रविवार, 4 नवंबर 2018

doha-doha diwali

दोहा दोहा दिवाली
* ऋद्धि-सिद्धि दीपक लिए, बालें ज्योत गणेश। जगजननी-जगपिता दें, वर हो सुखी हमेश।। * संग विरंचि-सरस्वती, बाल रहे हैं दीप। शारद कहें बचाइए, केश न जलें महीप।। * दीवाली पर करेंगे, किसका पूजन नाथ। रमा पूछकर हँस रहीं, विष्णु जोड़ते हाथ।। * कहाँ जलाऊँ दीप मैं, नारद हैं हैरान। तीन लोक में घूमता, कहीं न मगर मकान।। *
मत्स्य नयन दो दीप सम, जगमग-जगमग दिव्य।
ज्ञान-शिखा ले बढ़ चले, लिखें कहानी नव्य।।
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कच्छप जल से धरा पर, हुए प्रगट बन दीप।
जीवन-ज्योति तभी जली, प्रकृति-आँगना लीप।।
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जलधि जीत वाराह ने, किया धरा-उद्धार।
रवि दीपक से पा सकी, धरती तब उजियार।।
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दिया लिए प्रह्लाद थे, कुपित नृसिंह भगवान्।
शांत लक्ष्मी जी करें, दो प्रकाश मतिमान।।
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नयन दीप असमय बुझा, वामन का पथ रोक।
शुक्र डरे, पग सिर-धरें, बलि बोले सह शोक।।
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परशुराम के क्रोध से, दीपक-शिखा अभीत।
नृप-वध-तम हर कह रही, जलना जीवन-रीत।।
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पंचवटी में लीपते, लछमन आँगन आज।
चौक पूर सीता हँसी, रघुवर अद्भुत राज।। * जमुना तट पर दीप ले, छवि देखें गोपाल। सलिल-लहर में बिम्ब लख, हुईं राधिका लाल।। *
नयन दीप थे बुद्ध के, बंद तिमिर घन घोर।
उषा-सुजाता ज्योति ले, प्रगटी खीर अँजोर।।
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दोहा दीपक बालिए, घटे तिमिर का राज। कुंभकार की कुटी में, हो प्रकाश इस व्याज।। * संजीव, ४-११-२०१८
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