रविवार, 8 अक्तूबर 2017

doha

दोहा शतक-२  
मञ्जूषा 'मन'

*
















९-९-१९७३ 
सृजन विधा- गीत, दोहा, मुक्तक, ग़ज़ल आदि
कार्यक्रम अधिकारी, अम्बुजा सीमेंट फाउंडेशन  
प्रकाशित कृति- मैं सागर सी, हाइकु संकलन 
बलोदा बाज़ार, छतीसगढ़ 
१.
अब हमको लगने लगे, प्यारे अपने  गीत।
सपने नैनन में सजे, आप बने जो मीत।।
२.
कागज़ के टुकड़े हुए, उनके सारे नोट।
कर्मों से ज्यादा रही, क्यों नीयत में खोट।
३.
कहाँ छुपाकर हम रखें, तेरी ये तस्वीर।
भीग न जाये तू सनम, आँखों में है नीर।।
४.
ज़ख्मों पर मरहम नहीं, रखना तुम अंगार।
अनदेखी के दर्द पर, काम न आता प्यार।।
५.
दीप-शिखा बन हम जले, पाकर तेरा प्यार।
जान लुटाकर जी गए, यह जीवन का सार।।
६.
मन भीतर रखते छुपा, हमदम की तस्वीर।
बस ये ही तस्वीर है, जीने की तदबीर
७.
करी बागबानी बहुत, पर न खिल सके फूल।
क्या कोशिश में  कमी, या कुदरत की भूल??
८.
करते शोषण मर्द तो, औरत क्यों बदनाम?
किसने मर्यादा लिखी, औरत के ही नाम??
९.
सबके अपने रंग है, अपने अपने रूप।
अपने-अपने सूर्य हैं, अपनी-अपनी धूप।।
११.
महँगाई के दौर में, सबसे सस्ती जान।
दो रोटी की चाह में, बिक जाता इंसान
११.
आँसू पलकों में लिए, हम बैठे चुपचाप।
मेरे दुख को भूल कर, रास रचाते आप।।
१२.
हमने तो बिन स्वार्थ के, किये सभी के काम।
हाथ न आया सुयश हम, मुफ़्त हुए बदनाम।।
१३.
मन को सींचा अश्रु से, पर मुरझाई बेल।
बहुत कठिन लगने लगा, जीवन का  कटु खेल।।
१४.
बोलो कैसे निभ सके, पानी के सँग आग?
सुख सँग नाता है यही, डंसते बन कर नाग।
१५.
सूख गए आँसू सभी, आँखों में है प्यास।
बादल भी रूठे हुए, कौन बँधाए आस??
१६.
दुख-धागे चादर बुनी, पकड़े श्वांसें छोर।
सुख से कब सुलझी कहो, उलझी जीवन डोर??
१७..
हम सच बोलें तो उन्हें, क्यों आता है रोष?
अपने कर्मों का सदा, हमको देते दोष
१८.
अगिन शिकारी हैं छिपे, यहाँ लगाकर घात।
मन घबराता है बहुत, कौन बचाए तात??
१९.
अपने-गैरों की कहें, कैसे हो पहचान?
अपने धोखा कर रहे, मिले भले अनजान
२०.
ज़हर बुझे प्रिय के वचन, चुभते जैसे बाण।
इतनी पीड़ा सह हुए, हाय! प्राण निष्प्राण
२१.
चतुर समझता किंतु है, मन मूरख-नादान।
झूठे सारे रूप हैं, झूठी है सब शान
२२.
सूखे पोखर-ताल हैं, कहें किसे ये पीर?
और कहीं मिलता नहीं, आँखों में है नीर।।
२३.
फिर आएगी भोर कल, रखें जगाए आस।
बदलेंगे दिन ये कभी, बना रहे विश्वास।।
२४.
छिप न सके पंछी विवश, झरे पेड़ के पात।
निर्दय मौसम दे रहा, बड़े-बड़े आघात।।
२५.
सिर को पकड़े सोचता, बैठा एक गरीब।
कड़ी धूप से बच सकें, करे कौन तरकीब??
२६.
वसुधा तरसे नीर को, खो कर सब सिंगार।
मेघ नज़र आते नहीं, अम्बर के भी पार।।
२७.
