गुरुवार, 29 नवंबर 2018

समीक्षा- वतन को नमन

कृति चर्चा
वतन को नमन : पठनीय, मननीय, अनुकरणीय कृति 
प्रो. (डॉ.) साधना वर्मा 
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[कृति विवरण- वतन को नमन, राष्ट्रीय काव्य संग्रह, प्रो. सी.बी. एल. श्रीवास्तव 'विदग्ध', आकार डिमाई, आवरण एक रंग, सजिल्द, जैकेट सहित, पृष्ठ १३०, मूल्य १००/-, विकास प्रकाशन, विवेक सदन, नर्मदा गंज, मंडला ४८१६६१, लेखन संपर्क ०७६१ २६६२०५२]
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                             राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने लिखा है-
"जिसको न निज गौरव तथा निज देश एक अभिमान है
वह नर नहीं नर पशु निरा है और मृतक समान है।"
                             नर्मदांचल के श्रेष्ठ-ज्येष्ठ कवि प्रो. सी.बी. एल. श्रीवास्तव 'विदग्ध' ने देश की नई पीढ़ी को नर-पशु बनने से बचाने के लिए इस कृति का प्रणयन किया है। आदर्श शिक्षक रहे विदग्ध जी ने नेताओं की तरह वक्तव्य देने या तथाकथित समाज सुधारकों की तरह छद्म चिंता विकट करने के स्थान पर बाल, किशोर, तरुण तथा युवा वर्ग के लिए ही नहीं अपितु हर नागरिक में सुप्त राष्ट्रीय राष्ट्र प्रेम की भावधारा को लुप्त होने से बचाकर न केवल व्यक्त अपितु सक्रिय  और निर्णायक बनाने के लिए "वतन को नमन" की रचना तथा प्रकाशन किया है। १३० पृष्ठीय इस काव्य कृति में १०८ राष्ट्रीय भावधारापरक काव्य रचनाएँ हैं। वास्तव में ये रचनाएँ मात्र नहीं, राष्ट्रीयता भावधारा के सारस्वत कंठहार में पिरोए गए काव्य पुष्प हैं।

                             हिंदी साहित्य जिन दिनों छायावादी दौर से गुजर रहा था उन्हीं दिनों छायावादी काव्य धारा के समानांतर और उतनी ही शक्तिशाली एक और काव्यधारा भी प्रवाहमान थी। माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्णशर्मा नवीन, सुभद्राकुमारी चौहान आदि इस धारा के प्रतिनिधि कवि हैं। इन्होंने राष्ट्रीय और सांस्कृतिक संघर्ष को स्पष्ट और उग्र स्वर में व्यक्त किया है। छायावाद में राष्ट्रीयता का स्वर प्रतीकात्मक रूप में तथा शक्ति और जागरण गीतों के रूप में मिलता है। इसके बजाय माखनलाल चतुर्वेदी अपने वीरव्रती शीर्षक कविता में लिखते हैं- 
"मधुरी वंशी रणभेरी का डंका हो अब। 
नव तरुणाई पर किसको क्या शंका हो अब।" 

                             बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' विप्लव गान की रचना करते हैं- 
एक ओर कायरता काँपे गतानुगति विगलित हो जाए। 
अंधे मूढ़ विचारों की वह अचल शिला विचलित हो जाए। 

                             सुभद्राकुमारी चौहान ने झाँसी की रानी के रूप में पूरा वीरचरित ही लिख दिया - 
जाओ रानी याद करेंगें ये कृतज्ञ भारतवासी। 
तेरा ये बलिदान जगायेगा स्वतंत्रता अविनाशी। 

                           छायावाद की सीमारेखा इस धारा की सीमारेखा नहीं है। इसने पूर्ववर्ती मैथिलीशरण गुप्त और परवर्ती दौर में भी रामधारी सिंह दिनकर के साथ अपना स्वर प्रखर बनाए रखा।
सहनशीलता, क्षमा, दया को तभी पूजता जग है;
बल का दर्प चमकता उसके पीछे जब जगमग है।

