म के माथे अजाने / यक्ष-प्रश्नों की व्यथा है -२५,
भूनकर हम / तितलियों को / जा रहे जलपान करने / मंत्र को मुजरे में / भेजा है / किसी ने तान भरने -२६,
हर मेले में / चंडी के तारोंवाली झूलें / डाल पीठ पर / राजाजी के सब गुलाम फूलें / राजा-रानी बैठ पीठ पर / जय-जयकार सुनें / मेले बाद मिलें / खाने को / बस सूखे पौधे - ३८
दूधिया हैं दाँत लेकिन / हौसला परमाणु बम है / खो गया मन / मीडिया में / आजकल चरचा गरम है / आँख में जग रहा संत्रास हम जलते रहे हैं - ३९
सूखी तुलसी / आँगन के गमले में / गयी जड़ी / अपने को खाने / टेबिल पर / अपनी भूख खड़ी / पाणिग्रहण / खरीद लिया है / इस मायावी जाल ने - ४४
चुप्पी ओढ़े / भीड़ खड़ी है / बोल रहे हैं सन्नाटे / हवा मारती है चाँटे / नाच रहीं बूढ़ी इच्छाएँ / युवा उमंग / हुई सन्यासिन / जाग रहे / विकृति के वंशज / संस्कृति लेती खर्राटे -५२
भूमिका पर थी बहस / कुछ गर्म इतनी / कथ्य पूरा रह गया है अनछुआ / क्या हुआ? / यह क्या हुआ? - ५७
यहाँ शिखंडी के कंधे पर / भरे हुए तूणीर / बेध रहे अर्जुन की छाती / वृद्ध भीष्म के तीर / किसे समर्पण करे कहानी / इतनी कटी-फ़टी -६०-६१
सम्मानित बर्बरता / अभिनन्दित निर्ममता / लांछित मर्यादा को दें सहानुभूति / चलो / हत्यारे मौसम के कंठ को प्रहारें -७१
पीड़ा के खेत / खड़े / शब्द के बिजूके / मेड़ों पर आतंकित / जनतंत्री इच्छाएँ / वन्य जंतु / पाँच जोड़ बांसुरी बजाएँ / पीनस के रोगी / दुर्गन्ध के भभूके / गाँधी की लाठी / पर / अकड़ी बंदूकें -७३
हर क्षण वही महाभारत / लिप्साएँ वे गर्हित घटनाएँ / कर्ण, शकुनि, दुर्योधन की / दूषित प्रज्ञायें / धर्म-मूढ़ कुछ धर्म-भीरु / कुछ धर्म विरोधी / हमीं दर्द के जाये / भाग्य हमारे फूटे-७६
मुखिया जी के / कुत्ते जैसा दुःख है / मुस्टंडा / टेढ़ी कमर हो गयी / खा / मंहगाई का डंडा / ब्याज चक्रवर्ती सा बढ़कर / छाती पर बैठा / बिन ब्याही बेटी का / भारी हुआ / कुँआरापन -८७
पीना धुआँ, निगलने आँसू / मिलता ज़हर पचने को / यहाँ बहुत मिलता है धोखा / खाने और खिलाने को / अपना रोना, अपना हँसना / अपना जीना-मरना जी / थोड़ा ही लिखता हूँ / बापू! / इसको बहुत समझना जी- पृष्ठ ९९
इन विसंगतियों से नवगीतकार निराश या स्तब्ध नहीं होता। वह पूरी ईमानदारी से आकलन कर कहता है:
'उबल रहे हैं / समय-पतीले में / युग संवेदन' पृष्ठ ११०
यह उबाल बबाल न बन पाये इसीलिये नवगीत रचना है. यायावर निराश नहीं हैं, वे युग काआव्हान करते हैं: 'किरणों के व्याल बने / व्याधों के जाल तने / हारो मत सोनहिरन' -पृष्ठ ११३
परिवर्तन जरूरी है, यह जानते हुए भी किया कैसे जाए? यह प्रश्न हर संवेदनशील मनुष्य की तरह यायावर-मन को भी उद्वेलित करता है:
' झाड़कर फेंके पुराने दिन / जरूरत है / मगर कैसे करें?' -पृष्ठ ११७
सबसे बड़ी बाधा जन-मन की किंकर्तव्यविमूढ़ता है:
देहरी पर / आँगन में / प्राण-प्रण / तन-मन में / बैठा बाजार / क्या करें? / सपने नित्य / खरीदे-बेचे / जाते हैं / हम आँखें मींचे / बने हुए इश्तहार / क्या करें? -पृष्ठ १२४
पाले में झुलसा अपनापन / सहम गया संयम / रिश्तों की ठिठुरन को कैसे / दूर करें अब हम? - पृष्ठ ५६
यायावर शिक्षक रहे हैं. इसलिए वे बुराई के ध्वंस की बात नहीं कहते। उनका मत है कि सबसे पहले हर आदमी जो गलत हो रहा है उसमें अपना योगदान न करे:
इस नदी का जल प्रदूषित / जाल मत डालो मछेरे - पृष्ठ १०७
कवि परिवर्तन के प्रति सिर्फ आश्वस्त नहीं हैं उन्हें परिवर्तन का पूरा विश्वास है:
गंगावतरण होना ही है / सगरसुतों की मौन याचना / कैसे जाने? / कैसे मानें? -पृष्ठ ८४
यह कैसे का यक्ष प्रश्न सबको बेचैन करता है, युवाओं को सबसे अधिक:
तेरे-मेरे, इसके-उसके / सबके ही घर में रहती है / एक युवा बेचैनी मितवा -पृष्ठ ७९
आम आदमी कितना ही पीड़ित क्यों न हो, सुधार के लिए अपना योगदान और बलिदान करने से पीछे नहीं हटता:
एकलव्य हम / हमें दान करने हैं / अपने कटे अँगूठे -पृष्ठ ७५
यायावर जी शांति के साथ-साथ जरूरी होने पर क्रांतिपूर्ण प्रहार की उपादेयता स्वीकारते हैं:
सम्मानित बर्बरता / अभिनन्दित निर्ममता / लांछित मर्यादा को दे सहानुभूति / चलो / हत्यारे मौसम के कंठ को प्रहारें - पृष्ठ ७१
भटक रहे तरुणों को सही राह पर लाने के लिये दण्ड के पहले शांतिपूर्ण प्रयास जरूरी है. एक शिक्षक सुधार की सम्भावना को कैसे छोड़ सकता है?:
आज बहके हैं / किरन के पाँव / फिर वापस बुलाओ / क्षिप्र आओ -पृष्ठ ६९
प्रयास होगा तो भूल-चूक भी होगी:
फिर लक्ष्य भेद में चूक हुई / भटका है / मन का अग्निबाण - पृष्ठ ६२
भूल-चूल को सुधारने पर चर्चा तो हो पर वह चर्चा रोज परोसी जा रही राजनैतिक-दूरदर्शनी लफ्फ़ाजियों सी बेमानी न हो:
भूमिका पर थी बहस / कुछ गर्म इतनी / कथ्य पूरा रह गया है अनछुआ / यह क्या हुआ? / यह क्या हुआ? -पृष्ठ ५७
भटकन तभी समाप्त की जा सकती है जब सही राह पर चलने का संकल्प दृढ़ हो:
फास्टफूडी सभ्यता की कोख में / पलते बवंडर / तुम धुएँ को ओढ़कर नाचो-नचाओ / हम, अभी कजरी सुनेंगे- पृष्ठ ५४
कवि के संकल्पों का मूल कहाँ है यह 'मुक्तकेशिनी उज्जवलवसना' शीर्षक नवगीत में इंगित किया गया है:
आँगन की तुलसी के बिरवे पर / मेरी अर्चना खड़ी है -पृष्ठ ३१
यायावर जी नवगीत को साहित्य की विधा मात्र नहीं परिवर्तन का उपकरण मानते हैं. नवगीत को युग परिवर्तन के कारक की भूमिका में स्वीकार कर वे अन्य नवगीतिकारों का पथप्रदर्शन करते हैं:
यहाँ दर्द, यहाँ प्यार, यहाँ अश्रु मौन / खोजे अस्तित्व आज गीतों में कौन? / शायद नवगीतकार / सांस-साँस पर प्रहार / बिम्बों में बाँध लिया गात -पृष्ठ ३०
यायावर के नवगीतों की भाषा कथ्यानुरूप है. हिंदी के दिग्गज प्राध्यापक होने के नाते उनका शब्द भण्डार समृद्ध और संपन्न होना स्वाभाविक है. अनुप्रास, उपमा, रूपक अलंकारों की छटा मोहक है. श्लेष, यमक आदि का प्रयोग कम है. बिम्ब, प्रतीक और उपमान की प्रचुरता और मौलिकता इन नवगीतों के लालित्य में वृद्धि करती है. आशीष देता सूखा कुआँ, जूते से सरपंची कानून लाती लाठियाँ, कजरी गाता हुआ कलह, कचरे में मोती की तलाश, लहरों पर तैरता सन्नाटा, रोटी हुई बनारसी सुबहें आदि बिम्ब पाठक को बाँधते हैं.