थाम लिया पतवार खुद, चले सिंधु के पार।
मन में दृढ़ विश्वास ले, उतर गए मझधार।।
२८.
नीयत कब बदली कहो, बदले कपड़े रोज।
प्रेम हृदय में था नहीं, देखा हमने खोज।।
२९.
दुखे नहीं दिल आपसे, करी ऐसे कर्म।
कर्मों का फल भोगना, पड़ता समझो मर्म।।
३०.
दूजों को देखो नहीं, देखो अपने कर्म।
कुछ भी ऐसा मत करो, खुद पर आये शर्म।।
३१.
चंचल मन कब मानता, पल-पल उड़ता जाय।
छल से जब हो सामना, तब केवल पछताय।।
३२.
चंचलता अभिशाप है, रखना इसका ध्यान।
सोच-समझ कर चल सदा, सच को ले अनुमान।।
३३.
अब तक हमने था रखा, अपने मन पर धीर।
आँखों ने कह दी मगर, तुम से मन की पीर।।
३४.
सबके अपने दर्द हैं, कौन बँधाए धीर?
अपने-अपने दर्द हैं, अपनी-अपनी पीर।।
३५.
जाने क्या-क्या कह गया, बह नयनों से नीर।
हमने कब तुमसे कही, अपने मन की पीर।।
३६.
दिल को छलनी कर गए, कटु वचनों के तीर।
चुप रहकर हम सह गए, फिर भी सारी पीर।।
३७.
सोचा कब परिणाम को, चढ़ा प्रेम का जोश।
अपना सब कुछ खो दिया, जब तक आया होश।।
३८.
दिन भर छत पर पकड़ते, धूपों के खरगोश।
बचपन जैसा अब नहीं, बचा किसी में जोश।।
३९.
सीखो मुझसे तुम जरा, कहता है इतिहास।
अनुभव से मैं हूँ भरा, कल को कर दूँ खास।।
४०.
आनेवाला कल अगर, करना चाहो खास।
एक बार देखो पलट, तुम अपना इतिहास।।
४१.
सौंपा हमने आपको, अपने मन का साज।
मन वीणा में देखिये, सरगम बजती आज।
४२.
गली -गली चलने लगे, महाभारती दाँव।
कुरुक्षेत्र में अब कहो, कहाँ मिलेगी छाँव।।
४३.
युद्ध छिड़ा चारों तरफ, मचा सब तरफ क्लेश।
कुरुक्षेत्र सा दिख रहा, अपना प्यारा देश।।
४४.
मन ने चिट्ठी लिख रखी, गुपचुप अपने पास।
फिर भी हर पल कर रहा, है उत्तर की आस
४५.
पाती ही बाँची गई, पढ़े न मन के भाव।
बीच भँवर में डूबती, रही प्रेम की नाव
४६.
साथ मिला जो आपका, महक उठे जज़्बात।
होठों तक आई नहीं, लेकिन मन की बात।।
४७.
मन-पंछी नादान है, उड़ने को तैयार।
जब-जब भी कोशिश करी, पंख कटे हर बार
४८.
प्रेम बीज बोए बहुत, खिला नहीं पर फूल।
जिस बगिया को सींचते, वहीँ चुभे हैं शूल।।
४९.
महक रहा मन-मोगरा, तन बगिया के बीच।
समय निठुर माली न क्यों, सलिल रहा है सींच??
५०.
वर्षा बरसी प्रेम की, भीगे तन-मन आज।
धीरे-धीरे आज सब, खुले प्रेम के राज।।
५१.
थाम हाथ मन का चलो, राहें हो खुशहाल।
जीवन जीना चाह लें, हम तो सालों साल।।
५२.
सूने मन में खिल रहे, आशाओं के फूल।
बीच भँवर में पात ज्यों, मिल लगते हैं कूल
५३.
बैठा था बहुरूपिया, डाले अपना जाल।
भोला मन समझा नहीं, उसकी गहरी चाल।
५४.
प्रेम संग मीठी लगे, सूखी रोटी-प्याज।
सुख से जीने का सुनो, एक प्रेम ही राज।।
५५.
