सोमवार, 9 अक्तूबर 2017

muktak, geet

मुक्तक-
आस माता, पिता श्वास को जानिए
साथ दोनों रहे आप यदि ठानिए
रास होती रहे, हास होता रहे -
ज़िन्दगी का मजा रूठिए-मानिए
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माँ की मूरत सजीं देख भी आइये।
कर प्रसादी ग्रहण पुण्य भी पाइये।।
मन में झाँकें विराजी हैं माता यहीं 
मूँद लीजै नयन, क्यों कहीं जाइये?
***
गीत- 
मौसम बदल रहा
मौसम बदल रहा है, टेर रही अमराई
परिवर्तन की आहट, पनघट आई
जन-आकांक्षा नभ को छूती, नहीं अचंभा 
छाँव प्रतिनिधि, ज्यों बिजली का खंभा
आश्वासन की गर्मी, सूरज पीटे डंका
शासन भरमाता है, जनगण-मन में शंका
अपचारी ने निष्ठा, बरगद पर लटकाई
मौनी बाबा गायब, दूजा बड़बोला है
रंग भंग में मिलकर बाकी ने घोला है
पत्नी रुग्णा लेकिन रास रचाये बुढ़ापा
सुत से छोटी बीबी,लाई घर में स्यापा
घोटालों में पीछे, ना सुत नहीं जमाई
अच्छे दिन आये हैं, रखो साल भर रोजा
घाटा घटा सकें हम, यही रास्ता खोजा
हिंदी की बिंदी भी रुचे, न माँ-मस्तक पर
धड़क रहा दिल जन का, सुन द्वारे पर दस्तक
क्यों विरोध की खातिर ही विरोध हो भाई?
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salil.sanjiv@gmail.com
http://divyanarmada.blogspot.com
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