इन नवगीतों का वैशिष्ट्य छान्दसिकता के निकष पर खरा उतरना है. मानवीय जिजीविषा, अपराजेय संघर्ष तथा नवनिर्माण के सात्विक संकल्प से अनुप्राणित नवगीतों का यह संकलन नव नवगीतकारों के लिये विशेष उपयोगी है. यायावर जी के अपने शब्दों में : 'गीत में लय का नियंत्रण शब्द करता है. इसलिए जिस तरह पारम्परिक गीतकार के लिये छंद को अपनाना अनिवार्य था वैसे हही नवगीतकार के लिए छंद की स्वीकृति अनिवार्य है.… नवता लेन के लिए नवगीतकार ने छंद के क्षेत्र में अनेक प्रयोग किये हैं. 'लयखंड' के स्थान पर 'अर्थखण्ड' में गीत का लेखन टी नवगीत में प्रारंभ हुआ ही इसके अतिरिक्त २ लग-अलग छंदों को मिलकर नया छंद बनाना, चरण संख्या घटाकर या बढ़ाकर नया छंद बनाना, चरणों में विसंगति और वृहदखण्ड योजना से लय को नियंत्रित करना जैसे प्रयोग पर्याप्त हुए हैं. इस संकलन में भी ऐसे प्रयोग सुधीपाठकों को मिलेंगे।'
निष्कर्षत: यह कृति सामने नवगीत संकलन न होकर नवगीत की पाठ्य पुस्तक की तरह है जिसमें से तत्सम-तद्भव शब्दों के साथ परिनिष्ठित भाषा और सहज प्रवाह का संगम सहज सुलभ है. इन नवगीतों में ग्रामबोध, नगरीय संत्रास, जाना समान्य की पीड़ाएँ, शासन-प्रशासन का पाखंड, मठाधीशों की स्वेच्छाचारिता, भक्तों का अंधानुकरण, व्यवस्थ का अंकुश और युवाओं की शंकाएं एक साथ अठखेला करती हैं.
***
***
कुण्डलिया :
*
हे माँ! हेमा है खबर, खाकर थोड़ी चोट
बची; हुई जो दिवंगता, थी इलाज में खोट
थी इलाज में खोट, यही अच्छे दिन आए
व्ही आई पी है खास, आम जन हुए पराए
कब तक नेताओं को, जनता करे क्यों क्षमा?
काश समझ लें दर्द, आम जन का कुछ हेमा
४-७-२०१५
***


मंगलवार, 30 जून 2026

जून ३०, क्षुद्र ग्रह, सॉनेट, बुंदेली, दोहा, समुच्चय-आक्षेप अलंकार, दण्डकला छंद, ग़ज़लिका, मुक्तक

 सलिल सृजन जून ३०

क्षुद्र ग्रह (ऐस्टरॉइड) दिवस
*
ग़ज़लिका १ ० गुणा-भाग कर रहे कबीर जोड़-घटा हो रहे अमीर . सियासत बना नहीं सकी मिटाती है अदब की लकीर . कर गुरूर उड़ रहा तिनका कह रहा पहाड़ है हकीर . लीक प्रश्नपत्र बिक रहे खूब हम बना रहे नज़ीर . 'सलिल' चौकीदार को सजा दे रहा है चोर बन वजीर ३०.६.२०२६ ००० ग़ज़लिका २ . ज़िंदगी है सफ़र नहीं मंज़िल नाप दरिया न भूलना साहिल . आइनों पर न भरोसा करना अक्स को देख न होना ग़ाफ़िल . कोशिशों ने कभी न पूछा है क्या हुआ है उन्हें कभी हासिल . जो हक़ीक़त बयान करता है उससे नाराज़ क्यों रहा काबिल . नामुरादों! मुराद हो पूरी बेरहम पर न हो रहम नाज़िल ३०.६.२०२६ ०००
०००
मन-बगिया पधराओ सारद महरानी
बीना मधुर बजाओ सारद महरानी
.
कली फूल फल पत्ते टेरें
भू-बनमाली ब्याकुल हेरें।
तितली-भँवरे करें प्रार्थना-
माया-मोह नें नाहक घेरें।
चरन-सरन दिलबाओ सारद महरानी
मन-बगिया पधराओ सारद महरानी
.
ऊँच-नींच पथ पे पग फिसरो
धूप-छाँव में बैंया पकरो।
स्वार्थ सधे के सगरे नाते-
बिपदा में बैरी जग सगरो।
अपनों सें मिलबाओ सारद महरानी
मन-बगिया पधराओ सारद महरानी
.
मैया! 'इकनी एक' सिखा दे
'अ' अनार का पाठ पढ़ा दे
सबद-सबक पुस्तक सें यारी-
कंकर में संकर दिखला दे।
अनहद नाद सुनाओ सारद महरानी
मन-बगिया पधराओ सारद महरानी
३०.६.२०२५
***
क्षुद्र ग्रह (ऐस्टरॉइड) दिवस
क्षुद्रग्रह खगोलीय पिंड होते है जो ब्रह्माण्ड में विचरण करते रहते है। यह अपने आकार में ग्रहों से छोटे और उल्का पिंडों से बड़े होते हैं। खोजा जाने वाला पहला क्षुद्रग्रह, सेरेस, १८१९ में ग्यूसेप पियाज़ी द्वारा पाया गया था और इसे मूल रूप से एक नया ग्रह माना जाता था।
* १९०५ आइंस्टीन ने सापेक्षता सिद्धांत प्रकाशित किया।
३० जून, १९०५ को अल्बर्ट आइंस्टीन ने जर्मन भौतिकी पत्रिका एनालेन डेर फिजिक में "ज़ूर इलेक्ट्रोडायनामिक बेवेग्टर कोर्पर (चलती वस्तुओं के इलेक्ट्रोडायनामिक्स पर)" नामक एक पेपर प्रकाशित किया, जो उनके विशेष सापेक्षता के सिद्धांत को प्रस्तुत करता है। आइंस्टीन के इस अभूतपूर्व कार्य ने भौतिकी की नींव हिला दी।
स्विट्जरलैंड के ज्यूरिख में फेडरल पॉलिटेक्निक स्कूल में पढ़ने के बाद, आइंस्टीन ने १९०२ से १९०९ तक बर्न में स्विस पेटेंट कार्यालय में काम किया। उन्हें "तृतीय श्रेणी के तकनीकी विशेषज्ञ" के रूप में नियुक्त किया गया था, जहाँ वे आविष्कारों की पेटेंट योग्यता की जाँच करते थे, संभवतः उनमें बजरी छाँटने की मशीन और मौसम संकेतक शामिल थे। अपने मित्र मिशेल बेसो को लिखे एक पत्र में, आइंस्टीन ने पेटेंट कार्यालय को " वह धर्मनिरपेक्ष मठ माना जहाँ मैंने अपने सबसे सुंदर विचारों को जन्म दिया ।"
इनमें से सबसे गहन विचार १९०५ में एक के बाद एक लिखे गए पाँच सैद्धांतिक शोधपत्रों में उभरे, जिन्होंने २० वीं सदी के वैज्ञानिक विचारों में क्रांति ला दी। इतिहासकारों ने बाद में इस अवधि को आइंस्टीन के एनस मिराबिलिस या "चमत्कार वर्ष" के रूप में संदर्भित किया। उनके पहले शोधपत्र में प्रकाश के कण सिद्धांत का वर्णन किया गया था, जिसके लिए उन्हें बाद में १९२१ में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला। उनके दूसरे शोधपत्र ने आणविक आकार निर्धारित करने के लिए एक नई विधि बनाई, और उनके तीसरे शोधपत्र ने ब्राउनियन गति की जांच की, जिसमें द्रव में निलंबित कणों की गति के लिए गणितीय व्याख्या प्रस्तुत की गई।