प्रेम सहित मीठी लगे, सूखी रोटी प्याज।
सुख से जीने का सुनो, एक प्रेम है राज।।
५६.
गली-गली चलने लगे, महाभारती दाँव।
कहाँ मिले कुरुक्षेत्र में, पहले जैसी छाँव??
५७.
बहा रक्त कुरुक्षेत्र में, मचा भयंकर क्लेश।
मरघट जैसा हो गय , सारा भारत देश।।
५८.
कह दें मन की बात हम, पर समझेगा कौन?
बस इतना ही सोच कर, रह जाते हैं मौन।।
५९.
करो विदा हँस कर मुझे, जाऊँ मथुरा धाम।
राधा रूठोगी अगर, कैसे होगा काम??
६०.
कान्हा तुम छलिया बड़े, छलते हो हर बार।
भोली राधा का कभी, समझ सकोगे प्यार??
६१.
जो तुम यूँ चलते रहे, प्रेम डोर को थाम?
फिर इस जीवन में कहो, दुख का क्या है काम??
६२.
धुँआ-धुँआ सा दिख रहा, अब तो चारों ओर।
जीवन की इस राह का, दिखे न कोई छोर।
६३.
कह पाते हम किस तरह, हैं कितने हैं मजबूर?
जन्मों का है फासला, इसीलिए हैं दूर।।
६४.
चीरहरण होता यहाँ, देखा हर इक द्वार।
बहन बेटियों का सुनो, हो जाता व्यापार।।
६५.
बे-मतलब लेता यहाँ, कौन किसी का नाम।
दरवाज़े पर तब दिखे, जब पड़ता है काम।।
६६.
बोलो! कैसे सौंप दें, मन जब पाया श्राप?
मन से मन को जोड़कर, सुख पायेंगे आप??
६७.
कोई अब रखता नहीं, मन दरवाजे दीप।
गहन अँधेरा छा गया, टूटी मन की सीप।।
६८.
भूखा पेट न देखता, दिवस हुआ या रात?
आँतों को रोटी मिले, तब समझे वह बात।।
६९.
कड़वी यादें आज सब, नदिया दिये सिराय।
अच्छा-अच्छा गह चलो, यही बड़ों की राय।।
७०.
अपनी-अपनी ढपलियाँ, अपने-अपने राग।
अँधियारी दीवालियाँ, गूँगे होली-फ़ाग।
७१.
बौराया सावन फिरे, बाँट रहा सन्देश।
प्रेम लुटाता फिर रहा, धर प्रेमी का भेष।।
७२.
बूँदों की बौछार से, तन-मन जाता भीज।
कर सोलह श्रृंगार 'मन', आई सावन तीज।।
७३.
जग के छल सहते रहे, फिर भी देखे ख्वाब।
काँटों पर ही देखिये, खिलते सदा गुलाब।।
७४.
प्रेम बीज बोए बहुत, खिला नहीं पर फूल।
जिस बगिया को सींचते, वहीं चुभे हैं शूल।।
७५.
जीवन विष का है असर, नीले सारे अंग।
जिन जिनको अपना कहा, निकले सभी भुजंग।।
७६.
कागज पर लिखते रहे, अंतर्मनबात।
जग जिसको कविता कहे, पीड़ा की सौगात।।
७७.
ढलती बेरा में यहाँ, कब ले कोई नाम?
उगते सूरज को रहे, करते सभी  सलाम।
७८.
ढूँढें बोलो किस तरह, कहाँ मिले आनन्द?
सब ही रखते हैं यहाँ, मन के द्वारे बन्द।।
७९.
दुख अपना देता रहा, जीवन का आनन्द।
सुख छलिया ठगता रहा, आया नहीं पसन्द।।
८०.
मुरझाये से हैं सभी, साथी फूल गुलाब।
पलकों में चुभने लगे, टूटे रूठे ख्वाब।।
८१ .
मेरे ग़म का आप 'मन', सुन लें ज़रा हिसाब।
जीने को कब चाहिए, जमजम वाला आब।।
८२.
जंगल-जंगल देखिये, बहका फिरे बसन्त।
टेसू दहके आग सा, जागी चाह अनन्त।।
८३.
जागो लो फिर आ गई, प्यारी सी इक भोर।
फूला-महका मोगरा, पंछी करते शोर।।
८४.