                             नर्मदांचल में भारत माता, देश अपना हिन्दोस्तां, देश हमारा, अपना भारत, जग का अनुपम रतन, भारत हमारा प्यारा, सींचा था जिसे शहीदों ने, भगवान अब फिर आइए, मेरे देश के लिए, जब बीती यादें आती हैं, भारत की वंदना में, कहीं गाँधीका पैगाम नहीं दिखता, सद्भावना और प्यार का संसार चाहिए, आज जरूरत है भारत को, तब और अब, हमारे देश की धरती, क्रांति की अमर कहानी, पुनीत पर्व, गणतंत्र दिवस पर, कर सको कुछ अगर, समय है नाज़ुक मिज़ाज़, दृढ़वती संयमी को प्रणाम, हमारा वतन भारत, गणतंत्र हो अमर, हिमालय, तरुण पीढ़ी से, भारत हमें प्यारा, राजनेताओं से, किसी को राह कैसे दे सकेंगे बंद गलियारे, अब चुनावों के बाद, हम कहीं भी हों हमारा एक ही संसार है, बसंत आओ, बंबई बम विस्फोट दिवस पर, स्वतंत्रता दुवास पर भारतीय तरुणों से, भारत बनाम इंडिया, शहीदों की पुकार, कदम तो आगे बढ़े पर, भारत के गुमराह तरुणों से, श्रृंगार नया कर, जो लड़ता है, पौधे तो विश्व शांति के, स्वर आनेवाले तूफ़ान के, देश को चाहिए, विस्थापित पड़ोसियों से, देशवासियों से, दिल की चाहत, उजड़ी हुई बगिया में, वह हिन्दुस्तान हमारा है, आकांक्षा, बढ़ता भ्रष्टाचार, स्वप्न का संसार, मंडला की शहीदी मिट्टी की संकलन बेला में, फ़ौजी जवानों का अभिनन्दन, सेना के जवानों से, भारत की पवन माटी को प्रणाम, हम कहाँ आ गए, हम देश को अपने सही नज़रों से निहारें आदि काव्य रचनाओं  के माध्यम से  विदग्ध जी ने ५ दशकों तक राष्ट्रीय भावधारा का स्वर गुँजाने का कार्य किया। 

                             'वतन को नमन' विदग्ध जी की राष्ट्रीय चेतना से परिपूर्ण कविताओं-गीतों का संग्रह है। विदग्ध जी शिल्प पर कथ्य को वरीयता देते हुए नई पीढ़ी को जगाने के लिए राष्ट्रीय भावधारा के प्रमुख तत्वों राष्ट्र महिमा, राष्ट्र गौरव, राष्ट्रीय पर्व, राष्ट्रीय जीवन मूल्य, राष्ट्रीय संघर्ष, राष्ट्रीयता की दृष्टि से महत्वपूर्ण महापुरुष, राष्ट्रीय संकट, कर्तव्य बोध, शहीदों को श्रद्धांजलि, राष्ट्र का नवनिर्माण, नयी पीढ़ी के स्वप्न, राष्ट्र की कमजोरियाँ, राष्ट्र भाषा, राष्ट्र ध्वज, राष्ट्रीय एकता,  राष्ट्रीय सेना, राष्ट्र के शत्रु, रष्ट्रीय सुरक्षा, राष्ट्र की प्रगति, राष्ट्र हेतु नागरिकों का कर्तव्य एवं दायित्व आदि को गीतों में ढालकर पाठक को प्रेरित करने में पूरी तरह सफल हुए हैं। भारत का गौरव गान करते हुए वे कहते हैं- 
हिमगिरि शोभित, सागर सेवित, सुखदा, गुणमय, गरिमावाली। 
शस्य-श्यामला शांतिदायिनी, परम विशाला वैभवशाली।।
ममतामयी अतुल महिमामय, सरलहृदय मृदु ग्रामवासिनी। 
आध्यात्मिक सन्देशवाहिनी, अखिल विश्व मैत्री प्रसारिणी।।
प्रकृत पवन पुण्य पुरातन, सतत नीति-नय-नेह प्रकाशिनि। 
सत्य बंधुता समता करुणा, स्वतन्त्रता शुचिता अभिलाषिणी।।
ज्ञानमयी, युवबोधदायिनी, बहुभाषा भाषिणि सन्मानी। 
हम सबकी मी भारत माता, सुसंस्कारदायिनी कल्याणी।। 