आइंस्टीन का चौथा पेपर, जिसे अक्सर भौतिकी के क्षेत्र में प्रकाशित सबसे महत्वपूर्ण पेपरों में से एक माना जाता है, ने सापेक्षता के अपने विशेष सिद्धांत को प्रस्तुत किया, जिसने ब्रह्मांड के लंबे समय से स्थापित विचारों को पलट दिया जो आइजैक न्यूटन द्वारा गति के नियमों को पेश करने के बाद से प्रचलित थे। न्यूटन ने लिखा, "समय, किसी भी बाहरी चीज़ से संबंध के बिना समान रूप से बहता है," जबकि अंतरिक्ष "हमेशा समान और अचल रहता है।" हालाँकि, आइंस्टीन के कट्टरपंथी सिद्धांत ने माना कि समय और स्थान निरपेक्ष नहीं हैं, बल्कि पर्यवेक्षक की गति के सापेक्ष हैं।
मान लीजिए कि दो पर्यवेक्षक हैं; एक ट्रेन की पटरी पर स्थिर खड़ा है, जबकि दूसरा ट्रेन के बीच में बैठकर एक समान गति से ट्रेन से यात्रा कर रहा है। यदि ट्रेन के दोनों छोर पर बिजली गिरती है, ठीक उसी समय जब ट्रेन का मध्य बिंदु स्थिर पर्यवेक्षक से गुजरता है, तो प्रत्येक बिजली के झटके से प्रकाश को पर्यवेक्षक तक पहुंचने में समान समय लगेगा। वह सही ढंग से मान लेगा कि बिजली के झटके एक साथ हुए थे। हालाँकि, ट्रेन यात्री घटनाओं को अलग तरह से देखेगा। प्रकाश की गति स्थिर रहने पर, पीछे से आने वाला प्रकाश सामने से आने वाले प्रकाश की तुलना में बाद में दिखाई देगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि पीछे से आने वाले प्रकाश को यात्री तक पहुँचने के लिए अधिक दूरी तय करनी पड़ती है क्योंकि वह पीछे से आने वाले बिजली के झटके से दूर जा रही थी और सामने से आने वाले बिजली के झटके की ओर जा रही थी। इसलिए, यात्री को लगेगा कि बिजली के दो झटके एक साथ नहीं हुए हैं, और यह सही भी होगा। सितंबर में, आइंस्टीन ने विशेष सापेक्षता के गणितीय अन्वेषण के साथ पांचवां पेपर प्रकाशित किया: E=mc 2 , जिसमें ऊर्जा (E) द्रव्यमान (m) गुणा प्रकाश की गति (c) वर्ग ( 2 ) के बराबर है। दुनिया में सबसे प्रसिद्ध समीकरण यह माना गया कि द्रव्यमान और ऊर्जा एक दूसरे के स्थान पर इस्तेमाल किए जा सकते हैं और एक ही चीज़ को मापने के अलग-अलग तरीके हैं। इस खोज के दूरगामी परिणाम हुए और इसने परमाणु ऊर्जा और परमाणु बम के अंतिम विकास के लिए मंच तैयार किया, जिसमें आइंस्टीन की कोई प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं थी। वास्तव में, शुरुआत में अमेरिका द्वारा परमाणु बम विकसित करने के समर्थक होने के बावजूद, आइंस्टीन ने उस समर्थन को पूरी तरह से त्याग दिया।
एस्टेरॉइड्स, जिन्हें क्षुद्रग्रह भी कहा जाता है, अंतरिक्ष की अजीब और पत्थर जैसी चट्टानें होती हैं जो सूरज के चारों ओर घूमती हैं। ये न तो ग्रह होते हैं और न ही धूमकेतु। ये चट्टान, धातु या बर्फ से बने होते हैं। कुछ एस्टेरॉइड बहुत छोटे होते हैं, जैसे मलबा, जबकि कुछ इतने बड़े होते हैं कि वे छोटे ग्रह जैसे दिखते हैं। इनके पास कोई हवा या वातावरण नहीं होता, लेकिन फिर भी ये बहुत खतरनाक हो सकते हैं। अगर कोई एस्टेरॉइड धरती से टकरा जाए, तो भारी नुकसान हो सकता है। ३० जून १९०८ को तुंगुस्का घटना की सालगिरह पर जब एक उल्कापिंड के हवाई विस्फोट ने साइबेरिया , रूस में लगभग २,१५० वर्ग कि.मी. जंगल को नष्ट कर दिया था । क्षुद्रग्रह दिवस की स्थापना २०१४ में (२०१३ चेल्याबिंस्क उल्कापिंड वायु विस्फोट के बाद के वर्ष में) भौतिक विज्ञानी स्टीफन हॉकिंग , बी ६१२ फाउंडेशन की अध्यक्ष डेनिका रेमी, अपोलो ९ के अंतरिक्ष यात्री रस्टी श्वेकार्ट , फिल्म निर्माता ग्रिगोरी रिक्टर और ब्रायन मे (क्वीन गिटारवादक और खगोल भौतिकीविद्) द्वारा की गई थी। २०१६ में, संयुक्त राष्ट्र ने अपने संकल्प में हर साल 30 जून को विश्व स्तर पर क्षुद्रग्रह दिवस मनाने की घोषणा की। इस आयोजन का उद्देश्य क्षुद्रग्रहों के बारे में जागरूकता बढ़ाना और भविष्य में कोई एस्टेरॉइड धरती से टकराया, तो इसका असर कितना गंभीर हो सकता है, यह बताना है।
***
सॉनेट
सरकार
जाको ईंटा, बाको रोड़ो
आई बहुरिया, मैया बिसरी
भओ पराओ अपनो मोड़ो
जा पसरी, बा एड़ी घिस रई
पल मा पाला बदल ऐंठ रए
खाल ओढ़ लई रे गर्दभ की
धोबी के हो सेर रेंक रए
बारी बंदर के करतब की
मूँड़ मुड़ाओ, सीस झुकाओ
बदलो पाला, लै लो माला
राजा जी की जै-जै गाओ
करो रात-दिन गड़बड़झाला
मनमानी कर लो हर बार
जोड़-तोड़ कर, बन सरकार
३०-६-२०२२
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बुंदेली लोकगीत
काए टेरो
*
काए टेरो?, मैया काए टेरो?
सो रओ थो, कओ मैया काए टेरो?
*
दोरा की कुंडी बज रई खटखट
कौना पाहुना हेरो झटपट?
कौना लगा रओ पगफेरो?
काय टेरो?, मैया काए टेरो?...
*
हांत पाँव मों तुरतई धुलाओ
भुज नें भेंटियो, दूरई बिठाओ
मों पै लेओ गमछा घेरो
काय टेरो?, मैया काए टेरो?
*
बिन धोए सामान नें लइयो
बिन कारज बाहर नें जइयो
घरई डार रइओ डेरो
काए टेरो?, मैया काए टेरो
३०-६-२०२०
***
दोहा सलिला
*
नहीं कार्य का अंत है, नहीं कार्य में तंत।
माया है सारा जगत, कहते ज्ञानी संत।।
*
आता-जाता कब समय, आते-जाते लोग।
जो चाहें वह कार्य कर, नहीं मनाएँ सोग।।
*
अपनी-पानी चाह है, अपनी-पानी राह।
करें वही जो मन रुचे, पाएँ उसकी थाह।।
*
एक वही है चौधरी, जग जिसकी चौपाल।
विनय उसी से सब करें, सुन कर करे निहाल।।
*
जीव न जग में उलझकर, देखे उसकी ओर।
हो संजीव न चाहता, हटे कृपा की कोर।।
*
मंजुल मूरत श्याम की, कण-कण में अभिराम।
देख सके तो देख ले, करले विनत प्रणाम।।
*
कृष्णा से कब रह सके, कृष्ण कभी भी दूर।
उनके कर में बाँसुरी, इनका मन संतूर।।
*
अपनी करनी कर सदा, कथनी कर ले मौन।
किस पल उससे भेंट हो, कह पाया कब-कौन??