नस-नस में बहने लगा, अब वो बनकर पीर।
होंठो पर कुछ गीत हैं, आँखों में है नीर।।
८५.
रोजी-रोटी के लिए, तज आए थे गाँव।
कहाँ छुपाकर अब रखें, छालों वाले पाँव??
८६.
छाँव नहीं पाई कहीं, ऐसे मिले पड़ाव।
बीच भँवर में डोलती, जीवन की यह नाव।।
८७.
कैसी है यह ज़िन्दगी, पल-पल बदले रूप।
पल-दो पल की छाँव है, शेष समूची धूप।।
८८.
एक जुलाहा बैठ कर, स्वप्न बुने दिन-रैन।
मन बाहर झाँके नहीं, पाए कहीं न चैन।।
८९.
मिले नहीं हम आप से, मिले नहीं हैं नैन।
जब से मन में तुम बसे, कहीं न मन को चैन।
९०.
वारेंगे हम ज़िन्दगी, तुम पर सौ-सौ बार।
तेरी खातिर जी रहे, साँसे लिए उधार।
९१.
द्वारे पर बैठे लिए, अपने मन का दीप।
यादों के मोती सजे, नैनों की है सीप।।
९२.
बुझ जाएगा देखिये, आँखों का यह नूर।
मन दीपक बुझने लगा, होकर तुमसे दूर।।
९३.
मिलकर ही रौशन हुए, दीपक-बाती तेल।
जग उजियारा कर सके, तेरा-मेरा मेल।।
९४.
मैली तन-चादर हुई, सौ-सौ मन पर दाग।
तुझको कुछ अर्पित करूँ, मिला न ऐसा भाग।।
९५.
मालाएँ फेरीं बहुत, खूब जपा था नाम।
मन-भीतर छुपकर रहे, बड़ा अजब है श्याम।।
९६.
चिंगारी बाकी न थी, खूब कुरेदी राख।
मुरझाया हर पात था, मुरझाई थी शाख।।
९७.
गरल रोककर कण्ठ में, बाँट रहे मुस्कान।
ठोकर खा सीखे बहुत, जीवन का हम ज्ञान।।
९८.
उड़ अम्बर की ओर तू, ऐ मन! पंख पसार।
बैठे से मिलता नहीं, इस जीवन का सार।
९९.
चलने से थकना नहीं, चलना अच्छी बात।
बीतेंगे तू देखना, दुख के ये हालात।
१००.
आँखों ने पाई बहुत, आँसू की बरसात।
मेघों ने भी खूब दी, पीड़ा की सौगात।।
१०१.
मन की पीड़ा को मिली, मेघों से सौगात।
आँखों से बरसी बहुत, आँसू की बरसात।।
१०२.
बहा पसीना गाइये, आशाओं के गीत।
हो जाएगी एक दिन, उजियारे की जीत।।
१०३.
वाणी भी मीठी नहीं, कहे न मीठे बोल।
कड़वे इस संसार में, रे मन! मिसरी घोल।।
१०४.
सारा दिन खटती रहे, मिले नहीं आराम।
नारी जीवन में लिखा, काम काम बस काम।।
१०५.
पत्थर को पूजा बहुत, मिले नहीं भगवान।
मन-भीतर झाँका ज़रा, प्रभु के मिले निशान।।
१०६.
भूखे किसी गरीब घर, मने नहीं त्यौहार।
और अमीरों के यहाँ, हर दिन सजे बहार।।
१०७.
तन कोमल मिट्टी रचे, मन पाषाण कठोर।
ऊपर से भोले दिखें, अंदर बैठा चोर।।
१०८.
लोग मिले जो दोगले, रखना मत कुछ आस।
जो दो-दो सूरत रखें, उनका क्या विश्वास।।
१०९.
तेरह किसको चाहिए, कब चाहें हम तीन?
अपने साहस से करें, जीवन को रंगीन।।
११०.
पाँवों के छाले कहें, हमें न देखो आप।
बाकी है लम्बी डगर, झटपट लो 'मन' नाप।।
१११.
रिश्ते-नाते दे भुला, पद-कुर्सी का प्यार।
होता पद की आड़ में, रिश्तों का व्यापार।।

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