                             कहा जाता है 'अग्र' सोची सदा सुखी' अर्थात जो आनेवाले संकट का पूर्वानुमान कर लेता है वह पूर्व तैयारी कर उससे जूझकर विजय पा सकता है- 
सुन पड़ते स्वर मुझे साफ़ आनेवाले तूफ़ान के 
छीने जाते सुख दिन-दिन ईमानदार इंसान के 
                             लगभग २५ वर्ष पूर्व रची गई यह कविता रचना काल की अपेक्षा आज अधिक प्रासंगिक हो गई है। देश के नागरिकों का चरित्र देश की असली ताकत है। सच्चरिते और देशभक्त नागरिक देश को गंभीर से गंभीर संकट से निकाल सकते हैं। विदग्ध जी कहते हैं- 
आज जरूरत है भारत को बस चरित्र निर्माण की 
नहीं किसी नारे आंदोलन की, न किसी अभियान की 

                             देश के युवाओं का आव्हान करते हुए वे उन्हें युग निर्माता बताते हैं- 
हर नए युग के सृजन का भर युवकों ने सम्हाला 
तुम्हारे ही ओज ने रच विश्व का इतिहास डाला 
प्रगति-पथ का अनवरत निर्माण युवकों ने किया है-
क्रांति में भी, शांति में भी, सदा नवजीवन दिया है 

                             देश, उसकी स्वतंत्रता और देशवासियों के रक्षक सेना के रणबांकुरों के प्रति देश की भावनाएं कवि  के माध्यम से अभिव्यक्त हुई हैं- 
तुम पे नाज़ देश को, तुम पे हमें गुमान 
मेरे वतन के फौजियों जांबाज नौजवान 

                             देश के राजनैतिक क्षितिज पर उठ रहे विवादों की निस्सारता को शब्दांकित करते हुए कवि 'क्षमा करो और भूल जाओ' की नीति के अनुसार देश की वंदना में हर देशवासी से स्वर मिलाने का आव्हान करता है- 
बस याद रख वतन को, सब एक साथ मिलकर
भारत की वंदना को, सब एक स्वर से गाओ
समृद्ध जो विरासत तुमको मिली है उसको 
अपने सदाचरण से कल के लिए सजाओ

                             संस्कारधानी जबलपुर राष्ट्रीय भावधारा के इस सशक्त हस्ताक्षर की काव्य साधना से गौरवान्वित है। हिंदी साहित्य के लब्ध प्रतिष्ठ हस्ताक्षर आचार्य संजीव 'सलिल' देश की माटी के गौरवगान करने वाले विदग्ध जी के प्रति अपने मनोभाव इस तरह व्यक्त करते हैं- 
हे विदग्ध! है काव्य दिव्य तव  सलिल-नर्मदा सा पावन 
शब्द-शब्द में अनुगुंजित है देश-प्रेम बादल-सावन 
कविकुल का सम्मान तुम्हीं से, तुम हिंदी की आन हो
समय न तुमको बिसरा सकता, देश भक्ति का गान हो 
चिर वन्दित तव सृजन साधना, चित्रगुप्त कुल-शान हो 
करते हो संजीव युवा को, कायथ-कुल-अभिमान हो 
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सम्पर्क: प्रो. (डॉ.) साधना वर्मा, शासकीय मानकुँवरबाई स्वशासी स्नाकोत्तर अर्थ-वाणिज्य महाविद्यालय, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१  

   



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