*
करता वह, कर्ता वही, मानव मात्र निमित्त।
निर्णायक खुद को समझ, भरमाता है चित्त।।
*
चित्रकार वह; दृश्य वह, वही चित्र है मित्र।
जीव समझता स्वयं को, माया यही विचित्र।।
*
बिंब प्रदीपा ज्योति का, सलिल-धार में देख।
निज प्रकाश मत समझ रे!, चित्त तनिक सच लेख।।
३०.६.२०१८
***
आज की कार्यशाला:
रचना-प्रतिरचना
गुरु सक्सेना नरसिंहपुर-संजीव वर्मा सलिल जबलपुर
*
समुच्चय और आक्षेप अलंकार
घनाक्षरी छंद
दुर्गा गणेश ब्रह्मा विष्णु महेश
पांच देव मेरे भाग्य के सितारे चमकाइये
पांचों का भी जोर भाग्य चमकाने कम पड़े
रामकृष्ण जी को इस कार्य में लगाइए।
रामकृष्ण जी के बाद भाग्य ना चमक सके
लगे हाथ हनुमान जी को आजमाइए।
सभी मिलकर एक साथ मुझे कॉलोनी में
तीस बाई साठ का प्लाट दिलवाइए।
३०-६-२०१७
***
प्रतिरचना:
देव! कवि 'गुरु' प्लाट माँगते हैं आपसे
गुरु गुड, चेले को शुगर आप मानिए।
प्लाट ऐसा दे दें धाँसू कवितायें हो सकें,
चेले को भूखंड दे भवन एक तानिए।
प्रार्थना है आपसे कि खाली मन-मंदिर है,
सिया-उमा, भोले- हनुमान संग विराजिए।
सियासत हो रही अवध में न आप रुकें,
नर्मदा 'सलिल' सँग आ पंजीरी फाँकिये।
***
मुक्तक
मतभेदों की नींव पर खड़े कर मतैक्य के महल अगर हम
मनभेदों को भुला सकें तो घट जायेंगे निश्चय ही गम
मानव दुविधा में सुविधा की खोज करे, कुछ पाएगा ही
कुछ कोशिश करना ही होगी, फहराना ही है यदि परचम
*
गले अजनबी से मिलकर यूँ लगा कि कोई अपना है
अपने मिले मगर अपनापन लगा कि केवल सपना है
बारिश ठंडी ग्रीष्म न ठहरे, आए आकर चले गए-
सलिल तुम्हारा भाग्य न बदला, नाहक माला जपना है
***
गीत
तुलसी
*
तुलसी को
अपदस्थ कर गयी
आकर नागफनी।
सहिष्णुता का
पौधा सूखा
घर-घर तनातनी।
*
सदा सुहागन मुरझाई है
खुशियाँ दूर हुईं।
सम्बन्धों की नदियाँ सूखीं
या फिर पूर हुईं।
आसों-श्वासों में
आपस में
बातें नहीं बनी।
तुलसी को
अपदस्थ कर गयी
आकर नागफनी।
*
जुही-चमेली पर
चंपा ने
क्या जादू फेरा।
मगरमस्त संग
'लिव इन' में
हैं कैद, कसा घेरा।
चार दिनों में
म्यारी टूटी
लकड़ी रही घुनी।
तुलसी को
अपदस्थ कर गयी
आकर नागफनी।
*
झुके न कोई तो कैसे
हो तालमेल मुमकिन।
बर्तन रहें खटकते फिर भी
गा-नाचें ता-धिन।
तृप्ति चाहते
प्यासों ने ध्वनि
कलकल नहीं सुनी।
तुलसी को
अपदस्थ कर गयी
आकर नागफनी।
***
पुस्तक सलिला-
'लोकल विद्वान' व्यंग्य का रोचक वितान
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
[पुस्तक विवरण- लोकल विद्वान, व्यंग्य लेख संगर्ह, अशोक भाटिया, प्रथम संस्करण, ISBN ९७८-९३-८५९४२-१०-५, २०.५ से. मी. x १४ से. मी., पृष्ठ ९६, मूल्य ८०/-, आवरण पेपरबैक, दोरंगी, बोधि प्रकाशन, ऍफ़ ७७, सेक़्टर ९, मार्ग ११, करतारपुरा औद्योगिक क्षेत्र, बाईस गोदाम, जयपुर ३०२००६, दूरभाष ०१४१ २५०३९८९, व्यंग्यकार संपर्क बसेरा, सेक़्टर १३, करनाल १३२००१ चलभाष ९४१६११५२१००, ahsokbhatiahes@gmail.com]
*
हिंदी गद्य के लोकप्रय विधाओं में व्यंग्य लेख प्रमुख है। व्यंञकार समसामयिक घटनाओं और समस्याओं की नब्ज़ पर हाथ रखकर उनके कारन और निदान की सीढ़ी चर्चा न कर इंगितों, व्यंगोक्तियों और वक्रोक्तियों के माध्यम से गुदगुदाने, चिकोटी काटने या तीखे व्यंग्य के तिलमिलाते हुए पाठक को चिंतन हेतु प्रेरित करता है। वह उपचार न कर, उपचार हेतु चेतना उत्पन्न करता है
हिंदी व्यंग्य लेखन को हाशिये से मुख्य धारा में लाने में हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, रवींद्रनाथ त्यागी, श्री लाल शुक्ल आदि की परंपरा को समृद्ध करनेवाले वर्तमान व्यंग्यकारों में अशोक भाटिया उल्लेखनीय हैं। भाटिया जी हिंदी प्राध्यापक हैं इसलिए उनमें विधा के उद्भव, विकास तथा वर्तमान की चेतना और विकास के प्रति संवेदनशील दृष्टि है। स्पष्ट समझ उन्हें हास्य औेर व्यंग्य के मध्य बारीक सीमा रख का उल्लंघन नहीं करने देती। वे व्यंग्य और लघुकथा के क्षेत्र में चर्चित रहे हैं।
विवेच्य कृति लोकल विद्वान में २१ व्यंग्य लेख तथा १४ व्यंग्यात्मक लघुकथाएँ हैं। कुत्ता न हो पाने का दुःख में लोभवृत्ति, लोकल विद्वान में बुद्धिजीवियों के पाखण्ड, महान बनने के नुस्खे में आत्म प्रचार, चलते-चलते में प्रदर्शन वृत्ति , कुत्ता चिंतन सार में स्वार्थपरता, नेता और अभिनेता में राजनैतिक विद्रूप , साड़ीवाद में महिलाओं की सौंदर्यप्रियता, मेले का ग्रहण में मेलों की आड़ में होते कदाचार, असंतोष धन में वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पारम्परिक मुहावरों के नए अर्थ, तेरा क्या होगा? में आचरण के दोमुंहेपन, निठल्ले के बोल में राजनैतिक नेता के मिथ्या प्रलाप, फाल करने का सुख में अंग्रेजी शब्द के प्रति मोह, विलास राम शामिल के कारनामे में साहित्यकारों के प्रपंचों, रबड़श्री भारतीय खेल दल में क्रीड़ा क्षेत्र व्याप्त विसंगतियों, किस्म-किस्म की समीक्षा में विषय पर विश्लेषणपरक विवेचन, इम्तहान एक सभ्य फ्राड में शिक्षा जगत की कमियों, साहित्य के ओवरसियर में लेखका का आत्ममोह, ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर में धन-लोभ, पीड़ा हरण समारोह में साहित्य क्षेत्र में व्याप्त कुप्रवृत्तियों, नौ सौ चूहे बिल्ली और हज में राजनीति तथा नई प्रेम कथा में प्रेम के नाम पर हो रहे दुराचार पर अशोक जी ने कटाक्ष किये हैं।
इन व्यंग्य लेखों में प्रायः आकारगत संतुलन, वैचारिक मौलिकता, शैलीगत सहजता, वर्णनात्मक रोचकता और विषयगत है जो पाठक को बाँधे रखने के साथ सोचने के लिए प्रवृत्त करता है। अशोक जी विषयों का चयन सामान्य जन के परिवेश को देखकर करते हैं इसलिए पाठक की उनमें रूचि होना स्वाभाविक है। वे आम बोलचाल की भाषा के पक्षधर हैं, इसलिए अंग्रेजी-उर्दी के शब्दों का स्वाभाविकता के साथ प्रयोग करते हैं।
लघु कथाओं में अशोक जी किसी न किसी मानवीय प्रवृत्ति के इर्द-गिर्द कथानक बुनते हुए गंभीर चुटकी लेते हैं। रोग और इलाज में नेताओं की बयानबाजी, क्या मथुरा क्या द्वारका में अफसर की बीबी की ठसक, सच्चा प्यार में नयी पीढ़ी में व्याप्त प्रेम-रोग, दोहरी समझ में वैचारिक प्रतिबद्धता के भाव, अच्छा घर में प्रच्छन्न दहेज़, वीटो में पति-पत्नी में अविश्वास, अंतहीन में बेसिर पैर की गुफ्तगू, साहब में अधिकारियों के काम न करने, दर्शन में स्वार्थ भाव से मंदिर जाने, एस एम एस में व्यक्तिगत संपर्क के स्थान पर संदेश भेजने, पहचान में आदमी को किसी न किसी आधार पर बाँटने तथा दान में स्वार्थपरता को केंद्र में रखकर अशोक जी ने पैने व्यंग्य किये हैं।
सम सामायिक पर सहज, सुबोध, रोचक शैली में तीखे व्यंग्य पाठक को चिंतन दृष्टि देने समर्थ हैं। अशोक जी की १२ पुस्तकें पूर्व प्रकाशित हैं। उनकी सूक्ष्म अवलोकन वृत्ति उन्हें दैनन्दिन जीवन के प्रसंगों पर नए कोण से देखने, सोचने और लिखने सक्षम बनाती है। इस व्यंग्य संग्रह का स्वागत होगा।
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***
मुक्तक
मतभेदों की नींव पर खड़े कर मतैक्य के महल अगर हम
मनभेदों को भुला सकें तो घट जायेंगे निश्चय ही गम
मानव दुविधा में सुविधा की खोज करे, कुछ पाएगा ही
कुछ कोशिश करना ही होगी, फहराना ही है यदि परचम
३०-६-२०१६
दो पदी
गले अजनबी से मिलकर यूँ लगा कि कोई अपना है
अपने मिले मगर अपनापन लगा कि केवल सपना है
३०-६-२०१५
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छंद सलिला:
दण्डकला छंद
*
छंद-लक्षण: जाति लाक्षणिक, प्रति चरण मात्रा ३२ मात्रा, यति १०-८-८-६, पदांत लघुगुरु, चौकल में पयोधर (लघु गुरु लघु / जगण) निषेध।
लक्षण छंद: यति दण्डकला दस / आठ आठ छह / लघु गुरु सदैव / पदांत हो
जाति लाक्षणिक गिन / रखें हर पंक्ति / बत्तिस मात्रा / सुखांत हो
उदाहरण:
१. कल कल कल प्रवहित / नर्तित प्रमुदित / रेवा मैया / मन मोहे
निर्मल जलधारा / भय-दुःख हारा / शीतल छैयां / सम सोहे
कूदे पर्वत से / छप-छपाक् से / जलप्रपात रच / हँस नाचे
चुप मंथर गति बह / पीर-व्यथा दह / सत-शिव-सुंदर / नित बाँचे
२. जय जय छत्रसाल / योद्धा-मराल / शत वंदन नर / नाहर हे!
'बुन्देलखंडपति / यवननाथ अरि / अभिनन्दन असि / साधक हे
बल-वीर्य पराक्रम / विजय-वरण क्षम / दुश्मन नाशक / रण-जेता
थी जाती बाजी / लाकर बाजी / भव-सागर नौ/का खेता
३. संध्या मन मोहे / गाल गुलाबी / चाल शराबी / हिरणी सी
शशि देख झूमता / लपक चूमता / सिहर उठे वह / घरनी सी
कुण्डी खड़काये / ननद दुपहरी / सास निशा खों-/खों खांसे
देवर तारे ससु/र आसमां बह/ला मन फेंके / छिप पांसे
----------
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दण्डकला, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदन,मदनावतारी, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुद्ध ध्वनि, शुभगति, शोभन, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)
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नवगीत
*
इसरो को शाबाशी
किया अनूठा काम
'पैर जमाकर
भू पर
नभ ले लूँ हाथों में'
कहा कभी
न्यूटन ने
सत्य किया
इसरो ने
पैर रखे
धरती पर
नभ छूते अरमान
एक छलाँग लगाई
मंगल पर
है यान
पवनपुत्र के वारिस
काम करें निष्काम
अभियंता-वैज्ञानिक
जाति-पंथ
हैं भिन्न
लेकिन कोई
किसी से
कभी न
होता खिन्न
कर्म-पुजारी
सच्चे
नर हों या हों नारी
समिधा
लगन-समर्पण
देश हुआ आभारी
गहें प्रेरणा हम सब
करें विश्व में नाम
२४-९-२०१४
***
भोजपुरी हाइकु:
*
आपन बोली
आ ओकर सुभाव
मैया क लोरी.
*
खूबी-खामी के
कवनो लोकभासा
पहचानल.
*
तिरिया जन्म
दमन आ शोषण
चक्की पिसात.
*
बामनवाद
कुक्कुरन के राज
खोखलापन.
*
छटपटात
अउरत-दलित
सदियन से.
*
राग अलापे
हरियल दूब प
मन-माफिक.
*
गहरी जड़
देहात के जीवन
मोह-ममता.
३०-६-२०१४
***

बुधवार, 24 जून 2026

जून २४ , ग़ज़लिका, नवगीत, चौपदा, भटकटैया, प्रमाणिका, पञ्चचामर, छंद, हाइकु, बरगद, पिता,

जबलपुर अञ्चल की राष्ट्रीय काव्य धारा : विरासत पर विहंगम दृष्टि

*

संस्कारधानी जबलपुर सनातन सलिला नर्मदा की तट पर स्थित पुरातन नगरी है। ६० करोड़ वर्षों की दीर्घ समयावधि से अधिक प्राचीन श्यामल बैसाल्ट शिलाएँ, दानवाकारी डायनासौर, आदि मानव, मान्य मानव, ग्राम्य मानव और नागर मानव इस नगरी का अतीत रहे हैं। आधुनिक काल के पौराणिक परिदृश्य में त्रिपुरी जो शिव के  प्रलयंकारी प्रकोप का शिकार होकर नष्ट हुई, इसी नगरी का हिस्सा है। भौगोलिक परिदृश्य की बात करें तो घुघवा ज्वालामुखीय जीवाश्म, सिहोरा की ज्वालादेवी पहाड़ियाँ, भेड़ाघाट की बहुरंगी संगमरमरी शिलाएँ, आयुध निर्माणी के समीप पहाड़ियों से प्राप्त डायनासौर के अंडे व कंकाल प्रमाणित करते हैं कि यह अञ्चल मानवीय चेतना के जागरण से पूर्व भी जागृत था। मानवीय संस्कृति के विविध सोपानों पर इस नगरी का अवदान भारतीय नाट्य शास्त्र के विकास में अग्रगण्य  रहे आचार्य नंदिकेश (जिन्होंने नाटक में नांदीपाठ का अन्वेषण किया), महर्षि जाबालि, महर्षि भृगु, महर्षि अगस्त्य आदि के तप, श्री राम, श्री कृष्ण आदि के संघर्ष, मौर्य, कुषाण व कलचुरी कालीन पराक्रम, शिल्प व राजनैतिक प्रभुत्व, गोंड कालीन समृद्धि, रानी दुर्गावती के बलिदान गाथा, अधार सिंह की बुद्धिमत्ता, १८४२ की बुंदेला क्रांति,  स्वातंत्र्य प्राप्ति हेतु सशस्त्र संघर्ष, आदिवासी भाषाओं का ध्वन्यांकन (हीरालाल राय), राजा शंकर शाह व राजकुंवर रघुनाथ शाह की शहादत सत्याग्रहों (झण्डा सत्याग्रह), स्वतंत्रता पश्चात भारतीय संविधान की मूल प्रति पर चित्रांकन (ब्योहार राम मनोहर सिन्हा), हिन्दी को राजभाषा बनाने (ब्योहार राजेन्द्र सिंह, सेठ गोविंद दास आदि), देश की सुरक्षा हेतु आयुध निर्माण, हिन्दी के प्रथम व्याकरण का निर्माण (कामता प्रसाद गुरु), हिन्दी छंद शास्त्र के निर्माण (जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु’), पेड़ों को एन्टीना के रूप में प्रयोग करने (शिव प्रसाद कोष्ठा), मटर, कपास, सिंघाड़ा आदि के प्रोन्नत संस्करण तैयार करने (डॉ. अनामिका तिवारी), हिन्दी के ५०० से अधिक नए छंदों के निर्माण (संजीव वर्मा ‘सलिल’) आदि के रूप में उल्लेखनीय है।

ऐसे ऐतिहासिक अञ्चल के विकास और अवदान के केंद्र में भाषा का होना स्वाभाविक है। खड़ी बोली कही जाने वाली आधुनिक हिन्दी की पुरखन बुन्देली के साथ-साथ हिन्दी का शुद्ध प्रयोग इस अञ्चल की विशेषता है। सनातन सलिल रेवा की ओजस्विता, निश्छलता, स्वाभिमान, विद्रोह और लोक कल्याण इस अञ्चल का हर जीव नर्मदा जल के साथ-साथ आत्मसात करता है। यही प्रवृत्तियाँ हिन्दी काव्य धारा में मिलकर राष्ट्रीय काव्य की जन्म दात्री बनीं। एक स्वातंत्र्य सत्याग्रही सुकवि माणिक लाल चौरसिया, उनकी चारों संतानों (जवाहर लाल चौरसिया मधुर, कृष्ण कुमार ‘पथिक’, गोपाल कृष्ण चौरसिया ‘मधुर’ तथा कमलेश चौरसिया) से पौत्री संगीता भारद्वाज ‘मैत्री’ को राष्ट्र और राष्ट्रभाषा के प्रति प्रेम विरासत में मिला जो इस कृति ‘’जबलपुर की राष्ट्रीय काव्य धारा’’ के रूप में प्रकाशित हो रहा है।

षड दर्शन, षड राग और षड रस की तरह यह कृति षड अध्यायों में विभाजित है। जबलपुर के ऐतिहासिक परिदृश्य, नामकरण, भौगोलिक-पुरातात्विक-ऐतिहासिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि आदि अध्याय एक का कलेवर है। अध्याय दो में राष्ट्र की अवधारणा, ऋषि परंपरा, ऐतिहासिक व आधुनिक कालीन जनचेतना, आंदोलन, सत्याग्रह आदि, अध्याय तीन में परिक्षेत्रीय मौलिक काव्य सर्जना, काव्यानुवाद आदि,


सलिल सृजन जून २४
*
ग़ज़लिका
हमें बुला लो राम लला
हममें में भी हैं कई कला
.
देव! तुम्हारे बच्चे हम
मिले प्रसादी लगे भला
.
सोना चाँदी भव-बाधा
घेरे तुमको हमें खला
.
भला तुम्हारा करने को
हम ले, मानें कष्ट टला
.
हे माता पति! माया में
नहीं फँसाएँ आप गला
.
प्रभु को बेर अधिक भाते
माल उठाकर भक्त पला
.
सदा राम जी की जय हो
भक्त हार ले भाग चला
००० 
नवगीत
राम दास ने
राम कृपा बिन
राम लला को लूट लिया।
.
राम हितैषी बनकर आया
राम दयालु बोल मुस्काया।
राम सखा हनुमत की जय कह-
रामानुज को गले लगाया।।
भोंक पीठ में
छुरा ठठाया
कालकूट का घूँट दिया।
राम दास ने
राम कृपा संग
राम लला को लूट लिया।
.
सकल राम निधि अपनी मानी।
कहे राम-सिय हैं वरदानी।।
राम निहोरा महज दिखावा-
राम नाथ बनता अभिमानी।।
राम भक्त के
भक्ति भाव को
झूठ-दगा कर शूट किया।
राम दास ने
राम कृपा संग
राम लला को लूट लिया।
.
राम बिहारी कलि मल हारी
छलिया जै-जैकार पुकारी।
कर परिक्रमा अवसर ताके-
हेरें चकित राम महतारी।।
राम भरोसे
राम नाम को
रामधारी ने हूट किया।
राम दास ने
राम कृपा संग
राम लला को लूट लिया।
२४.६.२०२६
०००
चौपदा
भटकटैया
सुमिर भटकटैया सहे दर्द सारे हमने विहँसकर न शिकवा किया है।
उगे धूल में भी, खिले शूल में भी, किए फूल अर्पित न किंचित गिला है।।
रहा धैर्य हमदम, तजा वैर्य हर दम, बहन ने कुचल बंधु-मंगल मनाया-
किसी के कभी तो कहीं काम आया, किया जन्म सार्थक सलिल शुक्रिया है।।
२४-६-२०२५
०0०
कवि और कविता : सरला वर्मा
सर ला दें भजकर भजन, अंजलि में भर आज।
निशि-दिन मन संजीव हो, संगीता हर काज।।
*
योग किया; व्यय रोककर, गुना किया दिन-रात।
भाग भाग से; भाग पा, भाग मिली सौगात।।
*
बुक बुटीक में कर दिया, दिल सुशील के नाम।
दम दे जमीं दमोह में, रूचि बैठी सिर थाम।।
*
चेले केले खा रहे, छिलके ले आचार्य।
मौन हुए संतोष कर, उमा सधे सब काज।।
*
पहली-अंतिम शादियाँ, गई व्यवस्था टूट।
शिखा भूमि पर व्यवस्था, कर दी बैठ अटूट।।
*
विद्या रेखा खींच दे, गुरु मंजरी ललाम।
संत जयंत बसंत की, शैली काम अकाम।।
*
आकांक्षा इंद्रा-दया, ऋचा स्मिता रवींद्र।
बने वसीयत कमल की आभा-विभा कवीन्द्र।
*
वेद वंदना शशि करें, छाया वसुधा साथ।
माया-गीता शालिनी, मौली थामे हाथ।।
*
शंभु नाथ आशीष दें, आस्था रहे अभंग।
भावुकता के भाव को, देखे दुनिया दंग।।
*
गुडविल में गुड बिल छिपा, वर्षा कर भुगतान।
दिल मजबूत करो सलिल, तभी बचेगी आन।।
*
हँसी लबों पर हो सदा, चेहरे पर हो ओज।
माथे पर सूरज सजे, दे खुशियों को भोज।।
२४-६-२०२२
***
कृति चर्चा:
'पराई जमीन पर उगे पेड़' मन की तहें टटोलती कहानियाँ
चर्चाकार: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
[कृति विवरण: 'पराई जमीन पर उगे पेड़, कहानी संग्रह, विनीता राहुरीकर, प्रथम संस्करण, २०१३, आकार २२ से. मी. x १४ से. मी., आवरण बहुरंगी, सजिल्द जैकेट सहित, पृष्ठ १७८, मूल्य २५०/-, अरुणोदय प्रकाशन, ९ न्यू मार्किट, तात्या टोपे नगर भोपाल, ९१७५५२६७३६२४]
*
मनुष्य के विकास के साथ ही कहने की कला का विकास हुआ। कहने की कला ने विज्ञान बनकर साहित्य की कई विधाओं को जन्म दिया। गद्य में कहानी, भाषण, लघुकथा, परिचर्चा, साक्षात्कार, व्यंग्य, संस्मरण, चर्चा, संगोष्ठी आदि और पद्य में गीत, भजन आदि कहने की कला के विधिवत विकास के ही परिणाम हैं। कहानी वह जो कही जाए। कही वह जाए जो कहने योग्य हो। कहने योग्य वह जो किसी का शुभ करे। सत्य-शिव-सुन्दर की प्रस्तुति भारतीय वांग्मय का आदर्श है। साम्यवादी यथार्थवादी विडंबनाओं और विसंगतियों या पाश्चात्य विलासितापूर्ण लेखन को भारतीय मनीषा ने कभी भी नहीं सराहा। भारत में काम पर भी लिखा गया तो विज्ञान सम्मत तरीके से शालीनतापूर्वक। सबके मंगल भाव की कामना कर लिखा जाए तो उसके पाठक या श्रोता को अपने जीवन पथ में जाने-अनजाने आचरण को संयमित-संतुलित करने में सहायता मिल जाती है। सोद्देश्य लेखन की सकारात्मक ऊर्जा नकारात्मक ऊर्जा का शमन करती है।
युवा कहानीकार विनीता राहुरीकर के कहानी संग्रह 'पराई ज़मीं पर उगे पेड़' को पढ़ना जिंदगी की रेल में विविध यात्रियों से मिलते-बिछुड़ते हुए उनके साथ घटित प्रसंगों का साक्षी बनने जैसा है। पाठक के साथ न घटने पर भी कहानी के पात्रों के साथ घटी घटनाएँ पाठक के अंतर्मन को प्रभावित करती हैं। वह तटस्थ रहने का प्रयास करे तो भी उसकी संवेदना किसी पात्र के पक्ष और किसी अन्य पात्र के विरुद्ध हो जाती है। कभी सुख-संतोष, कभी दुःख-आक्रोश, कभी विवशता, कभी विद्रोह की लहरों में तैरता-डूबता पाठक-मन विनीता के कहानीकार की सामर्थ्य का लोहा मानता है।
विनीता जी की इन कहानियों में न तो लिजलिजी भावुकता है, न छद्म स्त्री विमर्श। ये कहानियाँ तथाकथित नारी अधिकारों की पैरोकारी करते नारों की तरह नहीं हैं। इनमें गलत से जूझकर सुधारने की भावना तो है किन्तु असहमति को कुचलकर अट्टहास करने की पाशविक प्रवृत्ति सिरे से नहीं है। इन कहानियों के पात्र सामान्य हैं। असामान्य परिस्थितियों में भी सामान्य रह पाने का पौरुष जीते पात्र जमीन से जुड़े हैं। पात्रों की अनुभूतियों और प्रतिक्रियाओं के आधार पर पाठक उन्हें अपने जीवन में देख-पहचान सकता है
विनीता जी का यह प्रथम कहानी संकलन है। उनके लेखन में ताजगी है। कहानियों के नए कथानक, पात्रों की सहज भाव-भंगिमा, भाषा पर पकड़, शब्दों का सटीक उपयोग कहानियों को पठनीय बनाता है। प्राय: सभी कहानियाँ सामाजिक समस्याओं से जुडी हुई हैं। समाज में अपने चतुर्दिक जो घटा है, उसे देख-परखकर उसके सकारात्मक-नकारात्मक पक्षों को उभारते हुए अपनी बात कहने की कला विनीता जी में है। विवेच्य संग्रह में १६ कहानियाँ हैं। कृति की शीर्षक कहानी 'पराई ज़मीं पर उगे पेड़' में पति-पत्नी के जीवन में प्रवेश करते अन्य स्त्री-पुरुषों के कारण पनपती दूरी, असुरक्षा फिर वापिस अपने सम्बन्ध-सूत्र में बँधने और उसे बचाने के मनोभाव बिम्बित हुए हैं। वरिष्ठ कथाकार मालती जोशी ने इस कहानी में प्रयुक्त प्रतीक के बार-बार दूहराव से आकर्षण खोने का तथ्य ठीक ही इंगित किया है। अपने सम्बन्ध को स्थायित्व देने और असुरक्षा से मुक्त होने के लिए संतति की कामना करना आदर्श भले ही न हो यथार्थ तो है ही। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार शिशु के जन्म से दाम्पत्य को स्थायित्व मिलता है।
वैभवशाली पति को ठुकरानेवाली 'ठकुराइन' दिवंगता सौतन के पुत्र को अपनाकर गरीबी में किन्तु स्वाभिमानपूर्वक जीवन गुजारती है। यह चरित्र असाधारण है। 'वट पूजा' कहानी में एक दूसरे को 'स्पेस' देने के मुगालते में दूर होते जाने की मरीचिका, अन्यों के प्रति आकर्षण तथा समय रहते अपने नैकट्य स्थापित कर संबंध को पुनर्जीवित करने की ललक स्पन्दित है। अपनी जड़ों से जुड़े रहने की चाहत में अतीतजीवी होकर जड़ होते बुजुर्गो, उनके मोह में अपने भविष्य को सँवारने में चूकते या भविष्य को संवारने में कर्तव्य निभाने से चूकने का मलाल पाले युवा दंपति की कशमकश 'चिड़िया उड़ गई फुर्र' कहानी में उठाई गई है। 'समानांतर रेखाएँ कहानी में पति से घरेलू कार्य में सहयोग की अपेक्षा कर निराह होती कामकाजी पत्नी की विवशता पाठक के मन में सहानुभूति तो जगाती है किन्तु पति की भी कुछ अपेक्षा हो सकती है यह पक्ष अनछुआ रह जाने से बात एकतरफा हो गयी है।
पिता के सामान में किसी अपरिचित स्त्री के प्रेम-पत्र मिलने से व्यथित किशोरी पुत्री 'खंडित मूर्ति' कहानी के केंद्र में हैं। यह कथानक लीक से हटकर है। माता से यह जानकर कि वे पत्र किसी समय उन्हीं पति द्वारा रखे गए नाम ने लिखे थे, बेटी पूर्ववत हो पाती है। 'अनमोल धरोहर' कहानी में संयुक्त परिवार, पारिवारिक संबंधों और बुजुर्गों की महत्ता प्रतिपादित करती है। वृद्धों को अनुपयोगी करार देकर किनारे बैठाने के स्थान पर उन्हें उनके उपयुक्त जिम्मेदारी देकर उनकी उपादेयता और महत्त्व बनाये रखने का सत्य प्रतिपादित करती है कहानी 'नई जिम्मेदारी'। कैशोर्य में बलात्कार का शिकार हुई युवती का विवाह के प्रति अनिच्छुक होना और एक युवक द्वारा सब कुछ जानकर भी उसे उसके निर्दोष होने की अनुभूति कराकर विवाह हेती तत्पर होना कहानी 'तुम्हारी कोई गलती नहीं' में वर्णित है। निस्संतान पत्नी को बिना बताये दूसरा विवाह करनेवाले छलिया पति के निधन पर पत्नी के मन में भावनात्मक आवेगों की उथल-पुथल को सामने लाती है कहानी 'अनुत्तरित प्रश्न'। 'जिंदगी फिर मुस्कुरायेगी' में मृत्यु पश्चात अंगदान की महत्ता प्रतिपादित की गई है। 'दिखावे की काट' कहानी दिवंगत पिता की संपत्ति के प्रति पुत्र के मोह और पुत्री के कर्तव्य भाव पार आधृत है।
'बिना चेहरे की याद' में भिन्न रुचियों के विवाह से उपजी विसंगति और असंतोष को उठाया गया है किन्तु कोई समाधान सामने नहीं आ सका है। परिवारजनों की सहमति के बिना प्रेमविवाह कर अलग होने के बावजूद परिवारों से अलग न हो पाने से उपजी शिकायतों के बीच भी मुस्कुराते रहने का प्रयास करते युवा जोड़े की कहानी है 'धूल और जाले'। निस्संतान दम्पति द्वारा अन्य के सहयोग से संतान प्राप्ति के स्थान पर अनाथ शिशु को अपनाने को वरीयता 'चिड़िया और औरत' कहानी का कथ्य है। अंतिम कहानी 'गाँठ' का कथानक सद्य विवाहिता नायिका और उसकी सास में मध्य तालमेल में कमी के कारण पति के सामने उत्पन्न उलझन और पिता द्वारा बेटी को सही समझाइश देने के ताने-बाने से बुना गया है।
विनीता जी की कहानियाँ वर्तमान समाज में हो रहे परिवर्तनों, टकरावों, सामंजस्यों और समाधानों को लेकर लिखी गयी हैं। कहानियों का शिल्प सहज ग्राह्य है। नाटकीयता या अतिरेक इन कहानियों में नहीं है। भाषा शैली और शब्द चयन पात्रों और घटनाओं के अनुकूल है। 'हालत' शब्द का बहुवचन हिंदी में 'हालतों' और उर्दू में 'हालात' होता है, 'हालातों' पूरी तरह गलत है (खंडित मूर्ति, पृष्ठ ६५)। चरिते चित्रण स्वाभाविक और कथानुकूल है। अधिकांश कहानियों में स्त्री-विमर्श का स्वर मुखर होने के बावजूद एकांगी नहीं है। वे स्त्री विमर्श के नाम पर अशालीन होने की महिला कहानीकारों की दुष्प्रवृत्ति से पूरी तरह दूर रहकर शालीनता से समस्या को सामने लाती हैं। पारिवारिक इकाई, पुरुष या बुजुर्गों को समस्या का कारण न कहकर वे व्यक्ति-व्यक्ति में तालमेल की कमी को कारण मानकर परिवार के भीतर ही समाधान खोजते पात्र सामने लाती हैं। यह दृष्टिकोण स्वस्थ्य सामाजिक जीवन के विकास में सहायक है। उनके पाठक इन कहानियों में अपने जीवन में उत्पन्न समस्याओं के समाधान पा सकते हैं। एक कहानीकार के नाते यह विनीता जी की सफलता है कि वे समस्याओं का समाधान संघर्ष और जय-पराजय में नहीं सद्भाव और साहचर्य में पाती हैं।
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संपर्क- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', विश्व वाणी हिंदी संस्थान, 204 विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष: ९४२५१ ८३२४४, ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com
२४-६-२०१७
***
छंद सलिला:
प्रमाणिका और पञ्चचामर छंद
*
प्रमाणिका
अन्य नाम: नगस्वरूपिणी
प्रमाणिका एक अष्टाक्षरी छंद है. अष्टाक्षरी छंदों के २५६ प्रकार हो सकते हैं। प्रमाणिका का सूत्र 'ज र ल ग' है।
इसके दोगुने को पञ्चचामर कहते हैं।
ज़रा लगा प्रमाणिका।
लक्षण: जगण रगण + लघु ।s। s। s । s यति ४. ४
उदाहरण:
१.
ज़रा लगाय चित्तहीं। भजो जु नंद नंदहीं।
प्रमाणिका हिये गहौ। जु पार भौ लगा चहौ। - जगन्नाथ प्रसाद 'भानु'
२.
सही-सही उषा रहे
सही-सही दिशा रहे
नयी-नयी हवा बहे
भली-भली कथा कहे -रामदेव लाल 'विभोर'
३.
जगो उठो चलो बढ़ो
सभी यहीं मिलो खिलो
न गाँव को कभी तजो
न देव गैर का भजो - संजीव
पञ्चचामर
अन्य नाम: नराच, नागराज
पञ्चचामर एक सोलहाक्षरी छंद है. सोलहाक्षरी छंदों के ६५,५३६ प्रकार हो सकते हैं. प्रमाणिका का सूत्र 'ज र ज र ज ग' है.
यह प्रमाणिका का दोगुना होता है: प्रमाणिका पदद्वयं वदंति पंचचामरं
लक्षण: जगण रगण जगण रगण जगण + गुरु ।s। ।s। ।s। ।s। ।s। s
उदाहरण:
१.
जु रोज रोज गोपतीय डार पंच चामरै।
जु रोज रोज गोप तीय कृष्ण संग धावतीं।
सु गीति नाथ पाँव सों लगाय चित्त गावतीं।।
कवौं खवाय दूध औ दही हरी रिझावतीं।
सुधन्य छाँड़ि लाज पंच चामरै डुलावतीं।। - जगन्नाथ प्रसाद 'भानु'
२.
उठो सपूत देश की, धरा तुम्हें पुकारती
विषाद से घिरी पड़ी, फ़टी दशा निहारती
किसान हो कुदाल लो, जवान हो मशाल लो
समग्र बुद्धिजीवियों, स्वदेश को संभाल लो -रामदेव लाल 'विभोर'
३.
तजो न लाज शर्म ही, न माँगना दहेज़ रे!
करो सुकर्म धर्म ही, भविष्य लो सहेज रे!
सुनो न बोल-बात ही, मिटे अँधेर रात भी.
करो न द्वेष घात ही, उगे नया प्रभात भी.
रावण कृत शिवतांडव स्तोत्र की रचना पञ्चचामर छंद में ही है.
जटाटवीगलज्जल:प्रवाहपावितस्थले। गलेSवलंब्यलंबितां भुजंगतुंगमालिकां।।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादमड्डमर्वयं। चकार चंडताण्डवं तनोतुन: शिव: शिवं।।
२४-६-२०१५
***
द्विपदी :
*
कदमों से अंदाज़ा कद का कर लेते हैं
नज़र जमीं पर रखने वाले गलत न होते
*
***
मुक्तक:
*
रौशनी कब चराग करते हैं?
वो न सीने में आग धरते हैं.
तेल-बाती सदा जला करती-
पूजकर पैर 'सलिल' तरते हैं.
*
मिले वरदान चाह की हमने
दान वर का नहीं किया तुमने
दान बिन मान कहाँ मिल सकता
उँगलियों पर लिया नचा हमने
*
माँग थी माँग आज भर देना
दान कन्या का झुका सर लेना
ले लिया कर में कर न छूटेगा
ज़िंदगी भर न चुके, कर देना
२४-६-२०१५
***
शुभ कामना गीत:
अनुश्री-सुमित परिणय १२-६-२०१५ बिलासपुर
*
मन जो मन से मिल गया
तो मन ने हँस कहा:
'मन तू मन से मिल गया
हाँ' मन ने फँस कहा
'हाथ थाम ले जरा
तू संग-संग चल,
मान भी ले बात मेरी
तू न यूँ मचल.
बेरहम न बन कठोर-
दिल जरा पिघल,
आ गया बिहार से
बिलासपुर सम्हल'
मन जो मन से मिल गया
तो मन ने धँस कहा.
*
मन जो मन से मिल गया
तो मन ने रुक कहा:
'क्या करूँ मैं साथ तेरे
चार-कदम चल?
कौन जनता न कहीं
जाए तू बदल?
देख किसी और को
न जाए झट फिसल?
कैसे मान लूँ कि तेरी
प्रीत है असल?
मन जो मन से मिल गया
तो मन ने तन कहा.
*
मन जो मन से मिल गया
तो मन ने मुड़ कहा:
'मैं न राम सिया को जो
भेज दे जंगल
मैं न कृष्ण प्रेमिका को
जो दे खुद बदल.
लालू-राबड़ी सी करें
प्रीत हम अटल.
मोटियार मैं तू
मोटियारी है नवल.'
मन जो मन से मिल गया
तो मन ने तक कहा.
*
मन जो मन से मिल गया
तो मन ने झुक कहा:
चक्रवात जैसी अपनी
प्रीत हो प्रबल।
लाख हों भूकम्प नहीं
प्यार हो निबल
सात जनम संग रहें
हो न हम निबल
श्वास-श्वास प्रीत व्याप्त
ज्यों भ्रमर-कमल
मन जो मन से मिल गया
तो मन ने मिल कहा.
*
मन जो मन से मिल गया
तो मन ने फिर कहा:
नीर-क्षीर मिल गया
न कोई दे दखल
अंतरों से अंतरों को
पल में दें मसल
चित्र गुप्त ज़िंदगी के
देख-जान लें
रीत प्रीत की निभा
सकें, सजल नयन
मन जो मन से मिल गया
तो मन ने हँस कहा.
*
संगीत संध्या
११.६.२०१५
होटल ईस्ट पार्क बिलासपुर
***
: मुक्तिका:
ज़िन्दगी हँस के गुजारोगे तो कट जाएगी.
कोशिशें आस को चाहेंगी तो पट जाएगी..
जो भी करना है उसे कल पे न टालो वरना
आयेगा कल न कभी, साँस ही घट जाएगी..
वायदे करना ही फितरत रही सियासत की.
फिर से जो पूछोगे, हर बात से नट जाएगी..
रख के कुछ फासला मिलना, तो खलिश कम होगी.
किसी अपने की छुरी पीठ से सट जाएगी..
दूरियाँ हद से न ज्यादा हों 'सलिल' ध्यान रहे.
खुशी मर जाएगी गर खुद में सिमट जाएगी..
***
हाइकु सलिला
*
रात की बात
किसी को मिली जीत
किसी को मात..
*
फूल सा प्यारा
धरती पर तारा
राजदुलारा..
*
करते वंदन
लगाकर चन्दन
हँसे नंदन..
*
आता है याद
दूर जाते ही देश
यादें अशेष..
*
कुसुम-गंध
फैलती सब ओर.
देती आनंद..
*
देना या पाना
प्रभु की मर्जी
पा मुस्कुराना..
*
आंधी-तूफ़ान
देता है झकझोर
चले न जोर..
*
उखाड़े वृक्ष
पल में ही अनेक
आँधी है दक्ष..
*
बूँदें बरसें
सौधी गंध ले सँग
मन हरषे..
*
करे ऊधम
आँधी-तूफ़ान, लिए
हाथ में हाथ..
*
बादल छाये
सूरज खिसियाये
भू मुस्कुराये.
*
नापते नभ
आवारा की
तरह नाच बादल..
***
मुक्तिका
मिट्टी मेरी...
*
मोम बनकर थी पिघलती रही मिट्टी मेरी.
मौन रहकर भी सुलगती रही मिट्टी मेरी..
बाग़ के फूल से पूछो तो कहेगा वह भी -
कूकती, नाच-चहकती रही मिट्टी मेरी..
पैर से रौंदी गयी, सानी गयी, कूटी गयी-
चाक-चढ़कर भी, निखरती रही मिट्टी मेरी..
ढाई आखर न पढ़े, पोथियाँ रट लीं, लिख दीं.
रही अनपढ़ ही, सिसकती रही मिट्टी मेरी..
कभी चंदा, कभी तारों से लड़ायी आखें.
कभी सूरज सी दमकती रही मिट्टी मेरी..
खता लम्हों की, सजा पाती रही सदियों से.
पाक-नापाक चटकती रही मिट्टी मेरी..
खेत-खलिहान में, पनघट में, रसोई में भी.
मैंने देखा है, खनकती रही मिट्टी मेरी..
गोद में खेल, खिलाया है सबको गोदी में.
फिर भी बाज़ार में बिकती रही मिट्टी मेरी..
राह चुप देखती है और समय आने पर-
सूरमाओं को पटकती रही मिट्टी मेरी..
कभी थमती नहीं, रुकती नहीं, न झुकती है.
नर्मदा नेह की, बहती रही मिट्टी मेरी..
***
कथा-गीत:
मैं बूढ़ा बरगद हूँ यारो...
*
मैं बूढ़ा बरगद हूँ यारो...
है याद कभी मैं अंकुर था.
दो पल्लव लिए लजाता था.
ऊँचे वृक्षों को देख-देख-
मैं खुद पर ही शर्माता था.
धीरे-धीरे मैं बड़ा हुआ.
शाखें फैलीं, पंछी आये.
कुछ जल्दी छोड़ गए मुझको-
कुछ बना घोंसला रह पाये.
मेरे कोटर में साँप एक
आ बसा हुआ मैं बहुत दुखी.
चिड़ियों के अंडे खाता था-
ले गया सपेरा, किया सुखी.
वानर आ करते कूद-फांद.
झकझोर डालियाँ मस्ताते.
बच्चे आकर झूला झूलें-
सावन में कजरी थे गाते.
रातों को लगती पंचायत.
उसमें आते थे बड़े-बड़े.
लेकिन वे मन के छोटे थे-
झगड़े ही करते सदा खड़े.
कोमल कंठी ललनाएँ आ
बन्ना-बन्नी गाया करतीं.
मागरमाटी पर कर प्रणाम-
माटी लेकर जाया करतीं.
मैं सबको देता आशीषें.
सबको दुलराया करता था.
सबके सुख-दुःख का साथी था-
सबके सँग जीता-मरता था.
है काल बली, सब बदल गया.
कुछ गाँव छोड़कर शहर गए.
कुछ राजनीति में डूब गए-
घोलते फिजां में ज़हर गए.
जंगल काटे, पर्वत खोदे.
सब ताल-तलैयाँ पूर दिए.
मेरे भी दुर्दिन आये हैं-
मानव मस्ती में चूर हुए.
अब टूट-गिर रहीं शाखाएँ.
गर्मी, जाड़ा, बरसातें भी.
जाने क्यों खुशी नहीं देते?
नव मौसम आते-जाते भी.
बीती यादों के साथ-साथ.
अब भी हँसकर जी लेता हूँ.
हर राही को छाया देता-
गुपचुप आँसू पी लेता हूँ.
भूले रस्ता तो रखो याद
मैं इसकी सरहद हूँ प्यारो.
दम-ख़म अब भी कुछ बाकी है-
मैं बूढ़ा बरगद हूँ यारो..
***
गीत:
तो चलूँ ……
*
जिसकी यादों में 'सलिल', खोया सुबहो-शाम.
कण-कण में वह दीखता, मुझको आठों याम..
दूरियाँ उससे जो मेरी हैं, मिटा लूँ तो चलूँ
उसमें बस जाऊँ, उसे खुद में बसा लूँ तो चलूँ ……
*
मैं तो साया हूँ, मेरा ज़िक्र भी कोई क्यों करे.
जब भी ले नाम मेरा, उसका ही जग नाम वरे..
बाग़ में फूल नया, कोई खिला लूँ तो चलूँ
उसमें बस जाऊँ, उसे खुद में बसा लूँ तो चलूँ ……
*
ईश अम्बर का वो, वसुधा का सलिल हूँ मैं तो
जहाँ जो कुछ है वही है, नहीं कुछ हूँ मैं तो..
बनूँ गुमनाम, मिला नाम भुला लूँ तो चलूँ.
उसमें बस जाऊँ, उसे खुद में बसा लूँ तो चलूँ ……
*
वही वो शेष रहे, नाम न मेरा हो कहीं.
यही अंतिम हो 'सलिल', अब तो न फेरा हो कहीं..
नेह का गेह तजे देह, विदा दो तो चलूँ.
उसमें बस जाऊँ उसे खुद में बसा लूँ तो चलूँ ……
***
स्मृति गीत / शोक गीत
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याद आ रही पिता तुम्हारी
याद आ रही पिता तुम्हारी...
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तुम सा कहाँ मनोबल पाऊँ?
जीवन का सब विष पी पाऊँ.
अमृत बाँट सकूँ स्वजनों को-
विपदा को हँस सह मुस्काऊँ.
विधि ने काहे बात बिगारी?
याद आ रही पिता तुम्हारी...
*
रही शीश पर जब तव छाया.
तनिक न विपदा से घबराया.
आँधी-तूफां जब-जब आये-
हँसकर मैंने गले लगाया.
बिना तुम्हारे हुआ भिखारी.
याद आ रही पिता तुम्हारी...
*
मन न चाहता खुशी मनाऊँ.
कैसे जग कोगीत सुनाऊँ?
सपने में आकर मिल जाओ-
कुछ तो ढाढस-संबल पाऊँ.
भीगी अँखियाँ होकर खारी.
याद आ रही पिता तुम्हारी...
२४-६-२०१०
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